कपिल भारद्वाज की रचनाएँ

आज वो भी आये 

आज वो भी आये ।

जिनकी बाट जोहते-जोहते, दरवाजा बूढ़ा हो गया था,
जिसकी एक मुस्कुराहट को पाने के लिए, भँवरों ने अपनी सांसे रोक ली थी,
जिसकी आंखों की रौशनी की खातिर, जुगनुओं ने चमकना छोड़ दिया था,
आज वो भी आये ।

जिसकी भीनी-भीनी खुशबू की कमी, गुलाबों ने महसूस की थी,
जिसके इंतज़ार में तितलियों ने, हवा में लहराना छोड़ दिया था,
जिसकी राह तकते-तकते, अहिल्या बन गया था एक शख्स,
आज वो भी आये ।

जिसके कारण बगीचे की दूब ने, अपनी हरियाली छोड़ दी थी,
जिसके कारण कोहरे के रंगों ने, अपना वजूद समेट लिया था,
जिसके कारण एक बैचेन दिल, नज़्मों में चैन ढूंढता फिरता था,
आज वो भी आये ।

यादों की चादर लपेटे

यादों की चादर लपेटे,
हर शाम उतर जाता हूं, धुंध के आगोश में,
दूर टिमटिमाता एक दीया,
मेरी आँखों मे उतार देता है अपनी सारी रौशनी,
और मैं अपनी हंसी मिला देता हूं उसकी हंसी में ।

एक संगीत उभरता है फ़िज़ाओं में,
जो सबकी नजर में नहीं आता सबके कानों को नहीं भाता ।

एक दिन मेरा संगीत और उसकी रौशनी,
हवा में मिलकर विलीन हो जाएंगे,
तब हम बहुत याद आएंगे !

(अजीज दोस्त राकेश घणघस के नाम एक छोटी सी नज्म)

अरी बावळी दिखता, तुझमे अनुराग नहीं 

अरी बावळी दिखता, तुझमे अनुराग नहीं !

घूंघट में शरमाई आंखे, मन का कोना-कोना चहका,
झिलमिल-झिलमिल बरसे सावन, मौसम का हर कतरा महका,
क्या री भोली यौवन की, तुझमें आग नहीं,
अरी बावली दिखता, तुझमे अनुराग नहीं ।

हम तो ठहरे राही अकिंचन, नूतन पथ पर चलने वाले,
थोड़े सुख के लिए उम्र भर, टुकड़ा-टुकड़ा पलने वाले,
जीवन से भटके सपनों में भी, राग नहीं,
अरी बावली दिखता, तुझमें अनुराग नही ।

तेरी तपती काया छूकर, पानी-पानी हुआ दीवाना,
सारी रात है झूमा तन मन, जैसे कबीर बना मस्ताना,
अरी गोरिया तेरे संगीत में, साज़ नहीं,
अरी बावली दिखता, तुझमे अनुराग नहीं ।

मैंने एक रोती लड़की को कहा था 

मैंने एक रोती लड़की को कहा था,
कि बहुत सुंदर लगती हो रोती हुई तुम,
तुम्हारे गालों पे ठहरे आंसू,
मुझे ऐसे दिखते हैं,
जैसे किसी कृषक को,
गेंहू की बाली में मोटे मोटे दाने,
वो मुस्कुरा उठी,
सामने रखी कबीर की किताब के पन्ने फड़फड़ाये,
मीरा के शब्द नाचने लगे और,
बुद्ध ने आँखे मीच ली ।

प्रेम कल्पित नहीं होता और न ही दूर की कौड़ी,
अहसासों की नदी के किनारे उगी,
अनवांछित और बेतरतीब घास,
मीरा के शब्दों को धुंधला करने के लिए काफी होती हैं,
कबीर की थिरकती देह को पसीने से लथपथ करने के लिए,
और बुद्ध के ध्यान से निकलते संगीत को बेसुरा करने के लिए भी ।

तुम्हें याद है नवम्बर की, वो गुनगुनी दोपहर

तुम्हें याद है नवम्बर की, वो गुनगुनी दोपहर,
रोज गार्डन में बैठ,
जार-जार रोई थी तुम,
मेरी बेरुखी से परेशान होकर,
पिछले दो दिन से ब्लॉक किया हुआ था मैंने तुम्हें !

