ओमप्रकाश सारस्वत की रचनाएँ

ऋत्विक पर्व 

जब भी आकाश पुष्प झरता है
धरा पर तभी उगते हैं ये बर्फ के फूल
हरे वृक्षों पर
टीन की लाल छतों पर
काली चिमनियों पर
स्थल पुण्डरीकों की तरह

जो सूरज का स्पर्श पाते ही
मुरझा जाते हैं
(शर्म के मारे पानी-पानी होकर)

क्या तुमने देखा है कभी
यह विराट ऋत्विक पर्व

अरे, इसे चतुर्दिक देखने के लिए
बर्ष महोदय ने
(साल भर तपस्या के वरदान स्वरूप)
तीन सौ पैंसठ आँखें माँगी थीं ख़ुदा से
और कहा था

कि हर रोज़
आँख़ों देखी ख़बरों की तरह
पहुँचाता रहूँगा
प्रकृति का नव-नव समाचार

पर दुर्भाग्य कि
जिस दिन भी यह पुण्य पर्व आता है
उसकी सहस्ररश्मि आँखों में
श्याम बादलों का काला मोतिया उतर आता है
(यद्यपि वह दूसरे ही दिन भला-चंगा हो जाता है )
पर देखने वाले
इन्हीं दो आँखों से देख लेते हैं यह अनुपम पर्व
(ज़्यादा माँगने से महत्व के दिन ही कंगाली आती है)

देखो किस प्रकार
इस प्राकृतिक यज्ञ में
अतिथियों के लिए बिछ गया है
एक सफेद दूधिया ग़लीचा

देवदारू स्वागत कर्ताओं की तरह स्नेहवश
किस तरह हाथ जोड़े खड़े हैं सफेद पगड़ी में
धरती किस प्रकार सँवर गयी है
सद्यः स्नाता-सी होम करने को सफेद धोती में

और डालियाँ, पौर कन्याओं-सी
बरसा रही हैं आते-जातों पर हिमलाजा
देखो तुम भी इसी शुभ्र यज्ञ में
कीर्ति पटल में धर लो पाँव

अन्यथा जीवन, इन्हीं श्यामल घाटियों में
परछाईयों की तरह हो जाएगा विलीन
और तुम आजन्म तरसते रहोगे
हिम पर, धूप की तरह
चाँदनी बन कर खिलने को

बर्फ़ / चार दृष्य 

एक
किसी दुर्दिन में
रूईं के फाहों सी
लगातार गिरती बर्फ़
यूँ लगती है
जैसे
अनन्त खरगोश-शावकों को
मार-मार कर
अविरल गिराता जा रहा हो
कोई आकाश मैं बैठा हुआ
पंचतंत्र का सिंह

दो
बड़े वर के सफेद लट्ठे के थान-सी
अछोर फैली यह उजली बर्फ़
कुछ स्थानों पर से
उड़ती हुई यूँ लग रही है
जैसे किसी थान को
बीच-बीच से काट कर
बेच रहा हो कोई
न समझ बजाज

तीन
किसी की खुशी में
कोई विरला ही
झूम उठता है
मस्ती से
देखो हवाएं किस तरह
इस शरदोत्सव में धूप की तरह पीकर
धुत्त
नाच रही हैं
देवदारुओं से
निपट-लिपट कर

चार
आगामी धूप के पर्व में
शामिल होने के लिए
सगर्व
सिर पर अपनी-अपनी
पगड़ी बाँध
सहर्ष
ग्रामीणों की तरह
किस तरह इधर-उधर
सुखा रहे हैं ये कैल,देवदारु
अपने-अपने
बर्फ़ के तहमद

ताकि तब तक

संकरी गलियों का
दमघोटू कसैला धूम
पहर भर में
शहर भर में
फैल जाएगा
शहर में एक और धूम-देश
घुस आएगा
फिर ह्र्दय की उदारता के
मायने क्या?

ह्र्दय बस चीखता है
स्नेह-हीन मशीन-सा
देह अब कोई धर्म स्वीकारती नहीं
मात्र पशुपन के
फिर आत्मा न जाने क्यों पड़ी है पीछे
कई जन्मों से, पीछा छोड़ती ही नहीं

मैं त्रस्त हूं
अपने पराये से
इसलिए ओ क्लैंडरों के वाचकों!
गणितिज्ञ सत्पुरुषों ! बताना कि
कौन सा दिन, तिथि
अपने महामरण की है

कब तलक

बैलों के चुपड़े हुए सीगों को देखकर
हमने सीख ली है
अपने नाख़ूनों में पॉलिश लगाना
ताकि मनुष्य होने के अभ्यास में
कुछ इज़ाफा हो सके

हमारे बुज़ुर्ग मर गए हैं
केसरी अनुभव लेकर
अब हमें बाजरे की बालियाँ
स्वयं ही बीननी हैं
और खुद ही छाननी है बची हुई चोकर
इस ढंग से
कि मेहनत रोटी हो सके
कुदाली की माँग पर
खेत की ख़ुशी के लिए

यहाँ सैंकड़ों चेहरे हर रोज़
असंख्य गालियों की ‘बिब्लियोग्रैफी’ वाले
भूख के ‘थीसिस’ हो रहे हैं
और जो ढो रहे हैं दोहरे लेख
अपने दुर्भाग्य और उनके पुरुषार्थ के
व्यंग्य से विडम्बना तक
नियति के भ्रम में

अब व्यापक हितों की रक्षा हेतु
ढूंढ रहे हैं लोग गुमशुदा बीवियां
लावारिस बेटियाँ
प्यार की गलियों में
सहयोग के तौर पर
स्वयं सेवकों की तरह

सभाएं नारे उगलती हैं चौराहों पर
संसद होने को
देश : द्रौपदी की देह हो रहा है
लाज के नाम पर

सदस्य कर रहे हैं प्रचार
मीसा ब्रह्मास्त्र का बचाव के पक्ष में
और हम इस समाजवादी दफ्तर में
अफसरों की कुर्सिफाँ हो गए हैं

अब कुल-हित के लिये,परिवार
पूजा किया करेंगे
लूप महर्षि की
बच्चों के जन्म-दिवस पर
माँ के स्वास्थय के लिए

यहाँ विकास के लिए विरोध और विद्रोह
शांत हो रहे हैं समझौतों में
गर्दनें सीख गयीं हैं
कालरों से घिर कर रहना
बालों ने खिजाब का रंग स्वीकार कर लिया है
और ’लोअर कट’ मूछें
पहले की कह चुकी है
‘योरज़ फैथफुल्ली’
फिर जय प्राकाश हो या द देसाई
रजनीश हो या साईं
अपने लिये तो सभी सिरताज़ हैं
पर पता नहीं जनता कब जाकर बनेगी
लोकनेत्री अथया भगवती

यह क्रोशियानिट ज़िन्दगी
कब तलद बुनती रहेगी शाल
और तुम कब तलक सराहते रहोगे
इसी डिज़ाईन को
अरे,कुछ तो नकार-नकार कर निरुत्साहित करते हैं
और तुम सराह-सराह कर
निकम्मा कर रहे हो

अब बदलने दो दिज़ाईन को
नयी देह के लिए
नयी माँग तक
जीवन संस्तुतियों की जालसाज़ी से तंग आ गया है

यहाँ व्यस्था का कुकर खराब हो गया है
उसमें अब चीज़े समय पर नहीं पकतीं
सारा टाईमटेबल ग़लत हो रहा है

इसलिये हम कहते हैं कि
एक बार, बस एक बार
जलने दो हीटर को
मीटर के मूल तक
पर बुढ़ऊ नुक्ते नित्य सावधान हैं
मुझे ख़तरा है कि किसी चालू इशारे पे
आग कहीं पानी न पी लें

पर तुम कब तलक छान-छान कर
पीते रहोगे चाय
और करते जाओगे छाननी की तारीफ़

बन्धु! याद रखना
एक दिन यही चाय, जलाएगी छाननी
और फिर हम देखेंगे
कि तुम कब तलक
बुझाते रहोगे फूँक से चकमक

दि माल 

यह माल है
लगता है किसी अप्सरा का
बदन पोंछा रूमाल है

पर माल की और चलते हुए
मुझे भ्रम होता है तब
जब मैं सोचता हूँ कि
मानव के अन्दर मानव पलता है
तब मुझे महसूस नहीं होता
कि मेरे अन्दर जो एक दानव हँसता है
जो मुझे रोकता नहीं
मेरी पीठ ठोंकता है
(क्योंकि माल के बिना भी वह
अपनी करनी से बाज नहीं आता )
मुझे और शीघ्र चलने को
उत्साहित करता है
उत्प्रेरित करता है
जबकि मैंने कभी उसका कहा टाला भी नहीं

फिर मुझे भी माल पर चलने के लिए
अन्दर के दानव से कोई बेहतर साथी
लंगोटिया यार,नज़र नहीं आता

क्योंकि हम दोनों
इसी सभ्य नगरी में
बचपन से साथ-साथ बड़े हुए हैं
अपने पैरों खड़े हुए हैं

वैसे यहाँ हर रोज
असँख्य लोग घूमते हैं
शून्य से शून्य तक
अर्थहीन गतियों में

या ऑफिस ऑर्डर की तरह
टेबल से टेबल तक
अधिकार की मुद्रा में

जो मित्र हैं साथी हैं
कुछ विश्वास की थाती हैं
पर, यहाँ पर दोस्तों, साथियों
मित्रों,बीवियों,बहनों की संज्ञा
कोई संज्ञा नहीं

यहाँ रिश्ते सम्बन्धों के नहीं
प्यार के कायल हैं,

और प्यार जो भावना के बदले
नज़रों से बंधा है
ऐसी नज़रें, जो पहली ही बार
छूटते ही बेंध देती हैं पुतलियाँ

