एहतराम इस्लाम की रचनाएँ

बहाना ढूंढ ही लेता है, खूँ बहाने का

बहाना ढूंढ ही लेता है खूँ बहाने का,
है शौक कितना उसे सुर्ख़ियों में आने का।

मिले हैं जख़्म उसे इस क़दर कि अब वो भी,
कभी किसी को नहीं आईना दिखाने का।

बुलन्दियाँ मुझे ख़ुद ही तलाश कर लेंगी,
अता तो कीजिए मौक़ा नज़र में आने का।

करिश्मा कोहकनों ही के बस का होता है,
किसी पहाड़ से दरिया निकाल पाने का।

कहीं तुझे भी न बे-चेहरा कर दिया जाए,
तुझे भी शौक़ बहुत है शिनाख़्त पाने का।

’मीर’ को कोई क्या पहचाने मेरी बस्ती में 

’मीर’ को कोई क्या पहचाने मेरी बस्ती में,
सब शाइर हैं जाने-माने मेरी बस्ती में।

आम हुए जिसके अफ़साने मेरी बस्ती में,
वो मैं ही हूँ, कोई न जाने मेरी बस्ती में।

रुत क्या आए फूल खिलाने मेरी बस्ती में,
हैं काशाने-ही-काशाने मेरी बस्ती में।

घुल-मिल जाने का क़ाइल हर कोई है लेकिन,
हैं आपस में सब अंजाने मेरी बस्ती में।

मेरी ग़ज़लों के शैदाई घर-घर हैं लेकिन,
कौन हूँ मैं यह कोई न जाने मेरी बस्ती में।

कोई पल भी हो दिल पे भारी लगे

कोई पल भी हो दिल पे भारी लगे,
फ़ज़ा में अजब सोगवारी लगे।

ये क्या हाल ठहरा, दिल-ए-ज़ार का,
कहीं जाइए, बेक़रारी लगे।

बहुत घुल चुका ज़हर माहौल में,
किसी पेड़ को अब न आरी लगे।

किसी मोड़ पर तो न पहरे मिलें,
कोई राह तो इख़्तियारी लगे।

मुहब्बत की हो या अदावत की हो,
हमें उसकी हर बात प्यारी लगे।

कहाँ ढूंढ़ने जाएँ हम शहर में,
वो दुनिया जो हमको हमारी लगे।

भरा जाए लफ़्ज़ों में जादू अगर,
ग़ज़ल क्यों ने जादू निगारी लगे।

ग़ज़ल को कहाँ से कहा जाएगा,
वो लहजा जो जज़्बों से आरी लगे।

ख़ुदा ’एहतराम’ ऐसा दिल दे हमें,
किसी की हो मुश्किल, हमारी लगे।

सौ शेर 

मुस्कुराहट तेरे होठों की मुझे,
अपनी मंजि़ल का पता लगती है।1

पेड़ गिनती के सही नफ़रत के,
सारी बस्ती को हवा लगती है।2

संग ही संग है, इस जगह,
आइना कुछ को क्या कीजिए।3

दिखाई दे तो है शब्दों में जादू,
सुनाई दे तो पत्थर बोलते हैं।4

यक़ीं आए न आए तुमको लेकिन,
बहुत से लोग मर कर बोलते हैं।5

मन में काली-काली रात,
तन पर उजला-उजला दिन।6

नभ में तारे चमकने लगते हैं,
जब भी आंचल पसारती है रात।7

मत पूछो क्या था बचपन,
दिन होली दीवाली रात।8

अंधेरा न रस्ते में आया कहीं,
कहां छोड़ता मेरा साया मुझे।9

मुक़द्दर मे थी मेरे मंजि़ल नई,
नया रास्ता रास आया मुझे।10

दर्द हर जाएगा दवा होकर,
कोई देखे तो दर्द का होकर।11

डंचे आसन पे जब से बैठ गया,
रह गया तू भी देवता होकर।12

कोई रिश्ता सच से यक़ीनन है मेरा,
मेरी बात लोगों को लगती है गाली।13

बड़ा आदमी कौन मानेगा तुझको,
तेरी जि़न्दगी है दिखावे खाली।14

फ़रिश्ता,देवता, शैतान देखो,
