ओम प्रभाकर की रचनाएँ

कितनी ख़ुशलफ़्ज़ थी तेरी आवाज़

कितनी ख़ुशलफ़्ज़ थी तेरी आवाज़
अब सुनाए कोई वही आवाज़।

ढूँढ़ता हूँ मैं आज भी तुझमें
काँपते लब, छुई-मुई आवाज़।

शाम की छत पे कितनी रौशन थी
तेरी आँखों की सुरमई आवाज़।

जिस्म पर लम्स चाँदनी शब का
लिखता रहता था मख़मली आवाज़।

ऎसा सुनते हैं, पहले आती थी
तेरे हँसने की नुक़रई आवाज़।

अब इसी शोर को निचोड़ूँगा
मैं पियूँगा छनी हुई आवाज़।

शब्दार्थ :
लम्स=स्पर्श
नुक़रई=चाँदी की खनक-सी

यह समय झरता हुआ

उफ़, यह समय
झरता हुआ।

कल के बेडौल हाथों
हुए ख़ुद से त्रस्त।

कहीं कोई है
कि हममें कँपकँपी भरता हुआ।

बनते हुए ही टूटते हैं हम
पठारी नदी के तट से।
हम विवश हैं फोड़ने को
माथ अपना निजी चौखट से।

एक कोई है
हमें हर क्षण ग़लत करता हुआ।

हम भी दुखी तुम भी दुखी 

रातरानी रात में
दिन में खिले सूरजमुखी
किन्‍तु फिर भी आज कल
हम भी दुखी
तुम भी दुखी !

हम लिए बरसात
निकले इन्‍द्रधनु की खोज में
और तुम
मधुमास में भी हो गहन संकोच में ।
और चारों ओर
उड़ती है समय की बेरुख़ी !

सिर्फ़ आँखों से छुआ
बूढ़ी नदी रोने लगी
शर्म से जलती सदी
अपना ‘वरन’ खोने लगी ।
ऊब कर खुद मर गए
जो थे कमल सबसे सुखी ।
हम भी दुखी
तुम भी दुखी ।

ख़्वाब में तो यहीं कहीं देखा

ख़्वाब में यहीं कहीं देखा
वैसे, कब से तुम्हें नहीं देखा।

था न मुमकिन जहाँ कोई मंज़र
मैंने शायद तुम्हें वहीं देखा।

मैंने तुमको तुम्हीं में देखा है
और किसी में कभी नहीं देखा।

टुक ख़यालों में, टुक सराबों में
टुक उफ़क में कहीं नहीं देखा।

उन दिनों भी यहीं थे, दिल की जगह
लौटकर आज फिर यहीं देखा।

शब्दार्थ :
टुक=थोड़ा; सराब-मृगमरीचिका; उफ़क=क्षितिज

वहीं से

हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढे़ंगें
देश के बंजर समय के
बाँझपन में
याकि अपनी लालसाओं के
अंधेरे सघन वन में

या अगर हैं
परिस्थितियों की तलहटी में
तो वहीं से बादलों के रूप में
ऊपर उठेंगे
हम जहाँ हैं वहीं से
आगे बढे़ंगे

यह हमारी नियति है
चलना पडे़गा
रात में दीपक
दिवस में सूर्य बन जलना पडे़गा

जो लडा़ई पूर्वजों ने छोड़ दी थी
हम लडे़ंगे
हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढे़ंगे

घर नियराया

जैसे-जैसे घर नियराया।

बाहर बापू बैठे दीखे
लिए उम्र की बोझिल घड़ियाँ।
भीतर अम्माँ रोटी करतीं
लेकिन जलती नहीं लकड़ियाँ।

कैसा है यह दृश्य कटखना
मैं तन से मन तक घबराया।

दिखा तुम्हारा चेहरा ऐसे
जैसे छाया कमल-कोष की।
आँगन की देहरी पर बैठी
लिए बुनाई थालपोश की।

मेरी आँखें जुड़ी रह गईं
बोलों में सावन लहराया।

यात्रा के बाद भी

यात्रा के बाद भी
पथ साथ रहते हैं।
हमारे साथ रहते हैं।

खेत खम्भे-तार
सहसा टूट जाते हैं,
हमारे साथ के सब लोग
हमसे छूट जाते हैं,

मगर
फिर भी
हमारी बाँह-गर्दन-पीठ को
छूते
गरम दो हाथ रहते हैं।

रे मन समझ 

रे मन, समझ
मौज़ूद सच !