रोना कितना मधुर होता है,
उस दिन जाना था मैंने,
अपने गुलाबी रुमाल से तेरे आंसू पोंछते हुऐ,
एक मीठी गुदगुदी हो रही थी,
दिल कर रहा था ऐसे ही अनन्त काल तक, तेरा रोना देखता रहूं !

पर तुम भी तो बहुत चालाक थी,
समझ गयी मेरे दिल का भेद,
और गालों पर आंसू सूखने से पहले ही, ठठाकर हंसने लगी थी,
दुनियाभर की बातों का पिटारा खोल दिया था तुमने,
मेरे कंधे पर सिर टिकाकर, या गाल पर हल्की चपत लगाते हुऐ!

मगर कोई इंटरेस्ट नहीं था मेरा,
उन बेस्वाद राम कहानियों में,

मेरी तो बस एक ही इच्छा थी,
कि तू छिक कर रोये और मैं,
अपने गुलाबी रुमाल में समा लूं तुम्हारें आंसुओ को !

मुझे सपनों में अब भी दिखती है 

मुझे सपनों में अब भी दिखती है,
मेरी पुरानी प्रेमिका के दांतो की लड़ियाँ,
जो कभी उसके हंसने पर दिखी थी,
दो-चार बार !

चिड़िया के दूध जैसी है ये स्मृति,
जो झटके से आती है और समय रोककर चली जाती है !

एक अंधेरे सागर की तलहटी पर बैठी उसकी हंसी,
स्त्री विमर्श का एक बेहतर उदाहरण हो जाता,
यदि उसने अपने भीतर बैठी,
कोयल की कूक को पहचान लिया होता,
और आकाश की तरफ उड़ ली होती !

मगर अफसोस,
एक कवि के साथ बीहड़ जंगली फूल चुनने की अपेक्षा,
गमले में उगे गन्धहीन गुलाब,
को …… परेफर किया !

रंगमंच पर दो पात्र थिरकते हैं,
देह लचकती है केले के पत्तो ज्यों,
अभिनय में दक्ष समय,
सलीब पर टँगा नज़र आता है,
और पर्दा गिर जाता है, आंख खुल जाती हैं ।

  • पंजाबी कथाकार गुरुदयाल सिंह का कथात्मक प्रतीक

मैं एक अधूरा सन्त्रास हूं 

मैं एक अधूरा सन्त्रास हूं,
जैसे एक आधी बुझी बीड़ी,
रखी हो मेज के किनारे
मैंने हज़ारों कुंठित उत्सव मनाऐ हैं,
जिन्होंने चाट लिया है, घुन की तरह,
मेरे भीतर बैठे देवता को !

हर अमावस्या की रात,
किसी मंदिर के पिछवाड़े बैठकर,
घटिया दारू चटखारे लेकर पी है मैंने!

मैं जला दिए गए उपन्यास का वो नायक हूं,
जो पत्थरो में अपनी प्रेमिका के चुम्बन तलाशता है!

सच कहूं,
फफोले फोड़ने में जो मजा है,
किसी स्त्री नाभि की चिकोटियाँ काटने में भी नहीं !