फिर यहाँ हर गुस्ताख़ नज़र
अपने लिए खोज ही लेती है
कोई न कोई जिस्म

यहाँ हरेक देह के
हर कोरे पन्ने पर
किसी न किसी गुस्ताख़ नज़र के
हस्ताक्षर अंकित हैं

ज़िन्दगी यहाँ मदहोश है
वैसे भी होश किसको रह गया है अब
तब मेरी देह का हर अंग चितकबरा हो जाता है
और मानवेतर भाषा में भदेस बतियाता है

और धूर्त इमान तब कायर-सा
बूट के तलवों में लुकता है

या झूठ-सा झुकता है
आँखों में फिर प्यार के
आसमां भर जाते हैं
रूप के आकर्षण की चुम्बकीय शक्ति के
तब भी मैं
चेहरों पर से फिसल-फिसल जाता हूँ
किसी भी पाउडरी मुस्कान पर
टिक नहीं पाता हूँ

पर दानव ढीठ-सा दीठ गड़ाये
चिकने चुपड़े रूप के गाढ़े में गड़ आता है
बस यूँ ही अड़ जाता है
उसकी आँखों में तब
पालतू शेर की बेवफाई चमकती है
तब उसकी ओर ताकना
शराफत की देवी की लज्जा का काम नहीं

किंतु सुए समझाये कौन
कि यहाँ पर भई
कई शरीफ घरानों की
देवियाँ,प्यारी बीवियाँ
सुन्दर बहनें,लाड़ली बेटियाँ
अपनी बोरियत दूर दरने
कुछ खुद को रिफ्रेश करने
हर रोज़ आती हैं
बिना नागा,बिना मतलब

और वे ऐसी-वैसी बिल्कुल नहीं
सभी माल के जंगल की जन चाही ऋतुएं हैं
जो हर रोज़ हरियाली बाँटती हैं

यहाँ कई विरोधाभास
साम्यवादी होना चाहते हैं
वामपंथी रास्तों पर

यहीं पर वैल-बॉटम, साड़ियों से
और सड़ियाँ,पैंटों से हाथ मिलाती हैं
जैसे ब्लाउज़ और बनियान
दोनो खूशबू बदलते हैं
परिचय के बाद, विस्तर की वीथी में

अब यहाँ लगता है
कि जीने के,अर्थ कुछ
मॉडर्न हुए जाते हैं
बेखुदी की सीमा तक
आत्मनिर्भर हुए जाते हैं
यहाँ हर मौसम में कुकुरमुत्ते
गुलाबी कलियों में मसखरियाँ करते हैं

यहाँ तरंगों के विरुद्ध
बालू का अभियान,सदा जारी रहता है

कहते हैं कि इस देश में
द्रौपदी की साड़ी ने उन्नति नहीं की!
तो लो देखो क्रान्ति
कुछ शांति पूर्ण परिवर्त्तन

यहाँ नाभिदर्शना साड़ियाँ
अब हॉट-पैंट पहनने लग गई हैं
सूटों ने तलाश ली हैं अपने लिये
गुलबदन हसीनाएं
और मर्दों के बाल,अब अबला की माँग के आभूषण हैं
इसलिए अब’आई’भी ‘आया’ है,
बन्धु,कैसा वक्त आया है, कल हम,मिस्टर-मिस से
बाल-बाल बच गये
वरना बेखुदी में स्वभाववश
हाथ मिला बैठे थे
गरवा लगा बैठे थे
खुदा का शुक्र है
हम साफ-साफ बच गए
वर्ना हमारे सफेद बाल पकड़े जाते
और हम किसी गोरी की बाहों में
बेवक्त जकड़े जाते

यहाँ क्षय रोगी विश्वास, नित
पुंश्चली आस्थाओं से
लव-मैरिज करते हैं
माल की कचहरी में
लाला जे के सामने
गान्धी के रू-ब-रू
अगर देखना चहते हो,तो
स्केण्डल के मैरिज एक्ट की धारा नम्बर ‘दस’ में
सब दुछ दर्ज है
देखने में कोई हर्ज नहीं

यहाँ सबके हौसले बुलन्द हैं
बस हम ही मतिमंद हैं
पर हमें भी दिखता खूब है
हम भी सूझ के पँछी हैं
यहाँ चमचमाती दुनिया के
चार-सौ-बीसी लट्ठे के
चिट्टे से चेहरे पर
शक में दवातों की स्याहियों की छाइयाँ हैं
अभावों की संध्या की,अंधकूप खाईयाँ हैं
जिन पर बस भ्रमों के पुल हैं
जो आर-पार जाते हैं
परस्पर मिलाते हैं

वैसे भी भ्रमों नें जीना
कितनी बड़ी सुविधा है
अन्यथा जीवन दुविधा है

फिर ज़िन्दगी के पाले हुए भ्रम ही
हमारी सुख शैय्या हैं
ममता की मैया हैं
इसीलिये तो जिजीविषा
आशिक की हरकतों-सी
माशुका की छूट पर, बेहयायी की सीमा तक
खिंचती चली जाती हैं–बिछती चली जाती है

इधर देखो होटलों में
असंख्य सुख्लिप्सु परिवार बस गये हैं
सोफों के रेगिस्तानों में
स्थलकमल धस गये हैं
यहाँ गिरस्तिन की चाकरी में
सब ‘वेटर’ व्यस्त हैं
ललुआ की अम्मा अब
बेलन छोड़, छुरी काँटे से बात करती है
अपने किसी काँपलैक्स में
शहरी पन भरती है

पर मैं यह देखदर सोचता हूँ
कि माल पर कोई पगडंडी चढ़ आई है
किसी मन्दिर में जाने के बदले
लव कॉर्नर तक बढ़ आई है
पर यहाँ आकर वह
गिरिजाकुमारी क्या
कैबरे में नारी को कहीं ढूँढ पाएगी?
या उन अंगों की थिरकन में
भूखी उस चितवन में
सूखी उस सिसकन में
लरज—लरज जाती हुई
‘आई लव यू गाती है

जाम छलकाती हुई
झूम-झूम अंगों की
ऐसी–तैसी करती हुई
नाटकीय मुद्रा में
गोपनीय अंगों से
शर्म हटाती को,
शर्म दे पाएगी ?
शायद नहीं
शायद कभी नहीं

क्योंकि
विज्ञापन की टाँगों पर
संयम की शालें सदा छोटी ही पड़ती है

वहाँ देखो कितनी भीड़ है
बाप रे बाप !
अधे की आँख लिए
बहरे के कानों से
जां-वां कुछ सुनती हुई
गूँगे की वाणी में
मूक-मूक गुनती हुई
किसी महामोहमयी मंत्र-ऋचा का
रियाज़ किये जाती हो

पर मैं इस भीड़ में रह कर भी
अपने को इससे अलग गिनने की
चेष्टा में होता हूँ ;
जैसे हर व्यक्ति, मेले में धंस कर भी
स्वयं को अलगाने की कोशिश में रहता है

पर यह तो भीड़ है
सौ से सौ तक, यह
मोह से मोह तक है
किसको अलगाती है?
किसको बचाती है?
यह समस्या नयी सभ्यता की
या असभ्यता की सभ्यता है

यहाँ आत्मा कराहती है
पर आत्मा की चीख़ों से दिल में दर्द नहीं होता
क्या सूर्य के व्रण को कोई किरण कभी रोई है?

फिर यह भीड़ की ज़िन्दगी है
ऐसे ही होती है
कौन सी करनी पर
किस बक्त रोती है?

यहाँ गंगा-जमुनी पाप हैं
फिर कौन सा पाप है ?
जो एक का होता है?
मर्ज़ सब का एक सा ही है
जो हर दिल में सोता है
मुझे जब रतनारी आँखें
आवाज़ देंगी
तो मैं रुकूँगा कैसे?
क्या सोंधी गंध के लिए
धरा और आषाढ बराबर के भागी नहीं?

यहाँ चकमक की आग है
जो छूने से जलती है
और हर तन में पलती है
पर मैं इस आग से बचता-बचाता हुआ
(जबकि कई बार यह बचना मुझे सकते में छोड़ता है )

भीड़ के साग़र के कोने पे हँसता हुआ
या ख़ुद के बेमतलब होने पे हँसता हुआ
घने जंगल में पेड़ों की सार्थकता जाँचता हूँ

इधर देखो नगर की अत्युत्तम सजी हुई
दुकानों के, पाँव पड़ती, रिरियाती
कलमुँही सड़क के सिर पर
देह की पटी पर ठेले के बोझे-सा

महाकाय शैल एक
गर्वोन्नत मुद्रा में
रक्षक या भक्षक वह
शहर के पापों के पुण्यों का तक्षक वह
जाखू या यातुधान
यक्षों की शय्या का विचित्र उपधान है
देवों की आत्मा का
मानव की देहों का, यात्रा उद्यान है
प्रहरी वह नगरी का
शहरी वह नगरी का
बड़े-बड़े नेत्रों की कोरों से ताकता है
इस नीचे के लोक को,
इस विश्व के शोक को

इसके पास कई युगों का
जीवन्त इतिहास है
गायक है यह हनुमत की जय मंगल-यात्रा का
वर्षों से कपिदल का इसीलिये चहेता है
यह प्रकृति पुराण है
यह शिमला का प्राण है

और इधर देखो इंफर्मेशन रूम की छाती
शुद्ध प्रापेगेंडा का अड्डा है
यहाँ कितने ही पोस्टर रविवारीय स्टाइल में
आलस की मुद्रा में, बतरतीब चिपके हैं
जो रंगों की भाषा में
जीने ढंगों की
गोरी के अंगों की नीलामी करते हैं

