ओम प्रकाश ‘आदित्य’ की रचनाएँ

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं

गधे हँस रहे, आदमी रो रहा है
हिन्दोस्तां में ये क्या हो रहा है

जवानी का आलम गधों के लिये है
ये रसिया, ये बालम गधों के लिये है

ये दिल्ली, ये पालम गधों के लिये है
ये संसार सालम गधों के लिये है

पिलाए जा साकी, पिलाए जा डट के
तू विहस्की के मटके पै मटके पै मटके

मैं दुनियां को अब भूलना चाहता हूं
गधों की तरह झूमना चाहता हूं

घोडों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो

यहाँ आदमी की कहाँ कब बनी है
ये दुनियां गधों के लिये ही बनी है

जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है
जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है

जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है
जो माइक पे चीखे वो असली गधा है

मैं क्या बक गया हूं, ये क्या कह गया हूं
नशे की पिनक में कहां बह गया हूं

मुझे माफ करना मैं भटका हुआ था
वो ठर्रा था, भीतर जो अटका हुआ था

तोता एंड मैना

भारत में एक दिल्ली है, जहाँ क़ुतुब की बिल्ली है।
दिल्ली के कुछ हिस्से हैं, सबके अपने किस्से हैं।
एक पुरानी एक नई, दोनों सम्मुख देख गई।
कनाट प्लेस है एक यहाँ, चलते हैं दिलफेंक यहाँ।
ये गुलाब का लिली का, नई पुरानी दिल्ली का।
सबसे सुन्दर हिस्सा है, उसी जगह का किस्सा है।
सांझ हुई दिन बीत गया, दिन हारा तम जीत गया।
जवां दिलों के धड़कों पर, कनाट प्लेस की सड़कों पर।
परीओं का अवतरण हुआ, गन्धर्वों का हरण हुआ।
मन सपनों के महक उठे, तरुओं पर खग चहक उठे।
एक नीम के तरुवर पर, बैठे थे दो खग सुन्दर।
एक डाल पर मैना थी, मैना सूर्य उदयना थी।
स्वर्ण नीड़ में लेटी थी, ऊँचे घर की बेटी थी।
अंग्रेजी में गाती थी, हिंदी में शर्माती थी।
इंग्लिश उसकी अच्छी थी, किसी मेम की बच्ची थी।
उसी डाल पर तोता था, बैठा बैठा रोता था।
तोता भोला भाला था, नीली कंठी वाला था।
वो हिंदी में अच्छा था, निर्धन घर का बच्चा था।
मौसम कुछ कुछ सर्द हुआ, हमदर्दी का दर्द हुआ।
मैना बोली हाउ डू यू डू, तोता बोला व्याकुल हूँ।
उड़ कर ऊपर जाता हूँ, फिर नीचे आ जाता हूँ।
जब नीचे आ जाता हूँ , फिर ऊपर उड़ जाता हूँ।
कोई निश्चित पंथ नहीं, पथ का कोई अंत नहीं।
सपनों की जलती होली, मिस मैना हंस कर बोली।
मिस्टर तोते थिंकर हो, लगता है तुम किंकर हो।
ये भी सबा पुराना है, अब मॉडर्न जमाना है।
खेलो खाओ डांस करो,चांस मिले रोमांस करो।
रॉक-एन -रोल सीख लो तुम, दिल का बोल सीख लो तुम।
तोता बोला हे चपले, विरल जनम में हरि जप ले।
मैना बोली हे साधो, तुम हो मिट्टी के माधो।
बूढ़े होकर हरि जपना, जंगल में जाकर तपना।
तोता बोला गूढ़ गते, भज गोविंदम मूढ़ मते।
मैना बोली यंग हो तुम, लेकिन दिल से तंग हो तुम।
इसी भाँत बातें करते, बातों की सरिता बहते।
दोनों का सम्पर्क हुआ, उसी गगन में अर्क हुआ।
कनाट प्लेस की सडको से, कुछ बेहूदी लड़कों से।
घबरा कर सकुचा कर वे, मन ही मन उकता कर वे।
