कविता सिंह की रचनाएँ

वस्ल के ख़्वाब सज़ा कर के सहर जाती है

वस्ल के ख़्वाब सज़ा कर के सहर जाती है
आलमें-हिज्र में ये रात गुज़र जाती है

दिल पर तारी है मेरे लज़्ज़ते ग़म का ये नशा
इसकी हर शय से मेरी रूह निखर जाती है

दर्द मिलता है यहाँ रोज नई सूरत में
ज़िन्दगी ऐसे ही किस्तों में गुज़र जाती है

बुझ चुकी आग मेरे दिल की ज़माने पहले
राख है बस जो हवा से ही बिखर जाती है

रोज ढलते हैं यहाँ अश्क़ मेरी आँखों से
हसरते-दीद तो पलकों में ठहर जाती है

रूह लर्ज़ां है मेरी उसके असर से ऐ ‘वफ़ा’
इक नज़र तीर-सी दिल में जो उतर जाती है

आँखें तरस रहीं मेरी दीदारे-यार को

आँखें तरस रहीं मेरी दीदारे-यार को।
मिलता नहीं करार दिले-बेकरार को॥

एे सोज़े-हिज्रां आज ज़रा देर तक ठहर-
तन्हा न छोड़ देख ग़मों के दयार को।

अबके दिए हैं ज़ख़्म हज़ारों बहार ने-
ले के कहाँ मैं जाऊँ दिले-दागदार को।

किस शहर में तलाश करूँ जाऊँ मैं कहाँ-
ढूँढूँ कहाँ पर जाके अपने खोए प्यार को।

ज़ालिम को मुझ पर आज भी आया नहीं रहम-
ठोकर से उसने मेरी उड़ाया मज़ार को।

दैरो-हरम में ढूँढता है अब ख़ुदा को तू-
भूला हुआ है रोज़े अज़ल के क़रार को।

मरहम लगा रहा है वह आकर के एे ‘वफ़ा’ –
कह दो कि आने दे अभी ज़ख़्मे-बहार को।

किसको रिश्ता यहाँ निभाना है

किसको रिश्ता यहाँ निभाना है।
बेवफ़ाई का अब ज़माना है॥

सोज़ दिल में कोई जगाना है-
वस्ल का ख्वाब फिर सजाना है।

ज़हर कितना है यहाँ फ़ज़ाओ में-
मौत हँसकर गले लगाना है।

ये अजब सानेहा हुआ मुझ पर-
दिल की नज़दीकियाँ भुलाना है।

बात वादों की थी इरादों की-
क़िस्सा-ए-इश्क़ को भुलाना है।

आतिशे-इश्क़ बुझ न पाएगी-
जीस्त को खाक़ में मिलाना है।

हुक्मरानी है इश्क़ की ऐ ‘वफ़ा’ –
ज़ख़्म खाना है मुस्कुराना है।

मेरे चेहरे पर मुहब्बत का असर छोड़ गया

मेरे चेहरे पर मुहब्बत का असर छोड़ गया।
जाते-जाते वह कोई ऐसी नज़र छोड़ गया॥

मौज-दर-मौज मुझे ग़म तो सताता ही रहा-
दर्द की लहरों पर वह शामो-सहर छोड़ गया।

वो सुखनवर था बड़ी उम्दा ग़ज़ल कहता था-
अश्के-तहरीर में वह अच्छी बहर छोड़ गया।

जाने कैसी ये उदासी है मेरे आँगन में-
जाते-जाते भी कोई अपना असर छोड़ गया।

जाने आग़ाज़ मोहब्बत का हुआ था कि नहीं-
कोई आया था मुझे ज़ख़्मी ज़िगर छोड़ गया।

मेरी आँखों में सजा कर वह हसीं ख़्वाबों को-
रात ग़ुज़री तो उदासी की सहर छोड़ गया।

क्या गुज़रती है कभी सोचिए उस पर एे ‘वफ़ा’ –
जिसका भी नूरे नज़र लख़्ते जिगर छोड़ गया।

