कबीर अजमल की रचनाएँ

कुछ तअल्लुक भी नहीं रस्म-ए-जहाँ से आगे

कुछ तअल्लुक भी नहीं रस्म-ए-जहाँ से आगे
उस से रिश्ता भी रहा वहम ओ गुमाँ से आगे

ले के पहुँची है कहाँ सीम-बदन की ख्वाहिश
कुछ इलाका न रहा सूद ओ जियाँ से आगे

ख्वाब-जारों में वो चेहरा है नुमू की सूरत
और इक फस्ल उगी रिश्ता-ए-जाँ से आगे

कब तलक अपनी ही साँसों का चुकाता रहूँ कर्ज
ऐ मेरी आँख कोई ख्वाब धुआँ से आगे

शाख-ए-एहसास पे खिलते रहे जख़्मो के गुलाब
किस ने महसूस किया शोरिश-ए-जाँ से आगे

जब भी बोल उट्ठेंगे तनहाई में लिक्खे हुए हर्फ
फैलतें जाएँगे नाकूस ओ अजाँ से आगे

जिस की किरनों का उजाला है लहू में ‘अजमल’
जल रहा है वो दिया कहकशाँ से आगे

अपनी अना से बर-सर-ए-पैकार मैं ही था

अपनी अना से बर-सर-ए-पैकार मैं ही था
सच बोलने की धुन थी सर-ए-दार मैं ही था

साज़िश रची गई थी कुछ ऐसी मेरे खिलाफ
हर अंजुमन में बाइस-ए-आजार मैं ही था

सौ करतबों से ज़ख़्म लगाए गए मुझे
शायद के अपने अहद का शहकार मैं ही था

लम्हों की बाज़-गश्त में सदियों की गूँज थी
और आगही का मुजरिम-ए-इजहार मैं ही था

तहजीब की रगों से टपकते लहू में तर
दहलीज़ में पड़ा हुआ अखबार मैं ही था

‘अजमल’ सफर में साथ रही यूँ सऊबतें
जैसे के हर सज़ा का सज़ा-वार मैं ही था

मैं जिस्म ओ जाँ के खेल में बे-बाक हो गया 

मैं जिस्म ओ जाँ के खेल में बे-बाक हो गया
किस ने ये छू दिया है के मैं चाक हो गया

किस ने कहा वजूद मेरा खाक हो गया
मेरा लहू तो आप की पोशाक हो गया

बे-सर के फिर रहे हैं जमाना-शनास लोग
ज़िंदा-नफस को अहद का इदराक हो गया

कब तक लहू की आग में जलते रहेंगे लोग
कब तक जियेगा वो ग़जब-नाक हो गया

ज़िंदा कोई कहाँ था के सदका उतारता
आखिर तमाम शहर ही खशाक हो गया

लहज़े की आँच रूप की शबनम भी पी गई
‘अजमल’ गुलों की छाओं में नक-नाक हो गया

वो मौज-ए-हवा जो अभी बहने की नहीं है

वो मौज-ए-हवा जो अभी बहने की नहीं है
हम जानते हैं आप से कहने की नहीं है

यूँ खुश न हो ऐ शहर-ए-निगाराँ के दर ओ बाम
ये वादी-ए-सफ्फाक भी रहने की नहीं है

ऐ काश कोई कोह-ए-निदा ही से पुकारे
दीवार-ए-सुकूत आप ही ढहने की नहीं है

क्यूँ अक्स-ए-गुरेजाँ से चमक बुझ गई दिल की
ये रात तो महताब के गहने की नहीं है

रक्कासा-ए-सहरा-ए-जुनूँ भी है यह मौज
यह चश्म-ए-खूँ-नाब से बहने की नहीं है

इक तरफ तमाशा है मुझे शोखी-ए-गुफ्तार
आशुफ्तगी-ए-‘मीर’ भी सहने की नहीं है

बजाए गुल मुझे तोहफा दिया बबूलों का

बजाए गुल मुझे तोहफा दिया बबूलों का
मैं मुंहरिफ तो नही था तेरे उसूलों का

इज़ाला कैसे करेगा वो अपनी भूलों का
के जिस के खून में नश्शा नहीं उसूलों का

नफस का कर्ज चुकाना भी कोई खेल नहीं
वो जान जाएगा अंजाम अपनी भूलों का

नई तलाश के ये मीर-ए-कारवाँ होंगे
बनाते जाओ यूँ ही सिलसिला बगूलों का

ये आड़ी तिरछी लकीरें बदल नहीं सकती
हज़ार वास्ता देते रहों उसूलां का

तमाम फलसफा-ए-कायनात खुल जाते
कहाँ से टूट गया सिलसिला नुजूलों का

इन्हीं से मुझ को मिला अज्म-ए-जिंदगी ‘अजमल’
मैं जानता हूँ के क्या है मकाम फूलों का

