ओम निश्चल की रचनाएँ

उन दिनों का ऋण

उन दिनों का ऋण चुकाना
बहुत मुश्‍किल है।
मित्रता को तोल पाना
बहुत मुश्‍किल है।

एक लघु आकाश था,
रमने-विचरने के लिए
साइकिल पर बैठकर
उन्माद करने के लिए

छन्द की तुकबन्दियों में
कौन्ध थी सुख की
फ़िक्र होती थी नहीं
तब जागतिक दुख की

उन पलो को भूल पाना
बहुत मुश्किल है।

साथ हंसना-खिलखिलाना
और बतियाना
किसी कवि की कल्पना
में डूब-सा जाना

नई जिल्दें पुस्तकों की
क्या गज़ब ढातीं
गीत – कविताएँ हमें
सम्पन्न‍ कर जातीं

फिर वही अहसास पाना
बहुत मुश्किल है।

मित्रताएँ आज ज़्यादा
दिन नहीं चलतीं
वक़्त जैसे बदलता है
दोस्ती ढलती

पर कभी होते यहाँ
अपवाद ऐसे भी
चार दशकों बाद भी
सम्वाद ऐसे ही

उन दिनों का लौट आना
बहुत मुश्किल है।

वह अवध की साँझ
वे दिन और वे बातें
और पलकों पर
थिरकती स्वप्नमय रातें

जेब ख़ाली पर
दिलों में धुर उजाला था
प्यार की इस सल्तनत
का ढब निराला था

लखनऊ तुमको भुलाना
बहुत मुश्किल है।
उन दिनों का ऋण चुकाना
बहुत मुश्किल है।

एक साँस गंध नदी सी 

कौन भला गूँथ गया
जूड़े में फूल
सिहर उठा माथ हल्दिया.

एक साँस गंध नदी सी
लहरों सा गुनगुना बदन
बात-बात पर हँसना रूठना
हीरे सा पिघल उठे मन
किसने छू लिया भला
रेशमिया तन
सिहर उठा हाथ मेंहदिया.

एक प्यार सोन पिरामिड सा
और बदन परछाईं सा
जल तरंग जैसे बजता है
मन मेरा पुरवाई सा
किससे ये लाज-शरम
कुछ तो बोलो…
सिहर उठा गात क्यों प्रिया?

एक आस गरम धूप सी
बाहों में ऐसे दहके
जूही बगिया में कोई
रह-रह के जैसे महके
किसने झाँका चुपके
घूँघट की ओट
दमक उठा प्रात सीपिया.

यह कौन दस्तक दे गया 

यह कौन दस्तक दे गया
इतनी सुबह इतनी सुबह ।

आँखों में सपने बो गया
इतनी सुबह इतनी सुबह ।

थी नींद आँखों में बसी
था रात का चौथा पहर
हर सिम्त ख़ामोशी यहाँ
सोया हुआ पूरा शहर

कोई सुखद-सी कल्पना
कर गई कवितामय सुबह ।

था गुनगुनाता-सा कोई
कुछ स्वप्न थे कुछ बिम्ब थे
सुधियों के फ़्रेमों में जड़े
भावों के कुछ प्रतिबिम्ब थे

इक लहर-सी आई तभी
धो गई मन की हर सतह ।

पूछा किसी ने क्या मेरी
भी याद आती है कभी ?
इस भुवन में मेरी कमी
तुमको है तड़पाती कभी ?

मेरे बिना होती तुम्हारी
रात की कैसी सुबह ?

कह दो तो!

जूड़े मे फूल टाँक दूँ
ओ प्रिया
कह दो तो हरसिंगार का

दूध नहाई जैसी रात
हुई साँवरी,
रह-रह के भिगो रही
पुरवाई बावरी,
भीग गया है तन-मन
पाँवों में है रुनझुन
अंग-अंग में उभार दूँ
ओ प्रिया,
कह दो तो छंद प्यार का

खुली हुई साँकल है
खुली हुई खिडकियाँ
शोख हवाएँ देतीं
मंद-मंद थपकियाँ
भीतर बाहर अमंद
बिखरी है नेह गंध
साँस-साँस में उतार दूँ
ओ प्रिया,
कह दो सुर सितार का

कुछ ना कहो

 कुछ ना कहो…..
जैसे मैं बह रही हूँ भावों की नाव में
वैसे तुम भी बहो…..

कुछ ना कहो…………..कुछ ना कहो …..।

थोड़ा चुप भी रहो
जैसे चुप हैं हवाएँ
जैसे गाती दिशाएँ
जैसे बारिश की बून्दें
सुनें आँख मूँदे
जैसे बिखरा दे फिजां में
कोई वैदिक ऋचाएँ

यों ही बैठे रहो कल्‍पना के भुवन में
जैसे बहती है नदिया
वैसे तुम भी बहो ।
कुछ ना कहो ।
कुछ ना कहो…………..कुछ ना कहो …..।

ये फिजां कह रही कुछ
ये हवा कह रही कुछ
ये खुले-से नयन
ये जुबां कह रही कुछ
इनकी बातें सुनो, इनकी ख़ामोशियाँ
सर्द रातों की चुप-सी ये सरगोशियाँ
हाथ में हाथ लो
बाँह यों थाम लो
मुँह न खोलेंगे यों
आज जो भी कहो ।
कुछ ना कहो…………..कुछ ना कहो …..।

कौन नभ पर इन्द्रधनु लिखता ! 

