एम० के० मधु की रचनाएँ

मरहम

तुम छूते हो
दुखता है

लगाते हो
जब मरहम
घाव पर मेरे

मुझे
तुम्हारी पहचान नहीं
पर मेरे घावों को
तुम्हारी उँगलियों की पहचान है ।

दो बूँदें ओस की

पहाड़ से गिरती
पत्थरों से चोट खाती
वह नदी सूख चुकी है

पलक की कोर से
दो बूँदें ओस की
उठा सको तो उठा लो

आँसुओं के सैलाब को
पानी की ज़रूरत है

समय का सूर्य
और गर्म होने वाला है

लिलि

उसकी बालकनी पर
गमले में कैक्टस और लिलि के पौधे
साथ-साथ सजे हैं
मेरी खिड़की से यह साफ़-साफ़ दीखता है

कैक्टस की विशालता के बीच
लिलि का पौधा दब सा गया है
किन्तु जब कभी फूल उसमें दिख जाता है
मेरे अन्दर एक पूरी पृथ्वी
अपनी धुरी पर घूम जाती है

अपनी खिड़की पर खड़े-खड़े
मैं कभी-कभी बहुत भीग जाता हूँ
जब उसकी बालकनी पर छितराया
छोटा-सा, नन्हा-सा आकाश
कारण या अकारण गीला हो जाता है

उसकी बालकनी के गमले
और भीगे उसके नन्हें आकाश से
मेरा क्या रिश्ता है
यह मैं नहीं जानता हूँ
किन्तु ऎसा जब कभी होता है
मैं पृथ्वी की गति में
दौड़ने लगता हूँ
और उसके आकाश को
बाँहों में भरने का
एक कठोर दुःसाहस करता हूँ

महीनों बाद दौरे से लौटकर
मैं अपने घर आया हूँ
अपनी खिड़की पर फिर खड़ा हूँ
सामने की बालकनी
अपने पूरे वज़ूद के साथ क़ायम है
किन्तु लिलि नहीं है
उसके गमले और सूखे ठूँठ पर
कैक्टस की विशाल शाखाएँ काबिज़ हैं
डायनासोर की तरह।

बुतों के शहर में…

एक शहर खुलता रहा
कैलेन्डर की तरह परत दर परत
मटमैली सड़क और काला धुआं
और मिट्टी पर बहते लाल रंग

हम अख़बार के फलक पर रेंगते रहे
स्याह तस्वीरों की धूल साफ़ करते हुए
तस्वीर सामने थी-
एक हंसता खिलखिलाता बच्चा
दादा की उंगली पकड़
स्कूल जा रहा था
उंगली छुड़ा उसे जबरन उठा लिया गया
शहर चिल्लाता रहा
सायरन बजाती गाड़ियां दौड़ती रहीं

एक दिन वह दलित औरत
चौराहे के बीच में नंगी खड़ी थी
सामाजिक वैधानिकता के ठेकेदार
उसके बाल मुड़ा कर
सड़कों पर घुमा रहे थे
औपचारिकता के डंडे निशान पीटते रहे
सड़कें चीत्कार करती रहीं
वह लड़की परीक्षा देने
पिता के साथ रिक्शे पर जा रही थी
बीच रास्ते में उतार ली गई
पास की झाड़ी में
उसके कपड़े तार-तार होते रहे
पिता चीख-चीख कर
मदद मांगता रहा
और ख़ंजरों की भेंट चढ़ गया
इन्तज़ामिया की फाइलें
खुलती, बंद होती चली गईं

वह एक गरीब फोटोग्राफ़र था,
मुहल्ले के एक डॉन को
रंगदारी नहीं देने पर
उसके लेंस को
हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दिया गया
शहर में शोर होता रहा
खोजी कुत्तों का दस्ता
निशान सूंघता रहा

वे तीन मेधावी छात्रा थे
जिनने कभी चंदा से राशि जमा कर
कारगिल-शहीदों के परिवारों को
सहायता भेजी थी
ख़ाकी वर्दी और काले धंधेबाजों की सांठगांठ ने
उन्हें अपराधी कह इनकांउटर कर दिया
शहर वर्षों तक शोक मनाता रहा
निर्दोषों की मौत का हिसाब मांगता रहा
समय दर समय धुआं उठता रहा
मिट्टी पर गिरते लाल रंग
पांवों की धूल से धूमिल होते रहे
कभी आग, कभी पानी बरसता रहा
हवा कभी गर्म, कभी ठंडी बहती रही
पर वह अडिग था
हर चौराहे पर खड़ा
पत्थर सा, गूंगा और बहरा

आज भी धुआं उठ रहा है
वह आज भी अडिग है
हर चौराहे पर खड़ा, स्पन्दनहीन
दरअसल, हम चले आए हैं
बुतों के शहर में

ईश्वर को याद करो
बुत बोलते नहीं
बुत कुछ करते भी नहीं।

मकान है घर नहीं

छत के शहतीर
कील बन रहे
आँगन की तुलसी
काँटेदार नागफ़नी

डायनिंग टेबुल पर
चाय के प्याले
काँच-काँच किरकिरे

साँझा चूल्हा पर
रोटियाँ नहीं
पक रहा है मन
धुएँ का वन
है ये मकान
परन्तु घर नहीं ।

इन दिनों 

इन दिनों
मेरी परछाइयाँ हिल रही हैं
इन दिनों
शब्द मेरे गडमड हो रहे हैं

इन दिनों
हर आहट पर
मेरी आँखें
खिड़की से फिसलकर
दरवाज़े तक चली जाती हैं

इन दिनों
सड़क का शोर
अनसुना लगता है

इन दिनों
आकाश में उड़ती पतंगें
लगता है मेरे लिए उड़ी है…
कट कर गिरती हैं
तो लगता है
मेरे लिए गिरी हैं

