ओम नीरव की रचनाएँ

ठहरो साथी 

आगे है भीषण अंधकार ठहरो साथी,
कर लो थोड़ा मन में विचार ठहरो साथी!

दासता-निशा का भोर
कहो किसने देखा?
जंगल में नाचा मोर
कहो किसने देखा?
अबतक उसका है इंतज़ार ठहरो साथी!
आगे है भीषण अंधकार ठहरो साथी!

भ्रम है कहना
केवल स्वराज को ही सुराज,
भ्रम है कहना
गति को ही प्रगति आज,
लो पहले अपना भ्रम निवार ठहरो साथी,
आगे है भीषण अंधकार ठहरो साथी!

सह लो कितने भी अनाचार
बनकर सहिष्णु;
पर लक्ष्य तभी पाओगे
जब होगे जयिष्णु!
कुचलो कंटक लो पथ सँवार ठहरो साथी;
आगे है भीषण अंधकार ठहरो साथी!

यह अंधकार पथ का है
दैवी शाप नहीं,
या पूर्व जन्म का संचित
कोई पाप नहीं!
तम कायर मन का दुर्विचार ठहरो साथी,
आगे है भीषण अंधकार ठहरो साथी!

बाहर के सूरज से ‘नीरव’
कब रात कटी,
हर उदय अंततः अस्त बना
आ रात डटी!
अब अपना सूरज लो निखार ठहरो साथी,
आगे है भीषण अंधकार ठहरो साथी!

ओ दर्पण

मेरा इतना भोड़ा चेहरा!
नहीं, नहीं, तुम ही झूठे हो!
ओ दर्पण तुम ही झूठे हो!

माना पाँव पड़े कीचड़ में, छींटे चेहरे पर भी आये,
किन्तु न लाए पास तुम्हारे, कभी बिना धोये चमकाये l
फिर भी तुमने छाप दिये हैं, दाग़ सभी वैसे के वैसे,
कोई भी जो देख न पाया, वह तुमने ही देखा कैसे?
नहीं नहीं तुम ही झूठे हो l
बोलो बोलो मेरे दर्पण
आखिर क्यों मुझसे रूठे हो?
ओ दर्पण तुम ही झूठे हो!

माना कुछ अनुचित करता हूँ, पर रातों में आँख बचाकर,
सीना तान चला करता हूँ, दिन में सबसे आँख मिलाकर l
फिर भी कर दीं नीची आँखें, मेरा भोड़ा बिम्ब बनाकर,
आँखें नहीं उठा पाता हूँ, दर्पण पास तुम्हारे आकर l
नहीं नहीं तुम ही झूठे हो l
सदा अप्रिय ही बोला करते
बड़े सत्यवादी नूठे हो!
ओ दर्पण तुम ही झूठे हो!
मेरा इतना भोड़ा चेहरा!
नहीं नहीं तुम ही झूठे हो!
ओ दर्पण तुम ही झूठे हो!

वही कहानी

बार-बार क्यों वही कहानी कालचक्र दुहरा जाता है?
संध्या की कालिमा उषा के पन्नों पर बिखरा जाता है!

एक झूँक में ही अम्बर के मैंने दोनों छोर बुहारे,
मेरे पौरुष के आगे तो टिके न नभ के चाँद सितारे;
फिर क्यों नभ के धवल पटल पर कागा-सा मँडरा जाता है?
बार-बार क्यों वही कहानी कालचक्र दुहरा जाता है?

पलकों के पल्लव पर ढुरकी बूँद कहीं जो पड़ी दिखायी,
नेह किरन से परस-परस कर मैंने तो हर बूँद सुखायी;
फिर-फिर क्यों नयनों की सीपी में सागर घहरा जाता है?
बार-बार क्यों वही कहानी कालचक्र दुहरा जाता है?

उर-मरुथल को स्नेह-सिक्त कर मैंने हरित क्रान्ति सरसायी,
पोषण-भरण-सृजन-अनुरंजन करने वाली पौध उगाई;
द्रुम कोई हरियाते ही क्यों एक बीज पियरा जाता है?
बार-बार क्यों वही कहानी कालचक्र दुहरा जाता है?