उमड़ आए बादलों के दल
इन्द्रधनु से
सज उठा आकाश।

बहुत प्यासा था
धरा का तन
मन बहुत व्याकुल
बहुत उन्मन

लग रहा
जैसे कि यायावर
पक्षियों ने भरे हों परवाज़।

धुल गई सड़कें
शहर औ’ गांव
मिल गई आतप को
ठण्डी छांव

हो गया माहौल
ज्यों शिमला
हो रहा ऐसा मधुर अहसास।

फ्लैट्स ऊँचे
दिख रहे सुन्दर
बालकनियों में
चहकते स्वर

झाँकते बूढ़े
युवा बच्चे
गूँजता कलरव बहुत ही पास।

नील नभ का
यह विपुल कोना
झर रहा
आलोक का सोना

तनी प्रत्यंचा
कि बिखरे रंग
रोशनी का रच गया मधुमास।

सरल मन का
कुतूहल कहता
कौन नभ पर
इन्द्रधनु लिखता !

काश ऐसे ही
सजा-सँवरा
रहे यह आकाश बारहों मास।

गीतों के गॉंव

फूलों के गाँव
फसलों के गाँव
आओ चलें गीतों के गाँव।

महके कोई रह रह के फूल
रेशम हुई राहों की धूल
बहती हुई अल्हड़ नदी
ढहते हुए यादों के कूल
चंदा के गाँव
सूरज के गाँव
आओ चलें तारों के गाँव।

पीपल के पात महुए के पात
आँचल भरे हर पल सौगात
सावन झरे मोती के बूँद
फागुनी धूप सहलाए गात
पीपल की छाँव
निबिया की छाँव
आओ चलें सुख-दुख की छाँव।

नदिया का जल पोखर का जल
मीठी छुवन हर छिन हर पल
गुज़रे हुए बासंती दिन
अब भी नहीं होते ओझल
भटकें नहीं
लहरों के पाँव
आओ चलें रिश्तों की नाव।

गुनगुनी धूप है

गुनगुनी धूप है
गुनगुनी छाँह है.

एक तन एक मन
एक वातावरण,
प्यार की गंध का
जादुई व्याकरण,
मन में जागी मिलन की
अमिट चाह है.

नींद में हम मिलें
स्वप्न में हम मिलें
ज़िंदगी की हरेक
साँस में हम खिलें
हमको जग की नहीं
आज परवाह है.

चिट्ठियाँ जो लिखीं
संधियाँ जो रचीं
तुम मिले जब से
बेचैनियाँ हैं जगी
कल्पना में पगी
प्यार की राह है.

दो घड़ी बैठ कर
दो घड़ी बोल कर
तुम गए साँस में
छंद-सा घोल कर
सिंफनी नींद है
चंपई ख्वाब है.

चारो तरफ़ सवाल 

चारो तरफ सवाल
समय के भटके हुए चरण,
कौन हल कर इतने सारे
उलझे समीकरण ।

गश्त कर रहे नियमों के
अनुशासन के घोड़े
सत्ता के सुख में डूबी
कुर्सियॉं कौन छोड़ें

सिंहासन तक नहीं पहुँचती
आदम की चीख़ें
दु:शासन के हाथ हो रहा
जिसका चीरहरण ।।

चेहरों पर जिनके नक़ाब
दिखता कुछ उन्हें नहीं
आम आदमी भेड़-बकरियों
से पर अलग नहीं

जिनके हाथो में
समझौतों के बासी परचम
बाँच रहे हैं कत्लगाह में
वे मंगलाचरण ।।

राजा का फरमान हुआ है
मंत्रीगण सोऍं
हत्याओं से नहीं कॉंपते
सत्ता के रोयें,

आड़ धरम की लिए सियासत
बेच रही सपने
टूट रहा है लोकतंत्र के
नट का वशीकरण ।।

छुआ मुझे तुमने रूमाल की तरह 

थके हुए काँधे पर
भाल की तरह,
छुआ मुझे तुमने रूमाल की तरह.

फिर चंचल चैत की
हवाएँ बहकीं,
कुम्हलाए मन की
फुलबगिया महकी
उमड़ उठा अंतर शैवाल की तरह.

बीत गए दिन उन्मन
बतकहियों के
लौटे फिर पल
कोमल गलबहियों के
हो आया मन नदिया-ताल की तरह.

बहुत दिन हुए
तुमसे कुछ कहे हुए
सुख-दुख की संगत में
यों रहे हुए
बोले-बतियाए चौपाल की तरह.

