ऋतु त्यागी की रचनाएँ

मैं अपने हर जन्म में

“मैं अपने हर जन्म में स्त्री ही होना चाहूँगी”।
मैंने एक दिन अपनी प्रार्थना
ईश्वर के कानो में फुसफुसायी।
ईश्वर ने मेरी तरफ देखा
और मुस्कुराकर
मेरे भीतर रेंगते दर्द
गिले शिकवों की लंबी प्रार्थनाओं का
ब्यौरा मेरे सामने रख दिया
जो मैंने बार बार उनके सामने
हर उस समय दर्ज़ की थी
जब मेरे पलकों से
आसुँओं के झरने झरझराये थे।
मैं अचरज में थी
कि ईश्वर को मेरी एक-एक प्रार्थना की ख़बर थी
बस मैं ही थी जो भूलती जा रही थी
मैंने एक बार फिर
ईश्वर की तरफ अपनी प्रार्थना भरी नज़र से देखा
और बुदबुदायी जो सिर्फ़ उन्होंने सुना
और मेरे भीतर रेंगते दर्द
गिले शिकवों की मेरी
लंबी प्रार्थनाओं का ब्यौरा समेटकर चले गये
मैंने तो बस उस समय
उनसे इतना ही कहा था
कि “एक स्त्री ही है जो
अपने हर दर्द से पर्दा सरकाकर
फिर से जुटा लेती है उम्मीदों का मरहम
पर
पुरुष का क्या ?
वो चुप- चुप रोयेगा
पर ख़ुद को कभी स्त्री नहीं होने देगा”।

राजनीति की कसौटी

सबको पछाड़कर
आगे बढ़ने की कला में
वह निष्णात था।
दूसरों के अधिकारों में सेंध लगाते हुए
उसे अक्सर देखा जा सकता था।
कईं बार वह औरों को धकियाने से भी
परहेज़ न करता था।
शीर्ष पर पहुँचने की उसकी लालसा उसकी आँखों में
बल्ब की तेज़ रोशनी की तरह
कभी भी चमक उठती।
दूसरों के कानों में
बातों की बत्ती डालकर घुमाने का उसका अपना अंदाज था।
राजनीति की गुणवत्ता की कसौटी पर
जब उसे परखा गया
तब वह उस पर
शत-प्रतिशत खरा पाया गया ।

सुबह उठा सूरज

सुबह उठा सूरज
और पकड़ बैठा आकाश की धोती का छोर
आकाश ने बाल सूरज के सिर को थपथपाया
मुलायम इशारे से पास बुलाया
सूरज भागा-भागा आया
साथी किरणों को भी खींच लाया
आकाश ने दोनों को अपनी गोद में उठाया
आकाश पर अब सूरज का डेरा था।
फिर चमचम करती दोपहर आयी
सूरज और दोपहर जमकर खेले
आकाश जलता रहा दिनभर
तपन धरती पर भी रही।
दूर खड़ी शाम पेड़ों की ओट से देख रही थी ये दृश्य
सूरज और दोपहर की धमाचौकड़ी के बीच
शाम चुपके से आकाश के आँगन में उतर आयी थी
पर आते-आते वह जलते आकाश के लिये
अपना सुरमई दुपट्टा उठा लाना न भूली थी।

इक दरिया और इक किनारा 

इक दरिया था और इक किनारा।
दोनों की हदें थी
और हदों का ख़्याल भी
पर दरिया दरिया था
हदों का ख़्याल होते हुए भी
उसे तोड़ने की ख़्वाहिश
जब तब दिल में दस्तक देती रहती।
गुरूर भी था हदों से बाहर होने का
और इक दिन दरिया
किनारे को तोड़
बहता गया बहता गया
अब सिर्फ़ वही था सिर्फ़ वही।
किनारा डूब चुका था
और उसका वज़ूद दरिया में।
दरिया अब अकेला था बिल्कुल अकेला।
उसने इक निगाह अपने चारों ओर डाली
पर ये क्या ?
भीतर तक थर्रा गया वह
क्योंकि वह अपने ही सैलाब में डूब चुका था
किनारे का नाम-ओ-निशाँ मिट चुका था
पर अब दरिया बहुत परेशाँ था
किस से टकराये ?
और किसको दिखाये अपना गुरूर ?

