कंवल भारती की रचनाएँ

पिंजड़े का द्वार खोल देना

शायद ऐसा हो कि तुम्हारे हृदय में
धधकी हो कोई ज्वाला
भस्म करने की वर्जनाएँ
कि तभी कोई बदली मर्यादा की
बरस गयी होगी
और तुम्हारा अन्तर्मन शीतल हो गया होगा

शायद ऐसा हो
की तुम्हरी अनुभूति अचानक हो गयी हो मार्मिक
पढ़ या सुनकर कोई दलित हत्याकांड
पीड़ित मनुष्यता का पक्ष
तुम्हारी चेतना का बन गया हो केन्द्र-बिन्दु
कि तभी कोई टुकड़ा सुख
जगा गया होगा परम्परा-बोध
और तुम्हारी शिराओं में रक्त थम गया होगा
शायद ऐसा हो कि मन्दिर की दीवारों के बीच
तुम्हारी आस्थाएँ विचलित हो गयी हों
पैदा हुआ हो स्थापना का अस्वीकार
कि तभी अनास्था का कोई अज्ञात भय
समा गया होगा तुम्हारे अन्तस में
और जन्मते ही मर गये होंगे विद्रोह के स्वर
शायद ऐसा हो कि तुम्हारी अन्तरात्मा ने
पिंजड़े में फड़फड़ाते पक्षी की वेदना को समझा हो
खोलना चाहा हो उसकी मुक्ति का द्वार
कि तभी किसी वृद्ध सदस्य ने कहा होगा—
यह पिंजड़ा ख़ानदानी है
बरसों-बरस से हमारे सम्मान का प्रतीक है
और तुम्हारी अन्तरात्मा सलीब पर टंग गयी होगी
प्रतिष्ठा के प्रश्न पर।

इस शायद और तभी के बीच कोई भावना
बुलबुले की नियति जीती है
प्रतिरोधों से अविचलित
कोई व्यक्ति-चेतना
यदि जन्म ले तुम्हारे भीतर
तो तुम सिर्फ़ इतना करना
पिंजड़े का द्वार खोल देना।

शम्बूक

शम्बूक
हम जानते हैं तुम इतिहास पुरुष नहीं हो
वरना कोई लिख देता
तुम्हें भी पूर्वजन्म का ब्राह्मण
स्वर्ग की कामना से
राम के हाथों मृत्यु का याचक

लेकिन शम्बूक
तुम इतिहास का सच हो
राजतन्त्रों में जन्मती
असंख्य दलित चेतनाओं का प्रतीक
व्यवस्था और मानव के संघर्ष का विम्ब

शम्बूक
तुम हिन्दुत्व के ज्ञात इतिहास के
किसी भी काल का सच हो सकते हो
शम्बूक जो तुम्हारा नाम नहीं है
क्योंकि तुम घोघा नहीं थे,
घृणा का शब्द है जो दलित चेतना को
व्यवस्था के रक्षकों ने दिया था

शम्बूक (हम जानते हैं)
तुम उलटे होकर तपस्या नहीं कर रहे थे
जैसाकि वाल्मीकि ने लिखा है
तुम्हारी तपस्या एक आन्दोलन थी
जो व्यवस्था को उलट रही थी

शम्बूक (हम जानते हैं)
तुम्हें सदेह स्वर्ग जाने की कामना नहीं थी,
जैसाकि वाल्मीकि ने लिखा है
तुम अभिव्यक्ति दे रहे थे
राज्याश्रित अध्यात्म में उपेक्षित देह के यथार्थ को

शम्बूक (हम जानते हैं)
तुम्हारी तपस्या से
ब्राह्मण का बालक नहीं मरा था
जैसाकि वाल्मीकि ने लिखा
मरा था ब्राह्मणवाद
मरा था उसका भवितव्य।

