कर्मानंद आर्य की रचनाएँ

श्मशान बाजार 

कोई न कोई खरीद रहा होगा
कोई न कोई बेच रहा होगा
किसी हरवाहे की मूंठ

कहीं न कहीं जल रही होगी
सखुए की हरी पत्तियां
कोई न कोई पका रहा होगा
चिता पर चावल

यह देश है जिसमें रहते हैं
बहुत सारे लोग
सिर्फ छब्बीस रूपये के मुवावजे में मरते हुए

बहुत सारे लोग जो निकल पड़ते हैं
मौत की तलाश में
बिना बीमा सत्ताईसवीं मंजिल पर
जिनके पावों में शनीचर
दिनरात भागता है

यह एक बाजार है
जहाँ हर गरीब की कीमत तय है
कोई एक है जो मंत्र पढ़ रहा है
कोई एक जो जला रहा है काया

एक कोई और जो देख रहा है
भूख और आग को जलते हुए

यह बाजार है यहाँ कम से कम
मरने की बाते नहीं हो सकती
बस हरवाहे की मूठ
काठ की जगह लोहे की हो जाए

तेलू ठकुराइन की अचकन

मगर वह बिलकुल नंगी थी
पीठ पर चमक रही थी सफ़ेद बर्फ
दुःख की छातियाँ नतग्रीव थीं
कोई समझ नहीं पा रहा था
उसे नंगा करने वाले कौन लोग थे
किन-किन लोगों ने उसे ठगा था
किस-किस की जीभ का लार घुटनों तक आया था
किस-किस ने देखा था उसका लिजलिजापन
उसे याद नहीं रहा

वह विस्थापन से दुखी नहीं थी
उसी देश से आयीं थीं बहुत सारी लड़कियां
दुःख आया था उसके आने के बाद
उसके बड़े होने पर
जब वह शारीरिक रूप से दिखाई देने लगी थी
जब उसे नोटिस किया गया था

वह लड़ाका थी
कई बार जीत-जीत हार गई थी वह
ऐसा नहीं कि हारने के बाद उसे मिलता था निरा सुख
या निरा दुःख उसे जिन्दा रखता था

बिल्कुल स्त्री सुलभ नहीं थीं उसकी लीलाएं
उसका भी मन था देखे अफलातून की फ़िल्में
ईराक और रूस के संबंधों पर बहस करे
ठकुरसुहाती तो उसे बिलकुल नहीं पसंद था

वह जानती थी उसका भोगा उसका भाग्य नहीं
जो नहीं भोग था उसे पछतावा नहीं

उसे पता था उसकी माँ नृत्य करती थी
नाचते-नाचते मर गई थी उसकी नानी
उसे नाचना पसंद नहीं था
लेकिन अचानक उसे घुंघरू पहनते देखा गया था

वह आम लड़कियों से अलग होना चाहती थी
उसकी जुबान पर थीं बहस-तलब चीजें
दलित-स्त्री-आदिवासी जैसे पद
उसे आकर्षित करते थे

लेकिन सुना है उसे मार दिया गया
दबा दी गई उसकी बोलती आवाज
किसी ने बताया वह कामरेड स्त्री थी
अंतिम बार उसे देखा गया था
तेलू ठकुराईन की अचकन पहने

शीतल साठे के लिए

ये जो आँखे हैं तुम्हारी
तकलीफ की उतरन, दुःख का दरिआव
उन अनंत आँखों में एक अनंत आँख झांक रही है

अनंत दुःख, अनंत काल
जाति की तरह विरासत में मिला है अन्याय

मैं हिंदी भाषी, तुम्हारी मराठी में समझ रहा हूँ
नहीं, नहीं समझने की भाषा एक ही है
अनंत दुःख, अनंत काल

जंगल डर गया है
लगता है तुम्हारी आवाज में छुपी है बंदूख की आवाज
अबकी बार आवाज उन्हें भी सुनाई दी है
जो कमजोर हैं, जो बहरे अंधे गूंगे हैं

तुम्हारी आवाज दब नहीं सकती
क्योंकि तुम चिल्ला नहीं रही हो, गा रही हो गीत
मुर्दा लोगों के भीतर, गाने की आवाज जिन्दा रहती है