इस आन्‍तरिक भूचाल में
रस-गंध की मत बात कर
झरते हुए दिक्‍काल में ।
उद्दीपनों की बाढ़ से
कुछ और बच
कुछ और बच ।

ये रंगीली-उजली हवा
सब कुछ उड़ा ले जाएगी
जितना बचे उतना बचा ।
अवशेष से आरम्‍भ कर
कोई नई
अल्‍पना रच !

रातें विमुख दिवस बेगाने

रातें विमुख दिवस बेगाने
समय हमारा,
हमें न माने !

लिखें अगर बारिश में पानी
पढ़ें बाढ़ की करूण कहानी
पहले जैसे नहीं रहे अब
ऋतुओं के रंग-
रूप सुहाने ।

दिन में सूरज, रात चन्‍द्रमा
दिख जाता है, याद आने पर
हम गुलाब की चर्चा करते हैं
गुलाब के झर जाने पर ।

हमने, युग ने या चीज़ों ने
बदल दिए हैं
ठौर-ठिकाने ।

दौड़

बच्चे ने खोली अलमारी,
अलमारीसे निकला बस्ता।
बच्चे ने फिर बस्ता खोला,
बस्ते से निकली इक पुस्तक।
फिर बच्चे ने खोली पुस्तक,
पुस्तक से निकला इक पाठ।
फिर बच्चे ने खोला पाठ,
और पाठ से निकली रोटी-
निकली और बाहर को भागी,
उसके पीछे बच्चा दौड़ा।
आगे रोटी, पीछे बच्चा
पीछे बच्चा, आगे रोटी,
दौड़ अभी भी जारी है।

-साभार: पराग, अक्तूबर, 1981, 48

शाम के साहिल से उठकर चल दिए

शाम के साहिल से उठकर चल दिए
दिन समेटा, रात के घर चल दिए।

हर तरफ़ से लौटकर आख़िर तभी
तेरे मक़्तल की तरफ़ सर चल दिए।

इक अज़ाने बेनवा ऎसी उठी
झूम कर मिनारो-मिम्बर चल दिए।

है उफ़क के पार सबका आशियाँ
ये सुना तो सारे बेघर चल दिए।

छू गए गर तेरे दामन से कभी
ख़ार भी होकर मुअत्तर चल दिए।

शब्दार्थ:
मक़्तल=वधस्थल
अज़ाने बेनवा=निशब्द अज़ान
मीनारो-मिम्बर=मस्जिद में वह ऊँचा स्थान जहाँ से अजान दी जाती है
मुअत्तर=सुवासित

ओ प्रिया 

ओ प्रिया
पिन्हाऊँ तुम्हें जुही के झुमके।

इस फूली संझा के तट पर,
आ बैठें बिल्कुल सट-सटकर,
दृष्टि कहे जो
उसे सुनें तो
अर्थ खिलेंगे नए आज गुमसुम के।

किरन बनाती तुझे सुहागिन,
आँखें खोल अरी बैरागिन,
इत-उत अहरह
अहरह इत-उत
लट ले तेरी मदिर हवा के ठुमके।

डूब गया दिन

डूब गया दिन
जब तक पहुँचे तेरे द्वारे।

एक धुँधलका छाया ओर-पास
धूप गाँव-बाहर की छूट गई,
छप्पर-बैठक सब बिल्कुल उदास
पगडंडी दरवाज़े टूट गई,

भारी था मन
हम थे काफ़ी टूटे-हारे।

सूना आँगन, सूनी तिद्वारी
तुलसी का चौरा सूना-सूना।
ऐसे सूनेपन में हमें हुआ
ख़ुद साँसें लेते में दुख दूना।

