ऋषभ देव शर्मा की रचनाएँ

अश्लील है तुम्हारा पौरुष

पहले वे
लंबे चोगों पर सफ़ेद गोल टोपी
पहनकर आए थे
और
मेरे चेहरे पर तेजाब फेंककर
मुझे बुरके में बाँधकर चले गए थे।

आज वे फिर आए हैं
संस्कृति के रखवाले बनकर
एक हाथ में लोहे की सलाखें
और दूसरे हाथ में हंटर लेकर।

उन्हें शिकायत है मुझसे!

औरत होकर मैं
प्यार कैसे कर सकती हूँ ,
सपने कैसे देख सकती हूँ ,
किसी को फूल कैसे दे सकती हूँ!

मैंने किसी को फूल दिया
– उन्होंने मेरी फूल सी देह दाग दी।
मैंने उड़ने के सपने देखे
– उन्होंने मेरे सुनहरे पर तराश दिए।
मैंने प्यार करने का दुस्साहस किया
– उन्होंने मुझे वेश्या बना दिया।

वे यह सब करते रहे
और मैं डरती रही, सहती रही,
– अकेली हूँ न ?

कोई तो आए मेरे साथ ,
मैं इन हत्यारों को –
तालिबों और मुजाहिदों को –
शिव और राम के सैनिकों को –
मुहब्बत के गुलाब देना चाहती हूँ।
बताना चाहती हूँ इन्हें —

“न मैं अश्लील हूँ , न मेरी देह।
मेरी नग्नता भी अश्लील नहीं
-वही तो तुम्हें जनमती है!
अश्लील है तुम्हारा पौरुष
-औरत को सह नहीं पाता।
अश्लील है तुम्हारी संस्कृति
– पालती है तुम-सी विकृतियों को!

“अश्लील हैं वे सब रीतियाँ
जो मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद करती हैं।
अश्लील हैं वे सब किताबें
जो औरत को गुलाम बनाती हैं,
-और मर्द को मालिक / नियंता।
अश्लील है तुम्हारी यह दुनिया
-इसमें प्यार वर्जित है
और सपने निषिद्ध!

“धर्म अश्लील हैं
-घृणा सिखाते हैं!
पवित्रता अश्लील है
-हिंसा सिखाती है!”

वे फिर-फिर आते रहेंगे
-पोशाकें बदलकर
-हथियार बदलकर;
करते रहेंगे मुझपर ज़्यादती।

पहले मुझे निर्वस्त्र करेंगे
और फिर
वस्त्रदान का पुण्य लूटेंगे।

वे युगों से यही करते आए हैं
– फिर-फिर यही करेंगे
जब भी मुझे अकेली पाएंगे!

नहीं; मैं अकेली कहाँ हूँ…
मेरे साथ आ गई हैं दुनिया की तमाम औरतें…
–काश ! यह सपना कभी न टूटे!

बनाया था माँ ने वह चूल्हा

चिकनी पीली मिट्टी को
कुएँ के मीठे पानी में गूँथ कर
बनाया था माँ ने वह चूल्हा
और पूरे पंद्रह दिन तक
तपाया था जेठ की धूप में
दिन – दिन भर

उस दिन
आषाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा,
हमारे घर का बगड़
बूँदों में नहा कर महक उठा था,
रसोई भी महक उठी थी –
नए चूल्हे पर खाना जो बन रहा था।

गाय के गोबर में
गेहूँ का भुस गूँथ कर
उपले थापती थी माँ बड़े मनोयोग से
और आषाढ़ के पहले
बिटौड़े में सजाती थी उन्हें
बड़ी सावधानी से।

बूंदाबांदी के बीच बिटौड़े में से
बिना भिगोए उपले लाने में
जो सुख मिलता था ,
आज लॉकर से गहने लाने में भी नहीं मिलता।

सूखे उपले
भक्क से पकड़ लेते थे आग
और
उंगलियों को लपटों से बचाती माँ
गही में सेंकती थी हमारे लिए रोटी
-फूले-फूले फुलके।

गेहूँ की रोटी सिंकने की गंध
बैठक तक ही नहीं , गली तक जाती थी।
हम सब खिंचे चले आते थे
रसोई की ओर।

जब महकता था बारिश में बगड़
और महमहाती थी गेहूँ की गंध से रसोई –
माँ गुनगुना उठती थी
कोई लोकगीत – पीहर की याद का।

माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी।

बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं।
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को।

आग बढ़ती है
तो रोटी जलने लगती है।
तेरे बहनोई को जली रोटी पसंद नहीं रे!
रोटी को बचाती हूँ तो उँगली जल जाती है।

माँ की उँगलियाँ छालों से भर जाती थीं
पर पिताजी की रोटी पर एक भी काला निशान कभी नहीं दिखा!

माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी।

बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं।
मेरे बीरा! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके ,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को।

आग बुझती है
तो रोटी फूलती नहीं
तेरा भानजा अधफूली रोटी नहीं खाता रे!
बुझी आग जलाती हूँ तो आँखें धुएँ से भर जाती हैं।

माँ की आँखों में मोतियांबिंद उतर आया
पर मेरी थाली में कभी अधफूली रोटी नहीं आई!

माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी।

रोटी बनाना सीखती मेरी बेटी
जब तवे पर हाथ जला लेती है,
आँखें मसलती
रसोई से निकलती है।
तो लगता है
माँ आज भी गुनगुना रही है।

मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को।

माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी।

‘न’ कहने की सज़ा 

– उन्होंने जोरों से घोषणा की :
अब से तुम आजाद हो,
अपनी मर्ज़ी की मालिक।

– मुझे लगा,
मैं अब अपने सारे निर्णय ख़ुद लूंगी,
इन देवताओं का बोझ कंधों पर न ढोना पड़ेगा।

-मैंने खुले आसमान में उड़ान भरी ही थी
कि फ़रिश्ते आ गए।
बोले-हमारे साथ चलो।
हम तुम्हें अमृत के पंख देंगे।

-मैंने इनकार कर दिया।
मेरा अकेले उड़ने का मन था।
-फ़रिश्ते आग-बबूला हो गए।
उनके अमृतवर्षी पंख ज्वालामुखी बन गए।
गंधक और तेजाब की बारिश में मैं झुलस गई।

-सर्पविष की पहली ही फुहार ने मेरी दृष्टि छीन ली
और मेरी त्वचा को वेधकर तेजाब की जलन
एक एक धमनी में समाती चली गई।

-मैं तड़प रही हूँ।
फ़रिश्ते जश्न मना रहे हैं – जीत का जश्न।

-जब जब वे मुझसे हारे हैं
उन्होंने यही तो किया है।

-जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी ,
जब जब मैंने उन्हें ‘ना’ कहा,
तब तब या तो मुझे
आग के दरिया में कूदना पड़ा
या उन्होंने अपने अग्निदंश से
मुझे जीवित लाश बना दिया।

-जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी,
जब जब मैंने उन्हें ‘ना’ कहा
तब तब या तो मुझे धरती में समाना पडा
या महाभारत रचाना पड़ा।

-मैंने कितने रावणों के नाभिकुंड सोखे
कितने दुर्योधनों के रक्त से केश सींचे
कितनी बार मैं महिषमर्दिनी से लेकर दस्युसुंदरी तक बनी
कितनी बार…
कितनी बार…

-पर उनका तेजाब आज भी अक्षय है
घृणा का कोश लिए फिरते हैं वे अपने प्राणों में;
और जब भी मेरे होठों से निकलती है एक ‘ना’
तो वे सारी नफ़रत
सारा तेजाब
उलट देते हैं मेरे मुँह पर।

-मैं अब नरक में हूँ
अन्धकार और यातना के नरक में।

-अब मुझे नींद नहीं आती
आते हैं जागती आँखों डरावने सपने।
नहीं,
उड़ान के सपने नहीं,
आग के सपने
तेजाब के सपने
साँपों के सपने
यातनागृहों के सपने
वैतरणी के सपने।

-यमदूतो! मुझे नरक में तो जीने दो!!

औरतें औरतें नहीं हैं! 

वे वीर हैं
मैं वसुंधरा।
उनके-मेरे बीच एक ही सम्बन्ध –
‘वीर भोग्या वसुंधरा।’

वे सदा से मुझे जीतते आए हैं
भोगते आए हैं,
उनकी विजयलिप्सा अनादि है
अनंत है
विराट है।

जब वे मुझे नहीं जीत पाते
तो मेरी बेटियों पर निकालते हैं अपनी खीझ
दिखाते हैं अपनी वीरता।

युद्ध कहने को राजनीति है
पर सच में जघन्य अपराध !
अपराध – मेरी बेटियों के खिलाफ़
औरतों के खिलाफ़ !

युद्धों में पहले भी औरतें चुराई जाती थीं
उनके वस्त्र उतारे जाते थे
बाल खींचे जाते थे
अंग काटे जाते थे
शील छीना जाता था ,
आज भी यही सब होता है।
पुरुष तब भी असभ्य था
आज भी असभ्य है,
तब भी राक्षस था
आज भी असुर है।

वह बदलता है हार को जीत में
औरतों पर अत्याचार करके।

सिपाही और फौजी
बन जाते हैं दुर्दांत दस्यु
और रौंद डालते हैं मेरी बेटियों की देह ,
निचोड़ लेते हैं प्राण देह से।

औरते या तो मर जाती हैं
[ लाखों मर रही हैं ]
या बन जाती हैं गूँगी गुलाम
००

वे विजय दर्प में ठहाके लगाते हैं !

