कँवल डबावी की रचनाएँ

ग़म का इज़हार भी करने नहीं देती दुनिया 

ग़म का इज़हार भी करने नहीं देती दुनिया
और मरता हूँ तो मरने नहीं देती दुनिया

सब ही मय-ख़ाना-ए-हस्ती से पिया करत हैं
मुझ को इक जाम भी भरने नहीं देती दुनिया

आस्ताँ पर तेरे हम सर को झुका तो लेते हैं
सर से ये बोझ उतरने नहीं देती दुनिया

हम कभी दैर के तालिब हैं कभी काबा के
एक मरक़ज पे ठहरने नहीं देती दुनिया

बिजलियों से जो बचाता हूँ नशेमन अपना
मुझ को ये भी तो करने नहीं देती दुनिया

मुंदिमिल होने पे आएँ तो छिडक़ती है नमक
ज़ख़्म दिल के मेरे भरने नहीं देती दुनिया

मेरी कोशिश है मोहब्बत से किनारा कर लूँ
लेकिन ऐसा भी तो करने नहीं देती दुनिया

देने वालों को है दुनिया से बग़ावत लाज़िम
देने वालों को उभरने नहीं देती दुनिया

जिस ने बुनियाद गुलिस्ताँ की कभी डाली थी
उस को गुलशन से गुज़रने नहीं देती दुनिया

घुट के मर जाऊँ ये ख़्वाहिश है ज़माने की ‘कँवल’
आह भरता हूँ तो भरने नहीं देती दुनिया

कुछ बुझी बुझी सी है अंजुमन न जाने क्यूँ 

कुछ बुझी बुझी सी है अंजुमन न जाने क्यूँ
ज़िंदगी में पिन्हाँ है इक चुभन न जाने क्यूँ

और भी भुत से हैं लूटने को दुनिया में
बन गए हैं रह-बर की राह बन-जान न जाने क्यूँ

उन की फ़िक्र-ए-आला पर लोग सर को धुनते थे
आज वो परेशाँ हैं अहल-ए-फ़न न जाने क्यूँ

जिस चमन में सदियों से था बहार का क़ब्ज़ा
उस में है ख़िज़ाओं का अब चलन न जाने क्यूँ

जिन गुलों से काँटें ख़ुद दूर बच के रहते थे
चाक चाक हैं उन के पैरहन न जाने क्यूँ

ग़ैर कुछ तो करते हैं पास और लिहाज़ अपना
और दोस्त होते हैं ख़ंदा-ज़न न जाने क्यूँ

ग़ुंचे ग़ुंचे के तेवर गुलिस्ताँ में बदले हैं
हम चमन में रह कर हैं बे-चमन न जाने क्यूँ

जिन को अपना समझे थे करते हैं ‘कँवल’ हम से
दोस्ती के परदे में मकर ओ फ़रेब न जाने क्यूँ

माह ओ अंजुम की रौशनी गुम है 

माह ओ अंजुम की रौशनी गुम है
क्या हर इक बज़्म से ख़ुशी गुम है

चाँद धुँदला है चाँदनी गुम है
हुस्न वालों में दिल-कशी गुम है

ज़िंदगी गुन न दोस्ती गुम है
ये हक़ीक़त है आदमी गुम है

इस तरक़्क़ी को और क्या कहिए
शहर से सिद्क़ की गली गुम है

फूल लाखों है सहन-ए-गुलशन में
उन की होंटो की गो हँसी गुम है

मेहनत-ए-बाग़-बाँ का ज़िक्र नहीं
ग़ुल है फूलों से दिल-कशी गुम है

है तरक़्क़ी नए अदब की ये
शेर से हुस्न-ए-शाएरी गुम है

ग़म बताओ ‘कँवल’ कहाँ ढूँडूँ
बज़्म-ए-आलम से दोस्ती गुम है

न घूम दश्त में तू सहन-ए-गुलिस्ताँ से गुज़र 

न घूम दश्त में तू सहन-ए-गुलिस्ताँ से गुज़र
जो चाहता है बुलंदी तो कहकशाँ से गुज़र

ज़मीं को छोड़ के नादाँ न आसमाँ से गुज़र
ज़रूरत इस की है तो उन के आस्ताने से गुज़र