तुम्हारे साथ

तुम्हारे साथ प्रकृति की सैर
तुम्हारे मन में नेह अछोर
तुम्हारे बोल चपल चंचल
किए जाते हैं भाव-विभोर
तुम्हारी बॉंहों का आकाश
खींचता हर पल अपने पास।

तुम्हारे साथ बड़ा होना
तुम्हारे संग खड़ा होना
तुम्हारे होने भर से ही
महकता घर का हर कोना
तुम्हारे साथ बिताए पल
कराते जीवन का आभास।

तुम्हारा साथ मिला है अब
तुम्हारा रूप खिला है अब
आ बसे जब से जीवन में
मिल गया एक जन्म में सब
तुम्हारी पलकें कहती हैं
सँभालो इनको अपने पास।

हमारा चित्त स्निग्ध निर्मल
न इसमें कोई दूजा है
कई जन्मों से हमने बस
तुम्हें ही केवल पूजा है
चाहता हॅूं मिल कर रचना
हृदय में एक अटल विश्वास।

तुमसे कितनी उम्‍मीदें थीं

      निरंकुशा: हि कवय: ।।
               तुमसे कितनी उम्‍मीदें थीं।।

तुमसे कितनी उम्‍मीदें थीं, तुम आँखों केे तारे थे ।
पर तुमने ही नाव डुबोई, तुम सत्‍ता के मारे थे ।

जिनके हाथ क़लम, वे दुश्‍मन, तुम बस यही समझते थे,
तुमने उनकी लाठी छीनी, जिनके तुम्‍ही सहारे थे ।

भीष्‍म पितामह शरशय्या पर, लेटे, बस, यह साेेच रहे,
उनका क्‍या गुनाह था, वे तो, बस, वक़्तों के मारे थे ।

तुमने इनसानों को इनसानों से बेशक बाँट दिया,
भूल गए भारत माता के, वे भी राजदुलारे थे ।

बस्‍ती-बस्‍ती कहते घूमे तुम, अच्‍छे दिन आएँगे,
ख़ुशफ़हमी में भूल गए हम, वे तो केवल नारे थे ।

फिर इनसानों की बस्ती में खद्दर वाले घूम रहे,
उनके चेहरे पर विनम्रता, कल तक जो हत्यारे थे ।

लोकतन्त्र के महासमर के, वे सब नायक कहाँ गए,
जब गान्धी नेहरू लोहिया के सारे स्‍वप्‍न हमारे थे ।

दिन खनकता है

दिन खनकता है
सुबह से शाम कंगन-सा।

खुल रहा मौसम
हवा में गुनगुनाहट और नरमी
धूप हल्के पॉंव करती
खिड़कियों पर चहलकदमी
खुशबुओं-सी याद
ऑंखों में उतरती है
तन महकता है
सुबह से शाम चंदन-सा।

मुँह अँधेरे छोड़ कर
अपने बसेरे
अब यहॉं तब वहॉं चिड़ियॉं
टहलती हैं दीठ फेरे
तितलियों-से क्षण
पकड़ में पर नहीं आते
मन फुदकता है
सुबह से शाम खंजन-सा।

चुस्कियों में चाय-सा
दिन भी गया है बँट
दोपहर के बाद होती
खतों की आहट
रंग मौसम के सुहाने
लौट आए हैं
लौटता अहसास फिर-फिर
शोख बचपन-सा।
दिन खनकता है
सुबह से शाम कंगन-सा।

दीवाली पर पिया

दीवाली पर पिया,
चौमुख दरवाज़े पर बालूँगी मैं दिया ।
ओ पिया ।

उभरेंगे आँखों में सपनों के इंद्रधनुष,
होठों पर सोनजुही सुबह मुस्कराएगी,
माथे पर खिंच जाएँगी भोली सलवटें
अगवारे पिछवारे फ़सल महमहाएगी

हेर-हेर फूलों की पाँखुरी जुटाऊँगी,
आँगन-चौबारे छितराऊँगी मैं पिया ।
ओ पिया ।

माखन मिसरी बातें शोख मावसी रातें,
अल्हड़ सौगंधों की नेह-सनी सौगातें,
फिर होंगे हरे-भरे दिन रंगत नई-नई
ताज़ा होंगी फिर-फिर सावनी मुलाक़ातें

पास बैठ कर मन की गाँठें सुलझाऊँगी,
सिरहाने गीत बन रिझाऊँगी मैं जिया ।
ओ पिया ।

आना जी, मावस को साँझ ढले आना
दूर यों अकेले में दिल मत बहलाना,
साथ दीप बालेंगे सुनेंगे हवाओं में……
खुशमिजाज़ चिड़ियों का बस स्वर थहराना

मन से मन जोड़ूँगी, हर संयम तोडूँगी
सुख-दुख से जुड़ कर सहलाऊँगी मैं हिया ।
ओ पिया ।

नदी का छोर 

यह खुलापन
यह हँसी का छोर
मन को बाँधता है ।
सामने फैला नदी का छोर मन को बाँधता है ।

