ऐतबार साज़िद की रचनाएँ

भीड़ है बर-सर-ए-बाज़ार कहीं और चलें 

भीड़ है बर-सर-ए-बाज़ार कहीं और चलें
आ मेरे दिल मेरे ग़म-ख़्वार कहीं और चलें

कोई खिड़की नहीं खुलती किसी बाग़ीचे में
साँस लेना भी है दुश्वार कहीं और चलें

तू भी मग़मूम है मैं भी हूँ बहुत अफ़्सुर्दा
दोनों इस दुख से हैं दो-चार कहीं और चलें

ढूँढते हैं कोई सर-सब्ज़ कुशादा सी फ़ज़ा
वक़्त की धुँद के उस पार कहीं और चलें

ये जो फूलों से भरा शहर हुआ करता था
उस के मंज़र हैं दिल-आज़ार कहीं और चलें

ऐसे हँगामा-ए-महशर में तो दम घुटता है
बातें कुछ करनी हैं इस बार कहीं और चलें

छोटे छोटे कई बे-फ़ैज़ मफ़ादात के साथ

छोटे छोटे कई बे-फ़ैज़ मफ़ादात के साथ
लोग ज़िंदा हैं अजब सूरत-ए-हालात के साथ

फ़ैसला ये तो बहर-हाल तुझे करना है
ज़ेहन के साथ सुलगना है के जज़्बात के साथ

गुफ़्तुगू देर से जारी है नतीजे के बग़ैर
इक नई बात निकल आती है हर बात के साथ

अब के ये सोच के तुम ज़ख़्म-ए-जुदाई देना
दिल भी बुझ जाएगा ढलती हुई इस रात के साथ

तुम वही हो के जो पहले थे मेरी नज़रों में
क्या इज़ाफ़ा हुआ अतलस ओ बानात के साथ

इतना पस्पा न हो दीवार से लग जाएगा
इतने समझौते न कर सूरत-ए-हालात के साथ

भेजता रहता है गुम-नाम ख़तों में कुछ फूल
इस क़दर किस को मोहब्बत है मेरी ज़ात के साथ

छोटे छोटे से मफ़ादात लिए फिरते हैं

छोटे छोटे से मफ़ादात लिए फिरते हैं
दर-ब-दर ख़ुद को जो दिन रात लिए फिरते हैं

अपनी मजरूह अनाओं को दिलासे दे कर
हाथ में कासा-ए-ख़ैरात लिए फिरते हैं

शहर में हम ने सुना है के तेरे शोला-नवा
कुछ सुलगते हुए नग़मात लिए फिरते हैं

मुख़्तलिफ़ अपनी कहानी है ज़माने भर से
मुनफ़रिद हम ग़म-ए-हालात लिए फिरते हैं

एक हम हैं के ग़म-ए-दहर से फ़ुर्सत ही नहीं
एक वो हैं के ग़म-ए-ज़ात लिए फिरते हैं

घर की दहलीज़ से बाज़ार में मत

घर की दहलीज़ से बाज़ार में मत आ जाना
तुम किसी चश्म-ए-ख़रीदार में मत आ जाना

ख़ाक उड़ाना इन्हीं गलियों में भला लगता है
चलते फिरते किसी दरबार में मत आ जाना

यूँही ख़ुश-बू की तरह फैलते रहना हर सू
तुम किसी दाम-ए-तलब-गार में मत आ जाना

दूर साहिल पे खड़े रह के तमाशा करना
किसी उम्मीद के मँजधार में मत आ जाना

अच्छे लगते हो के ख़ुद-सर नहीं ख़ुद्दार हो तुम
हाँ सिमट के बुत-ए-पिंदार में मत आ जाना