इतिहास गवाह है जब ऐसी आवाजों का दम घुटा है
देश मर गया है या हुई है क्रांति
तुम्हारी आवाज क्रांति की पहली किताब बन गई है

तुम्हारी आवाज बन गई है भीड़
पत्थर बन गई है तुम्हारी आवाज
हर हृदयहीन वक्ष में तुम्हारी आवाज रक्खा हुआ लोहा है

तुम डफली लिए चौराहे पर खड़ी हो
हर बोर्ड पर लिखा है तुम्हारा नाम
हर बूढी माँ, दो बिछड़ी सहेलियां
खेत से आते किसान, गुजरते ट्राम
मकान, दुकान, आसमान

एक अनंत गुलाम लोग
तुम्हें जेल की दीवारों से मुक्त कर रहे हैं

अस्तित्व 

इतनी आग है
जला सकते हैं तुम्हारा बदन
इतनी ऊष्मा है
पिघला सकते हैं ठंडा लोहा
इतनी कुंठा है
फूंक सकते हैं तुम्हारा राजमहल
इतना जहर है
विष के कटोरे में तब्दील कर सकते हैं
तुम्हारी काया
हमने तो केवल प्यार से काम चलाया है
जाने कितने हथियार हैं
हमारी जेब में अभी
हमारी मुट्ठियों में
ज्वाला है
जिसका प्रयोग हम
‘दिया’ जलाने के लिए कर रहे हैं
हमने हाथ को हथियार नहीं बनाया है
अभी तक
पर अब हम सोच रहे हैं…..
दीमकों! तुम माफ़ करने योग्य नहीं हो
फिर भी जाने क्यों
अस्तित्व है अभी तुम्हारा
हमारी भरी पूरी दुनिया में

आदर्श 

कम उम्र के वे लोग
जो तलवे चाटकर अमरपद पा गए
हमारे आदर्श नहीं हो सकते
मक्खियों की तरह
सत्ता का शहद बनाने वाले
कूकुरों की तरह एक टुकड़े पर लोट जाने वाले
सरकार की भाषा में मुस्कराने वाले
हमारे आदर्श नहीं हो सकते
हमें तो फौलाद पसंद है
जंग लगी तलवारें हमारा आदर्श नहीं हो सकती
जिन्दगी में जो रुई की तरह धुने गए
धुनाई से रेशे में भर ली आग
वे हमारे आदर्श हैं
वे हमारे आदर्श हैं जो देवदार की तरह खड़े रहे ऊँचाई पर
कभी घाटियों से नहीं डरे
आँधियों से टकराहट मोल ली
जिन्होंने चाटुकारों पर थूक दिया
अपनी राह स्वयं बनाई
वे ही हमारे नायक हैं
उनके सम्मान में सिर स्वयं ही झुक जाता है
दो मिनट नहीं
कई जन्मों तक खड़े रहने का मन करता है
उनके सम्मान में
चाटुकारों से जाकर कह दो
अनीति और अन्याय किसी की बपौती नहीं होती
फिर वह चाटुकारों की कैसे हो सकती है
वे जल्दी पहचाने जायेंगे
जो प्रतिभा नहीं ‘लार’ के बल पर जीते
और राज भोग रहे हैं राजधानी में

सब्र 

वे भूखे, सताये और मजलूम लोग
जो यातना गृहों के शिविरों से निकल कर आये हैं
हत्यारे उनका लोकतंत्र छीन सकते हैं
उनके होंठों की हंसी नहीं
वे हाथ काट सकते हैं
हौसला नहीं
वे जीभ कुतर सकते हैं
बोलने की ताकत नहीं
वे हांडियों में गोबर डाल सकते हैं
भूखा रहने का आत्मविश्वास नहीं छीन सकते
इसलिए मेरे दोस्त!
जाकर हिटलर से कह दो
यह बीजों के उगने का समय है
पहाड़ों की बरफ पिघल रही है
बछड़े फुर्री मार रहे हैं
आग
एक चूल्हे से दूसरे चूल्हे की ओर जा रही है
हिंसक उन्माद और तमाम अत्याचार
धुँआ बन चुका है
दुनिया में लोकतंत्र मर सकता है
राजतन्त्र की हत्या हो सकती है
पर वह फूल जिन्दा रहेगा
जो खिलकर सबको सुख देता है
वह घड़ी जिन्दा रहेगी
जो तमाम वक्तों की गवाह है
वे मजलूम और भूखे लोग
जो यातना गृहों से निकलकर आये हैं
हमेशा जिन्दा रहेगे
प्रेम करने वाले
सीरी-फरहाद, आसिफ़-जुलेखा, लैला-मजनू
आज तक जिन्दा हैं
क्या आप उनके हत्यारों का नाम बता सकते हैं
सताये और मजलूम लोगों से पूछिये
उनके होंठों पर सब्र लिखा है
लोकतंत्र की हत्या नहीं
हत्यारे उनका लोकतंत्र छीन सकते हैं
उनके होंठों की हंसी नहीं