न ढूढो आदमी को आदमी में।15

तू जो मेरे लिए थकने से बचा,
रास्ता मैं भी भटकने से बचा।16

तुझको पहचान नहीं शोलों की,
खुद को फूलों पे लपकने से बचा।17

गूंज है गीतों की लेकिन,
जि़न्दगी का स्वर कहां है।18

‘एहतराम’ अब ख़्वाब में भी,
ख़्वाब का मंजर कहंा है।19

आंख वाला ही जब नहीं कोई,
क्या मिलेगा दीया जलाने से।20

तलाश करता है मौक़ा लहू बहाने का,
है कितना शौक़ उसे सुर्खियों में आने का।21

दुनिया के सर्द-ओ-गर्म ने पहुंचा दिया कहां,
ख़ुद मेरा आइना मुझे पहचानता नहीं।22

नवाजि़श है जो यह कविता पे इतनी,
कोई शब्दों में उलझा रह गया क्या।23

बन जाते हैं जब-तब मेरा मासूम सा बचपन,
जि़द पकड़े हुए पांव पटकते हुए लम्हे।24

मेरी पसंद,तमन्ना,इरादा जानता है,
तो क्या कोइ मुझे मुझसे ज़्यादा जानता है।25

जि़न्दा है इन्तिक़ाम की चिंगारियां जहां,
दिल का हर इक जख़्म वहां भर गया तो क्या।26

देश को देगी कितने चपरासी,
ये हजारों में अर्जियां जो हैं।27

नज़र आता है मेरा अस्ल चेहरा,
मगर मेरी अदम-मौजूदगी में।28

धर्म जुदागाना रखकर भी,
हम मज़हब होते हैं बच्चे।29

तख्त-ए-दार चूमने वाला,
सरबुलंदी ज़रूर पाता है।30

मैदां में,कारखाने में,दफ्तर में औरतें,
आखिर परिंदे पिंजड़े से बाहर निकल गए।31

कोई इल्ज़ाम क्यों दूं बिच्छुओं को ‘एहतराम’ आखि़र,
मुझे ही डंक लगवाने का चस्का था बुरी लत थी।32

मुझे भी याद आयी है कोई भूली कथा अक्सर,
मेरी पलकों पे भी अक्सर सितारे झिलमिलाए हैं।33

इजाज़त दी गई है सांस लेने की यक़ीनन,
मगर माहौल में गाढ़ा धुआं रक्खा गया है।34


है शहरियों से दोनों तरफ़ शांति की अपील,
और’ फ़ौज सावधान है सरहद के आसपास।35

शाख़,गुल,तितली,धनक,बिजली, घटा आई नज़र,
जिस तरफ देखा,हमें शान-ए-खुदा आई नज़र।36

कम-जर्फ़ ही नहीं है,सियह बख़्त भी है वो,
दरियाओं से जो करता है दरियादिली की बात।37

मान रखता कौन विष का,कौन अपनाता सलीब,
कोई ईसा था न शंकर,सच को सच कहता तो कौन।38

आदमी तो ख़ैर से बस्ती में मिलते ही न थे,
देवता थे,सो थे पत्थर, सच को सच कहता तो कौन।39

ब-असर लोगों की इस बस्ती में,
किससे पूछें कि असर किसका है।40

दर-ओ-दीवार है मेरे लेकिन,
सोचता रहता हूं, घर किसका है।41

यों ही शमशीरों का ललकारेगा,
रह गया धड़ पे सर आगे भी।42

दूर तक नाम नहीं साये का,
है तो पीछे भी शजर आगे।43

दायरे टूट न पाए वर्ना,
जो तो सकती थी नज़र भी।44

मुस्कुरा लेता हूं मैं भी जब तक,
मेरे एल्बम में भी तस्वीरें हैं।45

झुक के मिलना पड़ेगा हर इक से,
क़द हमारा बड़ा न हो जाए।46

मैं तो बे-दाग़ लौट आया हूं,
आपको हौसला न हो जाए।47

अगर चारा निगल जाती है धोखे से बड़ी मछली,
तो अक्सर ये भी होता है कि बंसी टूट जाती है।48