कभी सोचता हूँ न करूँ कुछ जो होता है सो होने दूँ,
निर्झरणी के ही प्रवाह में जीवन लहरों को खोने दूँ;
पर ‘नीरव’ छौने को फिर-फिर कोई प्रिय हुलरा जाता है!
बार-बार क्यों वही कहानी कालचक्र दुहरा जाता है l

तुझको नमन

मातृ भू कैसे करें तुझको नमन!
हैं अधूरे ही पड़े तेरे सपन!

द्वार पर तेरे जले कितने दिये,
लाल थे तेरे जिये तेरे लिए.
बुझ गए दे भी न पाये हम कफ़न।
मातृ भू कैसे करें तुझको नमन!

नीर-भोजन-चीर तेरे भोगते,
गर्भ में तेरे खजाने खोजते।
कर चले हम स्वार्थ में ममता दफ़न।
मातृ भू कैसे करें तुझको नमन!

हम पले जिस छत्र से आँचल तले,
आज उसमे छिद्र कितने हो चले।
देखकर भी मूँद लेते हम नयन।
मातृ भू कैसे करें तुझको नमन!

एक माटी का पतन-उत्थान क्या,
विश्व में उसकी भला पहचान क्या?
अस्मिता जिसकी कुचालों के रहन।
मातृ भू कैसे करें तुझको नमन!

घूँट पी अपमान का जीना वृथा,
आन पर मरना भला है अन्यथा।
हो सर्जन संकल्प या नीरव हवन।
मातृ भू कैसे करें तुझको नमन!

माटी धन है मेरा

माटी तन है मेरा माटी धन है मेरा
माटी में मेरा जीवन सँवरता रहा l
मेरी हर साँस बंधक रही माटी की
मैं श्रमिक माटी में ही बिखरता रहा l

कितनी ऊँची तुम्हारी हो अट्टालिका
मेरे माथे से ऊँची न हो पाएगी,
खिड़की जब भी खुलेगी तुम्हारी कोई
खुशबू मेरे पसीने की ही आएगी l
आया मधुमास जो भी तुम्हारे भवन
पहले चौखट से मेरी गुजरता रहा l

तुमने मंदिर रचा तुमने मस्जिद रची
खींच दी बीच में एक दीवार भी,
जिसमे खिडकी झरोखा न कुछ भी रखा
करते एक दूसरे का जो दीदार भी l
राम अल्लाह दोनों मिले खेत में
उनका वरदान झोली में झरता रहा l

चाल बहकी तुम्हारी सँभलकर चलो
वरना औंधी चिलम से लुढ़क जाओगे l
फावड़े का प्रगति से है नाता बड़ा
भूल जाओगे तो मीत पछताओगे l
अन्न की टन्न से शक्ति संपन्न हो
व्योम के वक्ष मानव विहरता रहा l

तन से मैले कुचैले रहे हम सदा
रहती दिल में हमारे सफ़ाई मगर,
मेरी धनिया की चूनर तो मैली फटी
धानी चूनर धरा को उढ़ाई मगर l
मेरे माथे से टपकी हरेक बूँद पर
तख्ते-ताउस का कोहनूर मरता रहा l

गीत–झूम भौंरे उठे

झूम भौंरे उठे फाग गाने लगे।
देख खिलती कली गुनगुनाने लगे।

व्योम से भूमि पर छन रहीं रश्मियाँ,
वीण के तार-सी तन रहीं रश्मियाँ।
कर समीरन बढ़ाया उषा ने सिहर,
स्वर मधुर प्रीति के झनझनाने लगे।

रागिनी प्रात की गूंजने-सी लगी,
वल्लरी मत्त हो झूमने-सी लगी।
संयमी तरु दिवाने सयाने बने,
ओस-कण मोतियों-से लुटाने लगे।

‘ है अभी प्रात ही, तू अभी से न पी,
दिन चढ़े तक सही, लाज रख तो झपी’-
कह रही भृंग से, लग रही अंग से,
पंखुड़ी के कदम डगमगाने लगे।

वृद्ध वट पर चढ़ी आज लाली भली,
रंग ढुरका गयी है उषा बावली,
रंग में तो नशा रंच भी था नहीं,
क्या हुआ वृद्ध वट लड़खड़ाने लगे।
झूम भौंरे उठे फाग गाने लगे।