शम्बूक
सिर्फ़ इसलिए राम ने तुम्हारी हत्या की थी।
तुम्हें मालूम नहीं
जिस मुहूर्त में तुम धराशायी हुए थे
उसी मुहूर्त में जी उठा था
ब्राह्मण-बालक
यानी ब्राह्मणवाद
यानी उसका भवितव्य

शम्बूक
तुम्हें मालूम नहीं
तुम्हारे वध पर
देवताओं ने पुष्प-वर्षा की थी
कहा था– बहुत ठीक, बहुत ठीक
क्योंकि तुम्हारी हत्या
दलित चेतना की हत्या थी,
स्वतन्त्रता, समानता, न्यायबोध की हत्या थी

किन्तु, शम्बूक
तुम आज भी सच हो
आज भी दे रहे हो शहादत
सामाजिक-परिवर्तन के यज्ञ में

बहिष्कार

आइए, इस नये वर्ष में
बहिष्कार करें
ब्राह्मणवाद, सामन्तवाद और
पूँजीवाद का,
इससे जन्मे जातिवाद और
फ़ासीवाद का।
बहिष्कार करें उस राजनीति का
जो निभा रही है पुष्यमित्र की भूमिका।
बहिष्कार करें उस चिन्तन का
जिसके मूल में हिन्दुत्व का पुनरोत्थान
शिवाजी और पेशवा शासन की
स्थापना का लक्ष्य है,
जिनमें अछूतों को कमर में बाँधकर झाड़ू
गले में लटकाकर हांड़ी
चलने की राज्याज्ञा थी।
बहिष्कार करें उस साहित्य का
जो जन्मा है पुराणों के मिथकों से
जो विरोधी है लोकतन्त्र का
समर्थक है रामलला के राज्य का
जो स्वर्ग था द्विजों का
जिसमें शूद्र-अछूतों के विकास
के रास्ते सख़्ती से बन्द थे
बहिष्कार करें उन आलोचकों का
जो समाजवाद के कैप्सूल में
भर रहे हैं ब्राह्मणवाद
जो नववाद की आड़ में
स्थापित कर रहे हैं सामन्ती मूल्य
जो सिद्ध कर रहे हैं
पथ-भ्रष्टक तुलसीदास को पथ-प्रदर्शक
रूढ़िवादी निराला को प्रगतिवाद का जनक
जिन्हें इस देश का पूँजीवाद
बाँट रहा है पुरस्कार
ताकि वे इसी तरह करते रहें / सत्य का संहार
बहिष्कार करें उस पत्रकारिता का
जो बहुत सूक्ष्म साज़िश के तहत
साम्प्रदायिकता और धर्म-सापेक्षता
की बनी हुई है संवाहिका
उगल रही है कुछ वर्गों के ख़िलाफ़ ज़हर
ढा रही है भारत की एकता पर क़हर
आइए, इसे नये वर्ष में स्वीकार करें
स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुता को
न केवल चिन्तन में / न केवल लेखन में
बल्कि व्यवहार में, आचरण में, संस्कार में
मनुष्य और देश के विकास के लिए
विघटन के समूल नाश के लिए।

मुक्ति-संग्राम अभी जारी है 

मैं उस अतीत को
अपने बहुत क़रीब पाता हूँ
जिसे जिया था तुमने
अपने दृढ-संकल्प और संघर्ष से।
परिवर्तित किया था समय-चक्र को
इस वर्तमान में।

मैं उस अन्धी निशा की
भयानक पीड़ा को / जब भी महसूस करता हूँ
तुम्हारे विचारों के आन्दोलन में
मुखर होता है एक रचनात्मक विप्लव
मेरे रोम-रोम में।

तुम बिलकुल नहीं मरे हो बाबा !
जीवित हो हमारी चेतना में,
हमारे संकल्प में, हमारे संघर्षों में।

समता, सम्मान और स्वाधीनता के लिए
मुक्ति-संग्राम जारी रहेगा / जब तक कि
हमारे मुरझाए पौधे के हिस्से का सूरज
उग नहीं जाता है।

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