तू तो न पूछ ऐ मेरी सादा-दिली कि मैं,
दुनिया जिधर खड़ी थी, उधर क्यों नहीं गया।49

भटकता है जो दरिया जंगलों में,
समुन्दर से किसी दिन जा मिलेगा।50

क़ह्र सहता हूं रोज दर्पण का,
रोज दर्पण के पास जाता हूं।51

हाथ बच्चों पे कब उठाता हूं।
भूख से जूझना सिखाता हूं।52

चेहरे वही हैं, सिर्फ़ मुखौटे बदल गए,
कैसे कहें,फ़रेब के पुतले बदल गए।53

मातृ-भाषा,राष्टृ भाषा,राज भाषा, सब तो हैं,
बस ज़रा व्यवहार में हिन्दी नहीं तो क्या हुआ।54

पट्टियां आंखों पे चढ़वा दी गई हैं ‘एहतराम’,
देश की जनता अगर अंधी नहीं तो क्या हुआ।55

दुआ न दे कि जियूं बेशुमार बसरों तक,
कि जी के दो घड़ी तड़पा हूं यार बरसों तक।56

मौज-मस्ती का नज़ारा इक तरफ़,
आंसुओं की मुक्त धारा इक तरफ़।57

पग-पग भटकाव हो गए,
इस क़दर सुझाव हो गए।58

क्या तुम्हारे रूप का वर्णन करूं,
जिसने देखा तुमको दर्पन हो गया।59

सुधा के नाम पर विष पी रहा हूं।
यही जीना हुआ तो जी रहा हूं।60

निशि-दिन भ्रष्टाचार में है।
वह शायद सरकार में है।61

सारी व्यवस्था है पक्की
यस सर! वह भी कार में है।62

कतारें दीपकों की मुस्कुराती हैं दीवाली में,
निगाहें ज्योति का संसार पाती हैं दीवाली में।63

यूं ही हलचल ने अरमानों में होगी।
शरारत कुछ तो मुस्कानों में होगी।64

ले उठ रहा हूं बज़्म से मैं तश्नगी के साथ।
साक़ी मगर ये जुल्म न हो अब किसी के साथ।

भाज्य को भागफल समझते हैं।
लोग मजमे को दल समझते हैं।66

नंगा खड़ा है धूप में, दुनिया से बेख़बर।
टूटे हैं जाने कौन से सदमे दरख़्त पर।67

नज़रें न क्यों जमाएं बहलिया दरख़्त पर।
रुकने लगे हैं आके परिंदे दरख़्त पर।68

कैसी डरावनी थी, वो जंगल की रात भी,
काटी गई जो राम भरोसे दरख़्त पर।69

प्रश्न कोई कहां अभाव का है।
है तो वितरण में भेदभाव का है।70

इक तरफ़ मेरा अहम है, इक तरफ़ तेरी खुशी,
आ गया मेरे लिए पल ‘इम्तहानी’ हो न हो।72

सुर्ख़ मौसम की कहानी है,पुरानी हो न हो।
आसमां का रंग आगे असामानी हो न हो।73

फिर दिलों पर राज हो इंसानियत का या खुदा।
जि़न्दगी फिर जि़न्दगी महसूस हो हर शख़्स को। 74

दहशत ऐसी भी कभी महसूस हो हर शख़्स को।
खूं में तर चादर हरी मसहूस हो हर शख़्स को। 75