और मज़ा तो तब आता है बन्धु ! जब गांधी के क्लासफैलो भी
चश्मे के अन्दर से
मैक्सीमैन नम्बर से
इन सब को ताक कर भी
‘पितमाह’ कहलाते हैं,
पर ये पोस्टर
पताकाएं हैं
लक्ष्यहीना, प्रयोगशीला
सिर पिटी ज़िंदगी की
‘ब्लैक एण्ड’ व्हाईट में सुख-दुख की व्याख्या हैं
आस्था हैट जीवन के हड़ताली सत्यों की
झूठ-मूठ वचनों की दूधिया कहानी हैं

फिर ये पोस्टर, महज़ पोस्टर ही नहीं
कुछ एक अध्याय हैं
भविष्य पुराणों के

इस जगती के प्राणों के

इधर देखो रिज पर
पूरे देश के बूढ़े बापू को
जाम किया मूर्ति मे, नश्वरता के विरुद्ध
अतः तुम भी अगर बड़े बने, तो इसी तरह
स स्थापित कर दिये आओगे
चौराहों पर, सार्वजनिक स्थानों पर
राष्ट्र-चेतना के अग्रदूत बना कर

फिर तुम्हारे गले में भी
हर पन्द्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी को
चन्द फूल मलायें लटकाकर
तुम्हें मत्था टेक दिया जायेगा
और फिर वर्ष भर कौवे
तुम्हारी माँग में बीठ भरते रहेंगे

मित्र, यह अजान आकर्षित माल की ज़िंदगी
कब तलक
किस गोदो की प्रतीक्षा में
अनमनी पीती रहेगी चाय,कॉफी
सवयं को वेटरों की दया पर छोड़
शालीनता बेच-बेचकर टेबलों पर

ख़ैर यहाँ घूमने के लिए
मात्र शराफ़त ही काफी नहीं
हवाओं का दामन छूने के लिए
रुख की पहचान ज़रूरी है
इसलिए अगर तुम हमारी मानो तो
माल पर चुपके से पोकदान में
उगल दो समय
और झट से भीड़ का अनुमोदन कर को
देखो, मौसम के विरुद्ध लड़ना
बुद्धिमता नहीं होती

वायदा

ज़िन्दगी !
जब तक चलोगी तुम
तुम्हारा साथ देंगे

और जाओ थक
या इस अति भीड़ में
तुम भूल जाओगे पथ
तो हिम्मत हारना न

क्योंकि इस पथ पर
थके जीवन का साथी ;
मौत भी है कि

इसलिए
इस मृत्यु के बढ़ते
निरन्तर कारवाँ के संग आ जाना

शुभे!
हम वायदा करते हैं
इन जानलेवा घाटियों के
हर पड़ाव पर ही

हम कर रहें होगे
तेरा फिर इंतज़ार

ग़ाँव की सूख़ी बाढ़ 

कल धरा ने
पहले तो हित-आकांक्षिणी माँ की तरह
पेड़ों का स्वस्तिवाचन पढ़ा
और फिर उनकी कृतघ्नता को सराहती हुई
मानो ख़ुद अपने मातृत्व को कोसती हुई
जीवन भर के अफसोस को
क्षयरोग के रहस्य की तरह खोलती हुई
कुछ इस प्रकार बोलीः

मेरे ही पेट में लात मारने को उगे ये पेड़
मेरी ही छाती के आँगन में
ये वानरों को झुला रहे हैं पालना
तालियाँ बजा-बजाकर
बालियाँ पहना-पहनाकर

ये मेरे आत्मज हैं
केवल मुझ से जन्म पाने तक
मुझ में कील की तरह गड़कर
शूल की तरह खुभने को

यद्यपि मुझ इनसे कुछ नहीं लेना है
तो भी दर्द तो इस बात का है कि
मेरी ही फुलबाड़ी में पलकर
ये इद कद्र जंगली हो गये हैं आज

कि कौवों,गिद्धों और बंदरों के अतिरिक्त
केवल सिंहों मात्र से ही रह गया है परिचय इन्हें
परिचय की इस परम्परा में
सब पशु सम्मानित होने की फिक्र में
आज चन्दन की घास चर रहे हैं

आज सम्मानित होने के
कई तरीके हैं हमारे पास
हम अपना सारा विष चाकू से उंगली की तरह काट कर
(पपीते में लाल मिर्च के समान )
औरों के शरीर में भर देते हैं
और उंगली कट जाने से ख़ुद ही
शहीदों की डायरी में लिखवा देते हैं अपना नाम
पद्म श्री पाने को
फिर धीरे से एक ज़ायकेदार गाली निगलकर
जयहिन्द का नारा लगाते हुए
विशिष्ट व्यक्ति की कुर्सी संभाल लेते हैं
और राष्ट्रीय गीत को
व्याह के सुहाग की तरह गुनगुनाते हुए
फूलों भरे हारों के नीचे
दब-दब कर फुसफुसाहट में फुफकारते हैं
सभ्य होने की रिहर्सल में

हम वैसे तो मौनी हैं
गुपचुप के बाबा हैं
पर जंभाई लेने के बहाने खोलते हैं मुँह
और दो विश्व भर बदमाशियाँ जब तलक हम
एक साँस में पी नहीं लेते
तब तलक जपते रहते हैं
ओम नमः शिवाय
ओम नमः शिवाय
ताकि बाहर की साँस निर्विध्न आती रहे
फिर अगर हम खोलेंगे नहीं मुँह
तो दिखा कैसे पाएंगे
अपने अन्त:करण की सर्वभक्षी भूख
जिसकी आँच और आयतन
कुम्भकर्णी माप का है

वैसे हम कई कुछ हैं
(केवल मनुष्य को छोड़कर )
और हम क्या कुछ हैं यह तो मैं नहीं बताऊंगा
क्योंकि हम खुद को बख़ूबी समझते हैं सब
फिर अगर मैं सीधा कह दूँ
तो तुम कहोगे गालियाँ बकता है
इसलिये इस समय इतना वचन ही पर्याप्त है
के हम सही वक्त पर तो
बिना बल्ब-सैलों के
जंग लगी बैटरियाँ हैं
खोखली और आँखहीन
पर जिन्हें मौकेबाज़
अपनी ज़रूरत के वक्त
रगड़ कर जगा लेते हैं
बल्ब ठोक-ठाककर चालाकी से
वक्त की सीढ़ियाँ चढ़ने को

हम जो दूसरों के हाथ के झुनझुने हैं
हम केवल इस्तेमाल की चीज़े हैं
हम अधिकारी नम्बर एक है
चाहे यह अधिकार हमें कैसे ही मिला हो)
इसलिये तुम्हारी बात न सुनने को
हमारे पास सैंकड़ों तर्क हैं
हम कह सकते हैं कि
तुम हवा के संग, लता कि तरह
हमारे कदमों पर लहराए नहीं

तुम पत्थरों की भांति हमारी प्लेट में
रसगुल्लों की जगह अड़े रहे

तुम हमारे बकने पर बोले हो

तुमने बिना दाँतुन किए हमारा नाम ले दिया

तुम रात भर ख़ुद ही अपनी बीवी का मुँह देखते रहे

और इधर हमारे ‘टौमी’ को
हमारी रखवाली में भौंकना पड़ा सारी रात

अतः इसके फलस्वरूप तुम्हें
जीवित समाधि लेने का दण्ड दिया जाता है
जाओ तुम हमारे तल्वों की राख हो जाओ
और सुनो….!
जिसे अपने अंगों से लगा कर पावन करने वाला
कोई शंकर, कम से कम इस जन्म में
तुम्हें नहीं मिलेगा

मित्र! इस तरह के हमारे पास
कई शक्तिपुरुषों के
तेजोमय शाप-वर संचित हैं
इसलिए हम इस जीवन की
तीस सीढ़ियाँ ऊँचे चढ़कर भी
साठ मंज़िलें नीचे उतरे हैं

हम ऐसे दक्ष प्रजापति हैं
जिनकी अपनी ही बिटिया
उनके समक्ष
उनकी ही यज्ञ-वेदी के अग्नि-कुण्ड में
हव्य हो गयी है
शिवत्व पाने को
और हम हुतभाग्य खड़े देखते रहे
उसकी उठती हुई लाश को
गणों के दूषित हाथों

आज क्या बात है कि हम
अपनी ही धर्मपत्नी पर करने लगे हैं शक!
हम डरने लगे हैं ख़ुद अपनी ही प्रिया से
क्यों हम रति को बाहों में भर कर
रोम भर भी प्यार उसमें पी नहीं सकते
हाम अपने ही घर के डाकू हैं
सरकार द्वारा अघोषित-पुरस्कार हत्यारे
जिन्हें कोई ऋषि या पुलिस कम-अज़-कम
राम य काम का सन्मंत्र दे नहीं सकती।

फिर क्यों हमें सब दीखता है जड़
मरणमय, क्षुद्र,विषमय, रिक्त
या उच्छिष्ट या फिर व्यर्थ
क्यों कहीं भी घुल नहीं पाती हमारी धूसरित आँखें

अरे, कहीं तो शिव पड़ा होगा
विरूप गणों की कुटिया
कहीं तो सत्य की होगी महन्मूर्ति
कहीं तो हरी होगी प्रीति, त्याग की दूब

मित्र ! सोच कर देखो आखिर क्यों नहीं होते या हो सकते हैं हम
यकसां, ज्योति-वितरक सूर्य
मैत्री के पुनर्वसु,स्नेत-आश्लेषा
या मधु विश्वास की भरणी
या रसवती प्रेम-आद्रा
यह क्या बात है कि हम कभी मार्गी नहीं होते
या सदा शनि की तरह गुरू के घर में अड़कर
सज्जनों से द्वेष ही करते हैं