वे रौंद रहे हैं रोज मेरी बेटियों को
मेरी आँखों के आगे।
पति की आँखों के आगे
पत्नी के गर्भ में घुसेड़ दी जाती हैं गर्म सलाखें।
माता-पिता की आँखों आगे
कुचल दिए जाते हैं अंकुर कन्याओं के।

एक एक औरत की जंघाओं पर से
फ्लैग मार्च करती गुज़रती है पूरी फौज,
माँ के विवर में ठूँस दिया जाता है बेटे का अंग !

औरतें औरतें हैं
न बेटियाँ हैं, न बहनें;
वे बस औरतें हैं
बेबस औरतें हैं।
दुश्मनों की औरतें !

फौजें जानती हैं
जनरल जानते हैं
सिपाही जानते हैं
औरतें औरतें नहीं होतीं
अस्मत होती हैं किसी जाति की।

औरतें हैं लज्जा
औरतें हैं शील
औरतें हैं अस्मिता
औरते हैं आज़ादी
औरतें गौरव हैं
औरतें स्वाभिमान।

औरतें औरतें नहीं
औरतें देश होती हैं।
औरत होती है जाति
औरत राष्ट्र होती है।

जानते हैं राजनीति के धुरंधर
जानते हैं रावण और दुर्योधन
जानते हैं शुम्भ और निशुम्भ
जानते हैं हिटलर और याहिया
कि औरतें औरतें नहीं हैं,
औरतें देश होती हैं।
औरत को रौंदो
तो देश रौंदा गया ,
औरत को भोगो
तो देश भोगा गया ,
औरत को नंगा किया
तो देश नंगा होगा,
औरत को काट डाला
तो देश कट गया।

जानते हैं वे
देश नहीं जीते जाते जीत कर भी,
जब तक स्वाभिमान बचा रहे!

इसीलिए
औरत के जननांग पर
फहरा दो विजय की पताका
देश हार जाएगा आप से आप!

इसी कूटनीति में
वीरगति पा रही हैं
मेरी लाखों लाख बेटियाँ
और आकाश में फहर रही हैं
कोटि कोटि विजय पताकाएँ!

इन पताकाओं की जड़ में
दफ़न हैं मासूम सिसकियाँ
बच्चियों की
उनकी माताओं की
उनकी दादियों-नानियों की।

उन सबको सज़ा मिली
औरत होने की
संस्कृति होने की
सभ्यता होने की।

औरतें औरतें नहीं हैं
औरतें हैं संस्कृति
औरतें हैं सभ्यता
औरतें मनुष्यता हैं
देवत्व की संभावनाएँ हैं औरतें!

औरत को जीतने का अर्थ है
संस्कृति को जीतना
सभ्यता को जीतना,
औरत को हराने का अर्थ है
मनुष्यता को हराना,
औरत को कुचलने का अर्थ है
कुचलना देवत्व की संभावनाओं को,

इसीलिए तो
उनके लिए
औरतें ज़मीनें हैं;
वे ज़मीन जीतने के लिए
औरतों को जीतते हैं!

गर्भभार 

सँभलकर, बहुरिया,
त्रिशला देवी के सोलहों सपनों का सच
तेरे गर्भ में है।

नहीं,
दिव्यता का आलोक
केवल तीर्थंकरों की माताओं के ही
आनन पर नहीं विराजता;
हर बेटी, हर बहू
जब गर्भ-भार वहन करती है
उतनी ही आलोकित होती है।

हिरण्यगर्भ है
हर स्त्री।
उसके भीतर प्रकाश उतरता है,
प्रभा उभरती है,
प्रभामंडल जगमगाते हैं।
प्रकाश फूटता है
उसी के भीतर से।

प्रकाश सोया रहता है
हर लड़की के घट में,
और जब वह माँ बनती है
नहा उठती है
अपने ही प्रकाश में,
अपनी प्रभा में।
अपने प्रभामंडल में।

सँभलकर, बहुरिया,
तेरे अंग-अंग से किरणें छलक रही हैं!

मुझे पंख दोगे? 

मैंने किताबें मांगी
मुझे चूल्हा मिला,
मैंने दोस्त मांगा
मुझे दूल्हा मिला

मैंने सपने मांगे
मुझे प्रतिबंध मिले,
मैंने संबंध मांगे
मुझे अनुबंध मिले।

कल मैंने धरती मांगी थी
मुझे समाधि मिली थी,
आज मैं आकाश मांगती हूँ
मुझे पंख दोगे?

घर बसे हैं 

तोड़ने की साजिशें हैं
हर तरफ़,
है बहुत अचरज
कि फिर भी
घर बसे हैं,
घर बचे हैं!

भींत, ओटे
जो खड़े करते रहे
पीढियों से हम;
तानते तंबू रहे
औ’ सुरक्षा के लिए
चिक डालते;

एक अपनापन
छतों सा-
छतरियों सा-
शीश पर धारे
युगों से चल रहे;

झोंपड़ी में-
छप्परों में-
जिन दियों की
टिमटिमाती रोशनी में
जन्म से
सपने हमारे पल रहे;

लाख झंझा-
सौ झकोरे-
आँधियाँ तूफान कितने
टूटते हैं रोज उन पर
पश्चिमी नभ से से उमड़कर!

दानवों के दंश कितने
तृणावर्तों में हँसे हैं,
है बहुत अचरज
कि फिर भी
घर बसे हैं,
घर बचे हैं!

घर नहीं दीवार, ओटे,
घर नहीं तंबू,
घर नहीं घूंघट;
घर नहीं छत,
घर न छतरी;
झोंपड़ी भी घर नहीं है,
घर नहीं छप्पर।

तोड़ दो दीवार, ओटे,
फाड़ दो तंबू,
जला दो घूंघटों को,
छत गिरा दो,
छीन लो छतरी,
मटियामेट कर दो झोंपड़ी भी,
छप्परों को
उड़ा ले जाओ भले।

घोंसले उजडें भले ही,
घर नहीं ऐसे उजड़ते.
अक्षयवटों जैसे हमारे घर
हमारे अस्तित्व में
गहरे धँसे हैं,
है नहीं अचरज
कि अब भी
घर बसे हैं,
घर बचे हैं!

घर अडिग विश्वास,
निश्छल स्नेह है घर।
दादियों औ’ नानियों की आँख में
तैरते सपने हमारे घर।
घर पिता का है पसीना,
घर बहन की राखियाँ हैं,
भाइयों की बाँह पर
ये घर खड़े हैं;
पत्नियों की माँग में
ये घर जड़े हैं।

आपसी सद्भाव, माँ की
मुट्ठियों में
घर कसे हैं,
क्यों भला अचरज
कि अब तक
घर बसे हैं-
घर बचे हैं।

हाथ में रथचक्र

हाथ में रथचक्र लेकर
व्यूह से लड़ने चले हो!

सामने है शक्तियाँ सारी
आचार्य सब,
जीत की खा़तिर जिन्होंने
प्राण हाथों में लिए हैं,
शीश पर अपने
कफन धारण किए हैं,

मुट्ठियों में नीतियाँ हैं कैद जिनकी
मूल्य जिनकी उँगलियों पर नाचते हैं
गालियाँ जिनकी ऋचाएँ बन गई हैं
स्वप्न में भी शास्त्र को जो
बाँचते हैं,
जो नियंता हैं हवाओं के
जो दिशाओं – दिग्गजों को
हाँकते हैं।

होंठ पर धर बाँसुरी
भूकंप से भिड़ने चले हो!

घिर रहा है घोर अँधियारा
अनय-अन्याय का,
भूमि पर सारी
चिताएँ जल रही हैं,
युद्धजीवी महाप्रभु की वासनाएँ-
रक्त पीकर पल रही हैं
पीव पीकर फल रही हैं।

लाल आँखों को निकाले
लाल जबडे़ कड़कडा़ती
लाल जिह्वा लपलपाती
कालिमा के पर्व में
खुद कालिका सी
स्नान करके
रक्त में
उन्मत्त हो
कर छल रही हैं

स्वर्ण के अन्धे असुर की योजनाएँ।

अंजुली भर गंध लेकर
ध्वंस से अड़ने चले हो!

यह मिटाने की लडा़ई,
जय-पराजय की नहीं है;
हम खडे़ हैं मोड़ पर,

यह बिंदु है बदलाव का
यह बिंदु है भटकाव का
यह बिंदु है बहकाव का।

आज अर्जुन भी नहीं है
दिन छिपे तक कृष्ण भी
वापस नहीं होंगे.

धर्मपुत्रों से नहीं उम्मीद कोई,

जबकि चढ़ती आ रही सेना
अधर्मी,
घिर रहा तम हर तरफ से
ज्योति को बंदी बनाने के लिए।

साजिशों में कैद है
आकाश अपना,
किंतु आँखों में अभी है शेष
सपना।

सर्प-फण पर दुग्ध-उज्ज्वल
कील हम जड़ने चले हैं!

[हाथ में रथचक्र लेकर
व्यूह से लड़ने चले हैं!]!

धुआँ और गुलाल

सिर पर धरे धुएँ की गठरी
मुँह पर मले गुलाल
चले हम
धोने रंज मलाल !

होली है पर्याय खुशी का
खुलें
और
खिल जाएँ हम;
होली है पर्याय नशे का –
पिएँ
और
भर जाएँ हम;
होली है पर्याय रंग का –
रँगें
और
रंग जाएँ हम;
होली है पर्याय प्रेम का –
मिलें
और
खो जाएँ हम;
होली है पर्याय क्षमा का –
घुलें
और
धुल जाएँ गम !

