ऋतु पल्लवी की रचनाएँ

शब्द नहीं कह पाते 

कोई बिम्ब,कोई प्रतीक ,कोई उपमान
नहीं समझ पाते ये भाव अनाम

जैसे पूर्ण विराम के बाद शून्य-शून्य-शून्य
और पाठक रुक कर कुछ सोचता है
पर लेखक लिखता नहीं
लेखक भी कहता है पर चुक जाते हैं शब्द
समझने के लिए रीता अयाचित अंतराल .
शब्दों की कोई इयत्ता नहीं,कोई सत्ता नहीं.

असीम आकाश का निस्सीम खुलापन
अन्जानी राहों में भटकते पंछी,
अचीन्ही दिशाएँ खोजती हवाएँ
बादलों के बनते-बिगड़ते झुरमुठ
और इन सबको देखती आँखे
जो महसूसती हैं-बिलकुल निजि क्षण वह
पर कौन,कहाँ,किसे,कितना कह पाता है !

अकेलापन,अलगाववाद,कुंठा-संत्रास
आज के समय की पहचान हैं ये, अवांछित शब्द संभवतः आयातित
जिस प्रकार भारी भरकम विज्ञान के आने पर
खाली हो जाता है साहित्य का बाज़ार.
उसी प्रकार इन शब्दों ने खाली कर दिए,
शब्दों के सभी अर्थ
जैसे कभी बोलते-बोलते स्वयं रुक जाते हैं हम
बात की निरर्थकता समझकर
बहुत कुछ समेटते-समेटते
अटक जाते हैं बीच में ही कहीं.

संवेदनाएँ मरी नहीं हैं .
(मर जाएँगी तो हम जिंदा कहाँ रहेंगे?)
आज भी वह फूटकर रोता है ,
किसी विस्मृत होती सोच पर ,रोते-रोते हँस देता है.
पर मन के इस ज्वार को ,
उच्छलित होती भावनाओं को,अनियंत्रित वेदनाओं को
आवाज़ की पुकार नहीं मिलती.

धीरे -धीरे खो जाता है सब
पुकार,ज्वार,प्यार
और शब्दों से लेकर आवाज़ तक भटकते
संप्रेषण का हर आधार ,
रीते -कोरे से होकर जुट जाते हैं हम
यंत्रचालित इस संसार में अनिवार.

बंध

बंधन बांधते नहीं और बिखेरते ही हैं
अपनी हर कड़ी में व्यथा को और उकेरते ही हैं .
तुम हाथ से हाथ को बाँधते हो
उसमें छिपी सृजनता को नहीं सींचते
निर्निमेष दृष्टि के अथाह होना चाहते हो
पर अन्धकार से भय है ,
यह हृदय पर कैसा विजय है?

मन का मान कहाँ है ?
कभी मही पर,कभी मेघ में
निर्विवेक -कोई स्थान कहाँ है ?
जो बाहर की स्थिरता में सध गया
संधान गति की तरलता का पा गया
पर अतलता की उसे कहाँ कुछ टोह
जड़ का इतना मोह,चेतना से बिछोह !

बाँध लाए थे तुम एक फूलों का गुच्छा
तब से नित्य देखती हूँ-
गुलदान की ऊँची प्राचीरों में
कांच की दीवारों में ,
गलते-सूखते-घुटते गुलाब को
और चकित होती हूँ !
किसी की व्यथा से पगे उदगार
कैसे हो सकते हैं मुझे उपहार ?

नेह बंधन कब हैं ?
वह तो मेह है-कूल है
जो केवल किनारे पर खड़ा रहता है
और अपनी लहर को तड़ाग नहीं
विपथगा होने देना चाहता है- होने देता है .

दुष्कर – एक क्षण को ही सही
मैं सहज स्फूर्ति वरदान होना चाहती हूँ
नित्य का अभिशाप नहीं
मैं बंध कर क्या कह सकूंगी
स्वत्व को खोकर कितनी सत्व रहूंगी ?

कभी देखा है ग्रीष्म से उतप्त पवन को
बंध किवाडों मैं,झरोखों में ढकेलकर
उमस होकर क्लेद बन जाते -बह जाते हुए
जो निःसंग ,निर्वाक ,निर्विरोध
संध्या तक बहती तो संभवतः
प्रशांत हो भी जाती !

मुस्काना

दो कलि सामान कोमल अधरों पर
शांत चित्त की सहज कोर धर
अलि की सरस सुरभि को भी हर
प्रथम उषा की लाली भर कर
स्निग्ध सरस सम बहता सीकर
चिर आशा का अमृत पीकर
साँसों की एक मंद लहर से
कलि द्वय का स्पंदित हो जाना
तभी उन्हीं के मध्य उभरते
मुक्तक पंक्ति का खिल जाना
जीने से कहीं सुखकर लगता है
ऐसे मुस्काने पर,
सर्वस्व त्यागकर मिट जाना !

