कामिल बहज़ादी की रचनाएँ

आकाश की हसीन फ़ज़ाओं में खो गया

आकाश की हसीन फ़ज़ाओं में खो गया
मैं इस क़दर उड़ा की ख़लाओं में खो गया

कतरा रहे हैं आज के सुक़रात ज़हर से
इंसान मस्लहत की अदाओं में खो गया

शायद मिरा ज़मीर किसी रोज़ जाग उठे
ये सोच के मैं अपनी सदाओं में खो गया

लहरा रहा है साँप सा साया ज़मीन पर
सूरज निकल के दूर घटाओं में खो गया

मोती समेट लाए समुंदर से अहल-ए-दिल
वो शख़्स बे-अमल था दुआओं में खो गया

ठहरे हुए थे जिस के तले हम शिकस्ता पा
वो साएबाँ भी तेज़ हवाओं में खो गया

एक भटके हुए लश्कर के सिवा कुछ भी नहीं 

एक भटके हुए लश्कर के सिवा कुछ भी नहीं
ज़िंदगानी मिरी ठोकर के सिवा कुछ भी नहीं

आप दामन को सितारों से सजाए रखिए
मेरी क़िस्मत में तो पत्थर के सिवा कुछ भी नहीं

तेरा दामन तो छुड़ा ले गए दुनिया वाले
अब मिरे हाथ में साग़र के सिवा कुछ भी नहीं

मेरी टूटी हुई कश्ती का ख़ुदा हाफ़िज़ है
दूर तक गहरे समुंदर के सिवा कुछ भी नहीं

लोग भोपाल की तारीफ़ किया करते हैं
इस नगर में तो तिरे घर के सिवा कुछ भी नहीं

साया-ए-ज़ुल्फ़ नहीं शोला-ए-रूख़्सार नहीं 

साया-ए-ज़ुल्फ़ नहीं शोला-ए-रूख़्सार नहीं
क्या तिरे शहर में सरमाया-ए-दीदार नहीं

वक़्त पड़ जाए तो जाँ से भी गुज़र जाएँगे
हम दिवाने हैं मोहब्बत के अदाकार नहीं

क्या तिरे शहर के इंसान है पत्थर की तरह
कोई नग़्मा कोई पायल कोई झंकार नहीं

किस लिए अपनी ख़ताओं पे रहें शर्मिंदा
हम ख़ुदा के हैं ज़माने के गुनहगार नहीं

सुर्ख़-रू हो के निकलना तो बहुत मुश्किल है
दस्त-ए-क़ातिल में यहाँ साज़ है तल्वार नहीं

मोल क्या ज़ख़्म-ए-दिल-ए-ओ-जाँ का मिलेगा ‘कामिल’
शाख़-ए-गुल का भी यहाँ कोई ख़रीदार नहीं

ये किस ने दूर से आवाज़ दी है 

ये किस ने दूर से आवाज़ दी है
फ़ज़ाओं में अभी तक नग़्मगी है

सितारे ढूँडते हैं उन का आँचल
शमीम-ए-सुब्ह दामन चूमती है

तअल्लुक़ है न अब तर्क-ए-तआलुक़
ख़ुदा जाने ये कैसी दुश्मनी है

रिदा-ए-ज़ुल्फ़ में गुज़री थी इक शब
मगर आँखों में अब तक नींद सी है

मिरी तक़्दीर में बल पड़ रहे हैं
तिरी ज़ुल्फ़ों में शायद बरहमी है

ये ज़माना कहीं मुझ से न चुरा ले मुझ को

ये ज़माना कहीं मुझ से न चुरा ले मुझ को
कोई इस आलम-ए-दहशत से बचा ले मुझ को

मैं इसी ख़ाक से निकलूँगा शरारा बन कर
लोग तो कर गए मिट्टी के हवाले मुझ को

कोई जुगनू कोई तारा न उजाला देगा
राह दिखलाँएगे ये पाँव के छाले मुझ को

उन चराग़ों में नहीं हूँ कि जो बुझ जाते हैं
जिस का जी चाहे हवाओं में जला ले मुझ को

दर्द की आँच बढ़ेगी तो पिघल जाऊँगा
अपने आँचल में कोई आ के छुपा ले मुझ को

इस क़दर मैं ने सुलगते हुए घर देखे हैं
अब तो चुभने लगे आँखों में उजाले मुझे को

तजि़्करा मेरा किताबों में रहेगा ‘कामिल’
भूल जाएँगे मिरे चाहने वाले मुझ को

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