मन के घाव
सभी भर जाएँ,
मिटें द्वेष जंजाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !

होली है उल्लास
हास से भरी ठिठोली,
होली ही है रास
और है वंशी होली
होली स्वयम् मिठास
प्रेम की गाली है,
पके चने के खेत
गेहुँ की बाली है
सरसों के पीले सर में
लहरी हरियाली है,
यह रात पूर्णिमा वाली
पगली
मतवाली है।

मादकता में सब डूबें
नाचें
गलबहियाँ डालें;
तुम रहो न राजा
राजा
मैं आज नहीं कंगाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !

गाली दे तुम हँसो
और मैं तुमको गले लगाऊँ,
अभी कृष्ण मैं बनूँ
और फिर राधा भी बन जाऊँ;
पल में शिव-शंकर बन जाएँ
पल में भूत मंडली हो।

ढोल बजें,
थिरकें नट-नागर,
जनगण करें धमाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !

रंग 

रंग
तरह-तरह के रंग
आ जाते हैं जाने कहाँ से
सृष्टि में
दृष्टि में
चित्रों, सपनों और कविताओं में?

अँधेरे के गर्भ में
कौन बो जाता है
रोशनी के बीज?
फूट पड़ती है –
दिशाओं को लीपती हुई
किसी सूर्यपुत्र की
दूधों-नहाई
अबोध श्वेत हँसी।

तैरता है श्वेत कमल
गंगा के जल में
होती हैं परावर्तित
किरणें…….
किरणें…….
और किरणें।

शीतल जल की फुहारों में
नहाती हैं श्वेतवसना
अप्सराएँ
और श्वेत प्रकाश की धार
ढल जाती है
सात रंग के इंद्रधनुष में।
गूँजने लगता है
सात सुरों का संगीत
गंगा से यमुना तक,
हस्तिनापुर से
वृंदावन तक।
संगीत
खेलता है
चाँदनी से आँख मिचौनी
और रंग थिरक उठते हैं
रासलीला के उल्लास में,
सृष्टि में बिखर जाते है अमित रंग
राधिका की
खंडित पायल के
घुँघरुओं के साथ।
दृष्टि में खिल उठते हैं
फूल ही फूल
रंग बिरंगे
और चिपक जाते हैं
मन के चित्रपट पर।

घुलते चले जाते हैं….
घुलते चले जाते हैं….
हमारे अस्तित्व में रंग
और फिर
हौले से
आ जाते हैं सपनों में,
सताते है प्राणों को,
हो जाते हैं विलीन
छूने को बढ़ते ही।
टूटते हैं स्वप्न,
कलपती है उँगलियाँ,
तरसते हैं पोर-पोर
छूने को रंग;
सपनों के रंग!

सपनों के रंग
विलीन जब होते हैं,
तड़पता है आदमी
खोजता है इंद्रधनुष,
इंद्रधनुष नहीं मिलते।
नहीं मिलते इंद्रधनुष,
उठाता है धनुषबाण,
रचता है महाभारत
रंगों की खोज में।

रंग पर, नहीं मिलते।
इंद्रधनुष नहीं मिलते।
मिलता है युद्धों से
अँधेरा…
अँधेरा……..
घोर अँधेरा।

अँधेरों में फिर से
सूर्य की किरणें
बोती है कविता।
कविता ही प्रकृति है,
कविता उल्लास है,
रंगों का स्रोत है।

अँधेरे के गर्भ में
रोपती है कविता
रोशनी के बीज को,
रंगों के बीज को।

कविता ही सूर्य है,
दुधमुँहा सूर्यपुत्र!
सूर्यमुखी कविताएँ
रंगों को जनती हैं!

आओ!
हम सब….
सारे अक्षर
मिलकर सूर्यमुखी हो जाएँ,
रागों को उपजाएँ,
रंगों को बरसाएँ,
इंद्रधनुष के सात रंग से
रँग दें
सृष्टि को,
दृष्टि को,
चित्रों, सपनों और
कविताओं को।

वसंत, मुझ पर मत आना

एक जीवभक्षी पौधा हूँ मैं।
वसंत, मुझ पर मत आना।

बहुत रंगीन हूँ मैं,
भरा हूँ मादक खुशबुओं से,
मेरी त्वचा छूने में बडी़ कोमल है,
संगीत के साथ चटखती हैं मेरी कलियाँ
और रस छलकने लगता है मेरी कोर-कोर से,
जब तुम आते हो मुझ पर।

पर वसंत, मुझ पर मत आना।
जीवभक्षी पौधा हूँ मैं।

मेरे रंग झूठ हैं – इंद्रजाल हैं
खींचते हैं अपनी ओर – मासूम तितलियों को
– चहचहाते परिंदों को।
उन्हें क्या पता – मेरे रंग मौत के रंग हैं।

मैं एक जीवभक्षी पौधा हूँ।
वसंत, मुझ पर मत आना।

पाखंड हैं मेरी तमाम खुशबुएँ,
पाश बनकर बाँध लेती हैं पूरे जंगल को अपने-आप में
और ढाँप लेती हैं बेहोशी के जादू में
मेरे भीतर की सारी दुर्गंध को।
एक ज़िंदा कब्रिस्तान है मेरे भीतर
जिसमें दफ़न हैं जाने कितनी मासूम जानें-
बँधकर आई थीं इन्हीं खुशबुओं से
वे मेरे करीब।
सड़ाँध का एक सैलाब
छिपा है मेरी एक-एक खुशबू के पीछे।

पौधा हूँ, पर जीवभक्षी हूँ मैं।
वसंत, मुझ पर मत आना।

धोखा ही धोखा है मेरी त्वचा की चिकनाई में।
असल में तो – बहुत बारीक
– बहुत पैने
– बहुत जहरीले
– बहुत मज़बूत –
काँटे ही काँटे हैं मेरी देह पर।
स्पर्श के लिए आमंत्रित करती है मेरी त्वचा
हर जीव को।
उसके तन-मन को, चेतना को
सहलाती है मेरी विश्वासघातिनी छुअन।
और चुपके से दबोच लेते हैं उसे
कोमल मांस खाने वाले मेरे काँटेदार जबडे़।

पौधा होकर भी, जीवभक्षी हूँ मैं।
वसंत, मुझ पर मत आना।

तुम आओगे तो फिर से चटखेंगी मेरी कलियाँ।
संगीत से भर उठेंगी जंगल की गलियाँ।
सम्मोहन तन जाएगा इस छोर से उस छोर तक।
मेरी राक्षसी भूख के नाखून
अभिमंत्रित कर देंगे पूरे परिवेश को।
मेरी अनाचारी लिप्सा
चुन लेगी हर दिशा से
खिंची चली आती आत्माओं में से
– सबसे नादान को
– सबसे कोमल को
– सबसे सुंदर को
और निगल लेगी उसके
– सारे भोलेपन को
– सारी कोमलता को
– सारे सौंदर्य को।

जीवभक्षी पौधा हूँ न मैं।
वसंत, मुझ पर मत आना।

मत आना, वसंत,
मुझ पर मत आना।
तुम आए
तो फिर से छलकेगा रस
मेरी कोर-कोर से।
कोई बनपाँखी जान भी न पाएगा-
मैं विष से भरा कनकघट हूँ।
बहुत मीठे हैं मेरे होंठ – बहुत रसीले-
पर मेरा चुंबन मृत्यु का चुंबन है।
पाप का हृदय है मेरा आलिंगन।
शाप का परिणाम है मेरा प्यार।
मैं जिसे प्रेम से देख लूँ,
जो मेरा प्रेम पा ले,
समझो,
उसका सर्वनाश हुआ।
मेरा अस्तित्व एक गाली है।
मैं सातवें स्थान में मंगल और शनि की युति हूँ।
राहु-केतु का प्रकोप हूँ।
कालसर्प योग हूँ मैं।
जीना असंभव है मेरे साथ।
मुझसे केवल घृणा की जा सकती है।
पर तुम आओगे मुझ पर
तो यह जंगल मुझसे फिर प्यार करेगा।
फिर एक बार मेरे नरक की आग में जल मरेगा।

मुझ पर आओ तो वैसे आना
जैसे ‘सदोम’ और ‘अमोरा’ पर आए थे-
गंधक और तेज़ाब की बारिश बनकर,
परमाणु और न्यूट्रान बम बनकर।
मैं केवल घृणा के योग्य हूँ – विनाश का पात्र।

पौधा नहीं हूँ, मैं तो जीवभक्षी हूँ।
नहीं, वसंत, मुझ पर मत आना।
मुझ पर कभी मत आना, वसंत।
– कभी मत आना!!

परंपरा 

वे पृथ्वी हैं-
सब सहती हैं
चुप रहती हैं,
वे गाय हैं-
दूध देती हैं
बछड़े भी देती हैं,
हम युद्ध करते हैं
उनकी खातिर
और फिर
लगाते हैं चौराहों पर
उनकी बोली।
हम इसके लिए शर्मिंदा नहीं हैं,
यह तो हमारी परंपरा है-
गौरवशाली परंपरा!

वे सदा से
चलती आई हैं
हमारे साथ
झेलने के लिए
हर देश-निकाला,
हर एक अज्ञातवास
और हर एक अभिशाप-
कभी जानकी बनकर,
कभी द्रौपदी बनकर
तो कभी शैव्या बनकर।
आखिर यही तो
उनका धर्म है न !