उड़े इंडिया गेट गए, हरी घास पर लेट गए।
शीतल मंद सुवात चली, कम्पित करती गात चली।
रस की भीनी रात चली, और लव मैरिज की बात चली।
मैना बोली यू लव मी? तोता बोला तू लव मी।
मैं ब्राह्मण का बेटा हूँ, अपने कुल में जेठा हूँ।
तू किस कुल की बाला है? किसने तुझको पाला है?
मैं हूँ अग्निहोत्रवता, क्या है तेरा गोत्र बता?
मैना ने महसूस किया, कुल को इंट्रोड्यूस किया।
मम्मी मेरी कोर्ट गयी, लेकर डाईवोर्स गयी।
भाग हमारे तले गए, डैडी मेरे चले गए।
डिग्री लेने लन्दन में, सेंट मिलाने चन्दन में।
तोता बोला हे मीते, नूतन युग की नवनीते।
मेरा कुल तो कच्चा है, तेरा ही कुल अच्छा है।
हम गठबंधन जोड़ेंगे, हर बंधन को तोड़ेंगे।
कुसुम कली सी खिलना कल, आठ बजे फिर मिलना कल।
दूजे दिन का किस्सा है, लव का अंतिम हिस्सा है।
रख दिल पर पत्थर तोता, नैनों में जल भर तोता।
दो घंटे से खड़ा हुआ, एक डाल में पड़ा हुआ।
देख रहा था इधर उधर, हाय ये मैना गयी किधर।
तभी किसी का कोमल सर, आ टिका तोते के कंधे पर।
ओ माई डीयर आई हैव कम, तोता बोला ओ निर्मम।
तेरी प्रणय प्रतीक्षा में, बैठ स्कूटर रिक्शा में।
सब सड़कों का भ्रमण किया, दोपहरी तक रमण किया।
कहीं न तेरे चिन्ह मिले, सब चौराहे खिन्न मिले।
मुझसे दंभ किया तूने, बहुत विलम्ब किया तूने।
मैना हँस के ख़ुदक गई, दो फुट पीछे फुदक गयी।
कितने इनोसेंट हो तुम, बुद्धू सौ परसेंट हो तुम।
कच्चे हो लव नॉलेज में, क्या पढ़ते हो कॉलेज में।
हँस दी मैना यू नौटी, तोते को च्योंटी काटी।
भावों का बिल कैश किया, छोटा सा दिल पेश किया।
लव के सपने सच कर दो, मेरे दिल को टच कर दो।
आसमान के स्टार हो तुम, मेरे दिल के पार हो तुम।
मैरिज लाईसेन्स हो तुम, लाइफ इंश्योरेंस हो तुम।
मेरे दिल में टॉप हो तुम, डीयर लौलीपॉप हो तुम।
में हूँ व्हिस्की तुम हो रम, तोता बोला सुन्दरतम।
मैना कुछ आगे सरकी, तोते की बाहें फड़की।
पाँखों से टच पाँख हुई, सभी इन्द्रियाँ आँख हुईं।
तोता मन में फूल गया, हिंदी पढना भूल गया।
तोता बोला यू लवली, सुन्दरता की एक कली।
दिल पर चलती ट्रेन हो तुम, मीठा मीठा पेन हो तुम।
ब्यूटी में भी बीट हो तुम, आय हाय कितनी स्वीट हो तुम।
मैं दिल्ली का तोता हूँ, कनाट प्लेस में रोता हूँ।
तुम हो परिस की बुलबुल, मैना बोली वंडरफुल।
हिंदी इंग्लिश एक हुए, जब दो पंजे शेक हुए।
हिंदी जब अंग्रेज़ हुई, दिल की धड़कन तेज हुई।
कल्चर देकर कर्ज़े में, बैठ विदेशी दर्जे में।
वे दो आँसू लूट गए, भाग देश के फूट गए।
आओ हम सब ध्यान करें, मिल कर यह गुणगान करें।
आई लव यू एंड यू लव मी, या मैं लव तू एंड तू लव मी।

ओ घोड़ी पर बैठे दूल्हे

ओ घोड़ी पर बैठे दूल्हे क्या हँसता है!!
देख सामने तेरा आगत मुँह लटकाए खड़ा हुआ है .
अब हँसता है फिर रोयेगा ,
शहनाई के स्वर में जब बच्चे चीखेंगे.
चिंताओं का मुकुट शीश पर धरा रहेगा.
खर्चों की घोडियाँ कहेंगी आ अब चढ़ ले.
तब तुझको यह पता लगेगा,
उस मंगनी का क्या मतलब था,
उस शादी का क्या सुयोग था.