इन दिनों
बहुत अच्छा लगता है
घुटर-घूँ घुटर-घूँ करता
पड़ोसी की दीवार पर
कबूतर का जोड़ा

आधा रास्ता चल लेने पर भी
मन बार-बार
लौट जाने को करता है
इन दिनों…

यादें जो अब शेष हैं 

तुम्हारी यादें
ड्राइंग रूम के कोने में
एक लकड़ी फ़्रेम में जड़ गई हैं
अलबम की जिल्द में
मढ़ गई हैं

जब भी अकेला होता हूं
फ़्रेम में दर्ज तुम्हारी आंखें
मुझमें
डूबती, उतराती
नज़र आती हैं

अब जब
सांझ की दहलीज तक
पहुंचने को हूं मैं
तुम्हारे होने और न होने का अर्थ
धीरे-धीरे
मुझमें आने लगा है
धुंधली पड़ती मेरी आंखें
अतीत की धुंध में
तुम्हारे वजूद को
तलाशने लगी हैं
जिसे कभी
मेरी दोपहर की आंच ने
अपने दंभ में
गला दिया था

उस गले
और फ़र्श पर फैले
छितराये
तुम्हारे वजूद के विस्तार को
चिथड़े बने
वर्तमान की पोछन से
समेटने की
अथक कोशिश कर रहा हूं मैं

काश!
उस वक्त
तुम्हारा अर्थ समझ पाता
काश!
इस वक्त
यह पोछन कामयाब होती।

कोरे कैनवस की मोनालिसा

बंद पलकों से
दे रहा इशारे
स्वप्न रचने
तुम्हारी उनींदी आंखों में

अनचली
थमी-थमी सी
मेरी सांसें
बजाकर बांसुरी
नींद में उड़ाती तुम्हें

मौन का
है संवाद मेरा
खोलती
खिड़की तुम्हारी
एक झोंका है
हवा का
द्वार पर
सांकल बजाता
एक खुशबू
बह रही
बेचैन है

अनछुये अहसास
मौसम के
पुलक रहे
शांत चेहरे पर
सुलग रहे
शून्य भाव

एक क़तरा
रोशनी का अन्दर
आने तो दो
एक क़तरा
रोशनी का
बाहर निकल
जाने तो दो

मेघ के स्वर
बिखर गये
अनसुने गीत
गाने तो दो

तुम बनो
इतिहास सृजन का
गह रहा हूं
इसलिये
कुछ शब्द ऐसे
ढालने
ग़ज़ल में
लिख रहा हूं
कुछ नज़्म ऐसे

बिना रंगों की
तूलिका
फैला रहा हूं मैं
कोरे कैनवस पर
‘मोनालिसा’
बना रहा हूँ मैं।

सिर्फ़ तुम्हारे लिए

सिले-सिले होठों से
कैसे कहूं
कि मैं तुम्हे चाहता हूं

मुंदी-मुंदी आंखों से
कैसे बोलूं
कि तुम कितनी सुन्दर हो

बंधे-बंधे हाथों से
तुम्हें कैसे बांधूं
कि तुम वही सब्ज़परी हो
जो मेरे सपनों में
हर पूर्णिमा की रात
चांदनी के रथ पर
आकाश से उतरती हो

रुके-रुके पांवों से
तुम्हें कैसे रोकूं
क्योंकि तुम नदी की तरह
मेरी बगल से रोज़ बहती हो
खुला है
मेरे हृदय का कपाट
झांक कर देखो
एक मंदिर सा बना है अन्दर
तुम्हारे लिये
सिर्फ़ तुम्हारे लिये।

आख़िर कबतक

तुम कब सुनोगी
पहाड़ पर उतरते
उदास बादलों की आहट

कब देखोगी
शांत झील में
एक कंकड़ी से उठा जल तरंग

जानवरों के शोर शराबे में
घने जंगल के उस पेड़ की
पत्तियों का रुदन
कब महसूस करोगी

तुम कब पढ़ोगी
मेरे चेहरे पर
दोपहर और सांध्य-वेला का संघर्ष
और कब पढ़ोगी
मेरी आंखों में
रोज लिखी जाने वाली एक ही भाषा
जिसका अर्थ सबको मालूम है
पर तुम्हें मालूम नहीं
क्योंकि तुम्हारे पास आंखें हैं
कान हैं
दिल भी है
पर ढेर सारे पत्थरों के बीच
तुम्हारे दिमाग में
पत्थरों की नदी बहती है।

नीड़ फिर तिनका-तिनका 

मेरा सारा अहसास
क़तरा-क़तरा बह रहा था
मैं बटोरने और बांधने
की अथक कोशिश कर रहा था
एक ठोस साकार मूर्ति
मन में संजोकर रखना चाहता था
उसकी