और हमारा धर्म?
हमारा धर्म क्या है??
क्या है हमारा धर्म???

छोड़ आते रहे हैं हम उन्हें
बियाबान में
पंचतत्वों के हवाले,
गर्भवती होने पर।
चढ़े चले जाते हैं हम
कुत्तों की ज़ंजीर थामे
स्वर्ग के सोपान पर,
छोड़कर उनके एक एक अंग को
बर्फ में गलता हुआ।
और जब वे आती हैं
आधी साडी़ में लपेटे हुए
हमारे अपने बच्चों की लाश को,
वसूलते रहे हैं हम
पूरा पूरा टैक्स
मसान के पहरेदार बनकर
बची खुची आधी साड़ी से।

और हम
इसके लिए कतई शर्मिंदा नहीं हैं,
आखिर यह हमारी परंपरा है-
गौरवशाली परंपरा!

नीलाम किया है हमने
अपनी रानियों तक को
बनारस के चौराहों पर
सत्यवादी हरिश्चंद्र बनकर।
बोली लगाई है हमने
चंपा की राजपुत्री चंदनबालाओं तक की
कौशांबी के बाज़ारों में
धनपति नगरसेठ बनकर।
कभी…….
किसी नीलामी पर
किसी बोली पर
किसी को ऐतराज़ नहीं हुआ,
कोई आसन नहीं डोला,
कोई शासन नहीं बोला,
और न ही कभी
एक भी सवाल उठा-
किसी संसद में।

फिर अब क्यों बवाल उठाते हो?

कुछ नया तो नहीं किया हमने ;
कुछ लड़कियों, कुछ औरतों को-
(कुछ ज़मीनों, कुछ गायों को)-
नीलाम भर ही तो किया है
एलूरु के बाज़ारों में,
आंध्र के गाँवों की हाटों में।

इसमें नया क्या है?
क्यों बवाल मचाते हो??
क्यों सवाल उठाते हो???
हम तो इसके लिए शर्मिंदा नहीं हैं,
यही तो हमारी परंपरा है-
गौरवशाली परंपरा!

निवेदन 

जीवन
बहुत-बहुत छोटा है,
लम्बी है तकरार!
और न खींचो रार!!

यूँ भी हम-तुम
मिले देर से
जन्मों के फेरे में,
मिलकर भी अनछुए रह गए
देहों के घेरे में।

जग के घेरे ही क्या कम थे
अपने भी घेरे
रच डाले,
लोक-लाज के पट क्या कम थे
डाल दिए
शंका के ताले?

कभी
काँपती पंखुडियों पर
तृण ने जो चुम्बन आँके,
सौ-सौ प्रलयों
झंझाओं में
जीवित है झंकार!
वह अनहद उपहार!!

केवल कुछ पल
मिले हमें यों
एक धार बहने के,
काल कोठरी
मरण प्रतीक्षा
साथ-साथ रहने के।

सूली ऊपर सेज सजाई
दीवानी मीराँ ने,
शीश काट धर दिया
पिया की
चौखट पर
कबिरा ने।

मिलन महोत्सव
दिव्य आरती
रोम-रोम ने गाई,
गगन-थाल में सूरज चन्दा
चौमुख दियना बार!
गूंजे मंगलचार!!

भोर हुए
हम शंख बन गए,
सांझ घिरे मुरली,
लहरों-लहरों बिखर बिखर कर
रेत-रेत हो सुध ली।

स्वाति-बूंद तुम बने
कभी, मैं
चातक-तृषा अधूरी,
सोनचम्पई गंध
बने तुम,
मैं हिरना कस्तूरी .

आज
प्राण जाने-जाने को,
अब तो मान तजो,
मानो,
नयन कोर से झरते टप-टप
तपते हरसिंगार!
मुखर मौन मनुहार!!

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ ….

मैंने
किताबें पहन रखी थीं,
औरों से अलग दिखता था,
तुम खिंची चली आईं
मेरी ही तरह किताबों को ओढ़े हुए।
अक्सर हम दोनों
पास-पास रहते,
पर चुप रहते,
हमारी किताबें आपस में बातें करतीं
और हम प्रमुदित होते।

उस दिन
जब बाहर बहुत बरसात थी
तुम्हारे नक़ाब की किताब का
एक पन्ना गलकर बह गया
और मैंने
तुम्हारा एक रोम देख लिया
भीतर कुछ ऐसी बरसात हुई
कि मेरी पोशाक की एक किताब पूरी गल गई।
मैंने दूसरी किताब से
पोशाक में पैबंद लगाने की
कोशिश करते हुए
चोर नज़रों से तुम्हारी ओर देखा।
तुम
निर्निमेष ताक रही थीं
फटी पोशाक में से झाँकती हुई
मेरी मांसपेशियों को।
मैंने जल्दी से
पैबंद सी दिया
और तुमने भी
अपने नक़ाब पर दूसरा नया पन्ना
चिपका लिया।

बार-बार हुआ ऐसा,
हर बार मैंने नया पैबंद लगाया,
हर बार तुमने नया पन्ना चिपकाया।
किताबें पहले की तरह
बातें करती रहीं
और हमारे बीच संवाद नहीं हो सका।

उस दिन
बरसात के बाद की तेज धूप में
मैंने अचानक
भीगी किताबें
सूखने के लिए उतार दीं
तो तुमने
आतंक, विस्मय, लज्जा और संकोच से
आँखें मींच ली थीं
और मैंने झट से
क्षमा माँगते हुए
फिर से किताबें पहन ली थीं।

रात भर सो नहीं सका था मैं,
सोचता रहा था
उस क्षणिक हल्केपन के बारे में
जो किताबों की भारी पोशाक
उतारने पर महसूस हुआ था।

उस रात
मैंने निश्चय किया
कि
अब से कैद नहीं रखूँगा स्वयं को
किताबों की इस भारी पोशाक में।

अगले ही दिन
मैंने अपने चारों ओर जमे
पुस्तकालय को हटा दिया
और
तुम्हारे आँख मींचने की
परवाह किए बिना
तुम्हारे कानों में
अनुनयपूर्वक फुसफुसाया था-
क्या मैं
तुम्हारे नक़ाब में
चिनी हुईं किताबें
नोंच सकता हूँ?

जवाब में तुमने
एक बार कोमल दृष्टि से
मुझे देखा था
और पलकें झुका ली थीं।
मैंने किताबों की ईंटों को
छुकर
फिर पूछा था-
नोंच दूँ?

जवाब में तुमने
अर्थपूर्ण दृष्टि से
मुझे देखा था
और मैंने साहस करके
एक किताब नोंच ली थी।
झरोखे में से
मेरी गंध भरी हवा का एक झोंका
तुमसे टकराया था
और तुमने गहरी साँस लेकर
मेरी ओर देखा था
कृतज्ञता के भाव से।
देखकर
पलकें
फिर से झुका ली थीं।

मैंने डरते हुए कहा था-
तुम चाहो तो
इस किताब को
फिर वहीं चिपका दूँ?

तुमने लजाते हुए
कहा था…
नहीं!

उस क्षण मैं तुम्हारे
और निकट आ गया,
मैंने धीरे से
तुम्हें छूआ
किताब नोचने से बने झरोखे में से।
तुम्हारे होंठों पर
सिसकी बनकर
अनहद नाद उभरा;
और मैंने
तुम्हारे अस्तित्व पर चिपकी
दूसरी किताब नोंच दी।
धीरे से
फिर तुम्हें छुआ,
फिर वही मादक
अनहद नाद उभरा।
फिर एक किताब और….
एक किताब और…
एक किताब और…
फिर एक छुअन और….
एक छुअन और….
एक छुअन और….
फिर एक सिसकी और….
एक सिसकी और….
एक सिसकी और….

तुम्हारी चेतना के आकाश में
गुंजायमान
अनहद नाद में
डूब गया मैं,
डूब गईं तुम,
डूब गए हम दोनों।
डूबे तो ऐसे डूबे
कि तिर गए।
औंधे घट के
पीयूष रस में स्नान करके
समुद्र की सुनहरी रेत पर
हम दोनों
पसर गए।
हमारे अस्तित्व को उस दिन
पहली बार छुआ –
महकती हुई धरती ने,
गमकती हुई हवा ने,
लहराते हुए पानी ने,
सहलाती हुई आग ने
और गाते हुए आकाश ने।
किताबों से बाहर निकलने के बाद
उस दिन
देर तक नहाते रहे थे हम दोनों
इसी तरह।

और तब
आदित्य, चंद्र और नक्षत्रों ने
हमारी धुली हुई आत्मा पर
एक शब्द लिखा था….
ढाई आखर ‘प्यार’ का!

