काज़िम जरवली की रचनाएँ

सरकारी स्कूल की खिचड़ी

अच्छा है यही तुम मुझे भूखा ही सुलाना,
अच्छी मेरी अम्मा कभी खिचड़ी न पकाना ।

स्कूल मे खिचड़ी ही तो खायी थी सभी ने,
हंस खेल के मिलजुल के पकाई थी सभी ने,
किस चाव से थाली मे सजाई थी सभी ने,
इफ़्लास को सरकार के खाने से बचाना;

अच्छा है यही तुम मुझे भूखा ही सुलाना,
अच्छी मेरी अम्मा कभी खिचड़ी न पकाना ।

आफत थी मुसीबत थी हलाकत थी वो खिचड़ी,
बच्चों के लिए जाम-ए-शहादत थी वो खिचड़ी,
कुछ मांए ये कहती हैं क़यामत थी वो खिचड़ी,
सच ये है हुकूमत की ज़रुरत थी वो खिचड़ी,
हर दिल को रुलाता है यह खिचड़ी का फ़साना;

अच्छा है यही तुम मुझे भूखा ही सुलाना,
अच्छी मेरी अम्मा कभी खिचड़ी न पकाना ।। — काज़िम जरवली

राज़-ए-इन्किसारी

मुझे मालूम है मुझको पता है,
ये सन्नाटा तेरी आवाज़-ए-पा है।

चमन मे हर तरफ तेरे हैं चर्चे,
तेरा ही नाम पत्तों पर लिखा है।

मुझे आवाज़ देती है सहर क्यूँ,
परिंदा किस लिए नग़मा सरा है।

ये अब कैसी है दिल को बेक़रारी,
चमन है अब्र है ठंडी हवा है।

यहाँ पत्थर हुआ है कोई चेहरा,
यहाँ एक आईना टूटा पड़ा है।

सभी इन्सा हैं बस इतना समझ लो.
ज़रूरी है कि पूछो कौन क्या है।

सदा ये मारका चलता रहेगा,
न शब् हारी न ये सूरज थका है।

यही काज़िम है राज़-ए-इन्किसारी,
मेरे अंदर कोई मुझसे बड़ा है ।। — काज़िम जरवली

ज़मीने शौक़

खूने दिल से ये ज़मीने शौक़ नम रक्खेगा कौन,
हम नहीं होंगे, तो काग़ज़ पर क़लम रक्खेगा कौन।

ये दुआ मांगो सभी अहले जुनू जिंदा रहें,
वरना सहराओं के काँटों पर क़दम रक्खेगा कौन।

हम से दीवानों का जीना किया है; और मरना भी किया,
जब उठेंगे हम, यहाँ परचम को ख़म रक्खेगा कौन।

मेरा साया तक नहीं तुमको गवारा है अगर,
रास्तों मेरे निशानाते क़दम रक्खेगा कौन।

जिनके हाथों की लकीरें तक नहीं बाक़ी बचीं,
उनके सर पर शहर मे दस्ते करम रक्खेगा कौन।

रह चुकी है रौशनी जिनकी सनमखानों में क़ैद,
उन चरागों को सरे ताक़े हरम रक्खेगा कौन।

आज ही माबूद करदे मेरे सजदों का हिसाब,
ता क़यामत अपनी पेशानी को ख़म रक्खेगा कौन।

अब यही बेहतर है काज़िम छोड़ दे मुझको हयात,
ये खयाले मेजबानी दम बा दम रक्खेगा कौन।। — काज़िम जरवली