चाँद कहता हूँ तो मतलब न ग़लत लेना तुम
रात को रोज़न-ए-दीवार में मत आ जाना

जाने किस चाह के किस प्यार के

जाने किस चाह के किस प्यार के गुन गाते हो
रात दिन कौन से दिल-दार के गुन गाते हो

ये तो देखों के तुम्हें लूट लिया है उस ने
इक तबस्सुम पे ख़रीदार के गुन गाते हो

अपनी तनहाई पे नाजाँ हो मेरे सादा-मिज़ाज
अपने सूने दर ओ दीवार के गुन गाते हो

अपने ही ज़ेहन की तख़लीक़ पे इतने सरशार
अपने अफ़सानवी किरदार के गुन गाते हो

और लोगों के भी घर होते हैं घर वाले भी
सिर्फ़ अपने दर ओ दीवार की गुन गाते हो

न गुमान मौत का है न ख़याल ज़िंदगी

न गुमान मौत का है न ख़याल ज़िंदगी का
सो ये हाल इन दिनों है मेरे दिल की बे-कसी का

मैं शिकस्ता बाम ओ दर में जिसे जा के ढूँडता था
कोई याद थी किसी की कोई नाम था किसी का

मैं हवाओं से हरासाँ वो घुटन से दिल-गिरफ़्ता
मैं चराग़ तीरगी का वो गुलाब रौशनी का

अभी रेल के सफ़र में हैं बहुत निहाल दोनों
कहीं रोग बन न जाए यही साथ दो घड़ी का

कोई शहर आ रहा है तो ये ख़ौफ़ आ रहा है
कोई जाने कब उतर ले के भरोसा क्या किसी का

कोई मुख़्तलिफ़ नहीं है ये धुआँ ये राएगानी
के जो हाल शहर का है वही अपनी शायरी का.

फूल थे रंग थे लम्हों की सबाहत हम थे

फूल थे रंग थे लम्हों की सबाहत हम थे
ऐसे ज़िंदा थे के जीने की अलामत हम थे

सब ख़िरद-मंद बने फिरते थे माशा-अल्लाह
बस तेरे शहर में इक साहिब-ए-वहशत हम थे

नाम बख़्शा है तुझे किस के वुफ़ूर-ए-ग़म ने
गर कोई था तू तेरे मुजरिम-ए-शोहरत हम थे

अब तो ख़ुद अपनी ज़रूरत भी नहीं है हम को
वो भी दिन थे के कभी तेरी ज़रूरत हम थे

धूप के दश्त में कितना वो हमें ढूँढता था
‘ऐतबार’ उस के लिए अब्र की सूरत हम थे

रस्ते का इंतिख़ाब ज़रूरी सा हो गया

रस्ते का इंतिख़ाब ज़रूरी सा हो गया
अब इख़्तिताम-ए-बाब ज़रुरी सा हो गया

हम चुप रहे तो और भी इल्ज़ाम आएगा
अब कुछ न कुछ जवाब ज़रूरी सा हो गया

हम टालते रहे के ये नौबत न आने पाए
फिर हिज्र का अज़ाब ज़रूरी सा हो गया

हर शाम जल्द सोने की आदत ही पड़ गई
हर रात एक ख़्वाब ज़रूरी सा हो गया

आहों से टूटता नहीं ये गुम्बद-ए-सियाह
आब संग-ए-आफ़ताब ज़रूरी सा हो गया

देना है इम्तिहान तुम्हारे फ़िराक़ का
अब सब्र का निसाब ज़रूरी सा हो गया

तुम्हें ख़याल-ए-ज़ात है शुऊर-ए-ज़ात

तुम्हें ख़याल-ए-ज़ात है शुऊर-ए-ज़ात ही नहीं
ख़ता मुआफ़ ये तुम्हारे बस की बात ही नहीं

ग़ज़ल फ़ज़ा भी ढूँडती है अपने ख़ास रंग की
हमारा मसअला फ़क़त क़लम दवात ही नहीं

हमारी साअतों के हिस्सा-दार और लोग हैं
हमारे सामने फ़क़त हमारी ज़ात ही नहीं

वरक़ वरक़ पे डाएरी में आँसुओं का नाम भी है
ये सिर्फ़ बारिशों से भीगे काग़ज़ात ही नहीं

