‘क़ाबिल’ अजमेरी की रचनाएँ

तुम्हें जो मेरे गम-ए-दिल से आगाही हो जाए

तुम्हें जो मेरे गम-ए-दिल से आगाही हो जाए
जिगर में फूल खिलें आँख शबनमी हो जा

अजला भी उस की बुलंदी को छू नहीं सकती
वो जिंदगी जिसे एहसास-ए-जिंदगी हो जाए

यही है दिल की हलाकत यही है इश्क की मौत
निगाए-ए-दोस्त पे इजहार-ए-बेकसी हो जाए

ज़माना दोस्त है किस किस को याद रक्खोगे
खुदा करे के तुम्हें मुझ से दुश्मनी हो जाए

सियाह-खाना-ए-दिल में हैं जुल्मतों का हुजूम
चराग-ए-शौक जलाओ के रौशनी हो जाए

तुलू-ए-सुब्ह पे होती है और भी नम-नाक
वो आँख जिस की सितारों से दोस्ती हो जाए

अजल की गोद में ‘काबिल’ हुई है उम्र तमाम
अजब नहीं जो मेरी मौत जिंदगी हो जाए

दिल-ए-दीवाना अर्ज़-ए-हाल पर माइल तो क्या होगा

दिल-ए-दीवाना अर्ज़-ए-हाल पर माइल तो क्या होगा
मगर वो पूछे बैठे खुद ही हाल-ए-दिल क्या होगा

हमारा क्या हमें तो डूबना है डूब जाएँगे
मगर तूफान जा पहुँचा लब-ए-साहिल तो क्या होगा

शराब-ए-नाब ही से होश उड़ जाते है इन्सां के
तेरा कैफ-ए-नजर भी हो गया शामिल तो क्या होगा

खिरद की रह-बरी ने तो हमें ये दिन दिखाए है
जुनूँ हो जाएगा जब रह-बर-ए-मंजिल तो क्या होगा

कोई पूछे तो साहिल पर भरोसा करने वालों से
अगर तूफाँ की ज़द में आ गया साहिल तो क्या होगा

खुद उस की जिंदगी अब उस से बरहम होती जाती है
उन्हें होगा भी पास-ए-खातिर-ए-‘काबिल’ तो क्या होगा

हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहाँ तक आ गए

हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहाँ तक आ गए
हम नज़र तक चाहते थे तुम तो जाँ तक आ गए

ना-मुरादी अपनी किस्मत गुमरही अपना नसीब
कारवाँ की खैर हो हम कारवाँ तक आ गए

उन की पलकों पर सितारे अपने होंटों पे हँसी
किस्सा-ए-गम कहते कहते हम कहाँ तक आ गए

रफ्ता-रफ्ता रंग लाया जज्बा-ए-खामोश-ए-इश्क
वो तगाफुल करते करते इम्तिहाँ तक आ गए

खुद तुम्हें चाक-ए-गिरेबाँ का शुऊर आ जाएगा
तुम वहाँ तक आ तो जाओ हम जहाँ तक आ गए

आज ‘काबिल’ मय-कदे में इंकिलाब आने को है
अहल-ए-दिल अंदेशा-ए-सूद-ओ-जियाँ तक आ गए

होटों पे हँसी आँख में तारों की लड़ी है

होटों पे हँसी आँख में तारों की लड़ी है
वहशत बड़े दिलचस्प दो-राहे पे खड़ी है

दिल रस्म-ओ-रह-ए-शौक से मानूस तो हो ले
तकमील-ए-तमन्ना के लिए उम्र पड़ी है

चाहा भी अगर हम ने तेरी बज्म से उठना
महसूस हुआ पाँव में जंजीर पड़ी है

आवारा ओ रूसवा ही सही हम मंजिल-ए-शब में
इक सुब्ह-ए-बहाराँ से मगर आँख लड़ी है

क्या नक्श अभी देखिए होते हैं नुमायाँ
हालात के चेहरे से जरा गर्द झड़ी है

कुछ देर किसी जुल्फ के साए में ठहर जाएँ
‘काबिल’ गम-ए-दौराँ की अभी धूप कड़ी है

सुराही का भरम खुलता न मेरी तिश्नगी होती 

सुराही का भरम खुलता न मेरी तिश्नगी होती
जरा तुम ने निगाह-ए-नाज़ को तकलीफ दी होती

मकाम-ए-आशिकी दुनिया ने समझा ही नहीं वरना
जहाँ तक तेरा गम होता वहीं तक जिंदगी होती

तुम्हारी आरजू क्यूँ दिल के वीराने में आ पहुँची
बहारों में पली होती सितारों में रही होती

ज़माने की शिकायत क्या ज़माना किस की सुनता है
मगर तुम ने तो आवाज़-ए-जुनूँ पहचान ली होती

ये सब रंगीनियाँ खून-ए-तमन्ना से इबारत है
शिकस्त-ए-दिल न होती तो शिकस्त-ए-ज़िंदगी होती

रज़ा-दोस्त ‘काबिल’ मेरा मेयार-ए-मोहब्बत है
उन्हें भी भूल सकता था अगर उन की खुशी होती

तलब की आग किसी शोला-रू से रौशन है 

तलब की आग किसी शोला-रू से रौशन है
खयाल हो के नज़र आरजू से रौशन है

जनम-जनम के अँधेरों को दे रहा है शिकस्त
वो इक चराग के अपने लहू से रौशन है

कहीं हुजूम-ए-हवादिस में खो के रह जाता
जमाल-ए-यार मेरी जुस्तुजू से रौशन है

ये ताबिश-ए-लब-ए-लालीं ये शोला-ए-आवाज़
तमाम बज़्म तेरी गुफ्तुगू से रौशन है

विसाल-ए-यार तो मुमकीन नहीं मगर नासेह
रूख-ए-हयात इसी आरजू से रौशन है

तज़ाद-ए-जज्बात में ये नाजुक मकाक आया तो क्या करोगे

तज़ाद-ए-जज्बात में ये नाजुक मकाक आया तो क्या करोगे
मैं रो रहा हूँ तो हँस रहे हो, मैं मुसकुराया तो क्या करोगे

मुझे तो इस दर्जा वक्त-ए-रूखसत सुकूँ की तलकीन कर रहे हो
मगर कुछ अपने लिए भी सोचा मैं याद आया तो क्या करोगे

कुछ अपने दिल पर भी ज़ख्म खाओ मेरे लहू की बहार कब तक
मुझे सहारा बनाने वालों में लड़खड़ाया तो क्या करोगे

उतर तो सकते हो यार लेकिन मआल पर भी निगाह कर लेा
खुदा-न-कर्दा सुकून-ए-साहिल न रास आया तो क्या करोगे

अभी तो तनकीद हो रही है मेरे मज़ाक-ए-जुनूँ पे लेकिन
तुम्हारी जुल्फों की बरहमी का सवाल आया तो क्या करोगे

अभी तो दामन छुड़ा रहे हो बिगड़ के ‘काबिल’ से जा रहे हो
मगर कभी दिल की धड़कनों में शरीक पाता तो क्या करोगे

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