पर मुझमें वह
बर्फ़ की मानिंद पिघल रही थी
मेरे मयूर-पांखी सपनों की वह नायिका
मेघों के घने कोहरे में
लुप्त हो रही थी

ऐसा मेरे साथ हमेशा होता है
तिनका, तिनका जोड़कर
करता हूं उसके लिये एक
नीड़ का निर्माण
पर बसने से पहले ही
नीड़ फिर तिनका-तिनका
हो जाता है।

महज़ एक आदमी हूं 

मैं विद्वान नहीं
विद्वान बनने की साजिश भी नहीं
मैं तो महज़ एक आदमी हूं
बस सहज एक आदमी हूं
जिसके चेहरे पर
टंगी है तहरीर
थोड़ा है, थोड़ा और पाने की
और जिसके कंधे से लटकी है
बहुजन हिताय की तस्वीर
जो करता है अलग
बिल्कुल अलग
मेरे अहम को
उस अहम से
जो बांटता है
किताब एवं किताबत का आदमी
और जिससे हटकर
परिभाषित होता है
आदमीयत का आदमी।

एक संपूर्ण आकार

हर सुबह
खुलती है मेरी नींद
मस्जिद की अज़ान से

शुरू करता हूं
अपनी दिनचर्या
मंदिर की घंटियों के साथ

मन को करता हूं
शोधित
गिरजा की कैरोल-ध्वनि पर

मस्तिष्क में लाता हूं
संस्कार
गु्रुद्वारे की गुरुवाणी पर

कुरान की आयतें
मुझमें भरती हैं
साधना के स्वर

रामायण
मुझमें देता है
आदर्श
गीता देती है
कर्म का पाठ
बुद्ध की जातक कथाओं से
सीखा है– अहिंसा और सत्य

बाइबिल सिखाता है
त्याग और परोपकार
गुरुग्रंथ समझाता है
स्नेह और विश्वास

सारे अध्यात्म
एक साथ मिलकर
बनाते हैं
मेरे अन्दर
एक सम्पूर्ण आकार
मानव का।

ज़िंदगी लिखते हुए

हवा की सीढ़ियां चढ़
मिट्टी आकाश को उड़ रही
उफ़नता समुद्र में डूबता सूर्य
कुछ कहता रहा

चांद के मौन पर
जुगनुएं चीख़ती रहीं
स्याह रातें
कुछ अनकही
कहती रहीं

सूरज डूबता रहा
क्षितिज अपने पृष्ठ पर
अनदेखे चित्र
उकेरता रहा
पत्तियों पर
अनसुने बोल
बजते रहे
सांस लय देते रहे
सांस लय लेते रहे
सब बहते रहे
सब डूबते रहे
पर एक ध्वज लहराता रहा
नाव की पतवार पर
ज़िंदगी लिखता रहा
समंदर के झाग पर।

रफ़्तार से तेज़

मैं देख रहा हूं
अपने बेटे और बेटी को
जिनके कंधे
अब उचक कर
मेरे कंधे को पार कर जाना चाहते हैं

मैं देख रहा हूं
उनकी आंखों को
जिनमें सात नहीं
हज़ार रंगों वाले इन्द्रधनुष तैरते हैं

मैं सुन रहा हूं
उनके कानों में
हज़ार सुरों वाली
स्वर-लहरियां बज रही हैं

मैं महसूस कर रहा हूं
उनके बाजुओं को
जो समय को बांधने को बेसब्र हैं
और उनकी अंजुरियां
जो सितारों को बटोर रही हैं
मैं तक रहा हूं
उनके पांव
जो रफ़्तार से तेज़ हो रहे हैं
कहीं लड़खड़ा न जाएं वे
इसलिये बन जाना चाहता हूं
गति-अवरोधक
किन्तु फिर सोचता हूं
गिरेंगे, तभी तो बढ़ेंगे
पूर्ण होकर, अबाध, लक्ष्य तक।

समझौता

जब वह रौंदता है उसे
अपनी खरीदी हुई ज़मीन समझकर
तब उसकी खरगोशी आंखों में
एक खूंख़ार नाखून चुभता है
और एक ख़ास मौसम में दीवाना हुए
गली-पशु का वहशीपन
उसके मस्तिष्क
के कोमल तारों को काट जाता है

क्षत-विक्षत लहूलुहान तारों के बीच
स्वीकारती रहती है
अपनी जंघाओं पर
मंगलसूत्र का जख्म

वहशी पशु का जुनून
और बढ़ता है
जब मंगलसूत्र
किसी की पराजय, किसी की विजय
का परचम बनता है

धागों के टूटते रेशों के बीच
टूटता उसका मन
नखोर के घावों के बीच
रिसता उसका तन
किसी अनजाने कल के लिए
आज का समझौता है
समझौता ही तो है यह।

धनकुटनी

धान कूटती फुलबतिया
समाठ की हर चोट पर
उखल में समय कूटती है
चोट की ताल पर
कुछ गुनगुनाती है
दर्दीले स्वर में
मरद के खोने की बात सुनाती है

पैसा कमाने उसका मरद
पांच साल पहले परदेस गया
न पैसा भेजा, न चिट्ठी भेजी
बताये पते पर जब ढूंढने पहुंची
पता चला उसे
उसका पति वर्षों पहले
उस शहर को छोड़ चुका था
कोई और ठिकाना जोड़ चुका था