मेरा गाँव मेरा देश नहीं है

मेरा गाँव
दुनिया का सबसे सुंदर गाँव
मेरे गाँव वाले जमींदार के खेत में
मेरे हिस्से का खेत है
मेरे गाँव के फूलों में
मेरे हिस्से का कीचड़ है
मुरझाई कलियों में है मासूम बचपन
दादी की आवाज में तोतली बोली है
गोबर में है पेट का अनाज
स्कूल में घुटनों तक कीचड़ है
उस ब्राह्मण की डांट है जो लगभग मास्टर है
उस अहीर का शातिर हमला है
जो नवधनाड्य हुआ है पिछले साल
माई की मीठी मुस्कान है
दाई की नार काटने वाली मशीन
भौजाई है जिल्ला टॉप
भाई का तीर और बरछा है
विरासत वाला घाव है
मेरे गाँव में क्या नहीं है
मेरे गाँव में मेरे नाना का घर नहीं है
पानी है जिसमें आत्मविश्वास झलकता है
तैरती हैं नावें, मोटरबोट कराती है यात्रा
मेरे गाँव में दुःख है, संवेदना है, विकास है
विकास के पापा नहीं हैं
अगरचंद मेरा दोस्त नहीं है
कई नरेंद्र मोदी हैं
मेरा गाँव एक अजीब खुजली है
वहां के लोग खुश हैं
वहां के लोग हाजिर जबाब हैं
मेरा गाँव बदल रहा है
मेरे गाँव को प्लेग हो गया है
मेरा गाँव सबसे सुन्दर गाँव है
मेरे गाँव में बड़ी मछली
छोटी मछली को लीलती जाती है
सब कुछ है
मेरा गाँव मेरा देश नहीं है

काठमांडू का दिल 

लड़कियां जो सस्ता सामान बेचकर
लोगों को लुभाती हैं
लड़कियां जो जहाजी बेड़े पर चढ़ने से पहले
लड़कपन का शिकार हो जाती हैं
उन्हीं को कहते हैं काठमांडू का दिल
पहाड़ तो एक बहाना है
उससे भी कई गुना शक्त है वहां की देह
उससे भी कहीं अधिक सुन्दर हैं
देहों के पठार
और अबकी बार जब भी जाना नेपाल
उसका बचपन जरुर देख आना
होटल में बर्तन धोते किसी बच्चे से ज्यादा चमकदार हैं उनकी आँखें
नेपाल में आँखे देखना
थाईलैंड नहीं
जो आवश्यकता से अधिक गहरी और बेचैन हैं
फिर दिल्ली के एक ऐसे इलाके में घूमने जाना
जिसे गौतम बुद्ध रोड कहते हैं
जो कई हजार लोगों को मुक्त करता है
उनके तनाव और बेचैनी से
वहां ढूँढना वह लड़की जो सस्ता सामान बेचकर
जहाज ले जाती है अपने गाँव

पीढ़ी दर पीढ़ी 

हम ख़त्म हो जायेंगे
हमारी लड़ाइयाँ ख़त्म होती जाएँगी
हम प्रकृति के खिलाफ लड़ेंगे
अन्याय का तंतु तोड़
ईश्वर से बार बार होगी हमारी जंग

हम जीतने के लिए लड़ेगे
बलवान है प्रकृति
ईश्वर ने अपने हाथ मजबूत कर लिए हैं
हम अनुभव के लिए लड़ेंगे
हम लड़ेंगे
लड़ना खुद को मजबूत करना है