कहानियों का रूप दे के हम जिन्हें सुना सकें
हमारी ज़िंदगी में ऐसे वाक़िआत ही नहीं

किसी का नाम आ गया था यूँ ही दरमियान में
अब इस का ज़िक्र क्या करें जब ऐसी बात ही नहीं

ये हसीं लोग हैं तू इन की मुरव्वत पे

ये हसीं लोग हैं तू इन की मुरव्वत पे न जा
ख़ुद ही उठ बैठ किसी इज़्न ओ इजाज़त पे न जा

सूरत-ए-शम्मा तेरे सामने रौशन हैं जो फूल
उन की किरनों में नहा शौक़-ए-समाअत पे न जा

दिल सी चेक-बुक है तेरे पास तुझे क्या धड़का
जी को भा जाए तो फिर चीज़ की क़ीमत पे न जा

इतना कम-ज़र्फ़ न बन उस के भी सीने में है दिल
उस का एहसास भी रख अपनी ही राहत पे न जा

देखता क्या है ठहर कर मेरी जानिब हर रोज़
रोज़न-ए-दर हूँ मेरी दीद की हैरत पे न जा

तेरे दिल-सोख़्ता बैठे हैं सर-ए-बाम अभी
बाल खोले हुए तारों भारी इस छत पे न जा

मेरी पोशाक तो पहचान नहीं है मेरी
दिल में भी झाँक मेरी ज़ाहिरी हालत पे न जा.

मेरी रातों की राहत, दिन के इत्मिनान ले जाना

मेरी रातों की राहत, दिन के इत्मिनान ले जाना
तुम्हारे काम आ जायेगा, यह सामान ले जाना

तुम्हारे बाद क्या रखना अना से वास्ता कोई ?
तुम अपने साथ मेरा उम्र भर का मान ले जाना

शिकस्ता के कुछ रेज़े पड़े हैं फर्श पर, चुन लो
अगर तुम जोड़ सको तो यह गुलदान ले जाना

अंदर अल्मारिओं में चंद ऑराक़ परेशां है
मेरे ये बाकि मंदा ख्वाब, मेरी जान! ले जाना

तुम्हें ऐसे तो खाली हाथ रुखसत कर नहीं सकते
पुरानी दोस्ती है, की कुछ पहचान ले जाना

इरादा कर लिया है तुमने गर सचमुच बिछड़ने का
तो फिर अपने यह सारे वादा-ओ-पैमान ले जाना

अगर थोड़ी बहुत है, शायरी से उनको दिलचस्पी
तो उनके सामने मेरा यह दीवान ले जाना

कोई कैसा हम सफर है, ये अभी से मत बताओ

कोई कैसा हम सफर है, ये अभी से मत बताओ
अभी क्या पता किसी का, के चली नहीं है नाव

ये ज़रूरी तो नहीं है, के सदा रहे मरासिम
ये सफर की दोस्ती है, इसे रोग मत बनाओ

मेरे चारागर बोहत हैं, ये खलिश मगर है दिल में
कोई ऐसा हो के, जिस को हों अज़ीज़ मेरे घाव

तुम्हें आईनागिरी में है, बोहत कमाल हासिल
मेरा दिल है किरच किरच, इसे जोड़ के दिखाओ

कोई कैस था तो होगा, कोई कोकाहन था होगा
मेरे रंज मुख्तलिफ हैं, मुझे उनसे मत मिलाओ

मुझे क्या पड़ी है “साजिद”, के पराई आग मांगू
मैं ग़ज़ल का आदमी हूँ, मेरे अपने हैं अलाव

यूँ ही सी एक बात थी, उस का मलाल क्या करें

यूँ ही सी एक बात थी, उस का मलाल क्या करें
मीर-ए-खराब हाल सा अपना भी हाल, क्या करें?

ऐसी फिजा के कहर में ऐसी हवा के ज़हर में
जिंदा हैं ऐसे शहर में और कमाल क्या करें?