आज भी
बिना पता वाले पोस्टकार्ड का
वह रोज इंतज़ार करती है
गांव के सीमान से गुज़रती
रेल लाइन पर
शहर को जाती ट्रेन का धुआं
रोज़ निहारती है

इसी उम्मीद में
मालिक की हवेली पर
वह रोज़ समाठ से समय कूटती है
टुकड़ों में कुछ आंसू
कुछ उम्मीद जीती है
अपनी अधखुली चोली पर
मालिक की फिसलती निगाह
चुपचाप सहती है
अब ऊखल में कुटे
बस दो मुट्ठी धान
उसकी फटी धोती
का ईमान है।

वह ‘मरनी’ 

जंगल की आग से
जन्मी है एक औरत
सुर्ख़ होती है
अख़बार के फलक पर

स्याही की बूंद
और कलम की नोंक पर
वह जुगनू-सी
चमकती है

पर्चों पर उगती है
तलवार
बार-बार
तराशने गर्दन उसकी

किन्तु लहू ढलकती स्याही
नोंक पर चढ़ाती है ‘सान’
काटती है तलवार
मरते-मरते
वह फिर जी जाती है
किन्तु वह
‘मरनी’ कहलाती है।

क़तरा-क़तरा मौत 

ज़िंदगी का
यह कैसा मुक़ाम
जब हर कोई चाहता है पीना
मेरे लहू का जाम

क्यों हो गया है
यह इतना ज़ायकेदार
कि हर किसी की जीभ
लपलपाने लगी है

मैंने तो खाई थीं
समय के चूल्हे पर पकी
तल्खियों की तीखी सब्जियां
और सबकी थाल में परोसा था
अपने आंसू और पसीने की नमक

कुछ भी नहीं चाहा था किसी से
कुछ भी नहीं काटा था किसी का
लेकर जी रहा था
दो गज आकाश
दो गज ज़मीन
दो मुट्ठी रोशनी
दो मुट्ठी अंधेरा

पर हर आस्तीन में
क्यों छिपा है एक ख़ंजर
हर आंख में फैल रही है क्यों
क़तरा-क़तरा मौत
मेरे लिए
सिर्फ़ मेरे लिए।

आत्मशोध

मैंने स्वयं एक चक्रव्यूह रचा है
मैंने स्वयं अभिमन्यु की भूमिका अदा की है
मैंने स्वयं ही जयद्रथ बन
अपने अभिमन्यु की हत्या कर डाली
और मृत्यु से पहले
अपनी वसीयत भी बना डाली
कि
मैं नहीं चाहता
कोई अर्जुन मेरे लिए
किसी कृष्ण के पास जाए
और कोई कृष्ण
किसी नकली अभिमन्यु का दर्शन कराए
क्योंकि मैं नहीं चाहता
किसी अर्जुन के सामने किसी द्रौपदी का चीर
कोई दुश्शासन खींच डाले
और धर्म के नाम पर
अर्जुन सिर झुका डाले
और पांच वीर के सामने
एक नारी विलाप करे
फिर धर्म उस वक्त कहां गया था
जब द्रोण मारे गये थे
जब पितामह की हत्या हुई थी
और जब पराजित भीम ने
दुर्योधन पर ग़लत गदा मारी थी

उत्तर तुम्हारे कृष्ण भी नहीं दे सकते
उत्तर व्यास ने भी नहीं दिए हैं

उत्तर तुम्हें मुझसे लेना है
मैं जा रहा हूँ
नये सूर्य का निर्माण करने।

सेलफ़ोन

सेलफ़ोन की घंटी बजती है
वह दौड़ पड़ती है
उठाती है, कानों में लगाती है
वह कुलबुलाती है
फिर कसमसाती है
फिर रौ में बह जाती है

सेलफ़ोन से आवाज़ें नहीं
दो हाथ निकले थे
हाथों का कसाव बढ़ता है
वह और बहती है
जब तक दोनों हाथ
सेलफ़ोन की आस्तीन में
वापस नहीं चले जाते

समय के दौर में
शब्दों/मुहावरों के अर्थ बदल जाते हैं
आस्तीन के हाथ
और आस्तीन के सांप
अलग-अलग ढंग से
परिभाषित हो जाते हैं।

शो पीस

तुम्हारे ख़तों से
अनगिनत शब्दों को चुराकर
मैंने लिखी है
एक किताब

तुम्हारे ओठों पर
सदा विराजती मुस्कान
और आंखों में छाये
भावों को लेकर
बनाई है एक पेंटिंग

गिरते को थामने बढ़ी
तुम्हारी बांह
अपंग को गति देनेवाले
तुम्हारे पांव
और हमेशा सृजन करती
तुम्हारी काया को लेकर
मैंने बनाई है एक मूरत

जब तुम नहीं थी
तब ये सब
मेरे ड्राइंगरूम में
शो पीस की तरह चमकते थे
आज तुम हो
तो ये सब
किसी तिलस्मी दुनिया
के अजायबघर में क़ैद हैं।

छतरी

छतरी से ढँका तुम्हारा चेहरा
नहीं दिखता है,
सुनहरी धूप पर फिसलती
तुम्हारी परछाईं देखता हूँ
और हृदय में फैले बलुआही रेगिस्तान पर
लगता है
ओस की कुछ फुहार बरस गई है ।