दीवाली में घर-घर दिये मुस्कुराए।
मगर तुम न मेरे लिए मुस्कुराए। 76

जुबां तो खोलने की है इज़ाज़त।
किसी से सच बोलने की है इज़ाज़त।77

बच्चा था मैंने अपने आपको को चाटा लगा दिया।
अग्रज हैं आप पीठ मेरी थपथपाइए। 78

चट्टान तोड़ने को न घूंसा उठाइए।
मुट्ठी को चोट आएगी, मुट्ठी बचाइए।79

क्या जि़दगी हमारी-तुम्हारी है इन दिनों।
हर मूली अपने पत्तों से भारी है इन दिनों।80

तेरे ख़्याल को कहता है, जि़दगी अपनी।
तेरा ख़्याल जिसे अस्त-व्यस्त रखता है।81

स्दा भटकता है,रस्ता कभी नहीं पाता,
जे ‘एहतराम’ इरादों को पस्त करता है।82

तरह-तरह के भुलावों में मस्त रखता हूं।
मुझे वो कैसी निपुणता ध्वस्त रखता हूं।83

रीते के रीते हैं हम।
जाने क्या जीते हैं हम।84

फंस ही गया मंझधार का मारा नहीं छूटा।
पर देखने वालों से किनारा नहीं छूटा।85

कोना तंहाई का दमकता है।
तेरी तस्वीर मुस्कुराई क्या।86

देता रहता है तू सफाई क्या।
तेरे दिल में है कुछ बुराई क्या।

तन पर है सजा मख़मल,पर मन की दशा क्या है।
सोचा कभी तुमने, जीवन की दशा क्या है।88

याद से कौन बचा?बच न सकेगा तू भी।
आग तंहाई की भड़केगी जलेगा तू भी।89

लहू का नाम न था खंजरों के सीनों पर।
मगर लिखी थी कथा सारी आस्तीनों पर।90

तूफां नज़र में था, न किनारा नज़र में था।
हिम्मत थी अपनी,तेरा सहारा नज़र में था।91

ज़मीन छोड़ी, न छोड़ा है आसमां मैंने।
तुझे तलाश किया है कहां-कहां मैंने।92

कैसे कहूं कि आपका जादू चला नहीं।
मुंह में जुबां है सबके,कोई बोलता नहीं।93

प्यार में कर्तव्य क्या, अधिकार क्या।
हो गणित जिसमें भला,वह प्यार का।94

यूं तो मिल न गई होगी मंजिल-ए-मक़सूद।
उबूर हमने किए होंगे मरहले कितने।95

ये बहस छोडि़ए किस-किस के संग थे कितने।
पता लगाइए साबित हैं आइने कितने।96

उच्च कुल वाला हूं,गिर सकता हूं मैं उंचे कुलों में,
यह कहां लाए हो,यह तो वैश्याओं की गली है।97

आधुनिक तहज़ीब पर क्या सोचकर चर्चा चली है।
आवरण सुंदर,सुभग,भीतर से पुस्तक खोखली है।98

याद तेरी रातभर का जागरण दे जाएगी।
स्वप्न की भाषा को लेकिन व्याकर दे जाएगी।99

आपका पत्र क्या डाकिया दे गया।
रातभर जागने की सजा दे गया। 100

अग्नि-वर्षा है तो है हाँ बर्फ़बारी है तो है (ग़ज़ल)

अग्नि वर्षा है तो है हाँ बर्फ़बारी है तो है,
मौसमों के दरमियाँ इक जंग जारी है तो है ।

जिंदगी का लम्हा लम्हा उसपे भारी है तो है,
क्रांतिकारी व्यक्ति कुछ हो क्रांतिकारी है तो है ।

मूर्ति सोने की निरर्थक वस्तु है उसके लिए,
मोम की गुड़िया अगर बच्चे को प्यारी है तो है ।

खूँ- पसीना एक करके हम सजाते हैं इसे,
हम अगर कह दें कि यह दुनिया हमारी है तो है ।

रात कोठे पर बिताता है कि होटल में कोई,
रोशनी में दिन कि मंदिर का पुजारी है तो है ।