मौत और हम 

मौत ने दबी आवाज में पुकारा
और रूह
शरीर को छोड़कर चलती बनी।
वक़्त पर इल्ज़ाम है
कि वो किसी के लिए नहीं ठहरता
और साँसों पर
कि वह बीच रास्ते में दगा दे जाती हैं।
और रिश्तों का सच यही है
कि उनका सनसनीखेज़ ख़ुलासा
हमेशा किसी अपने की मौत के बाद होता है
फिर हमें महसूस होता है
कि जिनके प्यार की चाशनी
हम पर टपकती रहती थी
वह वीतरागी हो चुके हैं।
कुछ समय बाद वह हमारे
चेहरे की पहचान भी खोने लगते हैं।
मौत का एक अर्थशास्त्र भी होता है
जहाँ दावेदार क़ब्र से बाहर निकलकर
अपनी दावेदारी पेश करने लगते हैं
और जब हमारे साथ ये घट रहा होता है
तब हम हम नहीं रहते
कुछ और हो जाते हैं।

ज़िंदगी के शुरूआती दस साल

ज़िंदगी के शुरूआती दस सालों में
मैं दुनिया की वह लड़की थी
जो घर की छत के किनारे पर खड़े होकर
कर लेती थी संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा
छज्जे पर थोड़ा लटककर
नाप लेती थी संकरी गली की गहराई
टीवी की ब्लैक एंड व्हाइट स्क्रीन पर
उभरते दृश्यों से निकाल लेती थी
रात भर की गुनगुनाती थपकी
गरमी की छुट्टियों की कविता सी दोपहर में
कहानी की किसी क़िताब में घुसकर
उसके पात्रों में ख़ुद को लेती थी तलाश
अपने छोटे से फ्रॉक में समेट लाती थी
अपने इरादों का संसार
अपने शुरुआती दस सालों में
मैं शायद दुनिया की सबसे साहसी
और बे-फ़िक्र लड़की थी।

तुम नादान हो अभी

तुम नादान हो अभी
जानते नहीं ज़िंदगी की गुस्ताख़ियाँ
रोते हो
तो पल भर में ढूँढ लाते हो हँसी के टुकड़े
मैं तुम्हारी हँसी के वही टुकड़े
अपने बटुए में रखकर
रोज़ ले जाती हूँ अपने घर
और अपने घर की हवा में
घोल देतीं हूँ उन्हें
पर मैंने तुम्हारी हँसी के कुछ टुकड़े
सँभालकर रख लिए हैं अपने बटुए में
मुझे मालूम है कि आज
स्कूल के बेशक़ीमती दरवाज़े से बाहर
निकल जाओगे तुम
पर याद रखना
कि हर खुला दरवाज़ा
एक नई मंज़िल की तलाश है
इस रास्ते में बहुत से पत्थरों से
मुलाकात होगी तुम्हारी
उन पत्थरों से तुम टूटना पर बिखरना नहीं
बिखरना तो समेट लेना ख़ुद को
और अगर ज़िंदगी हँसना भुला दे
तो पीछे मुड़कर देखना
मेरे बटुए में तुम्हारी हँसी के वही टुकड़े
अभी सुरक्षित पड़ें है
चाहो तो ले जाना उन्हें।

किसी फ़िल्म की नायिका की तरह 

“भाग गई
उम्र के सोलहवें वसंत को बेलौस जीती
और
किसी फ़िल्म की नायिका की तरह
दिखने की कोशिश करती
दो लड़कियाँ”
आदर्शों की बागडोर थामे
किसी सभ्य ने अपनी
छिछली हँसी के साथ
मेरे कान में उछाला
मैंने सुना और अनसुना
और एक लंबी चुप्पी टाँगकर
उसके कंधे पर
धीरे से सरक गई।
लड़कियाँ भागती हैं
और लड़के चले जाते हैं
या भगा ले जाते हैं
किसी को
फ़र्क़ है बस इतना
एक के अंदर डर है
दूसरा निडर है।

इस बार

इस बार मैं ही करूँगी
युद्ध की मुनादी
और संधि का प्रस्ताव
निश्चित ही तुम्हारा होगा।