बादलों के व्यूह में
भटकी हुई मद्धिम दुपहरी
कौंध जाती बिजलियों-सी
आँख में छवियाँ छरहरी
गुनगुनाती घाटियों का शोर मन को बाँधता है ।
सामने फैला नदी का छोर मन को बाँधता है ।

ये घटाएँ शोख
यह माहौल को रँगती सियाही,
गुम गए हैं अँधेरों में
रोशनी के किरनवाही
लहरियों पर लहरियों का दौर मन को बाँधता है
सामने फैला नदी का छोर मन को बाँधता है

दूर तक फैली हुई है
रेत की रंगीन दुनिया,
यहाँ आकर सिमट जाती हैं
अनेक संस्कृतियाँ
एक सन्नाटा यहाँ हर ओर मन को बाँधता है ।
सामने फैला नदी का छोर मन को बाँधता है।

फिर घटाएं जामुनी छाने लगी हैं 

उठ गए डेरे
यहॉं से धूप के
डोलियॉं बरसात की आने लगी हैं।

चल पड़ी हैं फिर हवाएँ कमल-वन से,
घिर गए हैं मेघ नभ पर मनचले,
शरबती मौसम नशीला हो रहा
तप्त तावे-से तपिश के दिन ढले
सुरमई आँचल
गगन ने ढँक लिए
फिर घटाएँ जामुनी छाने लगी हैं।

आह, क्या कादम्बिेनी है, और ये
अधमुँदी पलकें मदिर सौदामिनी की
इंद्रधनुषी देह, बादल-राग गाती
सॉंस जैसे कॉंपती है कामिनी की
पड़ रही जब से
फुहारें चंदनी
आँसुओं में कुछ नमी आने लगी है।

बदला देश चरागाहों मे 

बदला देश चरागाहों मे
अब कैसी पाबन्दी
ख़ुद के लिए समूची धरती
ग़ैरों पर हदबन्दी

निज वेतन भत्तों के बिल पर
सहमति दिखती आई
जनता के मसले पर संसद
खेले छुपम-छुपाई

देशधर्म जनहित की बातें
आज हुईं बेमानी
सड़कों पर हो रही
मान -मूल्यों की चिन्दी-चिन्दी

शस्य श्यामला धरती का
यह कैसा शील हरण
उपजाऊ ज़मीन का देखो
होता अधिग्रहण

जिनके हाथों में हल-बल है
हैं क़िस्मत के खोटे
पूंजीपतियों के माथे पर
है समृद्धि की बिन्दी

कहने को यह लोकतन्त्र
पर झूठे ताने-बाने
दिल्ली के मालिक बन बैठे
शाही राजघराने

लम्बे-चौड़े रकबे पर
क़ाबिज़ जनता के नायक
उनके ऊँचे सूचकांक हैँ
हम पर छाई मन्दी

बहइ पुरवइया दुआर हो !

लोकवार्ता और लोकधुनों के रसिक प्रभात पांडेय कोलकाता
और कवयित्री व लोक गायिका सुधी इन्दुबाला शंकर जी के लिए

बहइ पुरवइया दुआर हो
भादों कै रात अन्हियार हो ।

बरसइ झकाझोर ऊपर से पानी
चुवै मढ़इया चुवै लागी छानी
फूटल बा आपन लिलार हो ।
भादों कै रात अन्हियार हो ।

घर मा न मनई न रान्हा‍ परोसन
केहिका से कही जाई दुखड़ा ई आपन
डूबि जाई छपरा-ओसार हो ।
भादों कै रात अन्हियार हो ।

गांठ गांठ भरि गइले खेतवा मा पानी
अबकी तौ बूूड़़ि गइल जानौ किसानी
सून रहिहैं बखरी-बखार हो ।
भादो कै रात अन्हियार हो ।

बीत गइले सावन सजन नहीं अइलें
रेलिया बैरिया भी रहिया भुलइले
फीक लागय तीज-त्योहार हो ।
भादों कै रात अन्हियार हो ।

दुनिया में फैली बा कइसी बीमारी
रिस्ता औ नाता न न्यौता हँकारी
दुनिया ई भइले उजाड़ हो ।
भादों कै रात अन्हि़यार हो ।

भीतर एक नदी बहती है

चंचल हिरनी बनी डोलती
मन के वन में बाट जोहती,
वैसे तो वह चुप रहती है
भीतर एक नदी बहती है।

सन्नाटे का मौन समझती
इच्छाओं का मौन परखती
सॉंसों के सरगम से निकले
प्राणों का संगीत समझती
तन्वंगी, कोकिलकंठी है
पीड़ाओं की चिरसंगी है
अपने निपट अकेलेपन के
वैभव में वह खुश रहती है
भीतर एक नदी बहती है।

अभी कहॉं उसने जग देखा
किया पुण्य का लेखा-जोखा
अभी सामने सारा जीवन
उम्मीदों का खुला झरोखा
कुछ सपने उसके अपने हैं
महाकाव्य उसको रचने हैं
मन ही मन गुनती बुनती है
पर अपने धुन में रहती है
भीतर एक नदी बहती है।

