‘क़ैसर’ निज़ामी की रचनाएँ

आतिश-ए-सोज़-ए-मोहब्बत को बुझा सकता हूँ मैं 

आतिश-ए-सोज़-ए-मोहब्बत को बुझा सकता हूँ मैं
दीदा-ए-पुर-नम से इक दरिया बहा सकता हूँ मैं

हुस्न-ए-बे-परवा तेरा बस इक इशारा चाहिए
मेरी हस्ती क्या है हस्ती को मिटा सकता हूँ मैं

ये तो फरमा दीजिए तकमील-ए-उल्फत की कसम
आप को क्या वाकई अपना बना सकता हूँ मैं

इश्क में रोज़-ए-अज़ल से दिल है पाबंद-ए-वफा
भूलने वाले तुझे क्यूँकर भुला सकता हूँ मैं

हम-नफस मुतलक भी तूफान-ए-आलम का गम नहीं
बहर की हर मौज को साहिल बना सकता हूँ मैं

बख़्श दी हैं इश्क ने इस दर्जा मुझ को हिम्मतें
जख़्म खा कर दिल पै ‘कैसर’ मुस्कुरा सकता हूँ मैं

दिल सोज़-ए-आह-ए-गम से पिघलता चला गया

दिल सोज़-ए-आह-ए-गम से पिघलता चला गया
मैं ज़ब्त की हदों से निकलता चला गया

जो तेरी याद में कभी आया था आँख तक
वो अश्क बन के चश्मा उबलता चला गया

रोका हज़ार बार मगर तेरी याद में
तूफान-ए-इजि़्तराब मचलता चला गया

पुर-कैफ हो गई मेरी दुनिया-ए-जिंदगी
पी कर शराब-ए-इश्क सँभलता चला गया

रोका किया जहाँ नए इंकिलाब को
करवट मगर ज़माना बदलता चला गया

‘कैसर’ न काम आईं यहाँ पासबानियाँ
दौर-ए-ख़िजाँ गुलों को मसलता चला गया

जाम-ए-नज़रो से पिलाया है तुम्हें याद नहीं 

जाम-ए-नज़रो से पिलाया है तुम्हें याद नहीं
मुझ को दीवाना बनाया है तुम्हें याद नहीं

गुल खिलाए मेरे सीने में ख़लिश ने क्या क्या
तुम ने जो तीर चलाया है तुम्हें याद नहीं

याद है मुझ को वो शोखी वो अदा वो गम्जा
तुम ने जी भर के सताया है तुम्हें याद नहीं

दिल ने लूट हैं मज़े जिस की ख़लिश के पैहम
तीर वो दिल पे चलाया है तुम्हें याद नहीं

बार-ए-गम जिस को फरिश्ते भी उठा सकते न थे
वो मेरे दिल ने उठाया है तुम्हें याद नहीं

आतिश-ए-इश्क बुझे देर हुई ऐ ‘कैसर’
दाग ने दिल को जलाया है तुम्हें याद नहीं

कह रही है सारी दुनिया तेरा दीवाना मुझे 

कह रही है सारी दुनिया तेरा दीवाना मुझे
तेरी नज़रों ने बना डाला है अफ्साना मुझे

इश्क में अब मिल गई है मुझ को मेराज-ए-जुनूँ
अब तो वो भी कह रहे हैं अपना दीवाना मुझे

दर्स-ए-इबरत है तुम्हारे वास्ते मेरा मआल
गुँचा ओ गुल को सुनाता है ये अफ्साना मेरा

इक निगाह-ए-नाज़ ने साकी की ये क्या कर दिया
रफ्ता-रफ्ता कह उठे सब पीर-ए-मय-खाना मुझे