आज हमें कोई भाई कहने को नहीं तैयार
कोई हमारा मित्र नहीं निःशंक
और सु-पुत्र हम हो नहीं सकते बिना माँ-बाप को कोसे
तो फिर हम क्या हो सकते हैं?
यही सोच, मुझे प्रश्न-बिच्छू बनकर
हर रात सोते वक्त डसता है कई सौ बार

पता नहीं मुझे क्यों लगता है कि हम
न आचार्य हैं. न हमदर्द
हम सिर्फ सिरदर्द हैं, सिरदर्द

हम दवाई के नाम पर विक कर
रोग बन लगते हैं औरों को
या फिर अपने ही झुण्ड के बैल हैं
जिन्हें माँ और बहन में फर्क नहीं ज्ञात
हम पशुपति के केवल कामजीवी प्राण हैं

देखो !
इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं
यह कविता नहीं सपाट-बयानी है
आजकल ज़माना है खरी कहने का
खरी सुनने का भले ही न हो
इसलिए अभी सुन लो, बाद में
यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ
कि तुम शुक्रनीति में पूरे हो
तुम गीता के कृष्ण बनकर भी
मरवा सकते हो स्वजनों को
मुझे तुम्हारे सुकर्मों ? (पर पूरा भरोसा है)

पर सुनो ! हम भी पूरे पंडित हैं
जन्म से लेकर मरसिया पढ़ने तक के
सारे मंत्र हम को आते हैं
हम एक साथ पढ़ाते हैं
चाणक्य और मनु और
ज्योतिष के हिसाब से बता सकते हैं
कि किस दिन गौतम की अहिल्या की तरह इन्द्र
फुसलाएगा तुम्हारी पत्नी को
( हाँ, यह बात अलग है कि इसे तुम सबके समक्ष पूछना )
न चाहो)
पर बन्धु,छले जाओगे एक दिन
यह योग गोचर में स्पष्ट है

मुझे यह समझ नहीं आता कि हम
वहीं क्यों चूक जाते हैं
जहाँ धर्म का उठना होता है सुखपाल
जहाँ न्याय को देना होता है कन्धा
जहाँ सत्य के लिए छोड़नी होती है कुर्सी
जहाँ बासनाहीन बाँटना होता है प्यार

क्यों चूक जाते हैं हम वहीं
जहां उगानी होती है सहानुभूति की फसल
जहाँ दया के राष्ट्रीय मार्ग पर
चलना होता है चार कदम बिना रथ के
जहाँ ममता को देनी होती है दृष्टि
जहाँ आदमी बन कर रहना होता है चंद रोज़
हम क्यों चूक जांते हैं वहीं

पता नहीं हमारे पचास वर्ष पुराने मुख में भी
भेड़ियों के हिस्र जबड़े कैसे उग आते हैं
और हम एकदम जंगल हो उठते हैं सैंकड़ों पशुओं भरे
तब हम सूंघने लगते हैं षोड़षवर्षीया अज-कन्या की स्फूर्तिप्रद गंध
अथवा क्यों हमारे शरीर में
रोमो की जगह नाख़ून
और अंगुलियों में नाख़ुनों की जगह
उग आते हैं ब्लेड ?
बन्धु ! आज ये ‘सब क्यों’ अनुत्तरित हैं
ये सब ‘क्यों’, ’किंतु’ और ‘कैसे’
गाँव के बाहर की सूखी बाड़ में
छाप दिये गये हैं कंटीली झड़बेरियों संग
इसलिए अब कभी उस बाड़ के ही संग जल कर
उत्तरित होंगे समूचे प्रश्न और ये ‘क्यों’
किंतु इतनी शर्त केवल एक
कि ये सब जिस दिन भी जलें
उस दिन दे दशहरे की आग
ज़िंदादिल होनी चाहिए

निन्यानवें चेहरे

मेरे युग का चमत्कार है
सब चीज़ तैयार
लिफाफे हैं, पालिश है
हर चीज़ ख़ालिस है
ले लो बज़ार से
किसी दुकानकार से
हर चेक्ष ‘पैक्ड’ है
कोई नहीं ‘नेक्ड’ है

यह कोई आदिम युग नहीं
जहाँ हर वस्तु अपने
प्राकृतिक,स्वभाविक
रूप में मिलेगी
तुम को दिखेगी

यह सभ्य ज़माना है
यहाँ कोई नहीं बेगाना है
यहाँ सारे ही प्यारे है
प्यार के मारे हैं

इस लिए हर आँख बुलाती है
हर साँस पिलाती है
हर सीना धड़कता है
हर माथा मचलता है
यहाँ पर कुछ भी पराया नहीँ

यह मत सोचो कि हमने
काला चश्मा लगाया है और
ख़ुद को, तुम्हारी नज़रों से बचाया है

प्रिय !
यह तो मात्र दृष्टि को
और स्थिर करने को
औरों से बचने को
तुम को निरखने को
मेरे युग का आविष्कार है
अब समाधि की मुद्रा में
प्रिय को क्यों ढूँढेंगे?
कयोंकि अब चश्मा ही दृष्टि को
खुली हुई सृष्टि में
प्रियतम दिखाने में
अधिक उपयोगी है
इललिये आज हर प्रेमी भी योगी है
और मत सोचो
कि मेरे ये वस्त्र
तुम्हारे उन पारखी,
नेत्रों को देह के
क्षितिजों में, जाने से रोकेंगे
तुम को ये टोकेंगे

मेरा युग विज्ञ है
यद्यपि अनभिज्ञ है
फिर भी सयाना है
यह नया ज़माना है

यहाँ हरेक को छूट है
हर वस्तु की लूट है
पर ढक कर ले जाना
या अँधेरे में आना
(वैसे यह तुम्हारे बाली बात है,वरना)

क्योंकि
यहाँ हर आँख सुनती है
हर कान निरखता है

इसलिए मेरे युग के निर्माताओं ने
मुक्त हस्तदाताओं ने
लिफाफे बनाए हैं
परदे सजाए हैं

अतः क्यों अपनी
बेइज्जती कराते हो
घर की वस्तु को बाहर दिखाते हो
अरे,लिफ़ाफे में डालो
गर परदा लगा लो
फिर जैसे भी ख़ोलो
पर आहिस्ता बोलो
यह नये युग का संविधान है
यहाँ सब कुछ की छूट है
बस लूट ही लूट है
देखो यहाँ झूठ भी ख़ालिस
बिन पालिश नहीं चलता
इस लिए मज़बूरी है
यहाँ ‘पॉलिश’ नहीं चलता
इस लिए मजबूरी है
यहाँ ‘पॉलिश,ज़रूरी है
अतः हर मुख,पुता है
वो बहू है या सुता है

यहाँ ‘टैक्निकलर’ चलता है
‘ईस्टमैन’ जँचता है
‘गेवा’ रंग भाता है
सब को सुहाता है

वैसे असली चमक इनकी
‘पोस्टर पै रखाअंकित जिस्मों पै आती है

कल राम और श्याम देखे
संध्या को माया के
रंगीन पल्लू से उलझे ही उलझे वे
गुदगुदे बदन की गंधि को पीते थे

यहाँ बस रंग बिकता है
शुद्ध तो पिटता है

बस रंगीन सुबहें हैं
रंगीन शामें हैं
रंगीन जिस्मों की
रंगीन माँगें हैं

क्योंकि मैं भी दुकानदार हूँ
इसलिए भई ग्राहक को
सभ्यतावाहक को
नाराज़ नाहक में
थोड़े ही करना है
फिर इस पेट पापी को कैसे तो भरना है

इसलिये बंधु !मेरे पास भी लिफाफे हैं,
पालिश है
परदे भी ख़ालिस हैं

पर एक ओर,आज की
चलती हुई चीज़ है
कहो तो दिखाऊं मैं
कल ही मंगवाए थे
केवल सौ आए थे
बस एक बचता है
हरेक पै जंचता है
कहो तो बांधूं मैं
बस एक मुखौटा है

बाबू जी ! आज
निन्यानबें चेहरे हैं
जो मुखौटे पहनते हैं

मेरे दादा, पिता और मैं 

मेरे दादा
लोग कहते हैं; वे जीवनभर
खेतों में कपास की तरह फूल कर
यश बिखेरते रहे
वे लोगों के मनों पर छाकर
रोम-रोम में बसते रहे
सूत-सूत होकर
वे अपने मौसम की
सबसे मंहंगी फसल थे

मेरे पिता
(जिन्हें लोगों ने ही नहीं
मैने खुद भी देखा है)
जो जीवन में
वर्ष-दर-वर्ष उगले रहे
गन्ने के सदृश
और बाँटते रहे
श्रम-संचित रस
कर्म के बेलने में
निष्पीड़ित होकर भी
लोगों में संवाद के समय
जिनकी ईमानदारी
आज भी गुड़ की तरह
बंटती है
और एक मैं हूँ
जिसे लगता है
कि वह
उस अवांछित पौधे के समान है
जो बासमती में
‘पल्लर’ कह के
तर्जित किया जाएगा

या उखाड़ कर
फेंक दिया जाएगा
बीड़ पर
खेत के किसी भी किनारे

जबकि मैं
लोगों पर
आसमान की तरह छाना चाहता हूँ
चाँदनी होकर
किन्तु लोग मुझे
धरती की तरह बिछा कर
रौंद डालना चाहते हैं
उस महिषपति के समान
जिसके साथ कई
मोटे भैंसे होते हैं

बनी रहने दो

बनी रहने दो गहनतम गुह्यता
प्रकट में है तथ्य क्या?
मत पास लाना
नहीं तो मैं छोड़ दूँगा
कल्पना करना
कठिन संसाधन करना