कविता लिखने से पहले ही 

कविता लिखने से पहले ही,
कवि का दर्जा पाने वाला, शायद पहला हूँ मैं ।

मैंने जब प्रेम किया, तो लोगों ने कहा,
इतनी शिद्दत से प्यार सिर्फ, एक कवि ही कर सकता है ।

सीटियां बजाते हुए जब मैं बारिश में, उड़ेल देता अपनी देह को,
कोने में खड़े जेंटलमैन, फुसफुसाते कि,
इसकी आवारा सीटी में है, कविता का संगीत ।

हर वक्त स्वप्न देखना, मेरी कला बन गई,
उनको करीने से सजता तो, लोग कहते कि,
अपनी कविताओं की, प्रूफ रीडिंग कर रहा है ।

जब मैं बोलता तो लगता कि, श्रवण कुमार भर रहा है घड़े में पानी,
कई दशरथो के निशाने होते मुझपर,
छाती पर बाणों को मुस्कुराकर सहता,
तो लोग कहते ऐसा साहस, एक कवि में ही हो सकता है ।

असल मे मैं कवि नहीं हूं,
मैं तो बस लोगों को सच करने में लगा हूँ ।

पैन की स्याही से निकली

पैन की स्याही से निकली,
चटक आवाज से ही,
झक सफेद पड़ने लगते हैं जिनके चेहरे,
और अंधेरे के सन्नाटे को चीरती,
पेन चलने की चर्र-चर्र की आवाज से निकलती रोशनी,
जिनकी आंखों में पनीली किरचों की तरह,
लगती है गड़ने,
तो हैरान परेशान वो लोग,
तान देते हैं पिस्तौल कलम के माथे पर ।

पर कलम चूंकि शाश्वत है, सत्य है,
हमेशा से पड़ा है जहर और गोलियों से वास्ता ।

बर्फ सी ठंडी हथेलियों के बीच,
करीने से सजाकर रखी गयी हजारों पिस्तौल,
न तो चटकती स्याही को ही खत्म कर सकती हैं,
और न ही चर्र-चर्र की आवाज से निकलती रोशनी को ।

रात के दो अढ़ाई बजे

रात के दो-अढ़ाई बजे,
महताब के शबाब के समय,
अचानक याद आ जाती है मुझे,
एक शराब और एक किताब,
दोनों ही का खुमार, बरसों से है तारी ।

किताब पढ़ना जैसे शराब पीना घूंट-घूंट,
हर हर्फ़ से आती है गुड़ और गेहूं की गंध,
सामने फैली चांदनी से ही,
घायल तितलियों का जोड़ा अक्सर डूब जाता है,
उसी शराब की खुश्बू में,
जिसे पढ़ने की कोशिश में,
इच्छाओं के मासूम जुगनू विलीन हो गए,
घनघोर अँधेरे में ।

ओ लेखनी मेरे साथ चल, गांव-गांव डगर-डगर

ओ लेखनी मेरे साथ चल, गांव-गांव डगर-डगर ।

उन भोले सजल नयनों की, गाथा लिखदे.
दुर्भाग्य से टूटे सपनों की, व्यथा लिखदे.
ढाह दे कल्पनाओं का महल, छोड़दे कातर स्वर ।

झोपड़ी में बैठी, कंटीली शाख लिखदे,
चूल्हे में बिखरी, पुरानी राख लिखदे,
चीखते सन्नाटों से सम्भल, वरना ठहर जाऐगा सफर ।

फूलों की नाज़ुकी, या भूख का रंग लिखदे,
रातों की तड़पन, या टूटते अंग लिखदे,
कविता लिख या लिख गजल, जागूंगा रात भर ।

रोते किसान के, आंसुओं की पीर लिखदे,
मजदूर के माथे की, मिटी लकीर लिखदे,
छोड़दे पाखण्ड व छल, रहने दे अगर-मगर ।

कब से कोयल रो रही है, इतनी बेबस हूक

कब से कोयल रो रही है, इतनी बेबस हूक !

सम्बन्धों को रखा ताक पर, बना दिया बाजार,
भावनाओं में नागफनी से, रिश्ते हैं लाचार,
हर घर मे दो आंगन हुऐ, छत गयी है चूक,

चूल्हा पड़ा सिसक रहा है, खा रहा हिचकोले,
दाल भात को तरसे बच्चे, कैसे जयहिंद बोलें,
बड़ों-बड़ों के शीश झुकादे, शक्तिशाली भूख ।

धर्म की बगिया में बो दिऐ, बस कांटे ही कांटे,
मानवता का ह्रास हुआ, पड़े गाल पर चांटे,
कहीं मंदिर कहीं मस्जिद में, बिलो रहे हैं थूक ।

राजनीति की नैया भ्रमित, लहरों में है भटकी,
जनता अंधे कुएं में, ज्यों चमगादड़ सी लटकी,
कोई चिल्लाए गला फाड़ के, कोई बिल्कुल ही मूक ।

आज नीरवता चारों ओर फैली है 

आज नीरवता चारों ओर फैली है,
जनवरी की उस धुंध की तरह,
जो गहराती रात में,
और ज्यादा गहरी होती जाती है !