गली का मुहाना और तुम 

तुम यूँही ही एक दिन खड़ी थी गली के मुहाने
तुम्हारे कँधे को दबाता
वही तुम्हारा पुराना बैग तुम्हारे साथ खड़ा था
तुम शायद कहीं जाने की तैयारी में थी
तुम्हारे चेहरे पर तनाव के हल्के बादल उड़ रहे थे
मैंने उस वक्त सोचा था
कि तुम्हारे बगल में खड़ा हो जाऊँ
और उतार लूँ तुम्हारे कँधे पर रखा वह बैग
पर मैं हमेशा फैसलों की घड़ी की गुजर जाने की
हद तक उसे देखता रहता हूँ
और इस बार भी यही हुआ
मेरे सोचते- सोचते तुम रिक्शा में बैठकर
अपने दुपट्टे और अपने बैग की धरोहर सँभाले
मेरी आँखों के ठीक सामने
मुझ से अनभिज्ञ-सी चली गई
और मैं फैसले की इस घड़ी की टिक-टिक
अपने कानों की जेब में रख कर
उन्हें अपनी हथेलियों से
आज भी सहला रहा हूँ ।

मेरी ठहाकेदार हँसी

स्त्री के
व्यवहार के लिए तय
मापदंडों की दीवार में पड़ गई
थी दरार
शायद
मेरी ठहाकेदार हँसी ने
रच दिया था इतिहास।

नजरों की सीढ़ी 

एक बार मैंने अनचाहे ही चाहा
कि सबकी नज़रों की सीढ़ी की
सबसे ऊँची पायदान पर बैठ जाऊँ !
पारंगत होने केे लिए
मैंने निचली पायदान से प्रयास किया
पर पहले प्रयास में ही मेरा पैर फिसला
और मैं धड़ाम
क्योंकि मैं अनाड़ी थी सीढ़ी पर चढ़ने के फार्मूले से अनजान थी
मुझे दर्द हुआ जो कि होना ही था
पर मैंने भी बिना दर्द की परवाह किए
अपने आसपास डकैत नज़र डाली
मेरा मतलब साफ़ था
सब अपने काम से काम रखो गिरने दो मुझे
क्योंकि गिरना मेरे शौक़ में शुमार था
अब मैं एक झटके से उठी
उठते-उठते मैंने एक काम किया
सबकी नज़रों की सीढ़ी अपनी नज़रों से गिरा दी ।
उस समय मैं पहली बार अपनी नाक़ामी पर
बेसाख़्ता हँसी थी
और इस बात पर भी
कि दुनिया की नज़रों में चढ़ने पर
गिरने का ख़तरा हमेशा बना रहता है।

मेरा प्रश्न

मेरे प्रश्न पर
वह टक्क से खड़ा कर देती है अपना हाथ
मैं अपने प्रश्न को
पुस्तक के पृष्ठ में छोड़कर
उसके हाथ पर झूलते उत्तर को उतारने में व्यस्त हो जाती हूँ।

जब भी कभी

जब भी कभी
कुछ अचानक घटित होगा हमारे आसपास
तब हम अपनी
संवेदनाओं के तालाब में
एक कंकड़ फेकेंगे
और चुपचाप देखेंगे उसमें उठते हुये बुलबुले
फिर लौट आयेंगे थके मांदे
अपनी संवेदनाओं को सुलाकर
बासी दिनचर्या के पास।

हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाती लड़की और एक बे-परवाह-सी दोपहर 

हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाती लड़की
एक बे-परवाह-सी दोपहर में
परंपरा के लिफ़ाफ़े में बंद अपने आसपास की
दबी -छिपी, थकी -मांदी, औचक निगाहों को
लौटा रही है जैसे लौटा देते हैं उधारी
लड़की अपने छोटे कपड़ों में उतनी ही सहज है
जितना सहज भोर के माथे पर रखा सूरज
या आकाश की छत पर गुनगुनाता चाँद
लड़की अकेली है !
नहीं नहीं एक साथी भी है
साथी ऐसा
एक हथेली में दूसरी हथेली की करवट जैसा
दोनों प्रेम को सरका रहें है
सिगरेट के कसमसाते कश में
दोनों के बीच एक पुल है मौन का
पर प्रेम में संवाद है
उनका प्रेम कुछ ऐसा
धुएँ के आवारा बादल जैसा
जो लड़की के चेहरे पर गिरा देता है
बारिश की नशीली बूँदें
धीरे-धीरे लड़की घुल रही है हवा में
ठीक वैसे ही
जैसे धीमी आँच पर पकती चाय में घुलती है चीनी
जिसका स्वाद ज़बान पर चिपककर रह जाता है
लड़की अभी-अभी निकली है
महकते झोंके-सी
सबकी निगाहें थोड़ा पीछा कर लौट आयीं हैं
अपने-अपने दड़बों में
और
हवा मीठी ख़ुमारी में कल-कल बह रही है।

तुम्हें शायद पता न हो !