खुरदुरी पाँखुरी-पाँखुरी

क्या हुआ कुछ कहो वाटिका के सुमन,
हो गयी खुरदुरी पाँखुरी-पाँखुरी।

कौन से देश से गर्म पछुवा चली,
दाल की नव कली अधखिली रह गयी।
गीतिका एक स्वच्छंद मधुमास की,
पाँखुरी के आधार पर सिली रह गयी।
कुंज-वन में न आयी सुरभि-राधिका,
रो पड़ी मन-किशन की सृजन-बाँसुरी।

है अनिल में अनल, लालिमा में छुपी-
कालिमा, गीत में रव, सुमन में चुभन।
लग रहा है विहग को विहग बाज़-सा,
डस रही तरुवरों को लता की छुअन।
अब भरोसा नहीं मेघ-से दूत पर,
यक्षिणी जल रही बीच अलकापुरी।

झूठ वाचाल है सत्य गूंगा हुआ,
बाहु-धन-बल बिना न्याय लाचार है।
भीड़ ही दे रही है दिशा देश को,
अब अनाचार ही लोक-आचार है।
हैं अँधेरों के घर आज शहनाइयाँ,
रश्मियाँ द्वार बांधे खड़ीं आँजुरी।

शीर्ष के फूल झुलसे खिले फिर नहीं,
पाँखुरी-पाँखुरी हो बिखर ही गये।
दूब के वृंत रौंदे तपे जो बचे,
जल मिला तो सजल हो निखर ही गये।
इसलिए दूब के नाम ही लिख गयी,
आज सारे चमन की छट माधुरी।
हो गयी खुरदुरी पाँखुरी-पाँखुरी।

शब्द से सत्य को मैं छलूँगा नहीं

शब्द से सत्य को मैं छलूँगा नहीं।
तालियों के चषक में ढलूँगा नहीं।

प्रीति की जाह्नवी क्या मिलेगी तुम्हें,
मैं हिमालय कभी जो गलूँगा नहीं।

पास है पर मिलेगी न मंज़िल कभी,
राह पर दो क़दम जो चलूँगा नहीं।

पल-चषक, आ तुझे क्यों न पी लूँ अभी,
बाद में हाथ यों ही मलूँगा नहीं।

ओ शमा, मैं पतंगा नहीं, छंद हूँ,
ख्याति की आग में मैं जलूँगा नहीं।

आधार छन्द–वाचिक स्रग्विणी
मापनी–गालगा गालगा-गालगा गालगा

कैसा यह उपहार ज़िन्दगी 

कैसा यह उपहार ज़िन्दगी?
किसका यह प्रतिकार ज़िन्दगी?

तिल-तिल गलती रही जन्म से
जन्मजात बीमार ज़िन्दगी।

हो न सकी यह कभी किसी की
लगती बड़ी लबार ज़िन्दगी।

कौन करे इससे गठबंधन
खड़ी मृत्यु के द्वार ज़िन्दगी।

‘है या नहीं’ अनिश्चित यह भी
कोरा मिथ्याचार ज़िन्दगी।

कटु यथार्थ का मृदु सपनों से
हो जैसे परिहार ज़िन्दगी।

सोहर का मरघट से ‘नीरव’ ,
एक सफल अभिसार ज़िन्दगी।

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आधार छंद-चौपाई
विधान-16 मात्रा, अंत में गाल वर्जित

वर्जनाएं काव्य में यदि हो समादृत क्या कहें 

वर्जनाएँ काव्य में यदि हो समादृत क्या कहें।
वासना शृंगार में यदि हो अनावृत, क्या कहें।

त्राण अंतर्वेदना का चुटकुलों में खोजता,
आज श्रोता छोड़ कविता का रसामृत, क्या कहें।

लिख रहे निज रक्त से सैनिक कथा वलिदान की,
फिर तुम्हारा राष्ट्र-गौरव हो न जागृत, क्या कहें।

मंच पर सँवरी सजी सब दिख रहीं कठपुतलियाँ,
खो गया सारा कहीं सौंदर्य प्राकृत, क्या कहें।

मृत्यु जीवन-गीतिका में रच गयी यों अंतिका,
एक मुट्ठी में किया आकाश विस्तृत, क्या कहें।

भोगकर जो छोड़ देते हैं निराश्रित पत्नियाँ,
कर रहे वे राम को निर्द्वंद उद्धृत, क्या कहें।

मूक सच्चे कवि दिखे वाचाल दिखते हैं अकवि,
हो रही कविता अकवि के हाथ अपहृत, क्या कहें।