शरार-ए-इश्क सदियों का सफर करता हुआ

शरार-ए-इश्क सदियों का सफर करता हुआ
बुझा मुझ में मुझी को बे-खबर करता हुआ

रमूज़-ए-खाक बाब-ए-मुश्तहर करता हुआ
यूँ ही आबाद सहरा-ए-हुनर करता हुआ

ज़मीन-ए-जुस्तुजू गर्द-ए-सफर करता हुआ
ये मुझ में कौन है मुझ से मफर करता हुआ

अभी तक लहलहाता है वो सब्ज़ा आँख में
वो मौज-ए-गुल को मेयार-ए-नज़र करता हुआ

हरीम-ए-शब में खूँ रोता हुआ माह-ए-तमाम
निगार-ए-सुब्ह किस्सा मुख़्तसर करता हुआ

मेरी मिट्टी को ले पहुँचा दयार-ए-यार तक
गुबार-ए-जाँ तवाफ-ए-चश्म-ए-तर करता हुआ

तकब्बुर ले रहा है इम्तिहाँ फिर अज्म का
सितारों को मेरे जेर-ए-असर करता हुआ

फलक-बोसी की ख्वाहिश ताइर-ए-वहशत को थी
उड़ा है अपनी मिट्टी दर-गुजर करता हुआ

हवा की जद पे चराग-ए-शब-ए-फसाना था 

हवा की जद पे चराग-ए-शब-ए-फसाना था
मगर हमें भी उसी से दिया जलाना था

हमें भी याद न आई बहार-ए-इश्वा-तराज
उसे भी हिज्र का मौसम बहुत सुहाना था

सफर अज़ाब सही दश्त-ए-गुम-रही का मगर
कटी तनाब तो खेमा उजड़ ही जाना था

हमीं ने रक्त किया नगमा-ए-फना पर भी
हमें ही पलकों पे हिजरत का बार उठाना था

उसी की गूँज है तार-ए-नफस में अब के मियाँ
सदा-ए-हू को भी वरना किसे जगाना था

हम ऐेसे खाक-नशीनों का जिक्र क्या के हमें
लहू का कर्ज तो हर हाल में चुकाना था

वो मेरे ख्वाब चुरा कर भी खुश नहीं ‘अजमल’
वो एक ख्वाब लहू में जो फैल जाना था

हुजूम-ए-सय्यार्गां में रौशन दिया उसी का

हुजूम-ए-सय्यार्गां में रौशन दिया उसी का
फसील-ए-शब पर भी गुल खिलाए हुआ उसी का

उसी की शह पर तरफ तरफ रक्स-ए-मौज-ए-गिर्या
तमाम गिर्दाव-ए-खूँ पे पहरा भी था उसी का

उसी का लम्स-ए-गुदाज रौशन करे शब-ए-गम
हवा-ए-मस्त-ए-विसाल का सिलसिला उसी का

उसी के गम में धुआँ धुआँ चश्म-ए-रंग-ओ-नगमा
सो अक्स-जार-ए-खयाल भी मोजज़ा उसी का

उसी से ‘अजमल’ तमाम फस्ल-ए-गुबार-ए-सहरा
उदास आँखों में फिर भी रौशन दिया उसी का

सियाही ढल के पलकों पर भी आए

सियाही ढल के पलकों पर भी आए
कोई लम्हा धनक बन कर भी आए

गुलाबी सीढ़ियाँ से चाँद उतरे
खिराम-ए-नाज़ का मंजर भी आए

लहू रिश्तों का अब जमने लगा है
कोई सैलाब मेरे घर भी आए

मैं अपनी फिक्र का कोह-ए-निदा हूँ
कोई हातिम मेरे अंदर भी आए

मैं अपने आप का कातिल हूँ ‘अजमल’
मेरा आसेब अब बाहर भी आए

इक तसव्वुर-ए-बे-कराँ था और मैं 

इक तसव्वुर-ए-बे-कराँ था और मैं
दर्द का सैल-ए-रवाँ था और मैं

गम का इक आतिश-फशाँ था और मैं
दूर तक गहरा धुआँ था और मैं

किस से मैं उन का ठिकाना पूछता
सामने खाली मकाँ था और मैं

मेरे चेहरे से नुमायाँ कौन था
आईनों का इक जहाँ था और मैं

इक शिकस्ता नाव थी उम्मीद की
एक बहर-ए-बे-कराँ था और मैं

जुस्तुजू थी मंजिल-ए-मौहूम की
ये जमीं थी आसमाँ था और मैं

कौन था जो ध्यान से सुनता मुझे
किस्सा-ए-अशुफ्तगाँ था औ मैं

हाथ में ‘अजमल’ कोई तीशा न था
अज़्म था कोह-ए-गिराँ और मैं

उफुक के आखिरी मंज़र में जगमगाऊँ मैं

उफुक के आखिरी मंज़र में जगमगाऊँ मैं
हिसार-ए-जात से निकलूँ तो खुद को पाऊँ मैं

ज़मीर ओ जे़हन में इक सर्द जंग जारी है
किसे शिकस्त दूँ और किस पे फतह पाऊँ मैं

तसव्वुरात के आँगन में चाँद उतरा है
रविश रविश तेरी चाहत से जगमगाऊँ मैं

ज़मीन की फिक्र में सदियाँ गुजर गई ‘अजमल’
कहाँ से कोई ख़बर आसमाँ की लाऊँ मैं

वो ख़्वाब तलब-गार-ए-तमाशा भी नहीं है 

वो ख़्वाब तलब-गार-ए-तमाशा भी नहीं है
कहते हैं किसी ने उसे देखा भी नहीं है

पहली सी वो खुशबू-ए-तमन्ना भी नहीं है
इस बार कोई खौफ हवा का भी नहीं है

उस चाँद की अँगड़ाई से रौशन हैं दर ओ बाम
जो पर्दा-ए-शब-रंग पे उभरा भी नहीं है

कहते हैं के उठने को है अब रस्म-ए-मोहब्बत
और इस के सिवा कोई तमाशा भी नहीं है

इस शहर की पहचान थीं वो फूल सी आँखें
अब यूँ है के उन आंखों का चर्चा भी नहीं है

क्यूँ बाम पे आवाज़ों का धम्मला है ‘अजमल’
इस घर पे तो आसेब का साया भी नही है

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