जागती आँखों से शब को हम सहर करते रहे 

जागती आँखों से शब को हम सहर करते रहे।
रात भर अश्क़ों को मानिंद-ए-गुहर करते रहे॥

लफ्ज़ चुन-चुनकर ग़ज़ल हम बा असर करते रहे-
दास्ताने ज़िन्दगानी मौतबर करते रहे॥

इस तरह आइना गर्दिश की नज़र करते रहे-
ज़िन्दगी ने जो दिया हँस के गुज़र करते रहे।

हर शजर देता रहा धोखा हमें इक छाँव का-
और हम सहराओं का तपता सफ़र करते रहे।

सबकी कोताही से बढ़कर है तेरा रहम-ओ-करम-
इसलिए तेरे करम पर हम नज़र करते रहे।

टूटती हैं आज फिर से दिल की ये नाज़ुक रगें-
टूटते दिल से ही हम शामो-सहर करते रहे।

ढूढ़ते थे हम ‘वफ़ा’ इन संग दिल इंसान में-
दिल लगी को दिल्लगी—सा ये बशर करते रहे।

ख़ामोश-सी फ़िज़ा का ये मंज़र उदास है 

ख़ामोश-सी फ़िज़ा का ये मंज़र उदास है
जो मस्त था वह आज कलंदर उदास है

क्या ख़ौफ़ है कलम में वह हरकत नहीं रही
क्या बात है कि आज सुखनवर उदास है

घायल ये साँस-साँस है ज़ख्मों भरा है दिल
तुझसे बिछड़ के क़ल्ब ये दिलबर उदास है

ख़ानोशियाँ-सी छा गईं मौजे हयात पर
बेसब्र ख़्वाहिशों का समंदर उदास है

क़ातिल तो हँस रहा है ‘वफ़ा’ जोश में मगर
मेरे लहू को देख के खंजर उदास है

बह्रे ग़म और ज़िन्दगानी है

बह्रे ग़म और ज़िन्दगानी है
मुख़्तसर-सी मिरी कहानी है

रोज़ बातें उसी से करती हूँ
एक ख़त जो तिरी निशानी है

फूल हसरत के हैं चढ़े जिस पर
कब्र दिल में वह इक पुरानी है

कौन से रिश्ते की दुहाई दूँ
आज कल ख़ून भी तो पानी है

जिस्मो-जाँ का सफ़र तो है तन्हा
ज़िन्दगी की यही कहानी है

रक्स करती है मेरी तन्हाई
ग़म है चेहरे पर शादमानी है

सुन ज़रा गौर से ग़ज़ल ऐ ‘वफ़ा’
हाल सब दर्द की जुबानी है

सुलगते ही रहो दिल की अगन में

सुलगते ही रहो दिल की अगन में
मज़ा कुछ भी नहीं दारो रसन में

फ़िज़ा में ये ज़हर कैसा घुला है
दिलों में नफ़रतें हैं अब वतन में

अभी धुंधला पड़ा है आइना भी
नहीं है अक्स कोई भी ज़हन में

वो करने आये तब इज़हारे उल्फ़त
बदन लिपटा हुआ था जब कफ़न में

कफ़स में क़ैद जैसे हो परिंदा
है क़ैदी रूह वैसे ही बदन में

शबे तन्हाईयाँ हैं रतजगे हैं
तड़पती है ‘वफ़ा’ दिल के सहन में

तमाम उम्र रहा दर्द की रिदा ओढ़े

तमाम उम्र रहा दर्द की रिदा ओढ़े
थका हुआ था बदन सो गया क़ज़ा ओढ़े

सुकूत तारी है जिस सिम्त भी नज़र डाली
हयात आयी नज़र दर्दे इंतेहा ओढ़े

अभी जो आँख की कोरों में इक नमी-सी है
ये अश्क जज़्ब ही हो जायेंगे सज़ा ओढ़े

क़फ़स के कैद से आज़ाद कैसे हो पाखी
के रूह थक गई है जिस्म की क़बा ओढ़े

शफ़क़-सी शाम दरो बाम पर उतर आई
गमों की दर्द भरी देखिए सदा ओढ़े

वफ़ा की खा के कसम बेवफ़ा हुए कितने
खड़ी है अब भी ‘वफ़ा’ देखिये वफ़ा ओढ़े

जो दर्दो ग़म न हो तो ऐसी आशिक़ी क्या है

जो दर्दो ग़म न हो तो ऐसी आशिक़ी क्या है
लहू से दिल के न लिक्खी तो शायरी क्या है

कोई बता न सका मुझको दिलबरी क्या है
हैं कहते प्यार किसे और दिल्लगी क्या है

रुबाई कह न सकी और ग़ज़ल हुई ही नहीं
मैं भूल बैठी हूँ अशआर की ख़ुशी क्या है

जो रूह क़ैद है जिन्दान के अंधेरों में
उसे पता ही नहीं साल क्या सदी क्या है

जो पास था उसे क़ुर्बान तो किया तुझपर
ऐ ज़िन्दगी तू बता मुझसे चाहती क्या है

वफ़ा, समझ में भला आएगी उन्हें कैसे
जो आज तक न समझ पाए बंदगी क्या है

भला वह क्या मिरी मजबूरियों को समझेंगे
जिन्हें पता ही नहीं ये के बेबसी क्या है

समन्दरो की बुझाता है प्यास जो ऐ वफ़ा
तुम उस से पूछती क्यों हो के तिश्नगी क्या है

बुझने दो शम’ अ मुहब्बत की जलाते क्यूँ हो

बुझने दो शम’ अ मुहब्बत की जलाते क्यूँ हो
तीरगी हिज्र की इस दिल से मिटाते क्यूँ हो