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आधार छंद-गीतिका
मापनी-गालगागा गालगागा-गालगागा गालगा

अनुशासित जीवन

शिल्प-सधी गीतिका विधा है, जैसे अनुशासित जीवन।
दोनों के प्रणयन से होता, पग-पग सुख का संवर्धन।

मुखड़ा, युग्म, तुकांत, छंद-लय, इनके सरस समागम से,
हिन्दी-पोषित बने गीतिका, जब हो एक विशेष कहन।

आड़ी-तिरछी ऊँची-नीची, डगर भले हो पर हमको,
साध-साध पग रखना होगा, जीवन हो या काव्य-सृजन।

कलयुग के कालिये कला से, मुसकाकर झुककर मिलते,
कुटिल विषैली मुसकानों को, समझ न लेना अभिवादन।

बैसाखी पर चलने वाले, जीत रहे हैं दौड़ सभी,
टाँगों वाले अपवर्जित हो, झेल रहे युग का लांछन।

अपनी भूल निरखते अपना, जीवन बीत गया सारा,
सीना फुला-फुला भूलों पर, पप्पू चलता है बन-ठन।

कवि-चरित्र को बेच न देना, कुछ तमगों के लालच में,
लक्ष्य लेखनी का होता बस, सरस्वती माँ का अर्चन।

आधार छंद-लावणी
विधान-30 मात्रा, 16, 14 पर यति, अंत में वाचिक गा

धर्म-ईमान की लग रहीं बोलियाँ

धर्म-ईमान की लग रहीं बोलियाँ।
झूठ पाखण्ड की भर रहीं झोलियाँ।

धर्म प्रह्लाद के नाम पर राख ही-
बच रही जब जलायी गयीं होलियाँ।

सत्य ने सिर उठाया तनिक जो कहीं,
झूठ की संगठित हो गयीं टोलियाँ।

आज आकाश छूना सरल है बहुत,
सीढ़ियाँ बन गयीं गालियाँ-गोलियाँ।

कुर्सियाँ दुल्हनें कुछ करें भी तो क्या,
जब लुटेरों के कंधे चढ़ीं डोलियाँ।

खींच टीवी दुशासन रहा बेखटक,
सभ्यता के तनों पर बची चोलियाँ।

देख सम्बंध पावन अपावन हुए,
काँप थर-थर रहीं राखियाँ-रोलियाँ।

आधार छन्द–वाचिक स्रग्विणी
मापनी–गालगा गालगा-गालगा गालगा

गुदगुदाये पवन फागुनी धूप में

गुदगुदाये पवन फागुनी धूप में।
खिलखिलाये बदन फागुनी धूप में।

है न किंचित तपन या चुभन या घुटन,
रेशमी-सी छुअन फागुनी धूप में।

डालियाँ बाल-कोंपल लिए गोद में,
दादियों-सी मगन फागुनी धूप में।

ठूँठ हरिया गए वृद्ध सठिया गये,
है अजब बाँकपन फागुनी धूप में।

गरमियाँ-सर्दियाँ मिल रहीं आप क्यों,
कुछ न करते जतन फागुनी धूप में।

प्रौढ़ तरु कर रहे माधवी रूप का,
संतुलित आचमन फागुनी धूप में।

ले विदा शीत ‘नीरव’ पलट घूम कर,
कर रहा है नमन फागुनी धूप में।

आधार छन्द–वाचिक स्रग्विणी
मापनी–गालगा गालगा-गालगा गालगा

कुहासा, तुम नहीं हो प्रिय 

धुआँ है धुंध है आँगन कुहासा, तुम नहीं हो प्रिय।
रचाती रश्मि दिन का नहछुआ-सा, तुम नहीं हो प्रिय।

धँसा हिमपात के विकराल दलदल में दिवस जैसे,
नियति-अनुबंध में हूँ मैं फँसा-सा, तुम नहीं हो प्रिय।

अजल अनुदार नातों की लकड़ियाँ चीन दी मैंने,
जला ओलाव चाहत की चिता-सा, तुम नहीं हो प्रिय।

तुम्हारे संस्मरण पीने चला नव काव्य का आग्रह,
दिवस के रक्त का ज्यों शीत प्यासा, तुम नहीं हो प्रिय।

चढ़ा दिन, उठ रहे प्रियतम धुएँ पर धुंध छायी-सी,
रही परिरम्भ कर जैसे खुलासा, तुम नहीं हो प्रिय।

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आधार छंद-विधाता
मापनी-लगागागा लगागागा-लगागागा लगागागा

जिया ही क्यों 

मात्र जीने के लिए नीरव जिया ही क्यों?
पी रहा है रश्मियाँ अपनी दिया ही क्यों?