अपनी कोमल भावना के रक्त में डूबी हुई,
मात्र श्रद्धा आज भी भारत की नारी है तो है ।

हैं तो हैं दुनिया से बेपरवा परिंदे शाख़ पर,
घात में उनकी कहीं कोई शिकारी है तो है ।

आप छल-बल के धनी हैं जीतिएगा आप ही,
आपसे बेहतर मेरी उम्मीदवारी है तो है ।

देश के सम्पन्नता कितनी बढ़ी है, देखिए,
सोचिए क्यों ? देश की जनता भिखारी है तो है ।

दिल्लियों अमृतसरों की भीड़ में खोई हुई,
देश मे अपने कहीं कन्याकुमारी है तो है ।

“एहतराम” अपने ग़ज़ल-लेखन को कहता है कला,
आप कहते हैं उसे जादूनिगारी, है तो है ।

बदली कहाँ हालात की तस्वीर वही है

बदली कहाँ हालात की तस्वीर वही है
करा है वही, पाँव की जंजीर वही है

बदली हुई इस घर की हर इक चीज है लेकिन
दीवार पे लटकी हुई तस्वीर वही है

लहराते हैं हर लम्हा नए रंग के सपने
हर चाँद की आखों में बसे पीर वही है

जो कुछ भी दया दृष्टि से मिल जाये किसी की
उपलब्धि वाही है में तकदीर वही है

अवसर को उचक लेने की रखता है जो क्षमता
इस युग का वही कृष्ण है रघुवीर वही है

अंतरगति का चित्र

अंतरगति का चित्र बना दो कागज़ पर
मकड़ी के जाले तनवा दो कागज़ पर

गुमराही का नर्क न लादो कागज़ पर
लेखक हो तो स्वप्न सज़ा दो कागज़ पर

युक्ति करो अपना मन ठण्ढा करने की
शोलों के बाजार लगा दो कागज़ पर

होटल में नंगे जिस्मों को प्यार करो
बे शर्मी का नाम मिटा दो कागज़ पर

कोई तो साधन हो जी खुश रहने का
धरती को आकाशा बना दो कागज़ पर

यादों की तस्वीर बनाने बैठे हो
आंसू की बूँदें टपका दो कागज़ पर

अनपढ़ को जिस ओर कहोगे जाएगा
सभ्य सुशिक्षित को बहका दो कागज़ पर

दृश्य जारी है मगर 

द्रश्य जारी हैं मगर परदे गिराए जा रहे हैं
जाने किस शैली में अब नाटक दिखाए जा रहे हैं

देश क्या अब भी नहीं पहुचेगा उन्नति के शिखर पर
नित्य ही दो चार उदघाटन कराये जा रहे हैं

छिड़ गया है स्वच्छता अभियान शायद शह्र भर में
गन्दगी के ढेर सडकों पर सजाये जा रहे हैं

दृष्टि में शासन की सर्वोपरि है कुछ तो लोकसेवा
लोक सेवा के लिए अफसर बढ़ाये जा रहे हैं

शांति के प्रति विश्व का उत्साह बढाता जा रहा है
अब कबूतर की जगह राकेट उडाये जा रहे हीं

झूठ तिकडम लूट रिश्वत राहजनी हत्या डकैती
जिन्दा रहने के हमें सब गुर सिखाए जा रहे हैं