रास्तों के फ़ासले हैं,
फ़ासलों में फिसलन है
फिसलन पर तेज़ी से सरकने वाला
तुम्हारा अक्स
मेरे पदचापों को अपने से बाँधे है

यह बरबस बढ़ता है
बढ़ता रहता है
आँखों में तुम्हारी परछाईं की लुकाछिपी को
क़ैद करते हुए

मेरे क़दम की उस बेजुबान आहट को
काश ! तुम सुन सकती
अपने ऊपर फैली उस छतरी को हटा सकती
बस एक बार अपनी गर्दन घुमा
पीछे देख भर लेती

छतरी और परछाईं बढ़ती रही
क़दम भी मेरे बढ़ते रहे
जगह-जगह फैले अलकतरे पर
अपने निशान छोड़ते हुए
सड़क के कंक्रीट
तमाशाई के जश्न में शामिल हो चुके थे ।

प्रेम

देखता हूँ प्रेम
बसंत की हर सुबह
सरसों के पीले फूलों पर

सुनता हूँ प्रेम
हर बारिश में
नन्हीं-नन्हीं बूंदों से

महसूसता हूँ प्रेम
हवाओं के ताल पर
बिखरते तेरे गेसुओं में

बाँटता हूँ प्रेम
जीवन में
आधा मुझे, आधा तुझे ।

लिली

उसकी बैलकनी पर
गमले में कैक्टस और लिली के पौधे
साथ-साथ सजे हैं

मेरी खिड़की से यह साफ़-साफ़ दिखता है
कैक्टस की विशालता के बीच
लिली का पौधा दब सा गया है
किंतु जब कभी फूल उसमें दिख जाता है
मेरे अन्दर एक पूरी पृथ्वी
अपनी धुरी पर घूम जाती है

अपनी खिड़की पर खड़े-खड़े
मैं अन्दर-अन्दर
खंडित होने लगता हूं कभी-कभी
जब हवा के झोंके में
कैक्टस के कांटे से टकरा-टकरा कर
लिली तार-तार बिखर जाती है

अपनी खिड़की पर खड़े-खड़े
मैं कभी-कभी बहुत भींग जाता हूं
जब उसकी बैलकनी पर छितराया
छोटा सा, नन्हा सा आकाश
कारण या अकारण गीला हो जाता है

उसकी बैलकनी के गमले
और भींगे उसके नन्हे आकाश से
मेरा क्या रिश्ता है
यह मैं नहीं जानता हूं
किंतु ऐसा जब कभी होता है
मैं पृथ्वी की गति में
दौड़ने लगता हूं
और उसके आकाश को
बांहों में भरने का
एक कठोर दुःसाहस करता हूं

महीनों बाद दौरे से लौटकर
मैं अपने घर आया हूं
अपनी खिड़की पर फिर खड़ा हूं
सामने की बैलकनी
अपने पूरे वजूद के साथ कायम है
किंतु लिली नहीं है
उसके गमले और सूखे ठूंठ पर
कैक्टस की विशाल शाखाएं काबिज हैं
डायनासोर की तरह।

क्योंकि यह मेरा शहर है

कविता के शब्दों में
एक शहर को जीता हूँ मैं

शब्द
कभी खुरदरी सड़क बन रेंगता है
कभी अलकतरे का धुआं उड़ाता है
कभी बहुमंजिली इमारतें
कभी स्लम की झोपड़पट्टी
और कभी
चौराहे का बुत बनकर
सामने खड़ा हो जाता है

शब्द
कभी म्यूनिसपेलिटी का कूड़ा
नाक में भरता है
सड़क पर बहता हुआ
गंदे नाले का पानी
कभी दरवाजा छूता है
कभी नल से बेवजह गिरता
पीने का जल
कभी गंदगी में घुलती
पावनी गंगा
और कभी
ट्रैफ़िक के जाम में
बच्चों का संसार डूबता है

शब्द
आंख तकता है
शब्द
सांस लेता है
शब्द
कान गूंजता है
शब्द
मुंह बोलता है
हरे पेड़ों को काला करता
गाड़ियों का धुआं उड़ता है
बस और ट्रेन की छत पर
बेतहाशा भीड़ दौड़ती है
कभी भागती हुई जिंदगी
कभी ठहरा हुआ समय
कभी अखबार के लोकल पन्ने पर
हत्या, अपहरण
और लूट की खबरें होती हैं
कभी काफी-हाउस के कोने में
सोचते हैं-
बीते कल के जनान्दोलन का इतिहास
और कभी
नुक्कड़ की दुकान में
चाय की चुस्कियों पर
विचारते हैं-
सामाजिक न्याय की रूपरेखा

बुझे लैंप-पोस्ट की तरह
सड़क पर चुपचाप खड़ा है शब्द
अपनी परछाई तलाशता है
निहारता है पुफटपाथ-
जाड़े की सर्द रात में
ठिठुरती अधनंगी आबादी
गुप्त होटलों की शाम को
रंगीन करता गुमनाम गोश्त
कॉलोनी के कूड़ेदान पर
नीलाम होता बचपन
और मंदिरों की चौखटों पर
भीख मांगता भाग्यहीन भगवान