तन्हाई की धूप

जब भी क़िस्सा अपना पढना,
पहले चेहरा चेहरा पढना ।

तन्हाई की धूप में तुम भी,
बैठ के अपना साया पढना ।

आवाज़ों के शहर में रहकर,
सीख गया हूँ लहजा पढना ।

हर कोंपल का हाल लिखा है,
शाख का पीला पत्ता पढना ।

भेज के नामे याद दिला दो,
भूल गया हूँ लिखना पढना ।

लोगों मेरी प्यास का क़िस्सा,
सदियों दरिया दरिया पढना ।

दीवारों पर कुछ लिखा है,
तुम भी अपना कूचा पढना ।

हिज्र की शब् में नम आँखों से,
धुंधला धुंधला सपना पढना ।

माज़ी का आएना रख कर,
खुद को थोडा थोडा पढना ।

मैं हूँ संगे मील की सूरत,
मुझसे मेरा रस्ता पढना ।

जीस्त का मतलब क्या है “काज़िम”,
अपना अपना लिखना पढना ।। —- काज़िम जरवली

तेरा गाँव 

मैंने अभी तो दूर से देखा है तेरा गाँव,
लगता है मेरे शहर से अच्छा है तेरा गाँव ।

दिन रात कोई ज़िकर वहीँ का किया करे,
मेरे लिए तो शाम सवेरा है तेरा गाँव ।

बस तू है, और तेरे ही जलवे हैं चार सूं,
तू चाँद है तो चाँद का हाला है तेरा गाँव ।

अच्छा अगर लगे तो यही कर के देख ले,
ये शहर मेरा तेरा है, मेरा है तेरा गाँव ।

कुछ भी नहीं पसंद तेरे गाँव के सिवा,
मेरे लिए तो सारा ज़माना है तेरा गाँव ।

जी चाहता है उम्र इसी में गुज़ार दूँ,
सारा जहान धुप है साया है तेरा गाँव ।

साँसों में है अजीब सी खुशबु बसी हुई,
कुछ दिन से मेरे दिल में धड़कता है तेरा गाँव ।

“काज़िम” जो, तू कहे तो वहीँ आके बस रहूँ,
मेरे दिलो दिमाग पे छाया है तेरा गाँव ।। — काज़िम जरवली

इश्क-ए-मुक़द्दस

परिंदा अपने ही पर काटता है,
इन आँखों को ये मंज़र काटता है ।

सड़क पर जी नहीं लगता है मेरा,
मैं घर जाता हूँ तो घर काटता है ।

वो दीवाना बहुत होश्यार निकला,
वो आईने से पत्थर काटता है ।

मुझे काँटों पा है सोने की आदत,
मुझे फूलों का बिस्तर काटता है ।

जवाँ होता है जब इश्क-ए-मुक़द्दस,
रगे गर्दन से खंजर काटता है ।

अबस बदनाम हो जाते हैं दरिया,
किनारे तो समंदर काटता है ।

है “काज़िम” कौन जो आबे रवां पर,
लहू से प्यास लिख कर काटता है ।। — काज़िम जरवली

ओंस की बूंदे 

सेर है ओस की बूंदों से सवेरा कितना.
बह गया रात की आँखों से उजाला कितना ।

अपने दुश्मन की तबाही पा मे रोया कितना,
मुनफ़रिद है मेरे एहसास का लहजा कितना ।

धूप मक़तल में खड़ी पूछ रही है मुझसे,
है तेरे जिस्म की दीवार में साया कितना ।

हैं जिधर तेज़ हवाएं वो उधर जाता है,
है उसे अपने चराग़ों पा भरोसा कितना ।

अब मेरी प्यास समंदर से कहीं आगे है,
आजमाएगा मेरा ज़र्फ़ ये दरिया कितना ।

जब टपकता है, ज़मीं अर्श नज़र आती है,
इन्किलाबी है मेरे खून का क़तरा कितना ।

अपनी तन्हाई उसे भीड़ नज़र आती है,
आज वो शख्स है दुनिया में अकेला कितना ।

ग़ौर से देखो बता देते हैं चेहरे काज़िम,
किस में है दर्द छिपाने का सलीक़ा कितना ।। — काज़िम जरवली