जब तक रहोगे दूर
कोसों दूर
मेरी गम्यता से
तब तक तो मैं
अतितीव्रता गतिशीलता से
पास आने को सदा चलता रहूँगा
पर कहीं प्रिय! रहस्यता अपनी दिखाकर
प्रकट मत होना
नहीं तो मेरे चरनों की गति रुक जायेगी

तुम रहो कहीं दूर
किसी गहन पटल में
और मैं यहाँ
स्नेह को पालता रहूँ
दूरियाँ ही स्नेह को परिपक्व करती हैं

फिर चिर प्रतीक्षा के अनंतर,मिलन में
जो बसा आनन्द, बह शीघ्र दर्शन में
भला क्या निहित है?
बस,बना रहे
प्रेम तेरा, और मेरा
तुम रहो आराध्य मेरे देव
मैं पावन पुजारी नित्य तेरा

मैं सदा गाता रहूँ
तेरे विरह के गीत
तेरे मिलन के मंगल तराने

पर तुम अपनी सत्यता
दिखलाना मत
नहीं तो
अंत हो जाएगा मेरी लगन का।

मैं ख़बरदार हूँ 

भोर की पहली किरण के साथ
मैं विगला
बढ़ा साया हूँ मेरा
जैसे आदि काल की
पहली शुभशंसा बढ़ी हो

पर हुआ मध्याह्न
मैंने निज में निज को समेटा
अपनेपन से यूँ लपेटा
कि मेरे समूचे व्यक्तित्व का
अंतः वाह्य एक हो गया तब
मैं यथार्थ हो गया तब

किंतु ढलते ही साँझ
मेरी तनुता का साया उल्टी रील-सा
यूँ भागा पीछे को
जैसे शुभ प्रभात की
दिव्य किरण का मंगेतर हो

किंतु तब मेरे मन की आँखों पर
जाला उग आया था
तब मुझे घुंधलके ने
वापिस कर दिया
किंतु अब मैं देख रहा हूँ
ढलती साँझ के छज्जे से
उस वृक्ष को
जो विश्व उपवन में
किसी की दया पर उगा था
माली को वन्दना-सा झुका था
दोपहर को निज में आत्मस्थ हो

खूब झूमा था
जिसने नियंता के महत्व को चूमा था
अब होते ही साँझ उसकी छाया पापकाया सी उससे
शतबार बड़ी हो
सुरसा-सी लीलने जा रही है
माली के उपकार को

और डालियाँ जो भोर में कलरव-युता थीं
अब धूत्कारती हैं
और उनकी यह धूत्कार
सृष्टि की सारी संज्ञा को ही निगल जाने को
समुद्यत है
अतः अब इसी में
प्रातः की शुभशंसा
मध्याह्न का यथार्थ और
सांध्य का विपरिणाम
सब समा जायेंगे और बचेगा
यही एक प्रभाविष्णु
केवल धूत्कार
केवल धूत्कार
क्योंकि यह सहस्रभुज
विश्वबल
सबके सठिया जाने पर
जवां होता है

किंतु अब मैं देख रहा हूँ ठगियाया-सा
सोच रहा हूँ भावी कल की बात ;
कि मेरे पास केवल रात के विस्तार का परिणाम बाकी है
तो भी मैं खबरदार हूँ

काकोल्लूकियम संवाद 

बाहर वायु के चहरे पर
उदासी का मौसम देख
कौवे ‘हन्म-जात के पास जाकर बोले–
खगराय !
अगर आप दिन में
अपना सुर अलापने की कृपा करें
तो लोग समझ जाएँगे कि
वक्त रात का है, और

उदासी नींद का परिणाम

लोग तुष्ट हो जायेंगे
(क्योंकि संतुष्टि एक अलभ्य एषणा है)
अन्यथा
हवा अगर फूलों के पास से गुज़र गयी
तो लोग दोनों के चेहरे देख कर
जाँच लेंगे कि

केनल पक्षियों का गा देना ही
मोसम के बदलाव का कारण नहीं हो जाता

बन्धु ! इस अवसरवादी ‘कालोल्लूकीयम् संवाद’ का
अर्थ स्पष्ट है कि
मौसम: यहाँ कुछ खास होश्यार तंत्रज्ञों ने
पहन रखा है,अंगूठियों की तरह
बीसों अंगुलियों में
हाथों से पाँव की अंगुलियों तक

जिन्हें खोलने के लिए
लौह-पंजों की ज़रूरत है

और देखो
कौवों की साजिश पर उल्लू
तब तलक गुर्राते रहेंगे
जब तलक मक्कारी के विधान में
कोई चाणक्य,नीति का
नया अध्याय नहीं जोड़ देता

आत्मा

यह आत्मा___
बिल्कुल उसी पंछी की भांति
चोग के लालच में आए
हो गये झट कैद पिंजरे में पड़ी सी
सिसकती
रोती है,

देती है दुहाई
मैं भी भूले से मुमुक्षु की ही
एकदम न तैक भी सोचे-विचारे
मानव नहीं दानव के इस कुशरीर रूपी पिंजरे में-
आ पड़ी हूँ
मैं फँसी हूँ

मैंने कई बारी महापुरुषों,जनों-साधुजनों को
मुँह से कहते सुना कि यह देह-निःसन्देह
इस-आत्मा गमन से ऊपर उठाकर य्आ बचाकर,
उस अनंत अमन्द महात्मा से
संयुक्ति कराती
यह मिलाती

पर ज्यों देखा इस देह के छल को छद्म को
रागता-अनुरागता से भरी इस अकी भयावह विषमता को
तो जड़ता के चक्कर में पड़ी जाती हूँ
पाती हूँ मैं निज को
वन्दिनी,दुखिया अशांति से घिरी सी
हड्डियों के निन्द्य-नीरव-स्तूप में एकाकिनी-सी,
फा फिर एक वियोगिनी सी
छटपटाती हूँ
न जाती हूँ कहीं पर भी
जलाती हूँ स्वयँ को

अब तो मेरी एक ही इच्छा है
अंतिम कामना ह,देह! तुझसे
मनुज की मदमाती हुई
ऐ देह ! तुझमें
यद्यपि सदाचार का आँचल कहीं से
लाके, मेरी इस तप्त तनु को ढाँकने में
तिन्य द्वेष की अग्नि से जलते इस तनु को
स्नेह के पावन पयः से गर बुझाने
और संतोष का पौष्टिक बना आहार लाकर
ललकती रसना की अभिलाषा मिटाने
हाँ,तो शांति-वायु का पीयूष-वर्षी
ज्अल पिलाने में
कहीं सौहार्दता प्रियता दिखा दो

तब कहीं यह प्राण यह चेतावनी मेरी
कुछ समय तक रह सके,संभवतः संभव
अन्यथा,मेरा यहाँ तेरे पिंजर में
घुट के दम इक दिन निकल जाएगा
और फिर तू याद रखना
एक आत्मा के हनन का कुत्सित दमन का
पाप नहीं,महापाप का महाकाय-अजगर
आके मुझको लील जाएगा
तुझे खाएगा
सहसा निगल जायेगा
तब फिर तेरा भी इसी भाँति
दमन होगा
पतन होगा
मरण होगा

पड़ी फिर तू जगत की डगर में, भीषण नगर में
दीनता से बिलबिलाती-सी पुकारे
थामने को हाथ अपना
पर पुराने कृत्य अपने याद कर लेना
या फिर एक लम्बी सी ठंडी, आह भरकर
खूब रो लेना
या फिर दम तोड़ देना

क्योंकि कोई भी तो आएगा नहीं
रे पास तेरे
तुझको सहलाने
तुझे उस दम बचाने

विकल्प 

मैं कहता हूँ
कुछ भी चुनो
भय,विश्वास
समझौता,बग़ावत
पर अपने अंतर्मन से चुनो

इसका क्या लाभ कि
तुम खुद की लड़ाई
खुद के खिलाफ हार जाओ
केवल इसलिए कि
तुम्हारे मन को
तुम्हारी वाणी का साथ न मिल सके

जबकि मन भी तुम्हारा है
और वाणी भी तुम्हारी

कहने वाले भले ही कहें कि
‘बीच की स्थिति’ दोनों को संतोष देती है
किंतु प्राणी जब भी मरता है
मझधार में ही मरता है

किनारे कैसे भी हों
(भले ही रेतीले ही)
आखिर सहारा होते हैं

(धारा उन्हीं के बलबूते पर
कूदती जाती है सिन्धु तक)
तुमने अगर गालियाँ ही बकनी हैं
तो बको
अप्र पीठे के पीछे नहीं

तुमने अगर विश्वासघात ही करना है
तो करो
पर अपने विशवास के बल पर

चाबी पाया हुआ खिलौना
आखिर कब तलक बज लेता है

मैं कोई पहेली नहीं बुझा रहा
पर सुझा रहा हूँ एक तरकीब
जिससे किसी की भी
कब-अज़-कम एक पहचान बनती है

दुनिया में एक पहचान बनाके
मरना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है

अन्यथा आपके पास
सैंकड़ों तर्क हैं
आप कैसे भी मर सकते हैं

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी
घर-मन्दिरों से ऊब कर
हट कर,उजड़कर
रेस्टूरेंटों में
या कॉफी हाऊसों के
उन कटे से कैबिनो में
घुटन में
सटकर,सिमिट कर
जा बसी है

जो वहाँ
कॉफी की कड़वाहट मिटाने को
उसी के संग
चुपके पी रही है
रूप के,रस के
छलकते सैंकड़ों प्याले
कभी नारी की कनखियों से
कभी नर की नज़र से

एक तथाकथित सलाह 

रंग जितने भी थे
सब जूतों पे लग गये
चेहरे वर्ष भर उदास देखते रहे
शायद कोई मौसम पंसारी बनके आ जाए