उस दिन
हम सचमुच पंडित हो गए थे
‘प्रेम’ का ढाई आखर पढ़कर।

हमें मिल गया था
जीवन का रहस्य
और
मुक्ति का मार्ग।

उस दिन के बाद से
हम विचरते रहे
मोक्ष में
बिना पोशाकों के।

हमने चाँदनी रातों में प्यार किया,
हमने अँधेरों में प्यार की बिजलियाँ चमकाईं,
हमने सवेरों में प्यार के फूल खिलाए,
हमने दुपहरी में प्यार के बादल बरसाए,
हमने साँझों में प्यार के गीत गुनगुनाए;
और
हमें कभी
किसी पोशाक की ज़रूरत नहीं पडी़,
किसी किताब की ज़रूरत नहीं पडी़।
हमारी आत्मा पर अंकित
ढाई आखर ही
अब हमारा पुस्तकालय था,
विश्वकोश था।

बहुत सुखी थे हम
आनंद में खॊए हुए
कि तभी
उस आधे चाँद की रात में
मैंने पाया
तुम्हारे एक कोने पर चिपका हुआ
एक किताब का पन्ना।
मैंने सहज भाव से
तुम्हारे वजूद पर से
नोंचने की कोशिश की
कागज़ के उस पन्ने को
बिना तुमसे अनुमति माँगे।

पन्ना अभी ज़रा सा ही फटा था
कि तुम चीख उठीं….
नहीं!
शायद
तुम्हें याद आ गया था
कोई पुराना अनुभव।

मैं डर गया था
और उसी हड़बडी़ में
मेरे नाखूनों की खरोंच
उभर आई थी
तुम्हारे ऊपर।

खरोंच के ऊपर
चिपका दिया था तुमने
फटे हुए कागज़ को
और घृणा से मुँह फेर लिया था
मेरी ओर से।

रो पडी़ थीं तुम
शिकायत करती हुईं
कि क्यों मैंने
कागज़ को नोंचना चाहा
बिना तुमसे अनुमति माँगे।

उस रात से
धरती में खूशबू नहीं रही,
हवाओं की छुअन गायब हो गई,
पानी फीका हो गया,
आग में तपन नहीं बची
और आकाश गूँगा हो गया।

उस रात से
मेरे नाखूनों की खरोंच में से
किताबें उगने लगीं
और तुम्हारे चारों ओर
नक़ाब बनकर तनने लगीं।

उस रात से
मेरे होंठों पर प्रार्थना है,
याचना है मेरी आँखों में,
अभ्यर्थना है मेरे माथे पर,
कंपन है मेरी उँगलियों में,
मेरी आत्मा में क्रंदन है
और
मेरे अस्तित्व में प्रतीक्षा का रुदन है;
मुझे आदेश दो
कि मैं नोंच दूँ
तमाम कागज़ों को,
किताबों को
और नक़ाबों को।

कहीं ऐसा न हो,
ये किताबें
फिर से
छा जाएँ
पूरे अस्तित्व पर
और फिर से
चेतना
कैद हो जाए
पोथियों के बीच!

मुझे प्रतीक्षा है
तुम्हारे संकेत की,
इससे पहले कि
मर जाए हमारी मुक्ति
या
मिट जाए
प्यार का ढाई आखर……….

(तुम्हारा आदेश मिलने
यह कविता
अधूरी रहेगी,
और प्रतीक्षा में रहेगा
तुम्हारा कबीर!)

गोलमहल

गोल महल में
भारी बदबू,
सीलन औ’ अवसाद;
धूप से
टूट गया संवाद।

कुर्सीजीवी कीट
बोझ से
धरती दबा रहे हैं;

मोटी एक किताब,
उसी के
पन्ने चबा रहे हैं;

दरवाज़े हैं बंद
झरोखों तक
मलबे की ढेरी;

दिवा रात्रि का आवर्तन है
चमगादड़ की फेरी;

इसको दफ़न करें मिटटी में
बन जाने दें –
खाद !

काव्य को अंगार कर दे भारती 

काव्य को अंगार कर दे, भारती
शब्द हों हथियार, वर दे, भारती

हों कहीं शोषण-अनय-अन्याय जो
जूझने का बल प्रखर दे, भारती

सत्य देखें, सच कहें, सच ही लिखें
सत्य, केवल सत्य स्वर दे, भारती

सब जगें, जगकर मिलें, मिलकर चलें
लेखनी में शक्ति भर दे, भारती

हो धनुष जैसी तनी हर तेवरी
तेवरों के तीक्ष्ण शर दे, भारती

घर से बाहर नहीं निकलना, आज शहर में कर्फ्यू है 

घर से बाहर नहीं निकलना, आज शहर में कर्फ्यू है
लक्ष्मण रेखा पार न करना, आज शहर में कर्फ्यू है

माना चीनी नहीं मिल रही, माना दूध नहीं घर में
फिर भी अच्छा नहीं मचलना, आज शहर में कर्फ्यू है

मस्जिद में अल्लाह न बोला, राम न मंदिर में डोला
खून किया धर्मों ने अपना, आज शहर में कर्फ्यू है

संप्रदाय की मदिरा पीकर, आदम आदमख़ोर हुआ
छाया पर विश्वास न करना, आज शहर में कर्फ्यू है

नोट-वोट का शासन बोले, अलगावों की ही भाषा
इस भाषा को हमें बदलना, आज शहर में कर्फ्यू है

गिरे घरानों का अनुशासन, नारों का जादू टूटे
जनगण सीखे स्वयं सँभलना, आज शहर में कर्फ्यू है

क्या पता था खेल ऐसे खेलने होंगे

क्या पता था खेल ऐसे खेलने होंगे
रक्त-आँसू गूँथ पापड़ बेलने होंगे

कुर्सियों पर लद गया है बोझ नारों का
यार, ये विकलांग नायक ठेलने होंगे

भर गया बारूद मेरी खाल में इतना
अब धमाके पर धमाके झेलने होंगे.

मिलीं शाखें गिलहरी को इमलियों की 

मिलीं शाखें गिलहरी को इमलियों की
छिन गईं लेकिन छटाएँ बिजलियों की

यह व्यवस्था है कि फेंको लेखनी को
चाहते हो खैरियत यदि उँगलियों की

न्याय को बंधक बनाकर बंदरों का
वे मिटाएँगे लड़ाई बिल्लियों की

आदमी की प्यास के दो होंठ सिलकर
प्राण रक्षा वे करेंगे मछलियों की

गीत के मेले लगाती राजधानी
चीख पिसती बजबजाती पसलियों की

आग सोई, लकड़ियाँ सीली हुई हैं
है ज़रूरत और सूखी तीलियों की

हिंसा की दूकान खोलकर, बैठे ऊँचे देश 

हिंसा की दूकान खोलकर, बैठे ऊँचे देश
आशंका से दबी हवाएँ, आतंकित परिवेश

अंतरिक्ष तक पहुँच गया है, युद्धों का व्यापार
राजनीति ने नक्षत्रों में, भरा घृणा-विद्वेष

गर्म हवाओं के पंखों पर, लदा हुआ बारूद
‘खुसरो’ कैसे घर जाएगा, रैन हुई चहुं देश

महाशक्तियाँ रचा रही हैं, सामूहिक नरमेध
हाथ बढ़ाकर अभी खींच लो, कापालिक के केश

गलियों की आवाज़ आम है , माना ख़ास नहीं होगी 

गलियों की आवाज़ आम है , माना ख़ास नहीं होगी
हीरे की यह आब , घिसो तुम, घिसकर काँच नहीं होगी

जनता के मुँह पर अंगारे , वर्दी वालों ने मारे
कुर्सी वालों का कहना है , इसकी जाँच नहीं होगी

सरकारी मिल में कुछ ईंधन, ऐसा ढाला जाएगा
चमक-दमक तो लूक-लपट सी, लेकिन आँच नहीं होगी

नाच रहा क़ानून जुर्म की महफ़िल में मदिरा पीकर
उन्हें बता दो : किंतु दुपहरी , तम की दास नहीं होगी

जनमेजय ने एक बार फिर , नागयज्ञ की ठानी है
नियति धर्मपुत्रों की फिर से , अब वनवास नहीं होगी

हर दिन बड़ा है आपका अपना न एक दिन 

हर दिन बड़ा है आपका, अपना न एक दिन
सब छूरियाँ ठूँठी पड़ीं, कटता न केक दिन

सूरज बदन प’ झेलता, मौसम की लाठियाँ
बदले मिज़ाज अभ्र का, खोता विवेक दिन

कुछ गालियाँ देकर कभी, कुछ बाट गोलियाँ
तुम छल चुके हमको, सुनो, अब तक अनेक दिन

कुछ हाथ बढ़ रहे इधर, तुमको तराशने
आकाशबेल! खेल लो. जी लो कुछेक दिन

रोटी जहाँ गिरवी धरी, वह जेल तोड़ दें
अब मुक्त करना है हमें, बंदी हरेक दिन

धुंध है घर में उजाला लाइए

धुंध है घर में उजाला लाइये
रोशनी का इक दुशाला लाइये

केचुओं की भीड़ आँगन में बढ़ी
आदमी अब रीढ़ वाला लाइये

जम गया है मॉम सारी देह में
गर्म फौलादी निवाला लाइये

जूझने का जुल्म से संकल्प दे
आज ऐसी पाठशाला लाइये

अब न बालों और गालों की कथा लिखिए

अब न बालों और गालों की कथा लिखिए
देश लिखिए, देश का असली पता लिखिए

एक जंगल, भय अनेकों, बघनखे, खंजर
नाग कीले जायँ ऐसी सभ्यता लिखिए

शोरगुल में धर्म के, भगवान के, यारो!
आदमी होता कहाँ-कब लापता ? लिखिए

बालकों के दूध में किसने मिलाया विष ?
कौन अपराधी यहाँ ? किसकी ख़ता ? लिखिए

वे लड़ाते हैं युगों से शब्दकोषों को
जो मिलादे हर हृदय वह सरलता लिखिए

एक आँगन, सौ दरारें, भीत दीवारें
साजिशों के सामने अब बंधुता लिखिए

लोग नक्शे के निरंतर कर रहे टुकड़े
इसलिए यदि लिख सकें तो एकता लिखिए

शायद कोई आने को है!