और फिर
शब्द बनता है-
बीमार अस्पताल
मुजरिम कोतवाली
बन्द कारखाने
दफ़्तरों में हड़ताल
बिना पढ़ाई का विश्वविद्यालय
पैसे लूटता पब्लिक स्कूल
कोचिंग प्रतिष्ठान में
शिक्षा की कालाबाजारी
बेरोजगारी बढ़ाता इम्प्लायमेंट एक्सचेंज
बिजली का अंधकार
और पानी का हाहाकार

किन्तु इन सबके बावजूद
झूठ और सच के बीच
झूलता यह शहर
शब्द बन कर
मुझे मरने से रोकता है
और मैं रोकता हूं
इस शहर को मरने से
क्योंकि यह शहर, मेरा शहर है।

रानी रूपमती की चाय दुकान 

सचिवालय की बहुमंजिली इमारत के
सिरहाने पर है
फूलों का एक सुन्दर बगीचा
और पैताने पर है
रानी रूपमती की चाय दुकान

चाय दुकान के पास
कई तरफ़ से
सड़कें आकर मिलती हैं
इसलिए चाय दुकान महत्वपूर्ण है
किंतु और महत्वपूर्ण है यह
रानी रूपमती की चाय दुकान होने के कारण

रानी रूपमती कोई रानी-वानी नहीं
रूपमती कोई बहुत रूपवान भी नहीं
पर जवान है और थोड़ी गदराई भी
उसके हाथों में जुंबिश है
जो उछाल दे-देकर
स्पेशल चाय को अंजाम देती है

अल्हड़पन के कारण
उसकी बातें बेताली हैं
परंतु उसके अंग-अंग में ताल है
उस ताल से बंधे हैं
सचिवालय के कुछ अधपके बूढ़े
और पूरे पके जवान
जो फाइलों की उब से उबरने के लिए
उसके ताल में ताल मिलाने आते हैं
उसके पति राजा को
ये अधपके बूढ़े
‘गांधी जी’ कहकर बुलाते हैं
राजा, ‘गांधी’ बनकर बहुत खुश रहता है
काश! वह पर्यायवाची शब्दों का अर्थ जान पाता
वह सिर्फ़ दांत निपोड़ते हुए
पत्नी के काम में हाथ बंटाता है
हाशिए पर बैठा चाय के जूठे गिलास धोता है

सचिवालय के अधपके बूढ़े
रानी रूपमती की जुंबिश
और चाय की उछाल पर
मस्त रहते हैं
उसकी चोली, उसके गाल
उसकी चाल, उसकी ढाल पर
कुछ तुक्के छोड़ते रहते हैं
कुछ फुटपाथी, कुछ अर्धसाहित्यिक
गुलशन नंदा और रानू के उपन्यास की तरह

रानी रूपमती की जुंबिश जब और बढ़ जाती है
‘गा्धी जी’ की बत्तीसी
जूठे गिलासों में तीव्र गति से घुलने लगती है
अधपके बूढ़ों के हाथों में चाय के गिलास
और चाय के गिलास पर उनकी चुस्कियां
तेज हो जाती हैं
जैसे गिलास नहीं, रानी के ओठ हों
फाइलों की दुनिया से दूर
एक नई दुनिया
जहां सिर्फ़ वे और रानी रूपमती
और कोई नहीं
सब कुछ से बेखबर

चाय की उछाल पर
पूरा सचिवालय
सिरहाने से पैताने तक
उछाल मारता रहता है
फाइलों में योजनाएं फुदकती रहती हैं
ठेकेदार चाय पर चाय
बाबूओं को पिलाता रहता है
चाय के नाम पर
छुटभैये नेता भी यहां
कुर्सी-कुर्सी खेल लेते हैं

सब कुछ देखती
सब कुछ सहती
रानी रूपमती की चाय दुकान
तिराहे पर खड़ी
‘तीन हिस्सों को’ सम्हालती रहती है
आम आदमी
इसी तिराहे से होकर हर रोज
सचिवालय, विधानमंडल और न्यायालय
का रास्ता पकड़ता है
अनजान राहगीर भी राह भटककर
रुक जाता है इसी चाय दुकान पर
जहां रोज की तरह
रानी रूपमती की जुंबिश
अधपके बूढ़ों की चुस्कियां
और राजा उर्फ ‘गांधी’ की
दंत-निपोड़ जारी रहती है।

एक अनाम दुनिया की प्रणय-कथा

हम सब ने बनाई है
अपरिचित शब्दों की
एक अनाम दुनिया
जहां नागफ़नी के कांटेदार जंगल में
कभी-कभी रसवंती के बेर उग आते हैं
कभी बेर को पाने की हवस में
कांटों की नोंक पर लहू लबरेज होते हैं
पर लहू में बेर की मिठास जारी रहती है

हम सब ने मिलकर
सात बार बसंत बोये हैं
सात बार पतझड़ की
उदास शुष्क दोपहर की
जल्लादी उमस से तार-तार हुए हैं हम

सात सावन को बहाया है हमने
उसकी ठंडी-ठंडी बूंदों को
मोतियों की तरह पिरो कर
अपने अन्तःपुर को सजाया है हमने

सात शरद की सुबह और शाम
हम सब ने मिलकर
बनाई हैं कुछ मूर्तियां, कुछ पेंटिंग
अजन्ता, एलोरा की मानिंद