जैसे बादल चीखता है
फैले हुए आकाश के भीतर
जैसे रात भन्नाती है
वैसे ही एक रोज हम समवेत भन्नायेंगे
सुनेगे धरती के सारे जीव

इस तरह ख़त्म होंगे हम
और अपनी पीढ़ियोंको बताएँगे
तुम भी इसी तरह ख़त्म होना
मेरे बहादुर बच्चे
निरंतर युद्ध लड़ते हुए

जो बुद्ध ने लड़ा
जो कबीर ने लड़ा
जो सेना नाइ लड़ता रहा जीवन भर
जो कोलंबस के पैरों में चुभ गया
जिसे इक्कीसवीं सदी के दशरथ मांझी
लड़ा जीवन समझ

तुम भी लड़ना
जीवन सदियों तक चलता है
हमारी लड़ाइयाँ कभी खत्म नहीं होती

वे कभी राजा नहीं होते

जो सत्य, अहिंसा, अस्तेय
अपरिग्रह की बात करते हैं
जो माया की बात करते हैं
जो ईश्वर विश्वासी होते हैं
जिन्हें आता नहीं छल छद्म
जो कर देते हैं अकारण क्षमा
वे कभी नायक नहीं होते
वही लोग पैदा करते हैं
दुनिया में नरक

नरक भक्तों की देन है!
जानता है भगवान

वो मेरी पीढ़ी के देवता मैं तुम्हारा अभिनन्दन करता हूँ 

वो चलती हवाओं के खिलाफ गीत छेड़ने वाले
बांसुरी के कंधे दुखने लगे हैं
तुम्हारी अँगुलियों के तेज दाब से

संसद के कंधे पर मुस्काने वाले दोस्त
बूढ़े बरगद की छांह में सुस्ताने वाले देश में
धूप का रंग चटक तेज हो गया है

बेटियों के स्कूल जाने तक
सरसों पीली हो गई है, समय की राह ताकते
तुम्हारी योजनाओं का शहर उजड़ने वाला नहीं
जहाँ जीवित हैं तुम्हारी पुरखों की इच्छाएं
मनरेगा कायम रखेगा तुम्हारी आस्था

चिंतन शिविर में बैठे हुए देवता भूलना मत
भूख से छटपटाते समुदाय के लिए
तुम्हें जिन्दा रखना है आरक्षण

उदास रात रोने के लिए नहीं
दबे गले के भीतर जिन्दा रह सकती हैं साँसें

तुम्हारे धर्म में मातमपुर्सी नहीं
बस सान्द्र करनी हैं आदिम दलित इच्छाएं
जागरण की रात से उगेगा पीला सूरज
सुख की चिड़िया चहकेगी अगवारे, बर्फ़ पड़ेगी
देहरी में भर जाएगा अन्न

वो मेरी पीढ़ी के देवता
चमकती सलीब के धोखे में मत आना
कुछ अपनापन कायम रखना उन दोस्तों के लिए
जो तुम्हें फोनबुक से याद आते हैं
फेसबुक पर बातें करते हैं

अँधियारा कितना भी घना हो
तुम्हारे मन के प्रकाश से सबल नहीं
जेब में एक दिया-सलाई रखना
अन्याय फूकने के लिए

छोटे-छोटे तिनकों से बनती है झोपड़ी
झोपड़ी थूनी से लेती है संबल
बड़ेर कायम रखती झोपड़ी का हौसला
तुम्हारा हौसला झुका हुआ आसमान है झोपड़ी का

कायम रखना अपना स्वत्व
बहने देना शिराओं का खून
वो मेरी पीढ़ी के अंतिम देवता
मैं तुम्हारा अभिनन्दन करता हूँ

मेरे हृदय में तुम्हारी प्रार्थना जीवित है

छोटे छोटे दुखों से हरी-भरी रातें
चहलकदमी करते दरवेश से तुम
आस्था का कुम्भ नहाकर लौटी मेरी देह
गुम हुई अर्थ की तलाश में गई मेरी आत्मा
और शायद वह कुछ जो बचा है मेरे भीतर
तुम्हें आवाज देते हैं