परंतु देखा जब
तो कथाकथित सुधाकरों के
ड्रॉईंग रूमों की
कार्क लगी बोतलों में बन्द थे सब रंग
खुशियों की तरह

सब बोतलों में
उनका व्यक्तित्व
उदभासित हो रह था
वर्ण-दर-वर्ण-बोतल-दर-बोतल
कहीं हरा तो कहीं जामुनी
कहीं बसंती तो कहीं सुर्ख

गौर करने पर
एक इन्द्रधनुषी चरित्र उभर आता था
जो बरसात का होकर भी
किसी खास मौसम का नहीं होता
हमारी जिज्ञासा पर
वे बोतल के कार्क निकालने की अदा में
स्वयं को उदघाटित करते हुए बोले
पत्थर में छेनी की तरह
प्रस्तावित करों खुद को या
धरती में जड़ की तरह गड़ कर
केवल रस चूसो

मिट्टी की गन्ध
केवल भूख देती है__ भूख
इसलिए अगर बटोरना है
तो मौसम बटोरो

वैसे तो
प्रकृति के साथ भी
बड़ा अत्याचार लग पड़ा है होने
कि पत्ती अभी निकली नहीं
और बकरियाँ पहले ही लग पड़ीं
जीभ लपलपाने
फिर भी अगर हरियाली बचानी है
(केवल अपने लिए)
तो एक हाथ में तगड़ा संगल
और दूसरे में मजबूत डण्डा रखो
देखो ये अदने जानवर
अब मौसम के रंगों के साथ-साथ
हवाओं का रुख भी
लग पड़े हैं पहचानने

कनस्तर

चीज़ें कुछ इस मिजाज़ से बिखरी हैं कि
कनस्तर में आने के बदले
वे गन्दे मौसम की बगल में
बसने लग गयी है

गन्दे नालों की भू-पट्टियों पर
मेंढकी झोंपड़ियों की तरह

यहाँ जब भी कोई कनस्तर बजता है
मुझे तुरंत उन चीज़ों की याद आ जाती है

जो उसकी होकर भी
उसकी हो नहीं रहीं

यद्यपि चीज़ों का कनस्तर से
उतना ही सम्बन्ध है
जितना गँवारों का गालियों से

यहाँ पता नहीं कैसे
गंदगी ने
‘बसुधैव कुटुम्बकम’ का महामंत्र
साध लिया है
और अब वह
मधुमक्खियों के छत्तों से लेकर
घर के छज्जों से होती हुई

दीवारों पर पाँव धरती
नींव में घर कर गयी है

घर का हर हिस्सा अब
कनस्तर का हिस्सा लगने लग गया है
देखो यह बद्दिमाग़ मौसम

वृक्षों के कंधों पर चढ़कर
पत्तियों को अँगूठा दिखा रहा है

दादे के कँधों पर चढ़े चोटी कचोटते
पोते की तरह

किसी के कँधों पर चढ़कर
उसकी मजबूरी का उड़ता हुआ
रंग देखने का हमारा शौक

पोते की तरह जिद्दी और
बचपन की तरह चिढ़ाऊ है

इधर यह खरदिमाग मौसम

(चूँकि अब गन्दगी भी उसके साथ हो गयी है)
सोचता है कि हर सही दिमाग को
हिस्टोरिया बन के लग जाओ,लोगों को

बेहोशी की हालत में नंगा कर दो

उनसे करा लो जो कुछ कराना है
उनसे कर लो जो कुछ करना है

क्योंकि हिस्टीरिया में हर उपचार जायज़ है,

ऑपरेशन थियेटर में
कपड़े उतारने तक से लेकर
भोग कसे योग-क्षेम तक की मुद्रा तक में आने तक

यह सम्पूर्ण प्रक्रिया विधि विशेषज्ञों के
निदान के अनुकूल है
यह सम्मोहन की मोहनी विद्या है

इधर कई रोगों ने इसे छूट में सिर उठाकर
लक्षणों समेत पाँव फैलाने शुरू कर दिये हैं

कई रोगों ने कुर्सियों के ताने-बाने में तनकर
साहबों की बीवियों की तरह
चिपका रखा है

कुछ रोगों ने
चापलूसी की अंगुली पकड़ कर
चालाकी से डग भरते हुए
ईमानदार घरों में
घुसना शुरू कर दिया है
ताकि भले घर का लेबल
उनकी बदमाशियों को
शालीनता की तह में छुपाए रखे
और अन्दर वे पूरे घर की सफेदी को
रात की तरह स्याह करने में लगे रहें

यहाँ हर दिन बदमाशी करता है
रात का तो केवल
नाम है बदनाम

अब कई रोग हस्पतालों में
रोगियों को छोड़ डॉक्टरों को लगने लग गये हैं

डॉक्टर अब यह सोचने की तरकीब में हैं
कि रोगी के रोग की गाँठ खोलने के बजाए
उसके कौन से बटन पर रखी जाए आँख

और देह कौन से द्वीप से
उपचार और उपभोग की सम्मिलित पद्धति
की जाए ईजाद

मेरे देह्स के सेवा सदनों में
रोगियों ने
स्वस्थ होने की कामना में अब
मृत्युंवरी आरतियाँ रच ली हैं
ताकि रोगी और चिकित्सक
दोनों शांति लाभ कर सकें
हम जब भी कभी बिना लाभ के कहीं भी फंस जाते हैं
तो केवल मुक्ति ही चाहते हैं

तुम सोचते होओगे
कि यह कैसी कविता है
पर तुम्हीं बताओ ऐसे मौसम में, मैं
कैसी कविता लिख सकता हूँ
जबकि हर चीज़ एक-दूसरे के विरुद्ध साजिश में मशगूल हैं

देखो जब तुम्हारी बीवियाँ ही
तुमसे मूँह चिढ़ाने लग जाएं
तो क्या तुम उनकी चोलियों से करोगे प्यार !

जब तुम्हारे बच्चे ही तुम्हें
तुम्हारे ही मुँह पर
‘खुद के मज़े के लिए बने माँ बाप
कहने लग जाएं

तो तुम क्या गीदड़ियों के बच्चों का मूँह चूमोगे?
फिर बच्चे जब तुम्हें पिता और माँ को माता
नहीं पायेंग़े
तो फिर कहाँ जाएंगे

देखो ऐसी बहुत कम भैंसे होती हैं समाज में
जो बछ्ड़े को अपना दूध पीने देती हैं
हम एक दूसरे का दूध पी कर तो बच सकते हैं
पर आज जबकि खून पीने की नौबतर

आ गयी है
हम कब तलक ज़िन्दा रह सकते हैं
वैसे ज़िन्दा रहने को तो लोग
ज़िन्दा रह रहे हैं
तरक्की के नाम पर लोग तरक्की भी कर रहे हैं
पर वे किस प्रकार अपनी ज़रूरतों के
कनस्तर भर रहे हैं

यह या तो वे ही जानते हैं
या उनका खुदा
( हाँ कइयों के बारे में थोड़ा मैं भी जानता हूँ)

हम खुद परेशान हैं
पर करें क्या?
कैसे दिन दिहाड़े दूसरे का गला काटकर
उसके रक्त को अपनी धमनियों में भर लें?

कैसे दूसरों को शरीफ दिखकर
उनकी बेटियों को
इतिहास की जगह भू-गोलार्धों का
ज्ञान कराना शुरू कर दें

या कैसे किसी की बीवी को
लफ्फाज़ी तारीफी के जाल में फंसा कर
उसके प्रत्येक अंग पर
सामुद्रिक शास्त्र के लक्षण हटाते हुए
पान की पीक की महावर
उसके अंगों पर सजा दें
मुझे बड़ी कोफ़्त होती है तब
जब मेरे रंगीन किन्तु तथाकथित आचार्य
इतिहास पढ़ाते हुए दैहिक भूगोल पढ़ाने लग जाते हैं
और मनु पढ़ाते हुए वात्स्यायन के
कामशास्त्र को नकाम सिद्ध करके
गिद्ध की तरह “फ्रँयड के ‘लिबिड’ क़ी डाल पर बैठकर
यौन विज्ञान के प्राचार्य बन जाते हैं।

उनका मनोविज्ञान
संभवतः उनके लिए सारा शास्त्र
इसी में सन्नध है

पता नहीं
मुझे किस सामाजिकते झिंझोड़ा है कि
लोगों की बदमाशी
मेरे दिमाग़ से जाती ही नहीं

पर मैं, यह भी नहीं कहता
कि सारी वर्णमाला ही
साबरमंत्रों की तरह निरर्थक है”

या मेरे समाज में विशिष्टता विशेष हो गयी है

परंतु वह इस कदर अस्थिशेष हो गई हैं
कि माँस और रक्त का मौसम
केवल जंगली भैंसों की देहों तक ही है सीमित
भरी बरसात में
केवल पलाश ही फूला है
बसंत आज तक
किसी करील की डाल पर
पल्लवी शाल नहीं ओढ़ा सका

मौसम के हर उत्सव में यहाँ
षड़यंत्र के शतमुखी नुकीले पंजे
कलियों की तरह उभर रहे हैं
शतशूल होने को

समाज में सम्बंधों के उत्सब
अब केवल देहोत्सव हो गये हैं

यह महामाया ‘बू’ अब
व्यक्ति के समाज
और समाज से राजनीति में
संक्रमित हो गई है

देश के भोले विश्वासों को
नेताओं की ‘बुलडोज़री’ नीति
कर रही है बराबर
जनसमस्याओं से वे शुतुर्मुर्ग की तरह
बरत रहे हैं
लोग उन्हें सारस समझ कर सराह रहे हैं
वे फसल के कीड़े चुगने के बदले
फसल के बीज खा रहे हैं
लोग फिर भी उनकी चोंच के गीत गा रहे हैं
हमारे देश में
कलगी और चोंच पर मरने वालों की संख्या
कम नहीं
(कई बार लोग चित्र-विचित्र
परों पर भी मोहित हो जाते हैं)