चौका-बासन
छतें, छज्जे सब अँधियारे।

धीरे-धीरे आँचल ओट किए
भीतर से दीप लिए तुम आईं।
संग-संग एक मौन ज्योति-पुंज
संग-संग एक मलिन परछाईं।

सिहरा आँगन
सिहरे हम, सिहरे गलियारे।

दृश्य घाटी में

बीत गए दिन
फूल खिलने के।

होती हैं केवल वनस्पतियाँ
हरी-हरी-सी
हर गली
हर मोड़ पर बैठी
मौत अपनी बाँह फैलाकर।
बर्फ़-सा
जमता हुआ हर शख़्स
चुप्पियों में क़ैद हैं साँसें,
समय की नंगी सलीबों पर
गले में अटकी हुईं फाँसें,
लिख रहे हैं
लोग कविताएँ
नींद की ज्यों गोलियाँ खाकर।
बीत गए दिन
अब हवाओं में गन्धकेतु हिलने के
फूल खिलने के।

ढोती है काले पहाड़ दृष्टियाँ
सूर्य झर गए,
दृश्य घाटी में गहरे उतर गए,
बीत गए दिन
उठी बाँहों से बाँहों के मिलने के
फूल खिलने के।

यहाँ से भी चलें

चलें, अब तो यहाँ से भी चलें।

उठ गए
हिलते हुए रंगीन कपड़े
सूखते।
(अपाहिज हैं छत-मुँडेरे)
एक स्लेटी सशंकित आवाज़
आने लगी सहसा
दूर से।

चलें, अब तो पहाड़ी उस पार
बूढ़े सूर्य बनकर ढलें।

पेड़, मंदिर, पंछियों के रूप।
कौन जाने
कहाँ रखकर जा छिपी
वह सोनियातन
करामाती धूप।

चलें, अब तो बन्द कमरों में
सुलगती लकड़ियों-से जलें।

इस क्षण

इस क्षण यहाँ शान्त है जल।

पेड़ गड़े हैं,
घास जड़ी।
हवा सामने के खँडहर में
मरी पड़ी।

नहीं कहीं कोई हलचल।

याद तुम्हारी,
अपना बोध।
कहीं अतल में जा डूबे हैं
सारे शोध।

जमकर पत्थर है हर पल।

जस का तस

शाख़-शाख़ बुलबुल
लिखती है
पत्ता-पत्ता गुल
लिखती है ।

बेटी माँ से
जो पढ़ती है
बच्चों में वो कुल लिखती है ।

सहर लिखे
उसकी पेशानी
शब उसके काकुल लिखती है ।

हर लम्हे वो
फ़लक वक़्त की
जस का तस बिल्कुल लिखती है ।

जब लिखती है
हवा इबारत
पानी पर ढुलमुल लिखती है ।

हाथों का उठना

हाथों का उठना
कँपना
गिर जाना
कितने दिन चलेगा ?

कितने दिन और सहेंगे
वे कब चीत्‍कार करेंगे
कब तक होंगे वे तैयार
कब तक हुँकार भरेंगे ?

क़दमों का उठते-
उठते रूक जाना
कितने दिन और चलेगा ?

दरवाज़ों को खुलना है
गिरना है दीवारों को
लेकिन
कितने दिन तक और
चलना है अतिचारों को ?

आँखों का उठना
झुकना
मुँद जाना
कितने दिन और चलेगा ?

सरोवर है श्वसन में 

सरोवर है
शवासन में !

हवा व्‍याकुल
गंध कन्‍धों पर धरे
वृक्ष तट के
बौखलाहट से भरे ।
मूढ़ता-सी छा रही है
मृगों के मन में !

मछलियाँ बेचैन
मछुआरे दुखी
घाट-मंदिर-देवता
सारे दुखी ।
दुखी हैं पशु गाँव में
तो पखेरू वन में ।

सरोवर है
शवासन में !

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