हर धड़कन रूक जाने को है
शायद कोई आने को है

वही पुरानी एक कहानी
मेरे पास सुनाने को है

मेरा मैं उसकी राहों में
वह मुझको ठुकराने को है

पल-पल पलकें मुँदी जा रहीं
घोर अंधेरा छाने को है

एक साँस साँसों में भर लो
यह गुलाब मुरझाने को है

विश्वासी मन मेरा 

रह-रहकर मुझको छलता, विश्वासी मन मेरा
अंबर की ओर मचलता, सन्यासी मन मेरा

नित ऊषा से संध्या की, चौखट तक सूरज सा
जलता चलता गल ढलता, अभ्यासी मन मेरा

मधुवन ने तो यौवन को, वर लिया स्वयंवर में
नारद सा कभी उबलता, प्रत्याशी मन मेरा

बाँहों में कभी पिघलता, आहों में जम जाता
चाहों में कभी तरलता, अभिलाषी मन मेरा

पारे का सागर जैसे, लोहू में बसा हुआ
भीषण लूओं में पलटा, मधुमासी मन मेरा

यह मेरा अपराधी मन

पल प्रतिपल शंकित रहता है, यह मेरा अपराधी मन
कितने कशाघात सहता है, यह मेरा अपराधी मन

एक रात जब नभ से बरसी, थी अमरित की धारा
रूप स्नान कर पूर्व दिशा से, निकली काँवरी तारा
धूलि धूसरित कण-कण तृण ने, किरण चुमनी चाही
छुईमुई के घूँघट पट पर, पापी हाथ पसारा

अपनी ज्वाला में दहता है, यह मेरा अपराधी मन
पल प्रतिपल शंकित रेहता है, यह मेरा अपराधी मन

एक रात सागर में सहसा, जब वह ज्वार उठा था
शंख सीपियों बस्ती में, मोती एक लूटा था
हाय, अकिंचन इन प्राणों की, उन्मादिन भावुकता
भुवनमोहिनी के पल्लू पर, अपना नाम लिख था

बंदी एकाकी गहता है, यह मेरा अपराधी मन
पल प्रतिपल शंकित रहता है, यह मेरा अपराधी मन

पहला सावन

सुनो !
सावन
पहली बार नहीं आया है,
आज से पहले भी
अनगिनत बार
जवानी आ चुकी है
नीम की बौर पर

आज से पहले भी
तिरछी बौछारों में नहाकर
मिठास से भर गई है
कूँआरी कड़वी निंबोलियाँ

आज से पहले भी
झूले की बाँहों में
आँख मींचकर
मल्हार अलापा है
बेसुधी में रूप ने !

सोचो !
अब तुम्हीं बताओ,
इस बरस का सावन
अधिक बौराया सा क्यों है ?

मेरी आँखों में
क्यों
कड़वाहट सी भरती है
और
झरने लगता है शहद ?

निशानी 

देखो !
इतिहास में जुड़ गया
एक वर्ष और|
सब कुछ बदल गया
पर
मेरे माथे पर
बचपन की चोट के
तीनों निशान
वहीं के वहीं हैं !
मेरे देवता,
सृष्टि के प्रारंभ में
जब तुमने
मुझ पर
पद प्रहार किया था
तब
क्या तुम्हें मालूम था
की ये निशान
न मिटेंगे
प्रलय के मेटे भी !

पुनर्जन्म 

ठीक ही हुआ
बिखर गई मेरी पंखुड़ियाँ|
नहला गईं हवाओं को
अपनी खुशबू से|

मर कर भी
मैं मरा भी नहीं,
मिटा नहीं|

फिर से जी उठा
तुम्हारी साँसों में।

प्यार

उस दिन मैंने फूल को छुआ
सहलाया और सूँघा,
हर दिन की तरह
उसकी पंखुड़ियों को नहीं नोंचा।

उस दिन पहली बार मैंने सोचा
फूल को कैसा लगता होगा
जब हम नोंचते हैं
उसकी एक –एक पंखुड़ी!

तब मैंने फूल को
फिर छुआ
फिर सहलाया
फिर सूँघा …

और मुझे लगा

हवाएं महक उठीं
प्यार की खुशबू से ।

संगम 

याद आता है समय
तुमने कहा जब
लो, चलो, हम आज मिलते है
दो पानियों जैसे,
और हम तुम मिल गए
गंगो –जमन से;
एक धारा बन गए थे ।

घुल गया
तुम्हारे गौर वर्ण में
मेरे कंठ का सारा नीलापन,
उतर आया
हमारे भीतर आकाश का विस्तार
और समा गया
समुद्र की गहराई में ।

अब हम धारा नहीं रहे थे ,
समुद्र थे –
पानी ही पानी ,
नाम-गोत्र से हीन पानी;
न घट, न तट –
बस पानी ही पानी,

न देह ,न गेह –
बस पानी ही पानी,
न तुम, न मैं,
पानी ही पानी !

जाने कैसी स्त्री थी वह !

जाने कैसी स्त्री थी वह ,
कितनी धीर ,
कितनी सबल !

कैसे कहा होगा उसने
माता पिता से,
पीहर और ससुराल से –

– नहीं ,मुझे यह विवाह स्वीकार नहीं
– न, मैं नहीं मानती बालपने की शादी को
– गुडिया के खेल तक की समझ न थी मुझे
विवाह की समझ कैसे होती
– आपका दिया यह पति मेरा पति नहीं !

कैसे टटोला होगा अपने आप को
जवाब दिया होगा दुनिया को –

– बंधन है बिना प्रेम का विवाह
और मुझे अस्वीकार
– कोई पुरुष दीखा ही नहीं
प्रेम के योग्य ;
एक परमपुरुष के सिवा
– वह आलोकसुंदर परमपुरुष ही मेरा प्रियतम है !

कैसे किया होगा सामना
तन मन को बींधती ज़हरबुझी नज़रों का ,
नकारा होगा अध्यात्म का भी आकर्षण
तोड़कर शृंखला की कड़ियाँ सारी
भारी –

– स्त्री पुरुष में जो भेद करे
वह धर्म मेरा नहीं
– स्त्री जाति से जो भयभीत हो
वह गुरु मेरा नहीं !

कैसे बाँटा होगा उसने अपने अस्तित्व को
अपने स्वयं रचे परिवार में –
किसी विधवा नौकरानी को
किसी सेवक को
किसी जिज्ञासु को
किसी गाय, किसी गिलहरी , किसी मोरनी को !

उसने जीते जी मुक्ति अर्जित की
विराटता सिरजी –
कभी बदली
कभी दीप
कभी कीर बनकर.
उसी ने दिखाया मुक्ति का मार्ग मेरी स्त्री को
संपूर्ण आत्मदान के बहाने
न्यस्त करके स्वयं को
सर्वजन की आराधना में .

वह सच ही महादेवी थी !!

तब तुम कहाँ थे?

जूझ रहा था जिस समय पूरा देश
समूचे पौरुष के साथ
हर रात
हर दिन
नए-नए मोर्चों पर ;

बताओ तो सही
तब तुम कहाँ थे, दोस्त?
कहाँ थे?

पर्वतमालाओं के हिमनद
काँप-काँप जाते थे विस्फोटों से,
श्वेत शिखरों का अभिषेक कर रहे थे
उठती उम्र के जवान
अपने गर्म लाल लहू से
और फहरा रहे थे तिरंगा
बर्फ से आच्छादित
हिरण्यमय गुफाओं के भाल पर
अपनी मिट्टी की गाडी़ को
मिट्टी मे मिलाकर।
झेल रहे थे वे आसमान से बरसती आग
अपनी छातियों पर।

जल गए विमान
पर जलने नहीं दिया
उन्होंने अपना हौसला।
लौट गई मृत्यु भी करके प्रणाम उन्हें;
निखर आए आग में से
मरजीवा पंछियों-से भारत माँ के बेटे।

वे लांछित शीश तक भी
शामिल थे अस्मिता के इस युद्ध में
जिनकी प्रतीक्षा में था फाँसी का फंदा;
हो गए गौरवान्वित वे सभी।

लंबी परंपरा दिखाई दी
रक्तदान करने वालों की
हर रात
हर दिन
नए-नए मोर्चों पर।

बताओ तो सही,
तब तुम कहाँ थे, दोस्त?

युद्ध!
केवल कारगिल में नहीं था।
बटालिक, द्रास और काक्सर
-तो नाम भर थे कुछ ऊँचे शिखरों के।

युद्ध तो लडा़ जा रहा था
देश भर में
गाँव-गाँव, गली-गली;
और शहीद हो रहा था
खून के हर कतरे के साथ
वीर प्रसू जननियों का मृत्युंजय दुग्ध,
मिसरी सी बहनों का शहदीला प्यार,
दूधों-नहाई प्रोषितपतिका वधुओं का
लाल जोड़े और हरी चूड़ियों का सिंगार।

शहीद हो रहे थे खून के हर कतरे के साथ
हज़ार-हज़ार आँसू भी
हर रात
हर दिन
नए-नए मोर्चों पर।

बताओ तो सही?
तब तुम कहाँ थे, दोस्त?

गर्भस्थ शिशुओं ने
अपने पिता दे दिए,
शरशय्या पर सोए पिताओं ने
दे दिए अपने पुत्र ;
बच्चों ने अपना जेबखर्च दे दिया,
बच्चियों ने अपने सपने दिए ;
हिजडों तक ने कीं फतह की दुआएँ;
भिखारियों ने भी उलट दीं झोलियाँ।
कवियों ने शब्द दिए,
मज़दूरों ने पसीना।
उखड़े और उजड़े हुओं ने भी
मिलकर दी एकता की आवाज़।

धरती और आकाश ने
गुंजारित कीं प्रार्थनाएँ
हर रात
हर दिन
नए-नए मोर्चों पर।

बताओ तो सही
तब तुम कहाँ थे, दोस्त?