टूटता सितारा

अभी तक बे ज़मीन-ओ-आसमां हूँ,
मैं इक टूटे सितारे की फुगा हूँ ।

हद-ए-इमकान में जब तू ही तू है,
मुझे इतना बता दे मैं कहाँ हूँ ।

मेरे अशआर मेरा काफ़िला हैं,
मैं खुद अपनी ज़मीनों पर रवां हूँ ।

मैं इन्सां हूँ, मोहब्बत मेरा मसलक,
मैं साज़े दैर हूँ, सोज़े अजां हूँ ।

मेरे अहबाब दरिया फूल झरने,
मैं जिनका हूँ उन्ही के दरमियाँ हूँ ।

शजर हूँ हॉल का अपने मैं अब भी,
न शाखे नौ न बर्गे रफ्त्गा हूँ ।

सहर को जो चहकते हैं परिंदे,
ये मेरे, और मैं इनका राज़दां हूँ ।

शबे ग़म का तसव्वुर है वहीँ तक,
जहाँ तक मैं शरीके दास्ताँ हूँ ।

मेरे शेरों में है थोड़ी सी उर्दू,
मैं “काजिम” इस लिए शीरीं बयां हूँ ।। — काज़िम जरवली

आवाज़ों का शहर

जब भी क़िस्सा अपना पढना,
पहले चेहरा चेहरा पढना ।

तन्हाई की धूप में तुम भी,
बैठ के अपना साया पढना ।

आवाज़ों के शहर में रहकर,
सीख गया हूँ लहजा पढना ।

हर कोंपल का हाल लिखा है,
शाख का पीला पत्ता पढना ।

भेज के नामे याद दिला दो,
भूल गया हूँ लिखना पढना ।

लोगों मेरी प्यास का क़िस्सा,
सदियों दरिया दरिया पढना ।

दीवारों पर कुछ लिखा है,
तुम भी अपना कूचा पढना ।

हिज्र की शब् में नम आँखों से,
धुंधला धुंधला सपना पढना ।

माज़ी का आएना रख कर,
खुद को थोडा थोडा पढना ।

मैं हूँ संगे मील की सूरत,
मुझसे मेरा रस्ता पढना ।

जीस्त का मतलब क्या है “काज़िम”,
अपना अपना लिखना पढना ।। —- काज़िम जरवली

रात की नींद

इक आन मे खामोश सी हो जाएगी,
हर एक सदा नींद मे सो जाएगी ।

इस दिल का कोई साथ कहाँ तक देगा,
कुछ देर मे ये रात भी सो जाएगी ।। — काज़िम जरवली

परछाईयाँ 

खून की मौजों से नम परछाईयाँ,
हैं नज़ारें मोहतरम परछाईयाँ ।

जिस्म कट सकता है खंजर से मगर,
हो नहीं सकती क़लम परछाईयाँ ।

बाल बिखराए हुए शाम आ गयी,
हो गयीं जिस्मों से कम परछाईयाँ ।

जिन्दगानी की हकीकत तेरा ग़म,
और सब रंजो आलम परछाईयाँ ।

ये ज़मीं देखेगी ऐसी दोपहर,
ख़ाक पर तोड़ेंगी दम परछाईयाँ ।

मोजिज़ा बन जा मेरी तशनालबी,
धूप पर करदे रक़म परछाईयाँ ।

ज़ुफिशा है ज़हन में सूरज कोई,
हैं मेरे ज़ेरे क़लम परछाईयाँ ।

सामने रौज़ा है, सूरज पुश्त पर,
हमसे आगे दस क़दम परछाईयाँ ।

हशर का सूरज सवा नैज़े पा है,
धूप है शाहे उमम परछाईयाँ ।

छुप गया काज़िम वो तशना आफताब,
ढूँढती हैं यम बा यम परछाईयाँ ।। — काज़िम जरवली

हुसैन 

खुद अपने खून का साया भी दोपहर भी हुसैन,
शहादतों का मुसाफिर भी और शजर भी हुसैन।

क़यामे सब्र भी, और सब्र का सफर भी हुसैन,
खुद अपने सब्र की मंज़िल भी, रहगुज़र भी हुसैन।

समांअतों में रसूलों की गूंजता ऐलान,
खबीर-ए-कलमा-ए-तौहीद भी, खबर भी हुसैन.