और बहुत सी उलझने तूक-ओ-रसं से बढ़ के हैं
ज़िक्र-ए-ज़माल क्या करे, फ़िक्र-ए-विसाल क्या करें?

ढूंढ़ लिए है चारागर हमने दियार-ए-गैर में
घर में हमारा कौन है, घर का ख्याल क्या करें?

चुनते है दिल की किरचियाँ बिखरी हैं जो यहाँ-वहाँ
होना था एक दिन यही, रंज-माल क्या करें?

उसकी नज़र में कैद हैं अपनी तमाम मुन्ताकिन
तेक-ए-ख्याल क्या करें, हर्फ़ की ढाल क्या करें?

तुम्हारे जैसे लोग जबसे मेहरबान नहीं रहे 

तुम्हारे जैसे लोग जबसे मेहरबान नहीं रहे
तभी से ये मेरे जमीन-ओ-आसमान नहीं रहे

खंडहर का रूप धरने लगे है बाग शहर के
वो फूल-ओ-दरख्त, वो समर यहाँ नहीं रहे

सब अपनी अपनी सोच अपनी फिकर के असीर हैं
तुम्हारें शहर में मेरे मिजाज़ दा नहीं रहें

उसे ये गम है, शहर ने हमारी बात जान ली
हमें ये दुःख है उस के रंज भी निहां नहीं रहे

बोहत है यूँ तो मेरे इर्द-गिर्द मेरे आशना
तुम्हारे बाद धडकनों के राजदान नहीं रहे

असीर हो के रह गए हैं शहर की फिजाओं में
परिंदे वाकई चमन के तर्जुमान नहीं रहे

तुम को तो ये सावन की घटा कुछ नहीं कहती 

तुम को तो ये सावन की घटा कुछ नहीं कहती
हम सोख्ता लोगो को ये क्या कुछ नहीं कहती

हो लाख कोई शोर मचाता हुआ मौसम
दिल चुप हो तो बहार की फिजा कुछ नहीं कहती

क्यूँ रेत पे बैठे हो झुकाए हुए सर को
के तुमको समंदर की हवा कुछ नहीं कहती

पूछा के शिकायत तो नहीं है उसे हमसे
आहिस्ता से कासिद ने “कहा कुछ नहीं कहती”

पूछा के जुदाई का कोई हल भी निकला ?
कासिद ने दुबारा कहा”कुछ नहीं कहती”

ऐ नुक्ता-ए-दर्द! ये तो बताओ के सारे शब
क्या शमा फरोज़ा से हवा कुछ नहीं कहती

भरी महफ़िल में तन्हाई का आलम ढूंढ़ लेता हूँ

भरी महफ़िल में तन्हाई का आलम ढूंढ़ लेता हूँ
जहाँ जाता हूँ अपने दिल का मौसम ढूंढ़ लेता हूँ

अकेला खुद को जब ये महसूस करता हूँ किसी लम्हे
किसी उम्मीद का चेहरा, कोई गम ढूंढ़ लेता हूँ

बोहत हंसी नजर आती हैं जो ऑंखें सर-ए-महफ़िल
मैं इन आँखों के पीछे चस्म-ए-पूर्णम ढूंढ़ लेता हूँ

गले लग कर किसी के चाहता हूँ जब कभी रोना
शिकस्ता कोई अपने जैसा हम दम ढूंढ़ लेता हूँ

कलेंडर से नहीं मशरूत मेरे रात दिन “साजिद”
मैं जैसा चाहता हूँ वैसा मौसम ढूंढ़ लेता हूँ

फिर उसके जाते ही दिल सुनसान हो कर रह गया 

फिर उसके जाते ही दिल सुनसान हो कर रह गया
अच्छा भला इक शहर वीरान हो कर रह गया

हर नक्श बतल हो गया अब के दयार-ए-हिज्र में
इक ज़ख्म गुज़रे वक्त की पहचान हो कर रह गया