अरे उतावले!!
किसी विवाहित से तो तूने पूछा होता,
व्याह-वल्लरी के फूलों का फल कैसा है.
किसी पति से तुझे वह बतला देगा,
भारत में पति-धर्म निभाना कितना भीषण है,
पत्नी के हाथों पति का कैसा शोषण है.

ओ रे बकरे!!
भाग सके तो भाग सामने बलिवेदी है.
दुष्ट बाराती नाच कूद कर,
तुझे सजाकर, धूम-धाम से
दुल्हन रुपी चामुंडा की भेंट चढाने ले जाएँगे.
गर्दन पर शमशीर रहेगी.
सारा बदन सिहर जाएगा.
भाग सके तो भाग रे बकरे,
भाग सके तो भाग.

ओ मंडप के नीचे बैठे मिट्टी के माधो!!
हवन नहीं यह भवसागर का बड़वानल है.
मंत्र नहीं लहरों का गर्जन,
पंडित नहीं ज्वार-भाटा है.
भाँवर नहीं भँवर है पगले.
दुल्हन नहीं व्हेल मछली है.
इससे पहले तुझे निगल ले,
तू जूतों को ले हाथ में यहाँ से भग ले.
ये तो सब गोरखधंधा है,
तू गठबंधन जिसे समझता,
भाग अरे यम का फंदा है.

ओ रे पगले!!
ओ अबोध अनजान अभागे!!
तोड़ सके तो तोड़ अभी हैं कच्चे धागे.
पक जाने पर जीवन भर यह रस्साकशी भोगनी होगी.
गृहस्थी की भट्टी में नित कोमल देह झोंकनी होगी.

अरे निरक्षर!!
बी. ए., एम. ए. होकर भी तू पाणी-ग्रहण
का अर्थ समझने में असफल है.
ग्रहण ग्रहण सब एक अभागे.
सूर्य ग्रहण हो, चन्द्र ग्रहण हो,
पाणी ग्रहण हो.
ग्रहण ग्रहण सब एक अभागे.
तो तोड़ सके तो तोड़ अभी हैं कच्चे धागे
और भाग सके तो भाग यहाँ से जान छुड़ाके.

नेताजी का नख-शिख वर्णन

सिर
बेपैंदी के लोटे-सा सिर शोभित
शीश-क्षितिज पर लघु-लघु कुंतल
सूखाग्रस्त क्षेत्र में जैसे
उजड़ी हुई फसल दिखती हो
धवल हिमालय-सा गर्वित सिर
अति उन्नत सिर
वोट मांगते समय स्वयं यों झुक जाता है
सिया-हरण से पूर्व झुका था जैसे रावण
या डसने से पूर्व सर्प जैसे झुकता है
स्वर्ण पट्टिका-सा ललाट है
कनपटियों तक
चंदन-चित्रित चौड़ा माथा
कनपटियों पर रेख उभरती कूटनीति की
माथे पर दुर्भाग्य देश का लिखा हुआ है

कान
सीपी जैसे कान शब्द जय-जय के मोती
कान नहीं ये षडयंत्रों के कुटिल भँवर हैं
एक कान ज्यों विरोधियों के लिए चक्रव्यूह
एक कान ज्यों चुगलखोर चमचे का कमरा!

नयन
रिश्वत के अंजन से अंजित
पर मद-रंजित
दूर किसी ऊँची कुर्सी पर
वर्षों से टकटकी लगाए
गिध्द नयन दो
भौहें हैं ज्यों मंत्री-मंडल की बैठक हो
पलकें ज्यों उद्धाटन मदिरा की दुकान का
अंतरंग कमरे-सी भीतर काली पुतली
पुतली में छोटा-सा गोलक जैसे कुर्सी
क्रोध-कुटिलता कपट कोरकों में बैठे हैं
शर्म न जाने इन ऑंखों में कहाँ छुप गई!

नाक
शहनाई-सी नाक, नफीरी जैसे नथुने
नाक नुकीली में ऊपर से है नकेल
पर नथ करती है
है नेता की नाक, नहीं है ऐरी-गैरी
कई बार कट चुकी किंतु फिर भी अकाटय है!