उलझी हुई भाषा की बिखरी किरचों को,
समटने का यह आखिरी प्रयास होगा,
सहज होना ही मुझे बैचेन करता है,
अपनी जद में ले लेता है पीलिया,
मेरी जीर्ण-शीर्ण देह को
यदि तीन रातें निकल जाएं बिना बैचेन हुए !

कभी-कभी लगता है कि बैचेनी,
वो बिछुड़ी हुई प्रेमिका है,
जो सारी रात पान के पत्तों को चबाती रहती थी,
और सुबह पीक छिड़क देती थी,
मेरे जरखेज होठों पर !

क्या मालूम यह बैचेनी है,
या पान की वो पीक,
जिसकी बिछुड़न न शरीर सह पाता है,
और न ही मन !

हजारों मुखोटों के पीछे से

हजारों मुखोटों के पीछे से,
खनखनाती हंसी हंसता है एक विकृत दिमाग,
जिसकी भयावहता ने लील लिया है,
जल-जंगल पर्वत-नदियों और खलिहानों के नूर को,
और टांक लिया है अपने लखटकिया सूटों में बटन की तरह !

सत्ता के अहंकार से दीपदीपाता उसका मुख,
बेशक नकली प्रसाधनों से उजला रहता है लेकिन,
उसके भीतर बैठे अंधेरे को स्पष्ट देखा जा सकता है,
उसके माथे की त्यौरियो में !

कोई समझाए उसे कि,
चमचमाते सूरज की रोशनी को लाठियों से नहीं पीटा जा सकता,

कोई बताए उसे कि
खील-बताशों सी मीठी हंसी को कप्तानों के बुंटो तले नहीं रौंदा जा सकता !

वो नदी, उस नदी में बहती जलधारा

वो नदी,
उस नदी में बहती जलधारा,
उस जलधारा में बहते जलकण,
पैदा करते हैं,
कितना मधुर संगीत ,
जब-जब टकराते हैं,
किसी सूखी चट्टान से !

छिपते सूरज की बेला में,
बहुत मन भाता है वो संगीत,
घूंट-घूंट पी रहा होता हूं,
उस कर्णप्रिय संगीत को,
उतार रहा होता हूं,
अपने ह्रदय में !

सच पूछो तो,
मुझे उसी संगीत का एहसास,
मेरी प्रेमिका की ‘ना’ में भी होता है,
जो, छिपते सूरज की हर बेला में,
मुझे सूखी चट्टान कर देती है !

क्या हुआ वो 70 साल की वृद्धा है 

क्या हुआ वो 70 साल की वृद्धा है,
या साल भर की बच्ची,
वह गर्भवती है या बीमार,
नोकरी-पेशा है या घरेलू,

शिष्टता से ढंके इस बलात्कारी समाज मे,
पशुत्व के विशेषण से सुशोभित समय में ।

कहकहों और रोदन के बीच,
सुबकती मानवता के परले सिरे पर,
एक प्रेमी प्रेमिका अपनी होने वाली बच्ची के नाम पर जिरहबाजी करें,
नहीं रेहाना नहीं मनीषा ठीक रहेगा,
ना-ना मैं तो रेहाना ही रखूंगा,
तो ऐसा लगता है,
मानो कोढ़ लगी इंसानियत के शरीर के कुलबुलाते अंग को,
लेप दिया गया है भीनी खुशबू की औषधियों से ।