हुसैन बादे मोहम्मद भी कायमो बाक़ी,
वुजूदे हज़रते आदम से पेश्तर भी हुसैन।

वही चराग़, चरागों की रोशनी भी वही,
हयाते नौवे बशर भी, हयातगर भी हुसैन।

मुहाल भी है उसी शख्स के लिये मुमकिन,
बशीरे ग़ैब भी, और पैकरे बशर भी हुसैन।

बड़ा हसीन सलीक़ा है जान देने का,
कमाले इश्क़ भी, और इश्क़ का हुनर भी हुसैन।

सदा – ए – हर्फ़ वही है, वही जवाबे सदा,
पयम्बरों की दुआएं भी, और असर भी हुसैन।

बकाये रूह उसी के हिसारे नफ्स में है,
शहादतों का मदीना भी, और दर भी हुसैन।। — काज़िम जरवली

(यह रचना पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के नवासे इमाम हुसैन की शान मे है जिनका क़त्ल बड़ी निर्दयता से किया गया, वह मानवता के प्रेरणास्रोत हैं – गांधी जी का कथन है की मैंने अहिंसा का सबक इमाम हुसैन से सीखा)

नन्हे जुगनु

छीनने वालों दूसरो की हसी,
तुम कभी मुस्कुरा नहीं सकते।

कातिलों नन्हे जुगनुओ का लहू,
रौशनी है बुझा नहीं सकते ।। — काज़िम जरवली

तस्वीरें 

सोचता हूँ कि किससे बात करूँ.
सामने हैं हज़ार तस्वीरें ।

मुतमईन कुछ है अपने चेहरों से,
और कुछ बेकरार तसवीरें. ।। — काज़िम जरवली

चराग़-ए-सब्र 

कमान-ए-ज़ुल्म वो दस्ते ख़ता से मिलती है,
गले वो फूल की खुशबु हवा से मिलती है ।

बिखर रही है फ़ज़ा में अज़ान की शबनम,
वो रूहे लहन-ए-मुहम्मद सबा से मिलती है ।

समन्दरों को सुखा दे जो हिद्दत-ए-लब से,
हमें वो तशनालबी नैनवा से मिलती है ।

वफ़ा के दश्त में कासिम को देख लो सरवर,
फसील-ए-जिस्म तुम्हारी क़बा से मिलती है ।

चराग़-ए-सब्र को तनवीर बांटने के लिए,
बस एक रात की मोहलत जफा से मिलती है ।

बस एक वफ़ा की महक है जो चन्द प्यासों को,
फुरात तेरे किनारे हवा से मिलती है ।

कहा हुसैन ने मुझको छिपा लिया अम्मा,
यह रेत कितनी तुम्हारी रिदा से मिलती है ।। –काज़िम जरवली

पाँच सितारा होटल

याद आती है !!!
बांस की खाट पर बैठी हुई,
टेढ़े सींगो वाली पागुर करती काली बकरी ।।
याद आती है !!!

कच्ची दीवार की ओट से ।
चाँद के चेहरे पर बादल सी मैली ओढ़नी,
पुरानी चाँदी के मैले कंगन की ।।
याद आती है !!!

चमचमाते हुये पीतल के बर्तनो की ।
रामदास और दीन मोहम्मद के आँगन की,
दही, राब और लेमू की पत्ती से बने शरबत की ।।
याद आती है !!!

तुम किया सोच रहे हो ?
तुम तो पांच सितारा होटल मै हो !
मै किया जवाब दूँ ???