मृत्यु

जब विकृत हो जाता है,हाड़-मांस का शरीर
निचुड़ा हुआ निस्सार
खाली हो जाता है
संवेदना का हर आधार..
सोख लेता है वक्त भावनाओं को,
सिखा देते हैं रिश्ते अकेले रहना (परिवार में)
अनुराग,ऊष्मा,उल्लास,ऊर्जा,गति
सबका एक-एक करके हिस्सा बाँट लेते हैं हम
और आँख बंद कर लेते हैं.
पूरे कर लेते हैं-अपने सारे सरोकार
और निरर्थकता के बोझ तले
दबा देते हैं उसके अस्तित्व को
तब वह व्यक्ति मर जाता है,अपने सारे प्रतिदान देकर
और हमारे केवल कुछ अश्रु लेकर..

उम्मीद

तुम्हारा प्यार डायरी के पन्ने पर
स्याही की तरह छलक जाता है
और मैं उसे समेट नहीं पाती
मेरे मन की बंजर धरती उसे सोख नहीं पाती.

रात के कोयले से घिस -घिस कर
मांजती हूँ मैं रोज़ दिया
पर तुम्हारे रोशन चेहरे की सुबह
उसमे कभी देख नहीं पाती.

सीधी राह पर चलते फ़कीर
से तुम्हारे भोले सपने
चारों ओर से घिरी पगडंडियों पर से
रोज़ सुनती हूँ उन्हें
पर हाथ बढाकर रोक नहीं पाती.

मेरा कोरा मन ,रीता दिया
उलझे सपने ,रोज़ कोसते हैं मुझे
फिर भी जिए जाती हूँ
क्यूंकि जीवन से भरी ये तुम्हारी ही हैं उम्मीदें
जिनको मायूसी रोक नहीं पाती और एकाकीपन मार नहीं पाता….

क्यों नहीं 

नीला आकाश ,सुनहरी धूप ,हरे खेत
पीले पत्ते ही क्यों उपमान बनते हैं !

कभी बेरंग रेगिस्तान में क्यों
गुलाबी फूलों की बात नहीं होती ?

रूप की रोशनी ,तारों की रिमझिम,
फूलों की शबनमी को ही क्यों सराहते हैं लोग!

कभी अनमनी अमावस की रात में क्यों
चाँद की चांदनी नहीं सजती ?

नेताओं के नारे ,पत्रकारों के व्यक्तव्य
कवि के भवितव्य ही क्यों सजते हैं अखबारों में!

कभी आम आदमी की संवेदना का सम्पादन
क्यों नहीं छपता इन प्रसारों में ?

मैं तुम्हें प्रेम भरी पाती ,संवेदनशील कविता,सन्देश,आवेश
या आक्रोश कुछ भी न भेजूं!

फिर भी मुखरित हो जाए मेरी हर बात
कभी क्यों नहीं होता ऐसा शब्दों पर,मौन का आघात..?

कभी-कभी यूँ ही मुस्काना 

कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है.

पावस के पीले पत्तों को स्वर्ण रंग दे
हार बना निज स्वप्न वर्ण दे
वासंती सा मोह जगाना,मन को भाता है.
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है .

व्यर्थ जूही-दल,मिथ्य वृन्द-कमल
केवल भरमाने को प्रस्तुत रंग-परिमल
इससे तो सुदूर विपिन में गिरे पलाश का मान बढ़ाना,मन को भाता है.
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है.

गर्मी के आतप से जलती जेठ-दुपहर में
एक-एक कर तिनका चुनते,नन्हें से पंछी के संग में
छोटा सा एक नीड़ बनाना,मन को भाता है .
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है.

हैं असीम आशाएं सबकी,सतरंगी सुख-स्वप्न सभी के
मनुज चाहता स्वार्थ सिद्धि हित,सारे मुक्तक भाग्य निधि के
इससे तो निस्पृह बच्चे की निश्छल इच्छा बन जाना,मन को भाता है .
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है.

जुड़े कई निश्चित से बंधन इस जीवन में
कई हैं अपने रिश्ता-नाते ,जग प्रांगण में
किन्तु किसी अंजान पथिक को अपना कहकर स्वयं मिट जाना,मन को भाता है.
कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है.