ख़ैर,कहें क्या
लगता है गंदगी,प्रभविष्णु हो गई है अब
और कनस्तर
गंदगी समेटने की लघुतम इकाई

अतः मुझे तो अब बस एक मरती हुई तरकीब
बचती हुई शेष दिखती है कि

कनस्तर में चीज़े समेटने के बजाए
सीधे गंदगी पर हल्ला बोल दिया जाए

अन्यथा
यह कीड़ी की चाल से चलकर भी
घोड़ों की भांति रोंद डालेगी एक दिन

जेल एक करिश्मा

कानून
जब नगर के किसी खास हिस्से की
घेर लेता है सशरीर
देह पर कंटीली तारें लपेट
एक भीमकाय दीवार की तरह
तो लोग
उसे जेल का नाम दे देते हैं
(अब जेलें सुधार-गृह हो गये हैं)

जबकि जेल
दीवारों की ही नहीं
मन की भी होती है

जेलः जहाँ भगवान भी रहे थे कुछ मास
(जन्म से पूर्व)
(तब से जेलें मन्दिर भी कहलाती है)
वहाँ जाना
लोग गौरव की बात समझते हैं जेलों ने बहुतों को गौरवशाली बनाया है

(आपने कईयों को
छाती फुला-फुला कर
जेलों को गीता की तरह गाते हुए
सुना होगा)

कितनों ने ही
जेल यात्रा की
इतिहास की तरह
लिख डाला है

जेलों ने चिच्छक्ति को
योग शक्ति की तरह जगाया है
और इस हद तक बहकाया है कि
वे अब खुद को पहचानना तक भूल गये हैं

हमारे एक मित्र ने हैं
जो कुछ दिन हुए जेल से छूट के आए हैं
(उन्हें दूसरी पार्टी का झण्डा चुराने के अपराध
में जेल हुई थी)

कहते हैं
जेल एक करिश्मा है
(यह कहते हुए वे आपाद मस्तक काँपते हैं)

वह एक ऐसा चश्मा है
जो सबको देखता है
समत्व भाव से

(जबकि जेले के यात्री ?
स्वयं को हंसों की तरह
एक दूसरे से उज्ज्वलतर ही समझते हैं
वे मित्र नेता
अब हरेक मंच पर
(माईक को अपने गले का असमर्थ प्रचारक समझते हुए)

केवल पंचम में अलापते हैं
य्अह धुन कि भाईयों !
अपने सुधार में जुट जाईये
‘उद्धरेदात्मनात्मानम्’
(वे बीच-बीच में गीता को टोटकों की तरह बोलते हैं)
इसके लिए
भले ही जेल जाईये
गोली खाईये
पर अपने लिये
कम-अज-कम
एक मँच
जरूर जुटाईये

गाँव में शहर की हँसी 

यूँ कई राष्ट्रीय महत्व के अवसरों पर
मेरा देश
मेरे गाँव का पर्याय हो जाता है
उस दिन सारा भारत
गाँवों में जा बसता है
(मेरा मन उस दिन खूब हँसता है
मैं साल में कभी-कभी ही
खिल कर हँसता हूँ)

मेरा देश पर्याप्त उन्नति कर गया है
इस की खबर
मेरे गाँव के दुकानदार के पास
फटे हुए दैनिक अखबार के टुकड़ों में
(दूसरे दिन ही सही)
उपलब्ध हो जाती है अवश्य

मेरे गाँव का दुकानदार

(लोग उसे ‘शाहजी’ कहते है।
(पर उसका नाम ‘भीखू’ है)
अखबार रद्दी के लिए मँगाता है
क्योंकि उस अनपढ़ ? की समझ में
अखबार ;

मँच से उछाले गये बहुपक्षीय झूठ का
टेबल पर गढ़ा गया एक पक्षीय बयान है
कभी-कभी उसकी इस धारणा को
निर्मूल करने के लिए
गाँव के उस छोटे से बाज़ार में
आ जाते हैं बड़े-बड़े नेता
जो भीखू की दुकान के सामने
तम्बू गाड़ कर
और अपनी पार्टी का झण्डा
उसकी दुकान पर अंटा कर
(क्योंकि कुछ बोट उसके भी
हाथ में होते हैं)
अपने वागस्त्र को
अमोघास्त्र की तरह
प्रयुक्त करते हुए
लोगों के वोटों से खरीदी हुई सुविधाओं को
पान की तरह चबाते हुए
साधिकार
बताते हैं

जनाब !
इस साल मौसम
हमारे कलेण्डर के अनुसार आएगा
(हमने हर घटना की
सरकारी तिथि तय कर रखी है)

हम हवाओं का रुख मोड़ देंगे
(और उस हकीकत का मुंह तोड़ देंगे
जो सही उतरने की कोशिश करेगी)

हम एक ही नहर खुदवाएंगे
सारे देश में
जो गंगा की तरह स्मरण मात्र से ही
पूर्वजों तक को तार देगी
स्गर-पुत्रों की तरह
सभी नालायक पुत्रों समेत

हम चट्टानों पर बासमती उगाएंगे!
(और खेतों की बासमती खुद खा जाएंगे)

हम एक व्यापक योजना के अनुसार
हरेक हाथ को काम
(भले ही हाथापाई का ही हो)

और हरेक दिमाग़ को
‘जुझारू’ चिंतन देंगे
(क्योंकि आज सारा देश
राजनीतिज्ञ होने को मतवाला हो रहा है)

अब पूरे देश का मानचित्र
हमारी नज़रों में है
इस पर किसी एक पार्टी को
कब्ज़ा नहीं करने देंगे
हम देश को कुछेक हाथों में ज़ब्त नहीं होने देंगे

तुम हम पर भरोसा रखो
(नहीं भी रखोगे तो क्य्आ कर लोगे?)
हमने आखिर क्या नहीं किया?

हम तुम्हें नारे देंगे
(भूख के स्थान पर)

हम तुम्हें तरक़ीब देंगे
(ईमानदारी से मरने की)

हम तुम्हें हौसला देंगे
(गोली खाकर हलाल होने का)

हम तुम्हें स्वप्न देंगे
9जो सात जन्म तक नहीं आएगा)

इसलिए उठो
(हमारा समर्थन करने को)

जागो
(हमारी रखवाली करने को)

और जगाओ औरों को
(अपने नेताओं को प्रभातफेरी निकलने को)

देखो भारत ने बहुत तरक्की की है!

भारत अब एक महान राष्ट्र है
(जैसे इन्हीं के कहने से महान हुआ हो)

इसकी परम्पराएँ महान् हैं
(जैसे पहले थी ही नहीं)

इन्हें जीवित रखना
(मारने का काम इन्होंने स्वयं ले रखा है)

बल्कि इन्हें और सुदृढ़ करना
आप सबके हित में है
इनके हित में क्या है वह
वे स्टेज पर नहीं कहते)

और सुनिए
नेता बनना कोई आसान नहीं
फिर भी हम जो
जैसे-तैसे बन गए हैं
वह सब आपका ही आशीर्वाद है
हम आपकी जैसी भी सेवा कर सके या
कर रहे हैं
हमें इस पर गर्व है
(आपको भी होना चाहिए)

उस दुकानदार की दुकान के पास
हर चुनाव के वर्ष
ऐसे कई गाँवडोब मौसमी भाषण
होते ही रहते हैं, बरसात की तरह

पर भीखू इन भाषणों में न डूब कर
(क्योंकि उसे भाषनों की गहराई का ज्ञान हो गया है)
वह रेडियों से प्रसारित ऐसे कई अन्य भाषणों को भी
लोगों को सुनाता है अपनी टिप्पणी के साथ :

हमारे सम्बन्ध
पड़ोसी देशों के साथ अच्छे हो रहे हैं
(हमें अपने पड़ोसियों
खासकर पड़ोसिनों से अच्छे सम्बन्ध बनाने चाहिए)

हम विकासशील देशों की
प्रथम पंक्ति में आ विराजे हैं
(हमें भी अपना लाब ह देखकर
बिना नम्बर के भी प्रथम पंक्ति में
उछल कर आना चाहिए आते)

राष्ट्रपति ने कहा है
हमें आलस छोड़ कर
मेहनत करनी चाहिए
(भाईयो! बिना मेहनत के
तुम्हीं बताओ,कहाँ क्या होता है?)

प्रधानमंत्री ने कहा है
हमें भयमुक्त होकर रहना चाहिए
(इसीलिए कहता हूँ कि
किसी भी किसिम का भय
हममें नहीं होना चाहिए )

उसकी दुकान उस इलाके की
सूचना एवं प्रसारण केन्द्र है
जो कहीं-कहीं गरज के साथ छींटे पड़ने
की खबरों से लेकर
ईरान में तेल की कीमतें बढ़ने
की खबरों तक को
एक साथ प्रचारित करती है
समभाव से

वह सरकार को
(सरकार के नाम पर वह झल्ला उठता है एकदम
प्रपंचियों की जमात कहता है
वह कहता है:
चार खेत थे अपने
सो भी ले गये मुजारे
अब मालिक क्या खाए6गे?
(सरकार का…….)