इन मै से कोई सितारा मेरे काम का नहीं ।
जो मेरे थे,
मेरी पलकों मे बसे हुए हैं ।।
कुछ मेरे गाँव की मिटटी मे रचे बसे हुएं हैं ।।। –”काज़िम” जरवली

पतझड़ 

पेड़ों की शाखें चुप हैं लुटा हुआ श्रृंगार लिए ,
पापी पछुवा के झोंको ने सारे वस्त्र उतार लिए ।

कब से रस्ता देख रहा है पतझड़ से सन्देश कहो ,
पीला पत्ता हरी मुलायम कोंपल का उपहार लिए ।

कितनी जल की धाराओं ने पाँव छुवा और लौट गयीं ,
मैं सागर तट पर बैठा हूँ तृष्णा का अंगार लिए ।

जल पथ पर तूफ़ान खड़े हैं पत्थर की दीवार बने ,
मांझी नौका मे बैठा है एक टूटी पतवार लिए ।

बाहर का है दृश्य कैसा नन्ही चिड़िया भय खाकर ,
छुपी घोंसले मे बैठी है छोटा सा परिवार लिए ।

नेत्रहीन निंद्रा है अपनी क्या देखू क्या ध्यान करूँ ,
घर से रैन चली जाती है सपनो का संसार लिए ।

हे दिनकर हे अम्बर पंथी उज्यारे के दूत ठहर ,
संध्या स्वागत को आयी है अन्धकार का हार लिए ।। “काज़िम” जरवली

वन्दे मातरम

बात सच्ची हो तो चाहे जिस ज़बा मे बोलिये,
फर्क मतलब पर नहीं पड़ता है ख़ालिक़ कि क़सम ।
“माँ के पैरो मे है जन्नत” क़ौल है मासूम का,
मै मुसल्ले पर भी कह सकता हुं “वन्दे मातरम” ।। –”काज़िम” जरवली

दोहे 

ये तो वक़्त बताएगा किसका गहरा वार,
एक जानिब तलवार है एक जानिब किरदार ।।
***

गर सर को मिल जाएगी तेरे दर की धूल,
अंगारे बन जायेंगे पाँव के नीचे फूल ।।
***

एक यही बस आएगा रोज़े महशर काम,
पाया है जो पाँच से मुट्ठी भर इस्लाम ।।
***

एक आंसू किरदार की मैली चादर धोये,
जिसको जन्नत चाहिए मजलिस मे वो रोये ।।
***

ये हमको मालूम है ये हमको है याद,
जितना उसको रोयेंगे उतने होंगे शाद ।।
***

लेता है अंगड़ाईयाँ जीने का एहसास,
हर मुश्किल का तोड़ है एक नाम-ऐ-अब्बास ।।
***

बदला है आशूर को जीवन का हर रूप,
कडवी कडवी छाँव है मीठी मीठी धूप ।।
***

मैंने तेरी राह में लीं यूँ आँखें मूँद ,
रौज़े की देहलीज़ पर जैसे मोम की बूँद ।।

ग़र्दिश-ए-दुनिया

मुफलिसी मे भी यहाँ खुद को संभाले रखना,
जेब खाली हो मगर हाथो को डाले रखना ।

रोज़ ये खाल हथेली से उतर जाती है,
इतना आसान नहीं मुह मे निवाले रखना ।

गाँव पूछेगा के शहर से किया लाये हो,
मेरे माबूद सलामत मेरे छाले रखना ।

ज़िन्दगी तूने अजब काम लिया है मुझ्से,
ज़र्द पत्तो को हवाओ मे संभाले रखना ।

जब भी सच बात ज़बां पर कभी लाना ”काज़िम”
ज़ेहन मे अपने किताबो के हवाले रखना ।। –”काज़िम” जरवली

ऊरूज-ए-आदमियत

अगर मैं आसमानों की खबर रखता नहीं होता,
ग़ुबार-ए-पाए-गेति मेरा सरमाया नहीं होता ।

ऊरूज-ए-आदमियत है मिज़ाजे ख़ाकसारी मे,
कभी मिटटी का दामन धूल से मैला नहीं होता ।

अगर हम चुप रहे तो चीख्ने चीखने लगती है ख़ामोशी,
किसी सूरत हमारे घर मे सन्नाटा नहीं होता ।

मै एक भटका हुआ अदना मुसाफ़िर, और वो सूरज है,
मेरे साये से उसके क़द का अंदाज़ा नहीं होता ।