शब्द शब्द हैं उसकी थाती
जिनसे लिखती है वह पाती
वह कविता के अतल हृदय में
बाल रही है स्नेहिल बाती
लता-वल्ल‍री-सी शोभन वह
इक रहस्य-सी है गोपन वह
किन्तु हुलस कर बतियाती वह
कभी-कभी सुख-दुख कहती है
भीतर एक नदी बहती है।

मेघदूत-सा मन

साँस तुम्हारी योजनगंधा,
मेघदूत-सा मन मेरा है ।

दूध धुले हैं पाँव तुम्हारे
अंग-अंग दिखती उबटन है
मेरी जन्मकुंडली जिसमें
लिखी हुई हर पल भटकन है

कैसे चलूँ तुम्हारे द्वारे
तुम रतनारी,हम कजरारे,
कमलनाल-सी देह तुम्हारी
देवदारु-सा तन मेरा है ।

साँझ तुम्हें प्यारी लगती है
प्रात सुहाना फूलों वाला
मुझे डँसा करता है हर पल
सूरज का रंगीन उजाला

कैसे पास तुम्हारे आऊँ
चंचल मन कैसे बहलाऊँ
हँसी तुम्हारे होठ लिखी है
दर्द भरा यौवन मेरा है ।

सुबह जगाता सूरज तुमको
साँझ सुला जाती पुरवाई,
मुझसे दूर खड़ी होती है
मेरी अपनी ही परछाईं

बाधाओं के बीच गुजरना
तुमसे झूठ मुझे क्या कहना
सीमाओं का साथ तुम्हा‍रा
सैलानी जीवन मेरा है ।

मौसम ठहर जाए

मेघ का, मल्हार का
मौसम ठहर जाए,
कुछ करो-
यह प्यार का मौसम ठहर जाए ।

जल रहा मन आज
सुधियों के अंगारों में,
दर्द कुछ हल्का हुआ है
इन फुहारों में,
रुप का, अभिसार का
मौसम ठहर जाए ।
कुछ करो-
यह प्यार का मौसम ठहर जाए ।

बादलों की गंध में
खोया हुआ है मन,
हो रही शिराओं में
सावनी सिहरन
जीत का, यह हार का
मौसम ठहर जाए,
कुछ करो-
यह प्यार का मौसम ठहर जाए ।

तुम सुनाओ ग़ज़ल कोई
गीत हम गाऍं,
क्या पता हम-तुम
कहीं फिर दूर हो जाऍं,
मान का, मनुहार का
मौसम ठहर जाए,
कुछ करो-
यह प्यार का मौसम ठहर जाए ।

यह धूप दिसम्बर की 

यह धूप दिसम्बर की

यह दुपहर की वेला
ठिठुरन के इस मौसम में ।
दिन का रूप सँजो लें हम,
कुछ धूप सँजों लें हम ।
अपने कोटों की जेबों में कुछ धूप सँजो लें हम ।

यह धूप गुनगुनी कितनी दुर्लभ है,
कितने दिन बाद आज छज्जे पर आई है,
लो खेल रहे अँजन खँजन चौबारे में,
फिर युवा हुई देखो ऋतु की तरुणाई है ।

कुछ देर ज़रा बैठो
कुछ गरमा-गरम पियो,
जीवन के इस क्षण को
तुम मन से ज़रा जियो,
मौसम के इस दीवानेपन का
रूप सँजो लें हम ।
अपने कोटों की जेबों में कुछ धूप सँजो लें हम ।

यह धूप सभी के लिए बराबर है,
मौसम की चोटें, प्यार बराबर है,
झिलगी खटिया पर भी उसकी रहमत,
निर्धन-कुबेर सबके हित प्यार बराबर है ।

यह अभी यहीं है
अभी कहीं होगी,
बादल में, कोहरे की
बाहों में गुम होगी,
खोने के पहले इसकी गरमाहट,
इसकी अनुपम सौगात सँजो लें हम ।
अपने कोटों की जेबों में कुछ धूप सँजो लें हम ।

लो बहुत दिनों के बाद दिखी गौरैया है,
यह सब बच्चे-बूढ़ों की लगती अय्या है,
कोयल भी कनखी से है जैसे देख रही,
बेसुरे समय में केवल वही गवैया है ।

यह धूप कर रही
जैसे अठखेली,
सूरज की किरणें
लगती अलबेली,
इससे पहले वह फिर मुण्डेर पर हो
सूरज की थोड़ी ऑंच सँजो लें हम ।
अपने कोटों की जेबों में कुछ धूप सँजो लें हम ।

यह वेला प्‍यार की 

पूजन आराधन की
अर्चन नीराजन की
स्वस्तिपूर्ण जीवन के
सुखमय आवाहन की
यह वेला सपनों के
मोहक विश्राम की।
यह वेला शाम की।।

यह वेला जीत की
यह वेला हार की
यह वेला शब्दों के
नख-शिख श्रृंगार की
दिन भर की मेहनत के
बेहतर परिणाम की।
यह वेला शाम की।।

यह वेला गीत की
यह वेला छंद की,
मौसम के नए नए
फूलों के गंध की
और थके-हारों के
किंचित आराम की।
यह वेला शाम की।।