वह आवाजें जो बधिया नहीं सकतीं
वे विचार जिनके डूबने से गुडुप की आवाज होती है
वह सपने जिनके मरने से हम मरते नहीं हैं
पर हार जाते हैं बिना लड़े युद्ध
तुम्हारा दिया हुआ बहुत कुछ है इस काया भीतर
जो इन सूखी अस्थियों को आधार देता है

अनगिनत रातों तक जागता हुआ मैं उनीदा सोया रहा हूँ
अनागत सेज पर बैठी हुई मेरी देह
बतियाती रही है ताउम्र तुमसे
कुछ था जिसे कहने के लिए बादल आते रहे थे
और जब बरसे थे तो भीतर तक भीग गया था मैं

बरक्श कुछ चीजें हैं, तुम्हारी पवित्र किताब में दर्ज
मैंने छूने का साहस नहीं किया
तुम सा बनने की बहुत कोशिश की मैंने
पर असफलता ने मेहनत करने की सीख दी
और कहा मैं तुम्हारे इशारे पर चलूँ

धूप तुम्हारे अच्छे के लिए है
कहा था एक दिन तुमने, मैंने धूप को धूनी बना लिया
अभी तक तपा रहा हूँ खुद को
उस बरगद की तरह, जिसने खुद को तपाया है
और अपने नीचे से एक नदी गुजरने दी है
ओ मेरे दलित देवता मेरे सपने मरने मत देना
मेरी अंतिम साँसों तक बचाए रखना मेरा स्वत्व
तुमने आघातों से लोहा ठण्डा किया है
मैं चाहता हूँ
मेरे भीतर जीवित रहे तुम्हारी प्रार्थना

घुट-घुट मरती राह

जिस शहर का इतिहास रक्तरंजित रहा
उस शहर में अपना इतिहास छुपाये रहता हूँ मैं

मैं अगड़े किस्म का दलित हूँ
सिटकिनी से भरा हुआ घर
बंद कर लेता हूँ जानबूझकर
किसी आहट के मरने से पहले
खुद को आवाज देता हूँ, गुम आवाज
भीतर बैठे हुए भय के लिए करता हूँ प्रार्थना

अपने ही चपरासी से डरा हुआ मैं
जाति की गाली सुनता हुआ
मरता हूँ थोड़ा-थोड़ा ऱोज
अपने बच्चों की खातिर

मेरा अर्दली
आगंतुकों को गालियों के साथ कराता है मेरा परिचय
निकालता है अपनी भड़ास
शायद उसके आसपास का माहौल रचाबसा हो उसके भीतर

मेरे आसपास कुछ भी अच्छा नहीं
अहंकार से भरी हुई दुनिया
चूहे सांप गिलहरियाँ केकड़े छछूंदर
आदमी का देह पहने कंकाल
एक दुनिया जहाँ कभी शाम नहीं होती
वह दुनिया जहाँ कभी दरवाजे नहीं खुलते

नफरत के दस्ताने पहने हुए लोगों के लम्बे नाख़ून नज़र नहीं आते
खून का स्याह रंग उनके जबड़े पर दिखाई नहीं देता
उनकी गुम चोटें दिखाई नहीं देती दोपहरी तक
बस बियाबान रातें रोती हैं सहलाते हुए सुबह

ऐसी दुनिया में डरा-डरा मैं
सुनता हूँ घात लगाये बैठे सारसों की बातें
बगुलों की चुप्पी
महोखे की गुपचुप चाल

सुनता हूँ सवर्ण पड़ोसी से
नीच लोगों के संस्कार जाते नहीं
नीची जाति मतलब नीचा आदमी
एक भरी पूरी किताब पढ़ी है उन्होंने
जातियों के व्यवहार पर
डरता हूँ अपनी जाति के भय खुलने से

बच्चों को पढ़ाता हूँ सामाजिक व्याकरण, ऊंच-नीच
भेद मत खोलना, अपनी जाति कुछ और बताना
मेरे हिस्से का अपमान और हिकारत
झेलते हैं मेरे बच्चे

मैं खुद के बारे में संकोच करता हूँ बताने से
शायद देखी हुई मक्खियाँ न निगले कोई

अजीब पशोपस में रहता हूँ
अँधेरी गलियों में झाकता हुआ
दलित मैं या दलित वो

दलित शिकायत

उनके जघन्य अपराधों के बावजूद
चुप रहती हैं जलती मशालें
ताले टूटते नहीं, मिट्टी गीली नहीं होती
पिटते टूटते ठुकराते सदियों का संताप झेलते हुए पेड़
भीतर ही भीतर सूख जाते हैं