तू सरापा नूर है मैं तेरा अक्स-ए-ख़ास हूँ
कह रहे हैं यूँ तेरा सब आईना-खाना मुझे

सुन रही थी शौक से दुनिया जिसे ऐ हम-नफस
याद है हाँ याद है वो मेरा अफ्साना मुझे

नूर से भरपूर हो जाती है बज़्म-ए-आरजू
जब कभी वो देखते हैं बे-हिजाबाना मुझे

अल-मदद ऐ ज़ोहद बढ़ कर रोक ले मेरे कदम
तिश्नगी फिर ले चली है सू-ए-मय-खाना मुझे

हम-नफस मेरी तो फितरत ही सना-ए-हुस्न है
इश्क के बंदे कहा करते हैं दीवाना मुझे

मुझ को ‘कैसर’ मय-कदे से निकले इक मुद्दत हुई
याद करते हैं अभी तक जाम ओ पैमाना मुझे

ख़ैर से उन का तसव्वुर हम-सफर होने तो दो

ख़ैर से उन का तसव्वुर हम-सफर होने तो दो
ये चराग-ए-राह-ए-मंजिल जल्वा-गर होने तो दो

जुरअत-ए-परवाज़ पर क्यूँ हैं अभी से तब्सिरे
ना-तवाँ ताएर में बाल ओ पर होने तो दो

उन के जल्वों पर निगाहों का भरम खुल जाएगा
इम्तिहान-ए-वुसअत-ए-जर्फ-ए-नज़र होने तो दो

काएनात-ए-इश्क की हर शाम होगी जल्वा जा
हुस्न के जल्वों को हम-रंग-ए-सहर होने तो दो

जुस्तजू-ए-राहत-ए-दिल है अभी तो बे-महल
साअत-ए-रंज ओ आलम इशरत असर होने तो दो

हो अभी से अहल-ए-दिल बे-ताब-ए-जल्वा किस लिए
तुम अभी जौक-ए-नजारा मोतबर होने तो दो

दास्तान-ए-तूर-ओ-ऐमन ताज़ा-तर हो जाएगी
शाहिद-ए-यकता को ‘कैसर’ जल्वा-गर होने तो दो

मोहब्बत बाइस-ए-दीवानगी है और बस मैं हूँ

मोहब्बत बाइस-ए-दीवानगी है और बस मैं हूँ
के अब पैहम इनायत आप की है और बस मैं हूँ

सुकूँ हासिल है दिन में और न शब को चैन मिलता है
के अब तो कशमकश में ज़िंदगी है और बस मैं हूँ

न जाने माजरा क्या है नज़र कुछ भी नहीं आता
के अब हद्द-ए-नज़र तक तीरगी है और बस मैं हूँ

नहीं है आज मुझ को ख़दशा-ए-जुल्मत ज़माने में
रूख़-ए-ताबाँ की उन की रौशनी है और बस मैं हूँ

कदम क्या डगमगाएँगें रह-ए-उल्फत में ऐ साकी
बहुत ही मुख़्तसर सी बे-खुदी है और बस मैं हूँ

तेरे नक्श-ए-कदम पर सर झुकाना काम है अपना
ख़ुदा शाहिद ये मेरी बंदगी है और बस मैं हूँ

उन्हें रूदाद-ए-ग़म अपनी सुनाऊँ किस तरह ‘कैसर’
वही उन की अदा-ए-बरहमी है और बस मैं हूँ