यह वेला नृत्य की
संस्कृति साहित्य की
कोमल बतकहियों की
सर्जन-सामर्थ्य की
मित्रों के संग बैठे–
टकराते जाम की।
यह वेला शाम की।।

यह वेला मिलने की
संग-साथ जुड़ने की,
हाथो में हाथ लिए
आजीवन रमने की
चितवन के नए नए
खुलते आयाम की।
यह वेला शाम की।।

यह वेला प्यार की
अथक इंतजार की,
प्राणों से प्राणों के
उत्कट अभिसार की
यह घड़ी मोहब्बत के
हक़ के पैग़ाम की।
यह वेला शाम की।।

यहीं कोई नदी होती

तुम्हारे संग सोना हो
तुम्हारे संग जगना हो
कुटी हो प्यार की कोई
कि जिसमें संग रहना हो
कही जो अनकही बातें
तुम्हारे संग करनी हों
तुम्हारे संग जीना हो
तुम्हारे संग मरना हो।

यहीं होता कहीं पर
गॉंव अपना एक छोटा-सा
बसाते हम क्षितिज की छॉंव में
कोई बसेरा-सा
कहीं सरसों खिली होती
कहीं फूली मटर होती
यहीं कोई भँवर होता
यहीं कोई नदी होती
जहॉं तक दृष्टि जाती खिलखिलाता एक झरना हो।

बरसता मेह सावन में
हवा यों मुस्कराती हो
कि जैसे गॉंव की बगिया में
कोयल गीत गाती हो
उनींदे स्‍वप्न के परचम
फहरते रोज नींदों में
तुम्हारी सॉंवली सूरत
बगल में मुस्काराती हो
तुम्हांरे साथ इक लंबे सफर पर फिर गुज़रना हो।

भटकते चित्त को विश्वास का
एक ठौर मिल जाए
मुहब्बत के चरागों को
खुदा का नूर मिल जाए,
तुम्हारी चितवनों से झॉंकती
कोई नदी उन्मन
हमारा मन अयोध्या‍ हो
तुम्हारी देह वृन्दावन
समय की सीढ़ियों पर साथ चढ़ना हो उतरना हो।

ये सर्द मौसम ये शोख लम्‍हे

ये सर्द मौसम,
ये शोख लम्‍हे
फ़िजा में आती हुई सरसता,
खनक-भरी ये हँसी कि जैसे
क्षितिज में चमके हों मेघ सहसा।

हुलस के आते हवा के झोंके
धुऍं के फाहे रुई के धोखे
कहीं पे सूरज बिलम गया है
कोई तो है, जो है राह रोके,
किसी के चेहरे का ये भरम है
हो जैसे पत्‍तों में सूर्य अटका।

नई हवाओं की गुनगुनाहट
ये खुशबुओं की अटूट बारिश,
नए बरस की ये दस्‍तकें हैं
नए-से सपने नई-सी ख्‍वाहिश
नया जनम ले रही है चाहत
मचल रहे हैं दिल रफ्ता रफ्ता।

चलो कि टूटे हुओं को जोड़ें,
जमाने से रूठे हुओं को मोड़ें
अँधेरे में इक दिया तो बालें
हम ऑंधियों का गूरूर तोड़ें,
धरा पे लिख दें हवा से कह दें
है मँहगी नफरत औ प्‍यार सस्‍ता।

नए जमाने के ख्‍याल हैं हम
नए उजालों के मुंतजिर हम,
मगर मुहब्‍बत के राजपथ के
बड़े पुराने हैं हमसफर हम,
अभी भी मीलों है हमको चलना
अभी भी बाकी है कितना रस्‍ता।

अपन फ़कीरी में पलने वाले
मगर हैं दिल में सुकून पाले
थके नहीं हैं हम इस सफर में
भले ही पॉवों में दिखते छाले,
अभी उमीदें हैं अपनी रोशन
अभी है माटी में प्‍यार ज़िन्‍दा।

लिख रहे हैं लोग कविताएँ 

भर गया
तेज़ाब-सा कोई
ख़ुशनुमा माहौल में आकर ।

नींद में
हर वक़्त चुभता है
आँधियों का शोर- सन्नाटा
कटघरों में ज्यों- पड़े सोए
क़ैदियों की पीठ पर चाँटा
तैरता
दु:स्वप्न-सा हर दृश्य
पुतलियों के ताल में अक्सर ।

सड़क पर
मुस्तैद संगीनें–
बंद अपने ही घरों में हम
आदमी की शक़्ल में क़ातिल
कौन पहचाने किसी का ग़म
हर गली
हर मोड़ पर बैठी
मौत अपनी बाँहे फैला कर ।

बर्फ़-सा
जमता हुआ हर शख़्स
चुप्पियों में क़ैद हैं साँसें
समय की नंगी सलीबों पर
गले में अँटकी हुई फाँसें
लिख रहे हैं
लोग कविताएँ
नींद की फिर गोलियाँ खाकर ।