इसी से तेरी इबादत पे रंग आएगा
जबीं झुकाना हुआ उन के आस्ताँ से गुज़र

है असलियत है ख़िजाँ ही बहार की तम्हीद
बहार चाहे तो अँदेशा-ए-ख़िजाँ से गुज़र

वफ़ा की राह में दार ओ सलीब आते हैं
ज़रूरत इस की है हर एक इम्तिहाँ से गुज़र

‘कँवल’ ख़ुशी की हुआ करती है यूँ ही तक्मील
ग़म-ए-हयात के हर बहर-ए-बे-कराँ से गुज़र

नज़र का मिल के टकराना न तुम भूले न हम भूले 

नज़र का मिल के टकराना न तुम भूले न हम भूले
मोहब्बत का वो अफ़्साना न तुम भूले न हम भूले

सताया था हमें कितना ज़माने के तग़य्युर ने
ज़माने का बदल जाना न तुम भूले न हम भूले

भरी बरसात में पैहम जुदाई के तसव्वुर से
वो मिल कर अश्क बरसाना न तुम भूले न हम भूले

बहारें गुलिस्ताँ की रास जब हम को न आई थीं
ख़िजाँ से दिल का बहलाना न तुम भूले न हम भूले

गुज़ारी कितनी रातें गिन के तारे दर्द-ए-फ़ुर्क़त में
जुदाई का वो अफ़्साना न तुम भूले न हम भूले

फ़रेब-ए-आरज़ू खाना ही फ़ितरत है मोहब्बत की
फ़रेब-ए-आरजू खाना न तुम भूले न हम भूले

हँसी में कटती थीं रातें खुशी में दिन गुज़रता था
‘कँवल’ माज़ी का अफ़्साना न तुम भूले न हम भूले

तअज्जुब ये नहीं है ग़म के मारों को न चैन आया 

तअज्जुब ये नहीं है ग़म के मारों को न चैन आया
तड़पना देख कर मेरा सितारों को न चैन आया

बढ़ी बे-ताबी-ए-दिल जब तो बहने ही लगे आँसू
मेरे हम-राह इन पिन्हाँ सितारों को न चैन आया

रहे गर्दिश में सारी रात मेरी बे-क़रारी पर
बढ़े हम-दर्द निकले चाँद ताारों को न चैन आया

हमारे आशियाँ तक बात रह जाती तो अच्छा था
जला जब तक न सब गुलशन शरारों को न चैन आया

कोई बे-ख़ुद हवा बे-ताब हो कर रह गया कोई
नक़ाब-ए-हुस्न उठने पर हज़ारों को न चैन आया

ज़माने के तग़य्युर ने किया बर्बाद गुलशन को
ख़िज़ाओं को न चैन आया बहारों को न चैन आया

थपेड़े उन को भी खाने पड़े अमवाज तूफ़ाँ के
मेरी कश्ती के बाइस ही किनारों को न चैन आया

ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-उक़्बा ग़म-ए-दुनिया
‘कँवल’ इस ज़िंदगी में ग़म के मारों को न चैन आया

ये मानता हूँ की ख़ारों को कौन पूछेगा 

ये मानता हूँ की ख़ारों को कौन पूछेगा
जला चमन तो बहारों को कौन पूछेगा

हमारी शाम-ए-अलम तक ही क़द्र है उन की
सहर हुई तो सितारों को कौन पूछेगा

तबाहियों का मेरे हाल मुंकशिफ़ न करो
खुला ये राज़ तो यारों को कौन पूछेगा

डुबो तो सकता हूँ कश्ती को ला के साहिल पर
जो ये हुआ तो किनारों को कौन पूछेगा

जो पी के थोड़ी सी हो जाएँ होश से बाहर
तो ऐसे बादा-गुसारों को कौन पूछेगा

तुम्हीं जो अपनी नज़र से उन्हें गिरा दोगे
तुम्हारे दीद के मारों को कौन पूछेगा

लगाए फिरता हूँ उन को भी मैं गले से ‘कँवल’
गुलों को चाहा तो ख़ारों को कौन पूछेगा

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