मुख
होंठ कत्थई इन दोनों होठों का मिलना
कत्थे में डूबा हो जैसे चांद ईद का
चूने जैसे दाँत, जीभ ताम्बूल पत्र-सी
आश्वासन का जर्दा भाषण की सुपाड़ियाँ
नेताजी का मुख है अथवा पानदान है
अधरों पर मुस्कान सितारे जैसे टूटें
बत्तीसी दिखती बत्तीस मोमबत्ती-सी
बड़ा कठिन लोहे के चने चबाना लेकिन
कितने लोहे के पुल चबा लिए
इन दृढ़ दाँतों ने
निगल गई यह जीभ
न जाने कितनी सड़कें
लोल-कपोल गोल मुख-मंडल
मुख पर काला तिल कलंक-सा
चांद उतर आया धरती पर
नेता की सूरत में!

गर्दन
मटके जैसी गरदन पर ढक्कन-सी ठोड़ी
कितनी बार झुकी यह गरदन यह मत पूछो
अनगिन बार उठी है फोटो खिंचवाने को
अनगिन मालाओं का भारी बोझ पड़ा है बेचारी पर

वक्षस्थल
वक्षस्थल चट्टान उठाए पत्थर-सा दिल
त्रिवली-तिकड़म पंथ
पेट की पगडन्डी पर
गुप्त पंथ काले धन का
तस्कर चोरों का
इसी पंथ से लुकते-छिपते धीरे-धीरे
नाभि कुंड में समा गई सभ्यता देश की
जिसको पाकर कटि-प्रदेश फैला थैली-सा!

पेट
पेट वक्ष से बड़ा पेट से बड़ी कमर है
ज्यों-ज्यों बढ़ती है महंगाई
त्यों-त्यों कटि बढ़ती जाती है
सुरसा-हनुमान में होड़ लगी हो जैसे
गोल मेज-सी कमर पर मत पेटी-सा पेट
बहुमत खाकर बहुत सा, गए पलंग पर लेट!

कंधे
कंधों पर गरदन है या गरदन पर कंधे
इन कंधों को देख सांड भी शर्माते हैं
इतना ढोया भार देश का इन कंधों ने
अब ये स्वयं देश को ही भारी पड़ते हैं

हाथ
अजगर जैसी लम्बी बाँहें
चांदी की खुरपी जैसे नाखून
अंगुलियाँ हैं कटार-सी
फिर भी इनके ये कर कमल कहे जाते हैं
इन हाथों से हाथ मिलाना खेल नहीं है
इन हाथों के हस्ताक्षर के सारे अक्षर स्वर्णाक्षर हैं
क्या न किया इन हाथों ने भारत की ख़ातिर
उद्धाटन करते-करते घिस गईं लकीरें
पूरी उम्र न जितनी जेबें काटीं किसी जेबकतरे ने
एक वर्ष में उतने फीते काटे इन कोमल हाथों ने
अवतारों के हाथ हुआ करते घुटनों तक
इनके पिंडली तक लटके हैं

पिंडली-पाँव
विरोधियों के पिंड-दान-सी चुस्त पिंडली
गड़े हुए धन जैसे टखने
नीचे दो सोने की ईंटें
जिन पर जड़े हुए दस मोती
स्वर्ण-चरण को चाट रहे चांदी के चमचे
आचरणों को कौन देखता
चरण बहुत अच्छे हैं
भारत-माता की छाती पर घाव सरीखे दिखते हैं जो
हैं सब चिन्ह इन्हीं चरणों के!

चाल (चलन)
चाल चुनावों से पहले चीते-सी लम्बी
मंत्री मंडल में आने के लिए
साँप-सी टेढ़ी-मेढ़ी
मंत्री पद पा जाने पर
मदमस्त हाथी-सी धीमी-धीमी
गिरगिट जैसा रंग देह का बगुले जैसा वेश
देश ध्यान में ये डूबे हैं, इनमें डूबा देश!

जिए जा रहा हूँ मैं 

दाल-रोटी दी तो दाल-रोटी खा के सो गया मैं
आँसू दिये तूने आँसू पिए जा रहा हूँ मैं
दुख दिए तूने मैंने कभी न शिक़ायत की
जब सुख दिए सुख लिए जा रहा हूँ मैं
पतित हूँ मैं तो तू भी तो पतित पावन है
जो तू करा ता है वही किए जा रहा हूँ मैं
मृत्यु का बुलावा जब भेजेगा तो आ जाउंगा
तूने कहा जिए जा तो जिए जा रहा हूँ मैं

इतिहास का पर्चा 

इतिहास परीक्षा थी उस दिन, चिंता से हृदय धड़कता था
थे बुरे शकुन घर से चलते ही, दाँया हाथ फड़कता था