संबंधों की अलगनियों पर

किसिम किसिम के
संबोधन के महज दिखावे हैं
संबंधों की अलगनियों पर सबके दावे हैं ।

दुर्घटना की आशंकाएँ
जैसे जहाँ-तहाँ
कुशल-क्षेम की तहकी़कातें
होती रोज़ यहाँ
अपनेपन की गंध तनिक हो
इनमें मुमकिन है
पर ये रटे-रटाए जुमले महज छलावे हैं ।

घर दफ़्तर हर जगह
दीखते बाँहें फैलाए
होठों पर मुस्कानें ओढ़े
भीड़ों के साए
हँसते-बतियाते हैं यों तो
लोग बहुत खुल कर
मुँह पर ठकुर-सुहाती भीतर जलते लावे हैं ।

निहित स्वार्थों वाली जेबें
सभी ढाँपते हैं
ग़ैरों की मजबूरी का सुख
लोग बाँटते हैं
दुआ-बंदगी, हँसी-ठहाके
हुए औपचारिक
आईनों के पुल तारीफ़ी महज भुलावे हैं ।

सियासत 

अब तो भय लगता है सियासत से
(झूठ कहते हैं लीलाधर जगूड़ी : भय भी शक्‍ति देता है)

मूर्तियाँ और अभी टूटेंगी
ख़्वाब भी बेहिसाब टूटेंगे ।
‘जागते रहो’ का नारा देकर
लोग सोते हुओं को लूटेंगे ।

जिनको मजहब पे था यक़ीन बहुत
उनकी मजहब का सोच तंग हुआ
भाई मारा गया जो दँगे में —
उनका मजहब से मोहभँग हुआ ।

दँगों में निहित खाद-पानी हैं
मुल्क़ की रगों में जवानी है
हाथ में ले त्रिशूल, वे बोले
अबकी दुगुना फ़सल उगानी है ।

उनका कहना ‘अलख निरँजन’ था
और फिर होना मूर्ति भँजन था
भीड़ में था भला विवेक कहाँ
हर तरफ़ शोर और क्रन्दन था ।

उनका मकसद था क्रान्ति हो जाए
पाँच सालों की शान्ति हो जाए
ध्वंस के बाद सृजन होता है —
हो न हो, रक्त क्रान्ति हो जाए ।

जो भी फिरकापरस्त घूम रहे
अपने आका के चरण चूम रहे
काइयाँपन है उनके चेहरे पर
खादियों में जो लोग झूम रहे ।

रोड-शो आज उनका होना है
भीड़ को फिर से जिबह होना है
एक अरसा हुआ है जंग लगे
खड्ग को फिर लहू से धोना है ।

कोई बजरँग बली कहता है
कोई ऐलान-ए-अली कहता है
इस सियासत में सभी जायज है
उनके भीतर का छली कहता है ।

अब यहाँ पर फकीर कोई नहीं
साधु लाखों हैं, पीर कोई नहीं
मुँह से नेता ज़हर उगलते हैं
अब जबॉं का अमीर कोई नहीं ।

वो घरों में दुबक के बैठे हैं
लोग अन्दर सहम के बैठे हैं
फिर न हो कोई गोलियों का शिकार
जिरह-बख़्तर पहन के बैठे हैं ।

तुम हो इनसान या भगवान हमें क्या मतलब?
लाखों लोगों के हो अरमान हमें क्या‍ मतलब?
अब सियासत में अहम है यही मुद्दा, साधो  !
तुम हो हिन्दू या मुसलमान हमें ये मतलब ।

जितने गुण्डे औ’ मवाली हैं, काम आएँगे
माफ़िया और बवाली हैं, काम आएँगे
इनके बलबूते है जम्हूरियत की हरियाली
सब सियासत के ही माली हैं, काम आएँगे ।

फिर विजय का जुलूस निकलेगा ।
दर्प-ओ-उन्माद और पिघलेगा ।
अब तो भय लगता है सियासत से
फिर वो क़ातिल शहर से गुज़रेगा ।

सीढ़ियों पर साँझ

सीढ़ियों पर सॉंझ
मन में धूप
जल में पाँव।
कहाँ ले आए
पिया तुम आज फिर इस ठाँव।

यह खुला एकान्त मन को ठौर
बरसों बाद
चित्त में ठहरी हुई है
अजनबी-सी याद

पर्वतों के पार कोई टेरता है
बुलाती निस्संग कोई छॉंव।

सीढ़ियों पर साँझ
मन में धूप
जल में पॉंव।
कहॉं ले आए
पिया तुम आज फिर इस ठॉंव।

यह छटा अनुपम कि
कैसे भूल जाऍं
साँप सी गलियॉं
सुहानी उपत्यकाऍं

सूझती है तुम्हें तो बस चुहल
हर पल
बस जरा-सी दूर पर है गॉंव।
सीढ़ियों पर साँझ
मन में धूप
जल में पॉंव।
कहॉं ले आए
पिया तुम आज फिर इस ठॉंव।

यहीं है चान्दी सुबह की
सॉंझ का सोना
यहीं है अनुराग का
छूटा हुआ कोना

यहीं आकर पूछता कोई
क्या यही है ओम जी का गॉंव?