तुम ग़ज़ल में ज़िंदगी की यों कहीं आते,
बन गये मेरी ग़ज़ल में काफिया ही क्यों?

सह लिया चुपचाप सब अपवाद लेकिन अब,
सोचता हूँ ओठ मैंने-सी लिया ही क्यों?

दो कदम मंज़िल से पहले जो न गिरता तो,
कोसता कोई नहीं मैंने पिया ही क्यों?

ज़िंदगी जीकर चला हूँ मौत जीने अब,
पढ़ रहे तुम पागलों से मरसिया ही क्यों?

रात को दिन पी रहा या रात पीती दिन,
कुछ कहो लेकिन लगाते शर्तिया ही क्यों?

एक उलझा प्रश्न उलझा ही भले रहता,
हल समझ नीरव तुझे पैदा किया ही क्यों?

आधार छंद-रजनी
मापनी-गालगागा गालगागा-गालगागा गा

सूरज एक उगाता कौन

नित्य सुबह पूरब में आकर सूरज एक उगाता कौन।
आसमान में इतना सारा लाल रंग बिखराता कौन।

बैलों सँग हल माची लेकर चल देते हैं सुबह किसान,
उन्हें जगाने की ख़ातिर फिर चिड़ियों को चहकाता कौन।

किरणों से छू-छू फूलों की, पंखुड़ियों को देता खोल,
पंखुड़ियों की मुस्कानों से भौंरों को ललचाता कौन।

अंधकार की बात भूलना चाह रहे दुनिया के लोग,
उगता सूरज ढलना ही है, इसकी याद दिलाता कौन।

नदिया से सागर, सागर से बादल बन जाता किस भाँति,
बादल बरसा कर धरती की बढ़ती प्यास बुझाता कौन।

आधार छंद-वीर
विधान-31 मात्रा, 16, 15 पर यति, अंत में गाल

त्याग न आया काम

सारा जीवन होम हो गया, आदर्शों के नाम।
साँसों पर संकट आया तो, त्याग न आया काम।

जीत सत्य की ही होती है, सबको है विश्वास,
राज किया रावण ने फिर क्यों, वन-वन भटके राम।

स्वेच्छाचारी नर-नारी सब करते हैं सुखभोग,
आदर्शों के आँगन में क्यों, घमासान संग्राम।

दूभर काम सरल हो जाते, देकर सुविधा शुल्क,
पर कानून नियम पर चलकर, फँस जाती क्यों धाम।

अनाचार करने जैसा ही सहना भी है पाप,
ठान यही, भिड़ने वाले क्यों चले गये सुरधाम।

मंच-कला पर कंचन बरसे, काव्य-कला पर धूल,
माँ वाणी के पूजन का क्यों, ऐसा दुष्परिणाम।