घर 

भीड़ भरी सड़कों की चीख़ती आवाज़ें
अक्सर खींचती हैं मुझे..
और घर के सन्नाटे से घबराकर,
में उस ओर बढ़ जाती हँ
…ठिठक-ठिठक कर क़दम बढाती हूँ।

भय है मुझे उन विशालकाय खुले रास्तों से
कि जहाँ से कोई रास्ता कहीं नहीं जाता है
बस अपनी ओर बुलाता है।

पर यह निर्वाक शाम
उकताहट की हद तक शान्ति (अशांति)
मुझे उस ओर धकेलती है
…कुछ दूर अच्छा लगता है
आप अपने में जीने का स्वाद सच्चा लगता है

चार क़दम बढ़ाती हूँ–
अपने को जहाँ पाती हूँ– वहाँ से,
मुड़कर… फिर मुड़कर देखती हूँ!
मुझे भय है,
घर की दीवारों-दरवाज़ों का, जो अभी तक जीते हैं
उन आदर्शों का जो इतना नहीं रीते हैं,
मुझे भय ह– अपने पकड़े जाने का
किसी और के हाथ नहीं,
अपने अंतर में जकड़े जाने का।

ये डर मुझे बढ़ने नहीं देते
उन पुकारते स्वरों को मेरे क़दमों से जुड़ने नहीं देते
और मैं स्वयं को पीछे समेटती,
इतनी बेबस हो जाती हूँ
…कि घर को अपने और नज़दीक पाती हूँ

अकेलापन

एक दिन जब बहुत अलसाने के बाद आँखे खोलीं,
खिड़की से झरते हल्के प्रकाश को बुझ जाते देखा
एक छोटे बच्चे से नन्हे सूरज को आते-जाते देखा
नीचे झाँककर देखा हँसते–खिलखिलाते,
लड़ते-झगड़ते पड़ोस के बच्चे
प्रातः के बोझ को ढोते पाँवों की भीड़
पर स्वर एक भी सुनाई नहीं पड़ा
या यूँ कहूँ कि सुन नहीं सका।

कमरे में बिखरी चीज़ों को समेटने में लग गया
चादर,पलंग,तस्वीरें,किताबें
सब अपनी-अपनी जगह ठीक करके, सुने हुए रिकॉर्ड को पुनः सुना
मन को न भटकने देने के लिए
रैक की एक-एक किताब को चुना
इस साथी के साथ कुछ समय बिताकर
पहली बार निस्संगता का भाव जगा
ध्यान रहे– सबसे विश्वसनीय साथी ही,
साथ न होने का अहसास जगाते हैं।

दिन गुज़रता रहा और अपना अस्तित्व फैलाता रहा
पाखिओं के शोर में भी शाम नीरव लगी
मन जागकर कुछ खोजता था–
ढलती शाम में सुबह का नयापन!
आस तो कभी टूटती नहीं है
सब डूब जाता है तब भी नहीं।

मन में आशा थी उससे दूर जाने की
उस एकाकीपन के साम्राज्य से स्वयं को बचाने की
मैं निस्संग था ,पर एकाकी नहीं
मेरा अकेलापन मेरे साथ था !

दिन के हर उस क्षण में, जब मैं
प्रकृति में, लोगों में, किताबों में
अपनी,केवल अपनी इयत्ता खोजता था.
और उसने कहा–
तुम चाहकर भी मुझसे अलग नहीं हो सकते,
मत होओ -क्योंकि तुम्हारा वास्तविक स्वरूप
केवल मैं ही पहचानता हूँ।

यहाँ सब भटकते हैं स्वयं को खोजने के लिए,
अपने अस्तित्व की अर्थवत्ता जानने के लिए,
और मैं तुम्हारी उसी अर्थवत्ता की पहचान हूँ।
संसार की भीड़ में तुम मुझे ही भूल जाते हो
इसलिए अपना प्रभाव जताने के लिए,
मुझे आना पड़ता है ,
मानव को उसके मूल तक ले जाना पड़ता है

…और अब मेरे आस-पास घर, बच्चे, किताबें
लोग, दिन, समय कुछ भी नहीं था
केवल दूर-दूर तक फैला अकेलापन था।

नए हाइकु

1- नभ में पंछी
सागर – तन मीन
कहाँ बसूँ मैं ?
2- कितना लूटा
धन संपदा यश
घर न मिला .
3-चंदन -साँझ
रच बस गयी है
मन खाली था.
4-स्याही से मत
लिखो ,रचनाओं को
मन उकेरो .
5-बच्चे को मत
पढ़ाओ तुम ,मन
उसका पढ़ो.

6-बात सबसे
करते हैं ,मगर
मन की नहीं .
7-अकेली तो हूँ
मगर भीड़ को भी
ओढ़ लेती हूँ.