हयाते-नौ अता होगी, हमें बे सर तो होने दो,
बहार आने से पहले शाख पर पत्ता नहीं होता ।

हमारी तशनगी सहराओ तक महदूद रह जाती
हमारे पाँव के नीचे अगर दरया नहीं होता ।

सफ़र की सातएंइन आती तो हैं घर तक मगर ”काज़िम”,
कभी हम खुद नहीं होते, कभी रास्ता नहीं होता ।। –”काज़िम” जरवली

लिबास-ऐ-शजर

लहु मे गर्क़ अधूरी कहानिया निकली,
दहन से टूटी हुई सुर्ख चूड़िया निकली ।

मै जिस ज़मीन पा सदियो फिरा किया तनहा,
उसी ज़मीन से कितनी ही बस्तिया निकली ।

जहा मुहाल था पानी का एक क़तरा भी,
वहा से टूटी हुयी चन्द कश्तिया निकली।

मसल दिया था सरे शाम एक जुग्नु को,
तमाम रात ख़यालों से बिजलिया निकली।

चुरा लिया था हवेली का एक छुपा मन्ज़र,
इसी गुनाह पर आँखों से पुतलियाँ निकली।

वो एक चराग़ जला, और वो रौशनी फैली,
वो राहज़नी के इरादे से आन्धिया निकली।

खुदा का शुक्र के इस अह्दे बे लिबासी मे,
ये कम नहीं के दरख्तो मे पत्तिया निकली।

वो बच सकी न कभी बुल्हवस परिन्दो से,
हिसारे आब से बाहर जो मछ्लिया निकली।

यही है क़स्रे मोहब्बत कि दास्ताँ ”काज़िम”,
गिरी फ़सील तो इंसा कि हड्डिया निकली ।। –”काज़िम” जरवली

संगे-जब्र

अपना दिल अब अपने दिल के अन्दर लगता है,
हम को मन्ज़र से अच्छा पस मन्ज़र लगता है ।

बिन ठहरे चलते रहते हैं हाथ, मगर फिर भी,
रात की रोटी तक आने मे दिन भर लगता है ।

ईंटो और गारो से जिनका रिश्ता कोई नहीं,
उनके नाम का दीवारों पर पत्थर लगता है ।

ज़ैसे कुछ होने वाला है थोड़ी देर के बाद,
शहर मे अब रातो को ऐसा अक्सर लगता है ।

उन बूढ़े बच्चो को, लोरी देकर कौन सुलाए,
रात को जिनका घर के बाहर, बिस्तर लगता है ।

बाते गर्म करो तुम लेकिन, ठन्डे लह्जे मे,
उनी कपड़ो मै रेशम का अस्तर लगता है ।

उसको अपने साये मे रक्खे, कैसे कोइ पेड़,
जिसको अपनी परछाई से भी डर लगता है ।

इन चांदी सोने वालो से ”काज़िम” दूर रहो,
इनकी कब्रों पर भी महंगा पत्थर लगता है ।। –”काज़िम” जरव

नुकूश 

बड़े हुनर से समेटे हैं दर-बदर के नुकूश ,
बजाये पाव के चेहरे पा हैं सफ़र के नुक़ूश ।

ये अह्द-ए-नौ के तक़ाज़े, ये कुछ थकी रस्मे,
नये मकान मे जैसे पुराने घर के नुक़ूश ।

हमारे फ़न कि कही भी नहीं है गुंजाईश,
वरक़ वरक़ है किसी साहिबे हुनर के नुक़ूश ।। –”काज़िम” जरवली