एहतराम उड़ पायेगा कोई बराबर आपके क्या
आप संबंधों के राकेट में उडाये जा रहे हैं

चहरे की मुस्कान गई 

चहरे की मुस्कान गई
मेरी भी पहचान गई

कैसी सभी सुशीला थी
जिसने कहा जो, मान गई

मूल्यों का संरक्षक था
मुफ्त ही जिसकी जान गई

जख्म से बच कर खुश हो तुम
गम है मुझको आन गयी

कैसी भोली सूरत थी
लेकर मेरा ध्यान गयी

बच्चों का अभ्यास हुआ
गौरैयों की जान गई

सोने की चिया हमको
देकर हिन्दुस्तान गयी

अग्नि शय्या पर सो रहे हैं लोग

अग्नि शय्या पर सो रहे हैं लोग
किस कार्ड सर्द पड़ चुके हैं लोग

तोडना चाहते हैं अमृत फल
जहर के बीज बो रहे हैं लोग

मंजिलों की तलाश है इनको
एक दर पर खड़े हुए हीं लोग

कापते हीं सड़क पे सर्दी से
बंद कमरों में खौलते हैं लोग

स्वर्ग से अप्सराएँ उतारी हैं
स्वप्न भी खूब देखते हैं लोग

खुद इन्हें भी खबर नहीं इसकी
किन दिशाओं में चल पड़े हैं लोग

मन को मन के निकट नहीं लाते
देह पर देह थोपते हैं लोग

कैसी बस्ती है ‘एहतराम’ यहाँ
मर रहे हीं न जी रहे हैं लोग

शक्ल मेरी क्या चमकी

शक्ल मेरी क्या चमकी
आपकी सभा चमकी

गहरी कालिमा चमकी
या मेरी दुआ चमकी

ज्योति पा गई धरती
बन के आईना चमकी

मेरे जख्म क्या चमके
आपकी अदा चमकी

सत्य की सुरक्षा में
जंग -ए – कर्बला चमकी

खैर प्यारे हिरणों की
मृग- मरीचिका चमकी

धन की राहें ढूंढ ली …

धन की राहें ढूंढ ली सत्ता की गलियां ढूढ़ ली
डूब मरने के लिए लोगों ने नदियाँ ढूढ़ ली

कितनी ही सदियाँ गवां दी एक लम्हे के लिए
एक लम्हे के लिए कितनी ही सदियाँ ढूढ़ ली

तुमने जिन आखों में कुछ लिखा हुआ पाया नहीं
हमने उनमें ढेर सारी पांडुलिपियाँ ढूढ़ ली

आपकी इच्छा ने ली करवट इधर और उस तरफ
आपकी बन्दूक के छर्रे ने चिड़िया ढूढ़ ली

पेश कर सकता हूँ अप शेरोन की माला एहतराम
भावनाओं में गुंथे शब्दों की लड़ियाँ ढूढ़ ली