सीढ़ियों पर सॉझ
मन में धूप
जल में पॉंव।
कहॉं ले आए
पिया तुम आज फिर इस ठॉंव।

हिन्दी के चेहरे पर चान्दी की चमक 

कहने को जनता की
कितनी मुँहबोली है,
सुख-दुख में शामिल है
सबकी हमजोली है,
कामकाज में लेकिन रत्‍ती-भर धमक है,
हिन्दी के चेहरे पर चान्दी की चमक है ।

ऊँचे आदर्शों के सपनों में खोई है,
किये रतजगे कितनी रात नहीं सोई है,
आज़ादी की खातिर बलिदानी वीरों की,
यादों में यह कितनी घुट-घुट कर रोई है ।

यों तो यह भोली है,
युग की रणभेरी है ।
लेकिन अँग्रेज़ी की
भृत्या है…चेरी है ।

हाथों में संविधान, फिर भी है तुच्‍छ मान,
आँखों में लेकिन पटरानी-सी ललक है,
हिन्दी के चेहरे पर चान्दी की चमक है ।
कितने ईनाम और कितने प्रोत्‍साहन हैं,
फिर भी मुखमंडल पर कोरे आश्‍वासन हैं ।

जेबों में सोने के सिक्‍कों की आमद है,
फाइल पर हिन्दी की सिर्फ़ हिनहिनाहट है ।

बैठक में चर्चा है
‘दो…जो भी देना है,
महामहिम के हाथो
पुरस्‍कार लेना है ।’

कितना कुछ निष्‍प्रभ है, समारोह लकदक है,
शील्‍ड लिए हाथों में क्‍या शाही लचक है !
हिन्दी के चेहरे पर चान्दी की चमक है ।
इत्रों के फाहे हैं, टाई की चकमक है
हिन्दी की देहरी पर हिंग्‍लिश की दस्‍तक है ।

ऊँची दूकानों के फीके पकवान हैं,
बॉस मगर हिन्दी के परम ज्ञानवान हैं ।

शाल औ दुशाला है
पान औ मसाला है,
उबा रहे भाषण हैं
यही कार्यशाला है ।

हिन्दी की बिन्दी की होती चिन्दी-चिन्दी,
ग़ायब होता इसके चेहरे का नमक है ।
हिन्दी के चेहरे पर चान्दी की चमक है ।

हिन्दी के तकनीकी शब्‍द बहुत भारी हैं,
शब्‍दकोश भी जैसे बिल्‍कुल सरकारी हैं,
भाषा यह रंजन की और मनोरंजन की,
इस भाषा में दिखते कितने व्‍यापारी हैं ।

बेशक इस भाषा का
ऑंचल मटमैला है,
राष्‍ट्रप्रेम का केवल
शुद्ध झाग फैला है ।

दाग़ धुलें कैसे इस दाग़दार चेहरे के,
नकली मुस्कानें हैं, बेमानी ठसक है ।
हिन्दी के चेहरे पर चान्दी की चमक है ।
हिन्दी की सेवा है, हिन्दी अधिकारी हैं
खाते सब मेवा हैं, गाते दरबारी हैं ।

एक दिवस हिन्दी का, एक शाम हिन्दी की
बाक़ी दिन कुर्सी पर अँग्रेज़ी प्‍यारी है ।

कैसा यह स्‍वाभिमान
अपना भारत महान !
हिन्दी अपने ही घर
दीन-हीन, मलिन-म्‍लान

पाँवों के नीचे है इसके दलदल ज़मीन
नित प्रति बुझती जाती सत्‍ता की हनक है ।
हिन्दी के चेहरे पर चान्दी की चमक है ।

जब हवा सीटियाँ बजाती है 

दूर तक
बस्तियों सिवानों में
गन्ध फ़सलों की महमहाती है,
जब हवा सीटियाँ बजाती है ।

एक सहलाव भरी गंध लिये आता है
आता है बालियाँ लिए मौसम
धान का हरापन ठिठकता है,
महक उठता है ख़ुशबुओं से मन
पत्तियों में छिपी कहीं कोयल
धूप के गीत-गुनगुनाती है,
जब हवा सीटियाँ बजाती है ।

एक खुलती हुई हँसी जैसी
फूटती है उजास मेड़ों से,
दीखते हैं दरख़्त फैले हुए
चाँदनी के हसीन पेड़ों से,
आँख से
ओट हो गईं सुधियाँ
पास फिर लौट-लौट आती हैं,
जब हवा सीटियाँ बजाती है ।

पाट चौड़े हुए नदी के फिर
फिर हवाएँ हुईं सरस-शीतल,
मुट्ठियों से शहद छिड़कता है
द्वार पर सन्त-सा खड़ा पीपल,
दिन रुई-सा
इधर-उधर उड़ता
रात अल्हड़-सी मुसकराती है,
जब हवा सीटियाँ बजाती है ।

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