राख़ का ढेर हूँ शोला न शरर है बाक़ी
मेरे सोये हुए जज़्बात जगाते क्यूँ हो

दश्ते दिल की ये ज़मीं अरसे से बंजर है पड़ी
अब शजर गुल के यहाँ फिर से लगाते क्यूँ हो

पर कतर देगी बुलंदी पर हवा की कैंची
कागज़ी पर लिए ऊंचाई पर जाते क्यूँ हो

नफ़रतों को न हवा दो ये मिटा देंगी तुम्हे
ख़ौफ़ खाओ की क़ज़ा को यूँ बुलाते क्यूँ हो

आग जो तुमने लगाई है जलोगे तुम भी
घर पड़ोसी का जला जश्न मनाते क्यूँ हो

यूँ सरे बज़्म वफ़ा को जो किया है रुसवा
शर्म से अपनी निगाहों को चुराते क्यूँ हो

रहेगी ज़िन्दगी में आख़िरश ये तीरगी कब तक

रहेगी ज़िन्दगी में आख़िरश ये तीरगी कब तक
अता करते रहोगे तुम ग़मों की बानगी कब तक

कमाले हुस्न के जलवे निगाहे-नाज़ के फ़ित्ने
तेरी जादूगरी से बच सकेगी सादगी कब तक

बड़ी मुद्दत से तेरी दीद को आँखें ये प्यासी हैं
मुझे इतना बता दे तू मिटेगी तिश्नगी कब तक

सदाक़त के चरागों को ज़रा दिल में जला के रख
तग़ाफ़ुल से करेगा तू बता ये बन्दिगी कब तक

हुई जो शाम तो छाये ग़मों के आज फिर बादल
बचायेगी सफीना अब ‘वफ़ा’ का ज़िन्दगी कब तक

ख्यालों में वल्लाह छाया हुआ है

ख्यालों में वल्लाह छाया हुआ है
तुझे मैंने दिल में बसाया हुआ है

ख़ता क्या कोई हमसे सरज़द हुई अब
सितम तुमने हमपे जो ढाया हुआ है

नज़र ने नज़र से ज़रा गुफ्तगू की
फ़साना सभी ने बनाया हुआ है

अजब दौरे-हाज़िर के शायर हैं यारो
क़लम को भी गिरवी बनाया हुआ है

सताने लगी है मुझे यादे-माज़ी
कि इक आखिरी ख़त बचाया हुआ है।

वतन से नहीं प्यार जिनको ज़रा भी
उन्हें रहनुमा क्यों बनाया हुआ है

सभी एक हैं फिर क्यों दीवारे-मज़हब
सभी को ख़ुदा ने बनाया हुआ है

‘वफ़ा’ पर कभी आंच आने न देंगे
ये वादा अभी तक निभाया हुआ है

तू रहे लाख अब हिजाबों में

तू रहे लाख अब हिजाबों में
ढूँढ़ लेंगे तुझे नकाबों में

रेत का वह तो इक समंदर था
तिश्नगी ले गई सराबों में

गर्दिशों ने हमें सिखाया जो
वो सबक है कहाँ किताबों में

काग़ज़ी फूल में कहाँ ख़ुशबू
जो शज़र के है इन गुलाबोँ में

जो कहर ज़िंदगी ने बरपा है
वो तो सोचा नहीं था ख्वाबों में

मुजमहिल आँख है थके सपने
कैद वीरानियाँ हैं ख्वाबों में

दर्द के कासिद से भी रिश्ता निभाया किस तरह

दर्द के कासिद से भी रिश्ता निभाया किस तरह
चश्मे-तर को आईने से भी छुपाया किस तरह

दर्द में डूबी हुई रातें तुम्हारे हिज्र की
कह न पाए के शबे-ग़म ने रुलाया किस तरह

कारवाँ के साथ भी तन्हा चले हम दूर तक
हमसे पूछो फासला हमने मिटाया किस तरह

हसरतें आबाद थीं अरमान थे जागे हुए
पूछ मत दे थपकियाँ उनको सुलाया किस तरह

टूट तो अब हम गये हैं पर अभी बिखरे नहीं
क्या बताएँ हमने ये जीवन बिताया किस तरह

ख़्वाब क्या-क्या थे हँसी जो इस मुहब्बत ने दिए
क्या कहें ताबीर ने पल-पल सताया किस तरह

ज़िंदगी भर ज़ख्म खाकर भी ‘वफ़ा’ करते रहे-
ज़ख्म को नासूर बनने से बचाया किस तरह

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