कुछ कबूतर उड़ाये हैं
कछुये और खरगोश को भी
दौड़ाया है इन ॠतुओं में हमने
हम सब ने मिलकर साथ-साथ
पलकों की घूंघट में
अनबोलते अक्षरों के महावर सजाए हैं
जो बिना अर्थ बताये टूट कर बह गये
सूखती गंगा की विलोपित होती धार की तरह

इन्हीं हाथों से हमने चुने
कुछ फूल, कुछ रंग
बनाये कुछ गजरे
पर किसे पता था कि
गजरों से भी चोट लगती है
चोट की मुस्कुराहट का
अन्दाज़ यहां अनोखा था
पेशानी पर मकड़जाल नहीं
लटों की लंपटता जारी थी

मौसम लुकाछिपी करता रहा
बयार का बहना जारी है
ज़िन्दगी आहटों में कटती रही
चारदीवारी के दरवाज़े पर
सांकल कहीं खनकता है
मन की सूखी गंगा में
कोई धार सी बहने लगती है
अनजान अंधेरी रातों में
कोई मांझी गीत सुनाता है
चारदीवारी के दरवाज़े पर
सांकल कहीं खनकता है।

किसी एक के नाम 

मेरी आँखों में
तैरते हैं शब्द
तुम्हारे लिए
पढ़ सको तो पढ़ लो

मेरी साँसों पर
बजता है संगीत
तुम्हारे लिए
सुन सको तो सुन लो

स्पंदित हैं मेरे ओंठ
तुम्हारे लिए
छू सको तो छू लो

तुम्हारे लिए
मेरी बाँहें
बढ़ चुकी हैं
बाँध सको तो बाँध लो

एक संपूर्ण भाव
उठ रहा है हृदय में
तुम्हारे लिए
ले सको तो ले लो

बहती नदी, चंचल झरना
घुमक्कड़ राही, औघड़ मन
समझ सको तो समझ लो

प्यार का पहर है
कारवाँ गुज़र न जाए
रोक सको तो रोक लो ।

शब्द से नि:शब्द तक 

इन दिनों मेरी सारी कविताएँ
तुम्हारे इर्द गिर्द घूमती हैं

इन दिनों धूप का एक गोला
बार-बार तुम्हारी पलकों की छाँव से टकरा कर
मेरी खिड़की पर आ गिरता है

इन दिनों हर शाम
बरसात के मौसम में
बादलों का समूह
तुम्हारी छत और मेरी छत के बीच
पुल बनाता है

इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं है
पर तुम्हारी गंध का निःशब्द अहसास
मुझे उस पुल पर चढ़ने को मजबूर करता है

काश! हॉलीवुड का स्पाइडर-मैन होता
या सुपर-मैन
तुम्हारे कँगूरे से लटकता झूलता रहता
तुम्हारे निज के मौसम में
सूराख बनाता रहता
कुछ पानी, कुछ आग
चुरा कर लाता
निज की मरुभूमि पर
पेड़ों की पाँत लगाते
दौड़ लगाता रहता
तय करता रहता
एक अन्तहीन दूरी
शब्द से निःशब्द तक ।

पत्थर की नदी 

तुम नहीं थी
हवा चलती थी
तुम आज हो
हवा चल रही है
तुम्हारे रहने, नहीं रहने के बीच
हवाओं के मिज़ाज में क्या अन्तर था
मैं नहीं समझ पाया
क्या तुम्हें
हवाओं के नहीं चलने का
इन्तज़ार था?
हवा ! तुम धीरे बहो
उनकी आखों में आज
पत्थरों का सैलाब है।

बटुआ

ज़िन्दगी को समेटते-समेटते
मैं बटुआ बन गया
अबकी होली में
कोई चुपके से आया
बटुआ खोला
सारा रंग चुरा ले गया

बटुआ हक्का बक्का
ठगा-ठगा रोता रहा
समय की खूंटी से लटक
अपनी गांठ को
कभी ढीला करता
कभी कसता रहा

चोर रंगों से अपने को
भर लिया था
पर आईने के अक्स में
काला ही लग रहा था
चोर, रंगों के इस तिलिस्म को
मापता रहा
कंगूरे पर खड़ा मैं
आकाश में इन्द्रधनुष तलाशता रहा
सोचता रहा –
एक दिन बटुआ फिर मुस्कुराएगा
तब की होली में
उसका रंग कोई नहीं चुराएगा
तब की होली में
अपने आंगन की अल्पना
वह स्वयं बनाएगा।

आंख में उगती मूंछें 

एक परी की तरह
वह रोज़ रूबरू होती है
धूप और छांव के गोले
पैरों से उड़ाती हुई

देखते-देखते
उसकी रूपहली आंखों में
कड़ी-कड़ी मूंछें उगने लगती हैं
एक औघड़ की तरह
मैं तटस्थ भाव में
अंधेरा ओढ़ लेता हूं

उसकी मूंछें मेरे अंधेरे से
ज़्यादा स्याह हो जाती हैं
एक हिरण की तलाश करने लगता हूं
ताकि अंधेरे से जल्द बाहर निकल सकूं।

गांठ 

मेरी आंखें
मेरे हाथ
मेरी उंगलियां
तथा मेरे नाखून
इतने तेज़
तथा सलीकेदार हैं
कि मुहल्ले, समाज
रिश्तेदार सभी
इनके मुरीद हैं