हमारे आँखों के पानी से भीग जाती हैं किताबें
लिखे हुए हर्फ़ सफ़ेद हो जाते हैं
हमारी लालटेने धीमी जलती हैं
उल्काओं से भी धीमी

जिस उम्र में हमें काले चश्मे की दरकार होती है
उस उम्र में हम काजल से काम चलाते हैं
कान में तेल डालकर सुनना कम कर देते हैं गाली

हम अपनी जन्मतिथि से चार साल बड़े दर्ज होते हैं
स्कूल के सवर्ण रजिस्टर में
शिक्षा के बाज़ार में हमारा कोई माई-बाप नहीं
हमारी दुकान उस तरह नहीं चलती
जैसे चलते हैं संस्कृत विद्यालय

हमारी कापियां हमारा मूल्यांकन नहीं करती जानबूझकर
हमें व्यवहारिक परीक्षा में कुछ कम अंक मिलते हैं
हमारे वजीफे से आते हैं गर्म समोसे
लार टपकाती लाल जीभ लम्बी हो जाती है
हमारी किताबों का दाम वसूलती हुई

फर्जी नामों से करोड़ो का खेल होता है
उनके भी नाम का वजीफा, फर्जी एडमिशन, रेमेडियल कोचिंग
जो कभी पैदा ही नहीं हुए

हमें ऱोज प्रार्थना कराई जाती है
हमसे आजादी का नारा लगवाया जाता है
जिस सामाजिक आजादी से हम मुक्त नहीं हुए कभी

जिस प्रार्थना के साथ पैदा हुई हमारी पीढ़िया
जिस प्रार्थना के साथ पैदा हुआ मैं
जिस प्रार्थना के बदले पटवारी ने किये दस्तखत

जिस दर्द को हमने महसूसा माँगा अपना हक
उस हक के लिए भी प्रार्थना
जो हमारी जाति के साथ पैदा हुई

हम हिकारत से भरी हुई जाति छुपाये रखना चाहते हैं
हम हॉस्टल से बाहर निकाल दिए जायेंगे
बदल दिए जायेंगे हमारे बर्तन
हमें खाने के लिए कहा जाएगा सबसे बाद में
अंतिम मेधा सूची से गायब हो जाएगा हमारा नाम

जातिवादी मुहल्ले में हमें घर के लाले पड़ जायेंगे
हमारे निर्वासन के साथ झुक जायेंगी हमारी खपरैलें
हमारी थकान में खो जायेगी हमारी नींद
शून्य गगन के नीचे हम शोकगीत नहीं गायेंगे
हम अपने पितरों से संवाद करेंगे

हम रोयेंगे नहीं, हमारी आँखे लाल हो गई हैं
हम इलाज नहीं करायेंगे, क्योंकि इनका इलाज नहीं

हमारी भूख मर गई है
हम अन्न का मंदिर बनाना चाहते हैं
हम अन्न खायेंगे नहीं, हम अन्न की पूजा करेंगे

महान विप्रों हमारे अपराध क्षमा करना
हम अबोध नहीं जानते सभी में है एक ही आत्मा
हम नहीं जानते किन कर्मों से हमारा इस कुल में जन्म हुआ
पर हमने मनुस्मृति जला दी है

हमारे पैरों की बिवाईयां गहरी हो गई हैं
हमारे हाथों में गोखरू पनप रहे हैं
खुर से फैल गए है हमारे होंठ
जोकों ने चूस लिया है हमारा खून

अभी हमारे हाथों में कुछ बंदूके थमा दी गई हैं
कुछ बुलेट, कुछ बैलट, कुछ पव्वे
बहुत सारा सदियों का संताप

बड़ी उम्मीद से लिख रहा हूँ मैं

उसकी भी गुजारिश
जिसे तुमने अचानक मना कर दिया
गिलहरियाँ जिनको तुम्हारे साहचर्य से जीना था