खून बहाने वालों में?
आँसू लुटाने वालों में?
या पसीना सींचने वालों में?

शायद कहीं और थे तुम?
तब तो इतिहास तुम्हें धिक्कारेगा!!

ओ छली दुष्यंत 

ओ छली दुष्यंत
तुमको तापसी का शाप!

आज आए हो
क्षमा की भंगिमा धारे,
एक पल में
चाहते हो
भूल जाएँ
अपराध सारे
हम तुम्हारे।
फिर वरण कर लें तुम्हारा?

याद आता है तुम्हारा रूप वह
गंधर्व बनकर तुम प्रियंवद
जब तपोवन में पधारे, हम न समझे
शब्द जो रस में पगे थे
तब तुम्हारे,
बढ़ रहे थे देह को खाने
लोभ के पंजे पसारे।

हम बिसुध थे स्वप्न में खोए हुए
शब्दजालों में फँसे,
चक्रवर्ती के कपटमय प्यार की
मधुगंध छककर
दे दिया सर्वस्व,
कर दिया अर्पित अस्तित्व अपना।
आश्वासनों में लुट गया यौवन,
प्यार की पुचकार भर से
बँध गया मन का हिरण।

तुम चुरा कर स्वत्व सारा दे गए उत्ताप!

छल तपोवन को
बसे तुम राजधानी में,
भोगते निर्बंध
रूप, रस औ’ स्पर्श का आनंद।
शक्ति के उन्माद में
तुम प्रभु बने,
बाँध आँखों पर सुनहरे तार की जाली
भाग्यलेखों के नियंता बन गए,
धर्म के पर्याय बनकर पाप के प्रतिनिधि बने।

पाप ही था
जबकि तुमने
पुण्य को छलकर कहा,
उस तपोवन की नहीं पहचान तुमको
रौंदकर जिसको गए थे!
याद वह आँचल न आया
सो गए थे छाँह में जिसकी थके तुम;
वे लताएँ,
भुजलताएँ कंटकित वे,
सब कलंकित हो गईं।
आश्वासनों को भूल तुमने
गंधर्व परिणय को – प्रणय को –
मारकर ठोकर
बहिष्कृत कर दिया
अपने भवन, अपनी सभा से।

तभी से फिर रहे हम भोगते संताप!

अब मुखौटों पर मुखौटे धार कर
फिर चले आए – विश्वासघाती!
अब न हम स्वागत करेंगे।

तुम वधिक हो!
प्रेम की
विश्वास की हत्या,
मातृत्व की
पुत्रत्व की हत्या,
कामना की
स्वप्न की
अस्तित्व की हत्या,
तुम्हारे नाम के आगे लिखी है
भविष्यत् के भ्रूण की हत्या।

तुम घृणित हो!
तपोवन को छला तुमने समर्पण के क्षणों में।
अब जलो अनुताप में!
भोगो ब्रह्महत्या से बडा़ यह पाप।
रहो पश्चाताप में!
तापसी के पुत्र का है राज्य पर अधिकार;
आ रहा वह निष्कलुष निष्पाप!

अनुपस्थित 

शहतूत की पत्ती पर
रेशम के कीड़े हैं,
भारत के स्विट्ज़रलैंड में
बकरी हैं, भेड़ें हैं,
गूजर हैं, बकरवाल हैं,
पंडित हैं, शेख हैं,
सेव और बादाम हैं,
पश्मीना है और केसर भी.
चश्मों का जल आज भी
पहले सा ठंडा और मीठा है.

पर एक चीज़ है
जो सिरे से गायब है –
एक उन्मुक्त संगीत
जो दम तोड़ रहा है
`पाकिस्तान ज़िन्दाबाद` के
बोझ तले !

खिला गुलमुहर

खिला गुलमुहर जब कभी द्वार मेरे,
याद तेरी अचानक मुझे आ गई .
किसी वृक्ष पर जो दिखा नाम तेरा,
ज़िंदगी ने कहा ज़िंदगी पा गई ..
आईने ने कभी आँख मारी अगर,
आँख छवि में तुम्हारी ही भरमा गई.
चीर कर दुपहरी छांह ऐसे घिरी,
चूनरी ज्यों तुम्हारी लहर छा गई..

शोकगीत : एक लडकी की आत्मह्त्या पर

दहक रही यह चिता तुम्हारी, धधक रहे अंगारे .
तरुणि! तुम्हारे अल्हड यौवन को लपटें शृंगारें .
कौन सुन रहा है मरघट में, विकल ह्रदय का रोदन ?
केवल तीक्ष्ण हवाएं करतीं , ‘सांय-सांय’ अनुमोदन.
अरी कुमारी, सखी, वेदने, ओ दर्दों की बेटी !
असमय परिचित हुई मृत्यु से, और चिता में लेटी .

चिता ही है जीवन का सार.
देवि! नश्वर सारा संसार..[ १ ]

प्रसव क्षणों की महावेदना से जब मुक्ति जुटा कर.
जिस दिन पहले-पहल सखी! तुम रोईं जग में आकर .
सोच रहा था नन्हा मन, यह जीवन का वरदान मिला.
इसीलिए तो रोकर के भी, नादानी में फूल खिला.
किंतु तुम्हें क्या ज्ञात, उसी क्षण क्या जननी पर बीता.
रोया उन्मन निर्धन बापू, देख देख घर रीता.

ज्ञात था उन्हें विश्व का सार .
बिना धन जीवन है निस्सार. [२]

खेलीं छोटे से आँगन में ,जब तुम किलक किलक कर .
भरा अंक में जब जननी ने तुमको पुलक पुलक कर.
मुस्कानों से नन्हीं बाला ! तुमने फूल खिलाए .
औ’ ललाट पर निज बापू के स्नेहिल चुम्बन पाए .
रहीं खेलती और किलकती , पुलक रहीं मन ही मन.
तुम क्या जानी गृह स्वामी का कैसे सुलगा जीवन ?

निरीहों पर फणि की फुंकार.
निर्धनों पर विधि की हुंकार..[३]

यदा कदा चलता ही रहता अन्न अभाव उपवास.
कई दिनों तक जीते रहते पीकर बस वातास.
किंतु तुम्हें तो सखी! सदा ही दूध खरीद पिलाया.
शुष्क छातियों से पिलवाती क्या निर्धन की जाया ?
रहीं अपरिचित कैसे घर में हर प्राणी जीता है.
केवल दर्द भरा है सबमें शेष सभी रीता है.

मिला उनको शून्य उपहार.
हँसा उनपर अपना संसार .. [४]

गली मुहल्ले में जाकर भी , सखी , बहुत तुम खेली.
निर्धनता किसको कहते हैं ? समझ न सकीं , सहेली!
बचपन में जितनी लीलाएं की होंगी सीता ने.
जितना स्नेह दिया गोपों को प्रिय बाला राधा ने.
रंकसुते ! तुमने भी उतनी लीला करनी चाहीं.
मन का सारा स्नेह उडेला ,सखियों की गलबाहीं .

साम्य का बचपन में विस्तार .
मुग्ध जिस पर कवि का संसार .. [५]

याद नहीं या वह दिन तुमको? मरघट की सुकुमारी !
जिस दिन नभ में रंग उड़ा था, गलियों में पिचकारी..
देख रही थीं तुम क्रीडा को, निज प्यासा मन मारे .
स्नेहमयी माता शैया पर पड़ी रोग तन धारे.
बदन तप्त था ,बस गृहस्वामी खड़ा हुआ सिरहाने .
मन ही मन था देव मनाता , बुरा किया विधना ने !

फागुन पर बिजली का प्रहार.
सूना फाग , निर्धन घर-बार ..[६]

फ़िर दीवाली भी तो आई , जगमग जगमग करती .
धनिकों के ऊंचे महलों में दीप शिखाएं धरती
अंधकार में रही उपेक्षित किंतु तुम्हारी कुटिया .
जला न चूल्हा तक पर वैभव जला रहा फुल झडियाँ .. ..
पहली बार बताया माँ ने बेटी , हम गरीब हैं.
रो मत मांग न खील खिलौने , बेटी , हम गरीब हैं.

गरीबी का पहला उपहार
भावना का निर्मम संहार .. [७]

अब तक तो सब ही मानव थे सखी तुम्हारे लेखे
किंतु वर्ग दो उस दिन तुमने अपनी आंखों देखे.
टुकडे कर डाले मानस के नर ने धन के पीछे
मानव स्वयं समाज मध्य ही सीमा रेखा खींचे
प्रश्न उठा था उस दिन मन में ,किसने करी व्यवस्था ?
समझ न सकी पहेली लेकिन , रही अबोध अवस्था

बने सपने झंझा अवतार
रुदन ही निर्धन का आधार [८]

धीरे धीरे सखी खो रहीं थीं तुम अपना बचपन
.इठलाना इतराना यों ही सीख रहा था जीवन.
तभी तुम्हारी एक सहेली , विदा हुई ससुराल
लाखों की संपत्ति गई थी यह धनिकों की चाल .
बिखर रहे थे जब डोली पर खन खन खोटे सिक्के .
लूट रही थीं तुम भी उनको, खाकर धक्के मुक्के

वधू ने किए सभी श्रृंगार
देख मचला मन का संसार . [९]

एक कल्पना मन में बैठी ,है मुझको भी सजना
हाथों में रचनी है मेहदी , चरण महावर रचना
स्वर्ण भूषणों से लद करके मुझको भी जाना है.
और स्वर्ण से कीर्तिमान निज साजन को पाना है.
पति-इच्छा ने तुमको क्रमश: यौवन दिया कुमारी
होठों पर मीठी मुस्कानें ,आँखें ज़हर कटारी
.
रूपरेखा मनसिज की मार
बिंधा फूलों से ही संसार .. [१०]

कठिन हैं कठिन,किशोरी , सत्य , पुष्प-धन्वा के तीर .
कठिन है कठिन कुंवारी आयु , कठिन रीता पण पीर ..
बांधता काम देव का पाश , स्वयं चंचल मन उन्को.
प्रकृति को सदा पुरूष के साथ ,यौवन से यौवन को ..
रहीं चूमती तुम अपना ही बिम्ब देख दर्पण में .
शर की नोक लिए हाथों में ,मदन लगा सर्जन में.