सराब-ऐ-हयात

सराबो से नवाज़ा जा रहा हूँ,
आमीर-ए-दश्त बनता जा रहा हूँ ।

मैं खुशबु हु यह दुनिया जानती है,
मगर फिर भी छुपाया जा रहा हुं ।

ज़माना मुझ्को सम्झे या न सम्झे,
मै एक दिन हूँ, जो गुज़रा जा रहा हूँ ।

मेरे बाहर फ़सीले आहनी है,
मगर अन्दर से टुटा जा रहा हूँ ।

मेरे दरिया, हमेशा याद रखना,
तेरे साहिल से पियासा जा रहा हूँ ।

तुम अब थकती हुई नज़रे झुका लो,
बुलंदी से मै उतरा जा रहा हूँ ।। –”काज़िम” जरवली

हंसती हुई कली 

यां ज़िन्दगी के नक्श मिटाती है ज़िन्दगी,
यां अब चिराग पीता है खुद अपनी रौशनी।

इन्सां का बोझ सीना-ऐ-गेती पे बार है,
हर वक़्त आदमी से लरज़ता है आदमी ।

रेत उड़ रही है सूखे समंदर की गोद मे,
इंसान खून पी के बुझाता है तशनगी ।

वो दौर आ गया है कि अफ़सोस अब यहाँ,
मफहूम इन्किसार का होता है बुज़दिली ।

पैदा हुए वो ज़र्फ़ के ख़ाली सुखन नवाज़,
इल्मो-ओ-अदब कि हो गयी दीवार खोखली ।

पिघला रही है बर्फ मुहब्बत का चार सु ,
नफरत कि आग जिस्मो के अन्दर छुपी हुई ।

रंगीनियाँ छुपी है दिले सन्ग सन्ग मे ,
होंटो पे फूल बन के टपकती है सादगी ।

ढा देगी बर्फ बनके हक़ीक़त कि एक बूँद,
कितने दिनों टिकेगी ईमारत फरेब की ।

शिकवे जहाँ के भूल गया ज़ेहन देखकर ,
“काज़िम” शजर की शाख पे हंसती हुई कली ।। –काज़िम जरवली

ज़ुल्मते शब्

पता नहीं है उजालो को वुसअते शब् का,
तहे चिराग भी क़ब्ज़ा है ज़ुल्मते शब् का ।

गुलो मे सर को छुपाये सिसक रही है हवा,
सहर के हाथ मे दमन है रुखसते शब् का ।

ये कहकशां है ग़ुबारे सफ़र का आईना ,
ये चाँद नक्श-ऐ-कफे पा है हिजरते शब् का ।

बता रहें हैं किसी के खुले हुए घेंसू ,
हवा की ज़द पे खज़ाना है नकहते शब् का ।

ठहर के ओंस की बूंदे शजर के पत्तो पर ,
इलाज ढूँढ रही हैं हरारते शब् का ।

थका थका सा उजाला डरी डरी आँखें ,
बहुत अजीब है मंज़र तिलावते शब् का ।। —काज़िम जरवली

वो एक अश्क जो “काज़िम” है ता सहर बाक़ी,
वही चराग़ मुजाविर है तुर्बते शब् का ।।

खुशबुए गुल

जब शाम हुई अपने दीये हमने जलाये ,
सूरज का उजाला कभी शब् तक नही पहुंचा ।

जिस फूल मे खुशबु थी उधर सर को झुकाया ,
हर फूल के मै नाम-ओ-नसब तक नही पहुंचा ।।

मै जिंदा हूँ 

हवा में ज़हर घुला है मगर मै जिंदा हूँ ,
हर एक सांस सज़ा है मगर मै जिंदा हूँ ।

किसी को ढूंडती रहती हैं पुतलियाँ मेरी,
बदन से रूह जुदा है मगर मै जिंदा हूँ ।

मेरे ही खून से रंगीं है दामने क़ातिल ,
मेरा ही क़त्ल हुआ है मगर मै जिंदा हूँ ।।

आँधियों का सफ़र

मै लाख सच था, मगर सच पा ध्यान देता कौन,
बिकी हुई थीं ज़बाने बयान देता कौन ।

जब आँधियों ने किया था हमारे घर का सफ़र,
सभी थे महवे तमाशा अज़ान देता कौन ।

न रंगता अपना ही चेहरा तो और क्या करता,
हमारे खून को “काज़िम” अमान देता कौन । —काज़िम जरवली

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