उसे जिसे देख अनचाहे मुड़ गए तुम्हारे कदम
उसकी जिसकी आँखे उम्मीद से लाल हो गईं
वह जिसका कोई नहीं है तुम जानते हो
जिसका भेड़िया प्रश्न तुम्हारे आगे दुम हिलाता रहा

सदियों का संताप झेलनेवाले
गूंगों की भाषा बोलनेवाले पपीहे
जूठन खाने वाले जानवर

तुम्हारे जूते की मरम्मत करनेवाला मोची
तुम्हारे गाड़ी पर पोंछा लगाने वाला लड़का
तुम्हारे बेटियों को स्कूल ले जाने वाला रिक्शा

जिन्हें संसद की भाषा में लिखना था इतिहास
अनचाहे संविधान पर कर दिए हस्ताक्षर

वे सभी जो दलित वंचित पिछड़े हैं
जिनकी निगाहें इलाज का सपना तोड़ रहीं हैं
जो सर्दियों की रात में तारों से ताश खेलते हैं

जिनकी निगाहों में शिक्षा की सुई गोल घूमती है
सफ़ेद ग्लोब में जिनका घर नजर नहीं आता
पांचसाला जादू जिनके आँचल में दम तोड़ देता है

तुम्हारे आसपास की प्रकृति, संरचना, बनावट, बुनावट
ठेले पर हिमालय बेचते बच्चे
देह का सौदा करती भूखी देहें

बड़ी उम्मीद से लिख रहा हूँ
उनके बारे में भी सोचना
जो तुम्हारा साहचर्य चाहते हैं

मेरा समर्पण 

एक दिन ख़त्म हो जाएगा मुरझाया बसंत
आसमान रिमझिम बरसायेगा बूंदे
धूप का रंग तेज चटक हो जाएगा
मैं समर्पित करूँगा एक दलित कविता

वो जो अँधेरे के खिलाफ जंग छेड़ेगें
वो जो अन्याय का रोना नहीं रोयेंगे
वो जिन पर मुकदमा नहीं चलेगा
वो जिनका कानून अँधा नंगा नहीं होगा

ऐसी पीढियां जो जानेगी अपना हक़ हकूक
जो शोषण को कैद करेंगी पिंजरे में
जो आरक्षण के खिलाफ आरक्षण की जंग छेड़ेगी

बेटियां गायेंगी सावन का गीत
समझायेंगी शिक्षा का अधिकार
सरेआम सड़कों पर पीटेगी दरिंदो को
बंदरबाट का लोकतंत्रीकरण करेगीं

एक दिन यह सब होगा
हम नहीं होगें
हम समर्पित करेंगे एक दलित कविता
उन दोस्तों के नाम

वो मेरी पीढ़ी के देवता

ओ मेरी पीढ़ी के अंतिम देवता
तुम्हारी आँखों में फूलने वाले बेहया के फूल
अकुंठित तुम्हारी हंसी
नर्म बाहों में समाने वाली उसकी भुजाएँ
कब कहेंगी तुम्हें
उठो और तोड़ दो पीढियो के बंधन

मानसिक दासता में जकड़े
तुम्हारे घुटने से लहू रिसता है आज भी
लहू जो तुम्हारी शिराओं में काला पड गया है
रमिया, सोल्हू, भाम्बी
जिनके आदर्शों में तुम्हारी छवि है
जिनके सपने तुम्हारे होने के बराबर है

जिनके इशारों में अड़हुल खिल रहे हैं
जिनकी अंगुलियाँ पत्थर तराश रही हैं किताबों में

जो बिना शर्तों के परिवर्तन चाहते हैं
जिनकी जिन्दा साँसों को एक अदद घर चाहिए
तुम्हारे भीतर

अहिंसा सत्य अस्तेय
सब खाते-पीते लोगों के बनाये प्रतिमान
उस समय जूठ हो जाते हैं
जब भूख की कविता जन्म लेती है
जब भय का व्याकरण दहाड़ता है

ओ मेरी पीढ़ी के अंतिम देवता
हम तुमसे खूनी क्रांति नहीं चाहते
हम तुमसे अधिक की कामना नहीं करते
पर जिस जमीर को पुरखों ने माँ की तरह संभाला
वह तुमसे धूमिल ना हो

ओ दलित बेटियों

ओ सांवली धरती
दो उभारों के बीच चलने वाली तुम्हारी नर्म सांसे
पछाह धान का चिउरा कूटती जवान लडकियों की साँसों से
थोड़ा तेज धड़क रही हैं