तुम्हें शायद पता न हो !
पर मुझे
तुम्हारी बरसती आँखों से इश्क है
जब तुम रोती हो
तो मैं ख़ुद को मज़बूत पाता हो
क्योंकि तब मेरा कंधा सरककर
एक वृक्ष बन जाता है
और मैं देखता हूँ
कि तुम उस पर सिर पर टिकाकर
एक छोटी बच्ची बन जाती हो
उस समय
तुम्हारी उनींदी पलकों में नाचते हैं सपने
तब मैं बादल बनकर
भीतर ही भीतर बरस रहा होता हूँ ।
जानती हो
तुम्हें शायद पता न हो !
मुझे तुम्हे
सलाहों के गुलदस्तें भेजना
बहुत पसंद है
जिन्हें तुम अपने घर के
उदास कोनो में सजा लेती हो
उस समय मुझे तुम्हारे घर में
चुपके से दाख़िल होकर
उनकी महक से
सराबोर होना बहुत पसंद है।
सुनो !
आज तुम्हें एक राज़ बताऊँ
जो शायद
तुम्हें पता न हो
आजकल मुझे तुम्हारा ख़ुद फ़ैसले लेना
और हँसते हुए
मेरी सलाहों के गुलदस्ते को
एक कोने में सरका देना
बिलकुल पसंद नहीं है
उस समय मैं
बादल की तरह फटता हूँ
और अपने ही सैलाब में डूब जाता हूँ।

तू और तेरा 

मख़मली आवाज़ का ज़ादू
ओस में लिपटी हँसी की धमक
स्वाभिमान के कोहरे में लिपटकर
चाँद सी अठखेलियाँ
खुद से ही रूठना
फिर बिख़र जाना
तेरे भीतर के पसारे में
बरसती नेह की बदली
फिर चुपके से संगत करती
कोई ख़ामोश गज़ल
तेरे मन के हाश़िए पर
खिंची रेखा को
लाँघने का हौसला
हो जाएगा तब हासिल
जब तेरी सोच का सूरज
चीरकर गहरी बदली का टुकड़ा
छा जाएगा आसमान पर
जहाँ के हर हिस्से पर
गीत तेरी कलम की
स्याही के होंगे।

बादलों की रजाई

मैं अपनी खिड़की पर ही
खींच लेती हूँ बादलों की रजाई
तमतमाता हुआ जाड़ा
अपने खुरदुरे तलुओं को
घसीटता हुआ दूर निकल जाता है।

कोशिशें उतनी ही कीजिए जितनी कि…

कोशिशें उतनी ही कीजिए
जितनी कि ज़िंदगी के कैलेन्डर में तारीख़ें
मसलन पैदाइश से लेकर
मौत तक के आंकड़ों का सफ़र
जन्मतिथि से पुण्यतिथि तक का सफ़र
और इस बीच भूख मिटाने से लेकर
सिर पर छप्पर तक की कोशिशों का दौर
अहसासों के चिरागों को
जलाये रखने की कुछ ज़िदा कोशिशें
बल्कि यूँ कहिये मियाँ
कि हम सब तारीख़ों में क़ैद हैं
और तारीख़ें मौत के बाद
यादों के मंज़र में भटकती रूहें
जिनके ठिकाने
किसी गुमशुदा याद की तरह
कभी नहीं मिलते ।

बेटी और पिता का संवाद

बेटी ने पिता से कहा
“जानते हो आप मेरे हीरो क्यों हो”
पिता की उत्सुक नज़रें
बेटी के चेहरे पर
चाँदनी की तरह फैल गयी
“क्योंकि आप मेरी
सहमतियों और असहमतियों के साथ
बिना किसी शर्त के
मेरे पीछे किसी वृक्ष की तरह
आकर खड़े हो जाते हो”
पिता बेटी के चेहरे को
दिप-दिप करते हुए
शाँत भाव से देख रहा था।

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