मैंने सवाल जो याद किए, वे केवल आधे याद हुए
उनमें से भी कुछ स्कूल तकल, आते-आते बर्बाद हुए

तुम बीस मिनट हो लेट द्वार पर चपरासी ने बतलाया
मैं मेल-ट्रेन की तरह दौड़ता कमरे के भीतर आया

पर्चा हाथों में पकड़ लिया, आँखें मूंदीं टुक झूम गया
पढ़ते ही छाया अंधकार, चक्कर आया सिर घूम गया

उसमें आए थे वे सवाल जिनमें मैं गोल रहा करता
पूछे थे वे ही पाठ जिन्हें पढ़ डाँवाडोल रहा करता

यह सौ नंबर का पर्चा है, मुझको दो की भी आस नहीं
चाहे सारी दुनिय पलटे पर मैं हो सकता पास नहीं

ओ! प्रश्न-पत्र लिखने वाले, क्या मुँह लेकर उत्तर दें हम
तू लिख दे तेरी जो मर्ज़ी, ये पर्चा है या एटम-बम

तूने पूछे वे ही सवाल, जो-जो थे मैंने रटे नहीं
जिन हाथों ने ये प्रश्न लिखे, वे हाथ तुम्हारे कटे नहीं

फिर आँख मूंदकर बैठ गया, बोला भगवान दया कर दे
मेरे दिमाग़ में इन प्रश्नों के उत्तर ठूँस-ठूँस भर दे

मेरा भविष्य है ख़तरे में, मैं भूल रहा हूँ आँय-बाँय
तुम करते हो भगवान सदा, संकट में भक्तों की सहाय

जब ग्राह ने गज को पकड़ लिया तुमने ही उसे बचाया था
जब द्रुपद-सुता की लाज लुटी, तुमने ही चीर बढ़ाया था

द्रौपदी समझ करके मुझको, मेरा भी चीर बढ़ाओ तुम
मैं विष खाकर मर जाऊंगा, वर्ना जल्दी आ जाओ तुम

आकाश चीरकर अंबर से, आई गहरी आवाज़ एक
रे मूढ़ व्यर्थ क्यों रोता है, तू आँख खोलकर इधर देख

गीता कहती है कर्म करो, चिंता मत फल की किया करो
मन में आए जो बात उसी को, पर्चे पर लिख दिया करो

मेरे अंतर के पाट खुले, पर्चे पर क़लम चली चंचल
ज्यों किसी खेत की छाती पर, चलता हो हलवाहे का हल

मैंने लिक्खा पानीपत का दूसरा युध्द भर सावन में
जापान-जर्मनी बीच हुआ, अट्ठारह सौ सत्तावन में

लिख दिया महात्मा बुध्द महात्मा गांधी जी के चेले थे
गांधी जी के संग बचपन में आँख-मिचौली खेले थे

राणा प्रताप ने गौरी को, केवल दस बार हराया था
अकबर ने हिंद महासागर, अमरीका से मंगवाया था

महमूद गजनवी उठते ही, दो घंटे रोज नाचता था
औरंगजेब रंग में आकर औरों की जेब काटता था

इस तरह अनेकों भावों से, फूटे भीतर के फव्वारे
जो-जो सवाल थे याद नहीं, वे ही पर्चे पर लिख मारे

हो गया परीक्षक पागल सा, मेरी कॉपी को देख-देख
बोला- इन सारे छात्रों में, बस होनहार है यही एक

औरों के पर्चे फेंक दिए, मेरे सब उत्तर छाँट लिए
जीरो नंबर देकर बाकी के सारे नंबर काट लिए

गोरी बैठी छत्त पर

इस रचना का प्रसंग है कि एक नवयुवती छज्जे पर उदास बैठी है। उसकी मुख-मुद्रा देखकर लग रहा है कि जैसे वह छत से कूदकर आत्महत्या करने वाली है। आदित्य जी ने इस प्रसंग पर विभिन्न कवियों की शैलियों में लिखा है:

मैथिलीशरण गुप्त
अट्टालिका पर एक रमिणी अनमनी सी है अहो
किस वेदना के भार से संतप्त हो देवी कहो?
धीरज धरो संसार में, किसके नही है दुर्दिन फिरे
हे राम! रक्षा कीजिए, अबला न भूतल पर गिरे।

सुमित्रानंदन पंत
स्वर्ण–सौध के रजत शिखर पर
चिर नूतन चिर सुंदर प्रतिपल
उन्मन–उन्मन‚ अपलक–नीरव
शशि–मुख पर कोमल कुंतल–पट
कसमस–कसमस चिर यौवन–घट

पल–पल प्रतिपल
छल–छल करती निर्मल दृग–जल
ज्यों निर्झर के दो नीलकमल
यह रूप चपल ज्यों धूप धवल
अतिमौन‚ कौन?
रूपसि‚ बोलो‚
प्रिय‚ बोलो न?