आधार छंद-सरसी
विधान-27 मात्रा, 16, 11 पर यति, अंत में गाल

गरल घोलते रह गये

स्नेह को स्वर्ण से तोलते रह गये।
लोग यों ही गरल घोलते रह गये।

प्रीति-मीरा बिकी तो बिकी मोल बिन,
अर्थ-स्वामी खड़े मोलते रह गये।

अश्रु उनके न पोंछे किसी ने कभी,
व्यर्थ ही लोग जय बोलते रह गये।

सौम्यता-सी कली ने न खोले अधर,
मनचलों-से भ्रमर डोलते रह गये।

पोथियों में मिला सच कहीं भी नहीं,
पृष्ठ के पृष्ठ हम खोलते रह गये।

आधार छन्द–वाचिक स्रग्विणी
मापनी–गालगा गालगा-गालगा गालगा

जलाता रहा रात भर

दीप जलता जलाता रहा रात भर।
बात क्या-क्या बनाता रहा रात भर।

ढाई आखर नहीं बोल पाया मुआ,
जाने क्या-क्या सुनाता रहा रात भर।

एक रोटी टँगी-सी लगी व्योम में,
चाँद यों ही जगाता रहा रात भर।

साँझ होते कहाँ लोप सूरज हुआ,
प्रश्न यह ही सताता रहा रात भर।

साँझ को प्यार करने सवेरा चला,
द्वार को खटखटाता रहा रात भर।

निज प्रभा को छिपा भानु खद्योत की-
अस्मिता को बचाता रहा रात भर।

आधार छन्द–वाचिक स्रग्विणी
मापनी–गालगा गालगा-गालगा गालगा

कुदबुदाती बकरियाँ

जो मिला वह चर रही हैं कुदबुदाती बकरियाँ।
जब जियो सुख से जियो सबको बताती बकरियाँ।

शुद्ध शाकाहार करती हैं अहिंसा-गामिनी,
हिंसकों को याद बापू की दिलाती बकरियाँ।

रक्त चमड़ी मांस कुछ भी छोड़ता मानव नहीं,
दूध उसको भी पिला जीवन बचाती बकरियाँ।

लाडले को हो गया डेंगू तभी से हर गली,
खोजता हूँ दूध की खातिर पल्हाती बकरियाँ।

आदमी से कम नहीं होती पचाने में निपुण,
यदि पचा सीमेंट-सरिया काश, पाती बकरियाँ।

आदमी की ख़ाल में हैं रक्त-प्यासे भेड़िए,
व्यर्थ में ही ख़ैर बेटों की मनाती बकरियाँ।

देख मिमियाँ कर उछलना भा गया उनका बहुत,
जब मिली ‘नीरव’ ललक थूथन उठाती बकरियाँ।

आधार छंद-गीतिका
मापनी-गालगागा गालगागा-गालगागा गालगा

दंभ मिटाता शौचालय

मंदिर मस्जिद दंभ बढ़ाते, दंभ मिटाता शौचालय।
निर्विकार हो जाता मानव, जब भी आता शौचालय।

प्रश्न सुलझते कहीं नहीं जो, उलझे के उलझे रहते,
ध्यानावस्थित होते-होते, सब सुलझाता शौचालय।

ऑफिस में घर में मित्रों में, चाहे जितनी हो किचकिच,
लेकिन शांति-निकेतन जैसा, सबको भाता शौचालय।

धर्मालय बनवाने वाला, करता अपना विज्ञापन,
पूजनीय वह जनता के हित, जो बनवाता शौचालय।

घर के बाहर मेला-ठेला, नगरों या बाज़ारों में,
भारी संकट छा जाता जब, व्यक्ति न पाता शौचालय।

आज धर्म के नाम हो रहा, है अधर्म इतना भीषण,
धर्मालय वीभत्स लग रहे, शुचिता लाता शौचालय।

शंका समाधान करने का, धाम एक ही है मित्रों,
निर्विवाद निष्पक्ष सर्व-प्रिय, जो कहलाता शौचालय।

कोलाहल कोने-कोने में, कविता हो कैसे नीरव,
समाधान कर हर उलझन का, सर्जन कराता शौचालय।

आधार छंद-लावणी
विधान-30 मात्रा, 16, 14 पर यति, अंत में वाचिक गा

जीवन-अंतिका

लिख गयी है जन्म के ही साथ जीवन-अंतिका।
प्यार से आओ सजायें भाल चन्दन अंतिका।

शान्त जीवन भर प्रतीक्षा जो मिलन की कर रही,
है वही मेरे ह्रदय की आज धड़कन अंतिका।

छोड़ देते साथ जब सब छोड़ देती देह भी,
अंक देकर तब निभाती प्रीति-बंधन अंतिका।

धर्म-दर्शन से न सुलझी उलझनें संसार की,
किन्तु सुलझाती त्वरित प्रत्येक उलझन अंतिका।

बाद जीवन के बचेगा क्या, लिखा जिसमें यही,
है उसी अनमोल-सी कृति का विमोचन अंतिका।

सत इधर या सत उधर यह भेद जाने कौन पर,
सत-असत के बीच करती है विभाजन अंतिका।

भूख तृष्णा क्रोध ईर्ष्या वासना ‘नीरव’ घुटन,
एक पल में कर रही सबका समापन अंतिका।

आधार छंद-गीतिका
मापनी: गालगागा-गालगागा गालगागा गालगा

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