जमी पर खेल कैसा हो रहा है

जमी पर खेल कैसा हो रहा है
समूचा दौर अंधा हो रहा है

कहाँ कोशिश गई बेकार अपनी
जो पत्थर था वो शीशा हो रहा है

न रोके रुक सकेगी अब तबाही
की पानी सर से ऊँचा हो रहा है

घरों में कैद लोगों आओ देखो
सड़क पर क्या तमाशा हो रहा है

ठिकाने लग रहा है जोश सबका
हमारा जोश ठण्ढा हो रहा है

जजाल वालों के हातोह ही गजब है
गज़ल के साथ धोखा हो रहा है

मिलेगा एहतराम अपने नगर में
तुम्हें ये वहम कैसा हो रहा है

दुनिया के गम 

दुनिया के गम फिजूल की फिकरों से बच गए
अच्छा हुआ की तुम मेरे शेरोन से बच गए

कर्फ्यू-जदा इलाके में तुम लोग भी तो थे
तुम लोग कैसे भेड़ियों, कुत्तों से बच गए

हरगिज़ बयां न दीजिए बाहर अमाँ न थी
कहिये की घर में कैद थे खर्चे से बच गए

इक चूक सारे मुहरों को अभिशिप्त कर गई
फर्जी से आ पिटे जो पियादों से बच गए

सिक्कों की ओट ले के सरलता से ‘एहतराम’
कातिल सभी पुलीस की नज़रों से बच गए

कुछ तो कमरे में गुजर होगा हवा का पागल 

कुछ तो कमरे में गुजर होगा हवा का पागल
खिडकियां खोल की है हब्स बला का पागल

उसकी बकवास में होती है पते की बात
कभी कर दे न कोई तेज धमाका पागल

क्यों बनाने पे तुला है तू कोई ताजमहल
हाथ कटवाएगा क्या तू अपनी कला का पागल

खैर हो आज निकल आया है घर से बाहर
अपने हाथों में लिए अग्नि शलाका पागल

हर इमारत से लपकते हैं घृणा के शोले
किसपे फहराएगा तू प्रेम पताका पागल

तूने सोचा ही कभी अपने लिए कुछ भी कभी
क्यों न ठहराएं तुझे लोग सदा का पागल

बात बस यही है की अन्य्याय नहीं सह पाटा
सभी कहते हैं जिसे दुष्ट लड़ाका पागल

हदें फलांगता ऊपर निकल गया कितना 

हदें फलांगता ऊपर निकल गया कितना
जिसे उछाला गया वो उछल गया कितना

वो सोचता है हवन से उसे मिला क्या कुछ
मैं देखता हूँ मेरा हाँथ जल गया कितना

न कोई बाप न भाई न कोई माँ न बहन
हमारा तौर तरीका बदल गया कितना

पड़ा है राह में रफ़्तार तेज थी जिसकी
जो सुस्त गाम था आगे निकल गया कितना

किसी को दे गया धोखा खुद उसका साया तक
किसी को दूर का रिश्ता भी फल गया कितना

तेरी नज़र में अगर दोस्तों की कीमत है
पता न कर की तुझे कौन छल गया कितना

पथ पे आयेंगे लोग जाने कब 

पथ पे आयेंगे लोग जाने कब
सर उठाएंगे लोग जाने कब

आसुओं से उमड़ पड़े सागर
मुस्कुराएंगे कोग जाने कब

जख्म मुद्दत से गुदगुदाते हैं
खिल्खिलायेंगे लोग जाने कब

पेड़ काँटों के हो गए बालिग
गुल खिलाएंगे लोग जाने कब

है प्रतीक्षा में प्रात का सूरज
साथ जाएँगे लोग जाने कब

अपने बच्चों की बलि चढाने से
बाज़ आयेंगे लोग जाने कब

जख्म सहना है’एहतराम’ गुनाह
जान पायेंगे लोग जाने कब

भ्रस्ट है तो क्या हुआ 

भ्रस्ट है तो क्या हुआ कहिये सदाचारी है वह
आप यह मत भूलिए अफसर है अधिकारी है वह

हुक्म है खाना तलाशी का तो लुट ही जाईये
बोलिए मत कुछ लुटेरे से की सरकारी है वह

श्रृंखला कटु अनुभवों की टूट पायेगी कहाँ
द्रोपदी के जिस्म से लिपटी सुई सारी है वह

दस्तकें जेहनों के दरवाजे पे दे पाए न जो
आप ही कहिये भला कैसी गज़लकारी है वह

फर्क ब्रह्मण शूद्र में करता नहीं कुछ ‘एहतराम’
धर्म से उसको गरज क्या घोर संसारी है वह

जीवित हूँ क्या अर्थ ?

जीवित हूँ क्या अर्थ ? मुझे कुछ जीने का अहसास तो हो
रूह मेरी समझा जाता है जिसको मेरे पास तो हो

आप भी मेरी तरह समंदर शोलों के पी जायें मगर
मेरी तरह से आप के होठों पर भी सुलगती प्यास तो हो

लाख हमारे जिस्म हमारी रूहों से अब दूर सही
लेकिन अब मैं पास तुम्हारे और तुम मेरे पास तो हो

काटनी होगी बस आखों ही आखों में जो रात मुझे
कुछ न सही उस रात में तेरी यादों की बू बास तो हो

लाख न हो चलने की ताकत लाख न हो मंजिल नज़दीक
लेकिन अंधियारों के वन में राह दिखाती आस तो हो

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