नौकरी के लिए जाओ तो
सब सीटें रिज़र्व
पर जब सारे ही
नौकरी के लालच में
हरिजन हो जाएंगे
(उसे अनुसूचित और जनजातियों का शायद पता ही नहीं है)

तब सरकार
किस-किस को नौकरी देगी

वह कहता है
उसका छोक़रा दस पढ़ा है
पर जहाँ भी जाता है
वहाँ फोन वाले या बड़े अफसर
या रिज़र्व कोटे वाले
ले जाते हैं सब स्थान

तो बताओ ?
और वह बिना मंगलचरण के ही
सधे हुए पंडित की तरह
गाली-पुराण का सम्पुट कर डालता है

एक दिन मैंने उससे कहा कि
ताऊ! तुम्हारे धंधे में भी तो बेईमानी है
लोग मिलावट को अधिकार
और ठगी को लक्ष्मी का आदेश मान बैठे हैं
तो वह बोला
मुन्नू !
हम क्या करें

जब तुम लोग
हराम की कमाई से
हर रोज़ मलाई खाओगे

तो क्या हम लोग
मिलावट की कमाई से
एक गिलास दूध भी नहीं पी सकते

मैं तब उसके सामने
सभ्य बनने के प्रयत्न में
गाँव की हँसी में
शहर की हँसी मिला रहा था

चुनाव की समझ

उसने ‘वैराग्यशतक’ देखा
और ‘वृद्धेभ्य: समर्पितम्’ कहकर
त्याग दिया

उसने ‘नीतिशतक’ देखा
और ‘मूर्खेभ्य समर्पितम्’ कहकर
रख दिया

किन्तु जब उसने
‘श्रंगारशतक’ देखा
तो झट ‘इदम् अस्मभ्यम् समर्पितम्’
कह कर
‘इदम अस्माकम्’ कहते हुए
उसे चूम लिया

उसका नाम विरागी संत था

मेरे गाँव का बसंत 

कानून
जब नगर के किसी खास हिस्से की
घेर लेता है सशरीर
देह पर कंटीली तारें लपेट
एक भीमकाय दीवार की तरह
तो लोग
उसे जेल का नाम दे देते हैं
(अब जेलें सुधार-गृह हो गये हैं)

जबकि जेल
दीवारों की ही नहीं
मन की भी होती है

जेलः जहाँ भगवान भी रहे थे कुछ मास
(जन्म से पूर्व)
(तब से जेलें मन्दिर भी कहलाती है)
वहाँ जाना
लोग गौरव की बात समझते हैं जेलों ने बहुतों को गौरवशाली बनाया है

(आपने कईयों को
छाती फुला-फुला कर
जेलों को गीता की तरह गाते हुए
सुना होगा)

कितनों ने ही
जेल यात्रा की
इतिहास की तरह
लिख डाला है

जेलों ने चिच्छक्ति को
योग शक्ति की तरह जगाया है
और इस हद तक बहकाया है कि
वे अब खुद को पहचानना तक भूल गये हैं

हमारे एक मित्र ने हैं
जो कुछ दिन हुए जेल से छूट के आए हैं
(उन्हें दूसरी पार्टी का झण्डा चुराने के अपराध
में जेल हुई थी)

कहते हैं
जेल एक करिश्मा है
(यह कहते हुए वे आपाद मस्तक काँपते हैं)

वह एक ऐसा चश्मा है
जो सबको देखता है
समत्व भाव से

(जबकि जेले के यात्री ?
स्वयं को हंसों की तरह
एक दूसरे से उज्ज्वलतर ही समझते हैं
वे मित्र नेता
अब हरेक मंच पर
(माईक को अपने गले का असमर्थ प्रचारक समझते हुए)

केवल पंचम में अलापते हैं
य्अह धुन कि भाईयों !
अपने सुधार में जुट जाईये
‘उद्धरेदात्मनात्मानम्’
(वे बीच-बीच में गीता को टोटकों की तरह बोलते हैं)
इसके लिए
भले ही जेल जाईये
गोली खाईये
पर अपने लिये
कम-अज-कम
एक मँच
जरूर जुटाईये

अघोरी लालसा 

हॉऊ स्वीट !
हॉऊ लवली !
हॉऊ ब्यूटीफुल !

यह कहते हुए हम प्रतिदिन
न जाने कितने असत्य जालों को तानते रहते हैं
शाब्दिक मुद्राओं के प्रभामण्डलीय वितान में

ताकि उनके प्रशंसकों की सूचि में
हम भी शामिल हो जाएँ
और
‘डायरी’ नामक ‘मार्क’ लगा
केवल हमारा ही नाम दिखे

ऐसा ही नाम हम
किसी दूसरी जगह भी देखना चाहते हैं
‘डायरी’ में क्रम के पहले नम्बर पर

हम एक नाम, एक रूप होने के स्थान पर
बहुनाम बहुरूप हो गये हैं
यह हमारी प्रभविष्णुता है !

या फिर
हम जो एक से अनेकधा
और एकत्र से अनेकत्र
दिखना चाहते हैं
रूपांतरित होकर
यह हमारी अघोरी लालसा की
शतमुखी वृत्ति है
जो हमारे खुद का पर्याय हो रही है

हम इतने ढोंगी हो गये हैं,कि
सत्य के ढोल में छिपे
जितने बजते हैं, उतने ही बड़बड़ाते हैं
झूथी प्रशंसा की थाप पर

यह जानते हुए भी कि
सिर्फ पोला ढोल बजता है

मैं देख रहा हूँ.आजकल
मुँह पर गालियाँ प्राप्त करना कितना मुश्किल है
मूँह पर प्रशंसा पाने के मुकाबिले

हम आँगन में मुश्किल से निगली हुई
प्रश6सा की पीक को
पिछवाड़े जाकर
गालियों की कड़वाहट के सथ
तुरंत उगल देते हैं
निर्द्वन्द्व भाव से

हमारा व्यक्तित्व असल में
गालियों के स्थान पर प्रशंसा
और प्रशंसा के स्थान पर
गालियों जैसा हो गया हि

(किंतु हमारा व्यक्तित्व असल में
कैसा हो गया है
यह समझ में आता नहीं)
लगता है कि कुछ अरसे के बाद लोग
पत्तियों को जड़ें
और जड़ों को तना
कहना शुरू कर देंगे
ओर हम मान लेंगे
क्योंकि यहाँ जो कुछ भी होता है
सब कहने से ही तो होता है

परदा-बे-परदा 

कहते हैं
आदिमवासी बेपरदा था
या फिर
जहां-तहां के निज अँगों को
कुछ हिस्सों को
पत्रावरणों या
बल्कल से ढक लेता था
मौका-बेमौका
उसकी गरज पड़े का
यह परदा था

पर आज हम
सभ्य होने के साथ-साथ
अति आधुनिक भी हैं
हम सुधरे हैं
हम धरा से
सूरज तक की दूरी तक
उससे आगे जा पहुँचे हैं

हमने कई चीज़ें जोड़ीं
हमने परदे किए ईजाद
नये परदे

हमारे घर आओ
देखो
खिड़की प्रत्येक कील पर
ठीक जमा है
स्वयं सजा है
और यहाँ-वहाँ तो
उसकी क्या है ज़रूरत ?

पर हाँ
घर तो बेपरदा है
बहुत बुरा लगता है

आख़िर ये बटन 

मेरी वैष्णव आत्मा
जो प्रार्थनाओं के दो जून भोजन
और संध्या के नाश्ते की उत्कोच
के आसरे,जी है
उसे मैं अपना तेज और नहीं पिला सकता

मेरे पेट में भूख के दाँत उग आये हैं
भ्रष्ट उसूलों की तरह
सत्य की हिंसा के

और कई सवालातों के विचित्र नाग
जो मेरी गर्दन पर मफ्लर की तरह लिपटे हैं
मेरा लहू चाट रहे हैं
और मुझे विश्वास है कि
मेरी हड्डियाँ दूध नहीं दे सकतीं

मंझोले दर्द पूरी शताब्दी का कद माँग रहे हैं
अभियोगों की दण्ड संहिता मुझे
मुजरिम की जेल बना देने को बजिदद है
ताकि मैं श्वेत शालों की प्रथम पंक्ति में कंबल–सा-स्याह
टोका हुआ अभियुक्त दिखूँ
(वैसे भी जन्म के अतिरिक्त सारे अपराध
यही पंक्ति करवाती है)

मैंने भाषायी छलावे में
बहुत कोशिश की है सम होने की
शब्द और अर्थ की तरह
यहाँ आकार के लिए कोट
और कोट के लिए पैड बहुत ज़रूरी है
अन्यथा बनावट मर जाती है

मैं तंत्र कीलित हूँ
समाज में अनार्किज़्म है
और प्रकृति में धाँधली
मुझे हर जन्मदिवस पर उम्र ने हरेक साल

बढ़ के ही भोगा है
अब मेरा रहना और भी ज़रूरी हो गया है
मैं उपभोग की वृत्ति हूँ

पर मुझ में जो शान्त उपद्रव है
उससे जुलूस तो निकलेगा
नारे तो लगेंगे
गाय रंभा तो सकती ही है
हाँ, षड़्यन्त्र हो तो हो
पर टाइम-बम हम नहीं चला सकते
हम माचिस जलाने वाले सुर्खियाँ नहीं बनाते

सब एक दूसरे की ओर भाग रहे हैं यहाँ
एक दूसरे से, एक दूसरे में
जैसे कर्फ्यू का भीड़तंत्र डर कर
गलियों में अजनबी हो जाता है

मैं असंग हो रहा हूँ
मुझे मरने भी नहीं आया
यद्यपि हर साल तेन सौ पैंसठ बार आई है मौत
दिनों का ज़हर लेकर

मैं इस निष्क्रियता का क्या करूँ
जो होने के विरुद्ध मेरी देह में, रोम-रोम हो रही है

आज सकने की भाषा में
होने की मजबूरी है

आखिर ये बटन, कब तलक
औपचारिकता निभाएंगे कमीज़ को
थामे रखने की
वैसे मुझे नंगा होने में कोई शर्म नहीं
अगर यह मनु की संतान अपना
नाम बदल ले तो

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