रामधारी सिंह ‘दिनकर’
दग्ध हृदय में धधक रही
उत्तप्त प्रेम की ज्वाला।
हिमगिरि के उत्स निचोड़‚ फोड़
पाताल बनो विकराला।
ले ध्वंसों के निर्माण त्राण से
गोद भरो पृथ्वी की।
छत पर से मत गिरो
गिरो अंबर से वज्र–सरीखी।

काका हाथरसी
गोरी बैठी छत्त पर‚ कूदन को तैयार
नीचे पक्का फर्श है‚ भली करे करतार
भली करे करतार‚ न दे दे कोई धक्का
ऊपर मोटी नार कि नीचे पतरे कक्का
कह काका कविराय‚ अरी! मत आगे बढ़ना
उधर कूदना‚ मेरे ऊपर मत गिर पड़ना

गोपाल प्रसाद व्यास
छत पर उदास क्यों बैठी है‚
तू मेरे पास चली आ री।
जीवन का सुख–दुख कट जाए‚
कुछ मैं गाऊं‚ कुछ तू गा री।

तू जहां कहीं भी जाएगी‚
जीवन–भर कष्ट उठाएगी।
यारों के साथ रहेगी तो‚
मथुरा के पेड़े खाएगी।

श्यामनारायण पाण्डेय
ओ घमंड मंडिनी‚
अखंड खंड–खंडिनी।
वीरता विमंडिनी‚
प्रचंड चंड चंडिनी।

सिंहनी की ठान से‚
आन–बान–शान से।
मान से‚ गुमान से‚
तुम गिरो मकान से।

तुम डगर–डगर गिरो
तुम नगर–नगर गिरो।
तुम गिरो‚ अगर गिरो‚
शत्रु पर मगर गिरो।

भवानीप्रसाद मिश्र
गिरो!
तुम्हें गिरना है तो ज़रूर गिरो
पर कुछ अलग ढंग से गिरो
गिरने के भी कई ढंग होते हैं!
गिरो!
जैसे बूंद गिरकर किसी बादल से
बन जाती है मोती
बख़ूबी गिरो, हँसते-हँसते मेरे दोस्त
जैसे सीमा पर गोली खाकर
सिपाही गिरता है
सुबह की पत्तियों पर
ओस की बूंद जैसी गिरो
गिरो!
पर ऐसे मत गिरो
जैसे किसी की आँख से कोई गिरता है
किसी गरीब की झोपड़ी पर मत गिरो
बिजली की तरह
गिरो! पर किसी के होकर गिरो
किसी के ग़म में रोकर गिरो
कुछ करके गिरो

गोपालदास “नीरज”
यों न उदास रूपसी‚ तू मुस्कुराती जा‚
मौत में भी ज़िन्दगी के फूल कुछ खिलाती जा।
जाना तो हर एक को एक दिन जहान से‚
जाते–जाते मेरा एक गीत गुनगुनाती जा।

सुरेन्द्र शर्मा
ऐ जी, के कर रही है
छज्जे से नीचे कूदै है?
तो पहली मंज़िल से क्यूँ कूदे
चौथी पे जा!
जैसे के बेरो तो लाग्ये के कूदी थी!

छंद को बिगाड़ो मत

छंद को बिगाड़ो मत, गंध को उजाड़ो मत
कविता-लता के ये सुमन झर जाएंगे।

शब्द को उघाड़ो मत, अर्थ को पछाड़ो मत,
भाषण-सा झाड़ो मत गीत मर जाएंगे।

हाथी-से चिंघाड़ो मत, सिंह से दहाड़ो मत
ऐसे गला फाड़ो मत, श्रोता डर जाएंगे।

घर के सताए हुए आए हैं बेचारे यहाँ
यहाँ भी सताओगे तो ये किधर जाएंगे।

Share