हो हल्ला और धूल के, गुबार के बीच 

हो हल्ला और धूल के, गुबार के बीच,
क्रोध से दीपदीपाते, विकृत चेहरों के बीच,
घृणित हंसी और फूहड़ मजाकों के बीच,
तकलीफदेह नारों व तामसी अट्टाहास के बीच,
लेनिन की वो मूर्ति, जमींदोज हो रही थी ।

पर जमीन पर गिरने से पहले, उसकी मुस्कुराहट,
निविड़ अंधकार में, एक छोटे दीये सी चमकी,
जिसकी रौशनी की किरचें,
नकली नारों की बैशाखी लिए खड़े,
लोगों की आंखों में गड़ गयी ।

हिंदी मां है हमारी

हिंदी मां है हमारी,
और वृद्धाश्रमों का निर्माण इसलिए किया गया है,
कभी-कभी अंगूठे की जरूरत पड़ने पर याद करते हैं हम ।

उर्दू को मौसी माना हमने,
जिसे कैकेयी की संज्ञा से विभूषित कर दिया,
जिसने रामराज्य को विलम्बित करके,
धर्माचार्यों को आशंकित कर दिया था ।

अंग्रेजी को वाइफ समझ रखा है,
जो अत्यधिक प्यार से बिगड़कर,
रणचंडी बन बैठी है,
हमारे सिरों पर लटकाती रहती है एक तलवार,
जिसके ख़ौफ़ में हमने,
अपनी ‘माँ’ के लिए एक दिन मुकर्रर कर दिया ।

असल मे सवाल भाषा का नहीं
अपनी जड़ों से कटने का है ।

आठ साल की बच्ची की योनि से रिसता खून 

आठ साल की बच्ची की योनि से रिसता खून,
न तो भय पैदा कर रहा था,
किसी देवता के कुपित होने का,
न उन्हें लज्जा आई खुद के मानव होने पर,
न पश्चाताप के आंसू थे उनकी आँखों में,
उनकी लपलपाती जीभ,
जानवरो के सब प्रतीकों को पछाड़ चुकी थी,
होठों में घुटती गिग्घी को,
दबा दिया गया तालू में ही,
सभ्यता के इस नँगे आवरण को,
जिसमे से आती है बूचड़खाने की तीखी सड़ांध,
चीथ देना होगा समय रहते,
नश्तर से जख्म सहलाने की सजा,
आखिर कब तक भुगतेगी मानवता,
उड़ा देने होंगे उनके लिंग, जंग लगी दरातीं से,
ताकि ये खूबसूरत धरती,
गंदे वीर्य का बोझ ढोने से बच सके,
और दरातीं का जंगपना भी जाता रहे ।

सुबह सुबह कांधो पर बस्ता टांगे 

सुबह सुबह कांधो पर बस्ता टांगे,
स्कूल जाते बच्चे,
सुन्दर तो बहुत लगते हैं,
बहुत मनभाव दृश्य होता है,
किसी बच्चे को स्कुल जाते देखना,
अचानक से मन में होने लगती है गुदगुदी,
और आँखों की बढ़ जाती है रौशनी,
हालाँकि हम सिर्फ वही देखते हैं जो हमे अच्छा लगता है,
उसी स्कुल जाते बच्चे की बहुत सी बातों को देखकर भी,
न देखने का अभ्यास हो चला है हमें ।

हमें देखना चाहिए,
उसके कांधो पर विकृत इतिहास लदा है,
उसके बैग में है कैक्ट्स के कांटे, एक शाश्वत थकी हुई उदासी और बासी पड़े फूलों की गंध,
कभी-कभी उसका उछलना-फुदकना,
बचकानी चपलता का अहसास करवाता प्रतीत होता है हमें,
विषाद और अवसाद की मिलीजुली,
गन्ध को पहचानकर भी झटक दिया जाता है,
हमें मालूम है उसकी मनोस्थिति,
मगर हम अभ्यस्त हो चले हैं किसी लहलहाते उद्यान की,
उजडियत और वीरानगी देखने के ।

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