तुम्हारी चौहद्दी के भीतर
कुछ युवा लड़के कर रहें हैं तुम्हारी रखवाली
मासूम कल्पना वाले देश में
तुम्हारे लिए खरीद रहें हैं सिगार-पटार
जुटा रहें हैं दूसरे साधन

एक तुम हो अनुभूतियों के आकाश में
दही जमा रही हो
मद्धम हवा सी लहरा रही हो फुनगियों पर ओढ़नी
नथुनी पर नचा रही हो गोल-गोल चाहतें

तुम असुरक्षा का कवच ओढ़े
घूम रही हो नंगी सड़कों, खुले बाजारों, बंद गलियों भीतर
बहेलिये के जाल को नाखूनों से काट रही हो

वह जाल जो तुम्हें जिन्दा रखता तो है
जीने का आकाश नहीं देता

दूसरी परंपरा की खोज में
तुम वर्जनाएं तोड़ रही हो
तुम टूट रही हो वर्जनाओ सी

तुम दूधो नहाओ पूतो फलो की उतरन उतार रही हो
संस्कार से चिढ़-रूठ रही हो भीतर-भीतर

एक अभ्र दमक रहा है माथे पर
क्या-क्या कर रही हो आजकल

तुमने कभी सोचा सूखे तपे पहाड़ों का दुःख 

मेरे जिस्म से निकलने वाली नदियों
समय के क्रूर पत्थरों
अस्मिता की अँधेरी गलियों में भटकने वाली दलित आत्माओं
बाहर निकलो

उन्होंने हमें सच का प्रलोभन दिया है
छीना है हमारा स्वत्व, हमारा घर, हमारे हरे-भरे खेत
हमारे लहू में नमक की मात्रा बढ़ा दी है
गला दी हैं हमारी कमजोर अस्थियाँ

सिर्फ मौत का समझौता करते हुए
बेच दिया है रोटी का एक टुकड़ा
बेटी के लिए
रोटी का वही टुकड़ा मेरे जीवन का अंतिम उद्देश्य हो गया है

हमने कभी नहीं सोचा प्रेम में नयापन
कभी सौन्दर्यबोध की कविता नहीं रची भाषा में
ऊंट की पीठ पर कविता लिखते हुए
गुलाब के दावे को सुर्ख किया है हमने
हम अपनी बदबूदार गलियों में भटकते रहे हैं दर-दर
करते रहे हैं माई-बाप

हम असंतुष्ट कभी नहीं रहे
धर्म और अहिंसा के पेंडुलम में भकाते हुए तुमने
भेज दिया घर में शमशानी शांति
तुमने हमारा मरणभोज खाया है पीढ़ियों से
जूठन खिलाया फेंका हुआ

नए सूरज का उदय हुआ है पूरब में
हम राजा से मांग रहे हैं अपनी खोई हुई मुहरें

यह अस्मिता या अस्तित्व की लड़ाई भर नहीं
हम टूटी मूर्तियों में खोज रहे हैं अपना इतिहास
हमने भूख को मरने के लिए छोड़ दिया है जलते जंगल भीतर
अब हम रोटी की भीख नहीं मांगेंगे
सच का निवाला छीन खायेंगे

समय दुहरा रहा है खुदको
मेरा भोग हुआ दुःख भोगेंगी तुम्हारी पीढ़िया
शुरुवात हो गई है
तुम खाने लगे हो मरे गोरु का मांस
जिसे तुम गन्दी निगाह से देखते थे
अपना रहे हो वही संस्कृति

आंधिया शांत हो गई हैं
आज हम रेत के ढूहे नहीं हैं
जगते हुए पहाड़ हैं
हमारी कंदराओं से जन्म रहीं है विकास की नदियाँ
हमारे खून के रंगों से खिल रहें हैं बनौधे लाल टेसू
बनाश बिखर रहें हैं बेटी के सपनों भीतर

देखना एक दिन परिंदे फडफड़ायेंगे अपने पंख
आकाशवाणी होगी
तुम विजयी हुए हो पार्थ!
क्या तुमने कभी सोचा है
सूखे तपे पहाड़ों का दुःख

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