गाहे ब गाहे वे
याद कर लेते हैं इन्हें
जब उनके घर की कुंडियां नहीं खुलती हैं
जब उनकी रस्सियों की गांठ नहीं सुलझती है
जब उनके रौशनदान का पट जाम हो जाता है
और जब उनके हाथों की सूई में
धागा नहीं घुस पाता है

प्रथम पहर से अन्त पहर तक
कस्बे से कार्यालय तक
मुझे याद किया जाता रहा है
खोलने के लिए कुंडियां
सुलझाने के लिए गांठ
और सूई में डालने के लिए धागे
एक विशेषज्ञ के रूप में
किंतु आज मैं दौड़ रहा हूं
एक कोने से दूसरे कोने
एक चौराहे से दूसरे चौराहे
बेचैनी से ढूंढ रहा हूं-
एक विशेषज्ञ
अपने लिए

क्योंकि लग गई है गांठ
अनजाने में
मेरे अपने ही आंगन की अलगनी पर
खोले नहीं खुलती है
खोलने की जद्दोजहद में
और उलझ जाती है
जिससे मुक्ति के लिए
फरफराते हैं
मेरे घर की अर्द्धमृत आत्माओं के
अर्द्धजीवित वस्त्र
जो कई पहरों से
अलगनी से
उल्टे लटके हुए थे
अपने बचे हुए पानी के निचुड़ जाने के लिए

गांठ अपने वजूद पर कायम है
जिसकी बगल से
अपने पंख बचा कर
निकल जाती हैं
हंसती खिलखिलाती
जीवन से भरी कुछ तितलियां।

बदलने का सुख 

बदलने का सुख
ये उंगलियां
जो कभी इंगित होती थीं
दूसरों के घरों में
सूराख़ तलाशने
अब मुट्ठी बन
आकाश में लहराती हैं
और बनती हैं आवाज़
उन सूराख़ों को बंद करने के लिए

ये आंखें
अपनी चंचलता में
फिकरे कसती थीं
अब निगहबान हैं
बेआंखों की नगरी में
अकेली प्रयासरत

ये पांव
अपनी अकड़ में
ढाहते थे घरौंदे
तोड़ते थे खेतों की मेड़
अब बनाते हैं
पगडंडियां
उनके लिए

ये पूरा शरीर
जो कभी
सिर्फ़ अपना लगता था
अब
तिनके जोड़-जोड़
बना रहा है नई दुनिया
उनके लिए
सिर्फ़ उनके लिए।

है हवाओं को इंतज़ार

आज मेरे आकाश पर
बनता है इन्द्रधनुष
किन्तु रंगहीन

आज मेरे मंदिर में
बजती हैं घंटियां
किन्तु स्वरहीन

मेरे सितार पर
सजते हैं गीत
किन्तु लयविहीन

मेरे चित्रपट पर
उतरती है तस्वीर
बेरंगत बेलौस

आज एक अकेला दीप
काग़ज़ की नाव पर
भटक रहा
नदी में उठ चुका तूफ़ान
लड़ रहा अकेला वह
साहिल से दूर
दूर केवट तक रहा
टिमटिमाती लौ
जिसके बुझने का है
हवाओं को इंतज़ार।

क्यों नहीं बनते सीमेंट 

रेत की तरह
क्यों भुरभुरे हो रामदहीन
क्यों नहीं बनते सीमेंट
और जोड़ते परिवार

सोचो रामदहीन
क्यों हो जाता है
तुम्हारा घोंसला तार-तार

गारे लगाते ईंट जोड़ते
चालीस पहुँच गये तुम
महल दर महल
बहुत खड़ा किये
‘राय-विला’ से
‘राव-प्लाजा’ तक
जुड़े रहे
उनकी नींव से कंगूरे तक
पर तुम रेत की रेत रहे
अपना घर-
तुम्हारा अपना घर
जब तुम लौटते हो
शुतुरमुर्ग की तरह
आंखें मूंदते हो
जब तुम देखते हो-
एक हांडी और एक चूल्हा के लिए
अपने घर में
सीता और उर्मिला का युद्ध
और लखन की तीखी जुबान
और एक लालटेन के लिए
मारा-मारी करते
तुम्हारे रामू, श्यामू
लखन का लखू, नखू
बूढ़े पिता की समझौता-वाणी
बूढ़ी माता के उलाहने स्वर

हांडी के पटके जाने पर
लालटेन के फूटने पर
थोड़ा चौंकते ज़रूर हो
फिर बन जाते हो शुतुरमुर्ग
फिर तेज़ करते हो
ट्रांजिस्टर, कान के पास
किन्तु शोर कमने के बजाय बढ़ता है
छोटा भाई छत पर डंडा पटकता है
छत का खपड़ा भरभराता है
अन्दर छत का छेद बढ़ता है
बाहर भीड़ का
शोर बढ़ता है
क्या हुआ…क्या हुआ…
भीड़ चिल्लाती है
छत भरभरा कर गिरती है
ट्रांजिस्टर टूटता है
रामदहीन का सर फूटता है
भीड़ का एक बूढ़ा बोलता है-
बेचारा रामदहीन!
शोर थोड़ा थमता है
भीड़ देख रही थी-
रेत से बने चारों खंभे
हिलते हुए, डोलते हुए
रामदहीन, तुम रेत की रेत हो
भुरभुरे, बिल्कुल भुरभुरे।

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