सीखने लगीं प्रेम व्यवहार
चुभाता सूनापन अब खार ..[११]

स्वप्न के कुशल चितेरे ने निशा के काले पट पर.
अनोखे चित्र खींच डाले नयन में दो क्षण रुक कर..
मिला पलकों की रेखा को अनोखा बांक पाना ,री !
देह – आकर्षण दुगुना हुआ, हुई कटि क्षीण तुम्हारी ..
मन ने देखे सपने घोडे वाले राज कुँवर के
अंग अंग में मन-रंजन के , चुम्बन -आलिंगन के…

तुम्हारा यौवन का संभार !
पिता पर चिंता ,दुर्वह भार !![१२]

बाप हो चला बूढा, तुम थीं युवा हो रही आतुर
मिला चाँद का रूप तुम्हें औ’ मधुर कोकिला के सुर ..
जाने किस दिन हाथ सुता के हो पायेंगे पीले?
इस चिंता में स्वयं पिता के अंग हो चले ढीले
एक प्रश्न था बस दहेज़ का उस निर्धन के आगे
पुत्री उसे मिली अनमाँगे , कौन पाप थे जागे !

सबसे कम माँगे दस हज़ार.*
दिशाएं करतीं हाहाकार [१३]
[*यह घटना १९७४ में कोडरमा,बिहार में घटित हुई थी.]

निर्धन की एक मात्र पूंजी , हा ! बस तुम थीं, रूपसि !
जिसकेलिए जिया था अबतक वह तुम ही थीं , रूपसि !
कब तक घर में तुम्हें कुँवारी बैठाए रख पाता
आंखों आगे कामदेव के तीरों से मरवाता
पर पैसे के बिना विश्व में क्या कुछ हो पाता है?
सब रिश्ते झूठे हैं जग में ,धन सच्चा नाता है!

गरीबों पर बेटी का भार !
विश्व में कौन करे उद्धार?[१४]

विवश पिता ने जाना केवल, अपना एक सहारा .
भीख माँगने हर चौखट पर उसने हाथ पसारा..
यह कंगाली की सीमा थी , सौदा नव यौवन का.
मौन देखता रहा विश्व यह नुच-लुटना तन-मन का..
किंतु तुम्हारा मान किशोरी! आहत होकर जागा.
खा न सका वह जगती को तो तुमको डसने भागा..

हुई थी सचमुच गहरी मार .
प्रकम्पित था मन का संसार..[१५]

मान? मान के पीछे जग में हुआ नहीं है क्या-क्या?
अति विचित्र इतिहास मान का ,सुना नहीं है क्या-क्या?
अधरों तक आकर भी प्याला,लौट चले जब यों ही.
स्वप्निल पलकें अविचुम्बित ही उठ जाएँ जब यों ही..
उठी रहें अम्बर में बाहें, बिकें विकल आलिंगन.
आशाएं हिम से आहत हों, उपालंभ दे कण-कण.

क्षुब्ध करती मन का संसार.
टूटते तारों की झंकार.. [१६]

रोती रहीं रात भर तुम यों, अब क्या होने वाला?
भर-भर करके रहीं रीतती, तुम आंखों का प्याला..
आह! प्रेयसी! सूज गए वे आकर्षणमय लोचन.
तरुणाई अभिशाप बन गई , ज़हर बन गया यौवन..
सब सोए थे बेसुध होकर, तुम उठ चलीं अकेली.
सूने पनघट पर पहुँचीं तुम, बहुत वेदना झेली..

हुआ जलमग्न श्वास संसार
गईं तुम जगती के उस पार..[१७]

रोकर बापू तुम्हें ले चला पनघट से मरघट को .
पर घट से क्या तुम्हें प्रयोजन ,पार किया अवघट को..
घट बनकर तुम स्वयं पी चुकीं सारा ही पनघट तो.
केवल रस्म मात्र को फूटा मरघट में वह घट तो..
जली स्वर्ण सी देह चिता में अलकों का वह मधुवन.
जला और जल गया अचानक मौन अकेला यौवन..

चिता ही है जीवन का सार!
देवि! नश्वर सारा संसार !![१८]

नीम की ओट में 

नीम की ओट में जो कई खेल खेले,
चुभे पाँव में शूल बनकर बहुत दिन.
कामना के युवा पाहुने जो कुंवारे ,
बसे प्राण में भूल बनकर बहुत दिन..
कंटकों के , तृणों के ,उगे चिह्न सारे,
खिले देह में फूल बनकर बहुत दिन.
स्वप्न वे सब सलोने कसम वायदे वे,
उडे राह में धूल बनकर बहुत दिन ..

छिपकली 

चिपक गई है
मेरे दिमाग में
एक प्रागैतिहासिक छिपकली

निरंतर फड़फड़ा रही है
अपने लंबे मैले पंख

और प्रदूषित होती जा रही है
पीयूष रस से भरी मेरी डल झील
गोताखोर तलाशेंगे
कुछ दिन बाद
इसके तल में
आक्सीजनवाही मछलियों के
जीवाश्म !

हे अग्नि!

हे अग्नि!
तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।
बहुत क्षमता है तुममें
बड़ा ताप है –
बड़ी जीवंतता।

तुम जल में भी सुलगती हो
और वायु में भी,
भूगर्भ में भी तुम्हीं विराजमान हो
और व्यापती हो आकाश में भी तुम।
हमारे अस्तित्व में अवस्थित हो तुम
प्राण बनकर।

परमपावनी!
तुममें अनंत संभावनाएँ हैं
तुम्हीं से पवित्रता है इस जगत में।
फूँकती हो तुम सारे कलुष को,
शोधती हो फिर-फिर
हिरण्यगर्भ ज्ञान की शिखा को।
तुम ही तो जगती हो
हमारे अग्निहोत्र में
और आवाहन करते हैं तुम्हारा ही तो
संध्या के दीप की लौ में हम।

जगो, आज फिर,
खांडवप्रस्थ फैला है दूर-दूर
डँसता है प्रकाश की किरणों को,
फैलाता है अँधेरे का जाल
उगलता है भ्रम की छायाओं को।

उठो, तुम्हें करना है
छायाओं में छिपे सत्य का शोध।
तुम चिर शोधक हो, हे अग्नि!
तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।

हर औरत काँपती है 

आज मैं काँप रही हूँ
सदा ऐसा ही होता है
जब जब वे लड़ते हैं
मैं काँपती रहती हूँ

वे लड़ते हैं
लड़ना उनकी फ़ितरत है
कभी ज़र के लिए
कभी जोरू के लिए
कभी ज़मीन के लिए
कभी जुनून के लिए

वे लड़ते हैं
लड़कर उन्हें संतोष मिलता है
कभी शहीद होने का
कभी जीत के जश्न का
कभी स्वर्ग की लिप्सा का
कभी राज्य के भोग का

वे लड़ते हैं
लड़ाई उन्हें महान बनाती है
कभी वे शवाब कमाते हैं
कभी जेहाद करते हैं
कभी क्रांति लाते हैं
कभी तख्ता पलटते हैं

लड़ते वे हैं
काँपती मैं हूँ

लड़े कोई भी
मरे कोई भी
काँपना मुझी को है हर हाल में

वे जिनका खून बहाते हैं
मैं उन सबकी माँ हूँ न
वे जिसके परखचे उड़ाते हैं
वह मेरा सुहाग है न
वे जिससे बलात्कार करते हैं
वह मेरी कोखजनी है न

मुझे काँपना ही है हर हाल में –

वे जो खून पीते हैं
वे जो नरमेध करते हैं
वे जो बलात्कारी हैं
मैं उनकी भी तो माँ हूँ
मैं उनकी भी तो बेटी हूँ
मैं उनकी भी तो बहन हूँ

मैं काँपती हूँ-

उनके लिए मैं माँ नहीं रही न
न बेटी, न बहन
रिश्ते तो मनुष्यों के होते हैं
दरिंदों के कैसे रिश्ते – कैसे नाते

दुनिया को अपने रंग में रंगने का उन्माद
जब जब
मनुष्यों को दरिंदों में तब्दील करता है
तब तब मैं
काँपती हूँ

हर माँ काँपती है
हर औरत काँपती है
और शाप देती है
अपनी ही संतानों को

मैं फिर काँप रही हूँ (26 नवंबर की रात से)
और दे रही हूँ शाप
उन सारी आदमखोर संतानों को
जो दरिंदों में तब्दील होकर
लील रही हैं मनुष्यों को!

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