नज़र-नवाज़ नज़ारों से बात करता हूँ

नज़र-नवाज़ नज़ारों से बात करता हूँ
सुकूँ नसीब सहारों से बात करता हूँ

उलझ रहा है जो ख़ारों में फिर से ये दामन
ख़िज़ाँ ब-दोश बहारों से बात करता हूँ

तुम्हारें इश्क में तुम से जुदा जुदा रह कर
ग़म-ए-फिराक के मारों से बात करता हूँ

तेरे बग़ैर ये आलम अरे मआज़-अल्लाह
फलक के चाँद सितारों से बात करता हूँ

उफूर-ए-अश्क से ये हाल हो गया ‘कैसर’
यम-ए-अलम के किनारों से बात करता हूँ

निज़ाम-ए-गुलशन-ए-हस्ती बदल के दम लेंगे

निज़ाम-ए-गुलशन-ए-हस्ती बदल के दम लेंगे
हुदूद-ए-रंज-ओ-अलम से निकल के दम लेंगे

शुऊर हासिल-ए-मकसद जिसे समझता है
ये अज़्म है उसी मंज़िल पे चल के दम लेंगे

मता-ए-अमन लुटाएँगे हम ज़माने में
निज़ाम-ए-जब्र-ओ-तशद्दुद कुचल के दम लेंगे

नदीम बहर-ए-मुसीबत में सूरत-ए-तूफाँ
मचल मचल के उठेंगे सँभल के दम लेंगे

नहीं पसंद रिवाज-ए-कोहन हमें ‘कैस़र’
नए निज़ाम के साँचे में ढल के दम लेंगे

सितम तो फरमा रहे हैं मुझ पर मगर ये उनको ख़बर नहीं है 

सितम तो फरमा रहे हैं मुझ पर मगर ये उनको ख़बर नहीं है
नहीं है नाम-काम मेरा नाला मेरी फुगाँ बे-असर नहीं है

करें जो परवाज़ का इरादा रसाई पानी हो ला-मकाँ तक
कहा ये किस ने के हम को हासिल वो दौलत-ए-बाल-ओ-पर नहीं है

रविश रविश है निशात-ए-सामाँ गुल ओ सुमन मुस्कुरा रहे हैं
चमन में आज अपना आशियाना शिकार-ए-बर्क ओ शरर नहीं है

ख़ोशा मुकद्दर वो सामने हैं सुकूँ-ए-ख़ातिर भी है मयस्सर
ज़ह तजल्ली के आज पहला सा इजि़्तराब-ए-नज़र नहीं है

मैं आप गर्म-ए-सफर हूँ तन्हा न कोई रह-रव न कोई साथी
ये जादा-ए-मंज़िल-ए-वफा है यहाँ कोई हम-सफर नहीं है

ज़माना हम से सुनेगा कब तक कहाँ तक आख़िर सुनाएँगे हम
तवील है दास्तान-ए-उल्फत ये किस्सा-ए-मुख़्तसर नहीं है

रूख-ए-मुनव्वर पे उन की ‘कैसर’ अभी तो बिखरी हुई हैं जुल्फें
अभी तो शाम के अँधेरे अभी तुलू-ए-सहर नहीं है

तेरी नज़र के इशारों को नींद आई है 

तेरी नज़र के इशारों को नींद आई है
हयात-बख़्श सहारों को नींद आई है

तेरे बग़ैर तेरे इंतिज़ार से थक कर
शब-ए-फिराक के मारों को नींद आई है

सहर करीब है अरमाँ उदास दिल गम-गीं
फलक पे चाँद सितारों को नींद आई है

तेरे जमाल से ताबरी थे जो उल्फत में
अब उन हसीन नज़ारों को नींद आई है

हर एक मौज है साकित यम-ए-मोहब्बत की
मेरे बग़ैर किनारों को नींद आई है

चमन में ज़हमत-ए-गुल्शत आप फरमाएँ
ये सुन रहा हूँ बहारों को नींद आई है

कहो ये साकी-ए-सहबा-नवाज़ से ‘कैसर’
फिर आज बादा-गुसारों को नींद आई है

तुझे भी चैन ने आए करार को तरसे

तुझे भी चैन ने आए करार को तरसे
चमन में रह के चमन की बहार को तरसे

इलाही बर्क वो टूटे जमाल पर तेरे
कली की तरह से तू भी निखार को तरसे

तमाम उम्र रहे मेरा मुंतज़िर तू भी
तमाम उम्र मेरे इंतिज़ार को तरसे

न हो नसीब मोहब्बत की ज़िंदगी तुझ को
सुकून-ए-ज़ीस्त को ढूँढे क़रार को तरसे

दुआ है ‘कैसर’-ए-महजूर की यही पैहम
के तू भी जल्वा-ए-रूख़्सार-ए-यार को तरसे

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