रुत ने मेरे चारों तरफ खींचें हिसार-ए-बाम-ओ-दर
यह शहर फिर मेरे लिए ज़ान्दान हो कर रह गया

कुछ दिन मुझे आवाज़ दी लोगों ने उस के नाम से
फिर शहर भर में वो मेरी पहचान हो कर रह गया

इक ख्वाब हो कर रह गई गुलशन से अपनी निस्बतें
दिल रेज़ा रेज़ा कांच का गुलदान हो कर रह गया

हर सात-ए-आराम-ए-दिल हर लम्हा तस्कीन-ए-जान
बिछड़े हुए इक शख्स का पैमान हो कर रह गया

ख्वाहिश तो थी “साजिद” मुझे तशीर-ए-मेहर-ओ-माह की
लेकिन फ़क़त मैं साहिब-ए-दीवान हो कर रह गया

किसी दिन, चाहते हैं 

किसी दिन, चाहते हैं
चुपके से हम उस के जीने पर
कोई जलता दिया,
कुछ फूल
रख आयें
के अपने बचपन में
वो अंधेरों से भी डरता था
उसेफूलों की खुशबू से भी रघबत थी
बोहत मुमकिन है, अब भी
शब की तारीकी से उस को खौफ आता हो
महकते फूल शायद बैस-ए-तस्कीन अब भी हों
सो इस इमकान पर
इक शाम उस के नाम करते हैं
चलो यह काम करते हैं!

मेरी राहों के

मेरी राहों के
जो जुगनू हैं
वो तेरे हैं
तेरी आँखों के
जो अँधेरे हैं
वो मेरे है
छू सकता नहीं
कोई गम तुझको
क्यूंकि
तुझ पर दुआओं के जो
पहरे हैं
वो मेरे हैं

अभी आग पूरी जली नहीं 

अभी आग पूरी जली नहीं, अभी शोले ऊँचे उठे नहीं
अभी कहाँ का हूँ मैं गज़लसारा, मेरे खाल-ओ-खद अभी बने नहीं

अभी सीनाजोर नहीं हुआ, मेरे दिल के गम का मामला
कोई गहरा दर्द मिला नहीं, अभी ऐसे चरके लगे नहीं

इस सैल-ए-नूर की निश्बतों से मेरे दरीचा-ए-दिल में आ
मेरे ताकचिनो में है रौशनी, अभी ये चराग बुझे नहीं

न मेरे ख्याल की अंजुमन, न मेरे मिजाज़ की शायरी
सो कयाम करता मैं किस जगह, मेरे लोग मुझको मिले नहीं

मेरी शोहरतों के जो दाग हैं, मेरी मेहनतों के ये बाग़ हैं
ये माता-ओ-माल-ए-शिकस्तागान है, ज़कात में तो मिले नहीं

अभी बीच में हैं ये माजरा, सो रहेगा जारी ये सिलसिला
के बिसात-ए-हर्फ़-ओ-ख्याल पर अभी पूरे मोहरे सजे नहीं

तर्क-ए-वफ़ा तुम क्यों करते हो? 

तर्क-ए-वफ़ा तुम क्यों करते हो? इतनी क्या बेजारी है
हम ने कोई शिकायत की है? बेशक जान हमारी है

तुम ने खुद को बाँट दिया है कैसे इतनी खानों में
सच्चों से भी दुआ सलाम है, झूठों से भी यारी है

कैसा हिज्र क़यामत का है, लहू में शोले नाचते हैं
आंखें बंद नहीं हो पाती, नींद हवस पे तारी है

तुम ने हासिल कर ली होगी शायद अपनी मंजिल-ए-शौक़
हम तो हमेशा के राही हैं, अपना सफ़र तो जारी है

पत्थर दिल बे’हिस लोगों को यह नुक्ता कैसे समझाएं
इश्क में क्या बे’अंत नशा है, यह कैसी सरशारी है

तुम ने कब देखी है तन्हाई और सन्नाटे की आग
इन शोलों में इस दोज़ख में हम ने उम्र गुजारी है

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