8-विश्वास टूटा
मानवता का एक
पाठ पा लिया .
9-भोग्या – नारी
विज्ञापन जग के
नशे से बचो .
10- माँ ने भी जब
छोटी बात बनाई
लगी पराई .
11-आकाश ओढ़ो
तारों को बिछा दो
स्वप्न सोएँगे .
12- पूजाघर तो
बनाओ, पर घर
तोड़ो न कभी .
13-शहर बसा
गाँव की कब्र पर
सहर नहीं !
14- अब इंसान
में बम बसता है
ब्रह्म तो नहीं !

15-घर गली औ
दुकान क्या ,शहर
सुनसान हुए .
16एक , दो , तीन
गलतियाँ जीवन
की , कम नहीं !
17-खोया पल न
लौटे फिर ,जीवन
लौट जाता है .
18- कोरे पन्ने हैं
किताब के , जीवन
लिखता नहीं .
19-आज कितनी
द्रौपदियाँ हैं , पर
कृष्ण कंस हैं .
20 गुरु- शाप से
आज अर्जुन बना
एकलव्य है .
21-
रोको झेलम
या चनाब को, धार
आर-पार है .

22- नारी श्रद्धा है
आज इड़ा भी वही
सचेत रहो !
23-मेरे रंग की
आभा लाई ,बेटी क्यों
हुई पराई !
24- ओस- सी नर्म
निश्छल- सी दुनिया
नन्ही कलियाँ !
25-वाणी -सी शुभ्र
लक्ष्मी सी वरदायी
बिटिया आई .
26- हम साथ ही
चलते रहे, तो भी
क्या रास्ते पटे !
27-समय -शिला
सब कुछ लिखे ,तो
कठोर क्यों ?
28-सूरजमुखी-
सा मन खिला पर
मुरझाया भी .
29-सर्दी में जब
ये धूप अलसाई
तू याद आई .
30- मन अकेला
भीड़ का रेला , मेला
किस काम का .
31-बेटे की ऊँची
पढ़ाई , क्या कटाई ?
सिर्फ बुआई .
32-हवा चली ले
झीनी नर्मी , हरती
मन की गर्मी .
33-संवेदन की
खिली छटा निराली ,
फिर भी खाली .
34- हाथ – हाथ में
बात – बात में खिले
मैं और तुम .
35-तुंग शैल भी
घन की नमी पर
रो पड़ता है .
36- साथ तुम्हारा
प्यार है ,घर नहीं
न ही द्वार है .
37-सब माँगा जो
जीवन से ,मुझे ही
क्यों छोड़ दिया  ?

औरत

पेचीदा, उलझी हुई राहों का सफ़र है
कहीं बेवज़ह सहारा तो कहीं खौफ़नाक अकेलापन है
कभी सख्त रूढि़यों की दीवार से बाहर की लड़ाई है…
..तो कभी घर की ही छत तले अस्तित्व की खोज है
समझौतों की बुनियाद पर खड़ा ये सारा जीवन
जैसे-जैसे अपने होने को घटाता है…
दुनिया की नज़रों में बड़ा होता जाता है
…कहीं मरियम तो कहीं देवी की महिमा का स्वरूप पाता है!

आप अपना…

आज मैंने आप अपना आईने में रख दिया है
और आईने की सतह को
पुरज़ोर स्वयं से ढक दिया है।

कुछ पुराने हर्फ– दो-चार पन्ने
जिन्हें मैंने रात की कालिख बुझाकर
कभी लिखा था नयी आतिश जलाकर
आज उनकी आतिशी से रात को रौशन किया है।

आलों और दराजों से सब फाँसे खींची
यादों के तहखाने की साँसें भींची
दरवाज़े से दस्तक पोंछी
दीवारों के सायों को भी साफ़ किया है।

जीने भी दो

महानगर में ऊँचे पद की नौकरी
अच्छा-सा जीवन साथी और हवादार घर
यही रूपरेखा है-
युवा वर्ग की समस्याओं का और यही निदान भी।

इस समस्या को कभी आप तितली,
फूल और गंध से जोड़ते हैं,
रूमानी खाका खींचते हैं,
उसके सपनों, उम्मीदों-महत्वाकांक्षाओं का।

कभी प्रगतिवाद, मार्क्सवाद, सर्ववाद से जोड़कर
मीमांसा करते हैं उसके अन्तर्द्वन्द्व
साहस और संघर्ष की।
छात्र आन्दोलनों, युवा रैलियों, राजनीति से जोड़ते हैं
कभी उसके अन्दर के
विद्रोह, क्रान्ति और सृजन को।

मत बांधिए उसके अन्दर की आग को इन परिभाषाओं में
जिन से जुड़कर वह केवल
वाद, डंडों और मोर्चों का होकर रह जाता है।

जीने दीजिये उसे अपना नितांत निजी जीवन
अपने सपने, अपना संघर्ष
अपनी समस्याएँ, अपना निदान!

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