किरण अग्रवाल की रचनाएँ

रोबोट 

और एक दिन नींद खुलेगी हमारी
और हम पाएँगे
कि आसमान नहीं है हमारे सिर के ऊपर
कि प्रयोगशालाओं के भीतर से निकलता है तन्दूरी सूरज
कि पक्षी अब उड़ते नहीं महज फड़फड़ाते हैं
और पेड़ पेड़ नहीं ठूँठ नाम से जाने जाते हैं
कि कोख कोख नहीं जलता हुआ रेगिस्तान है
और हृदय सम्वेदन शून्य, बर्फ़ उगलता एक शमशान
और एक दिन डिक्शनरी खोलेंगे हम
और देखेंगे
कि ’आज़ादी’ शब्द हमारे शब्दकोश में नहीं है
कि माता-पिता, प्रेम, दया जैसे उद्‌गार
औबसलीट हो गए हैं अब
और तब बदहवास से
डिस्क में बंद अतीत को स्क्रीन पर टटोलते
हम जानेंगे
कि हम इन्सान नहीं रोबोट हैं

आज़ादी की चौवनवीं वर्षगाँठ पर

हृदय खाली है
सम्वेदनाएँ सुन्न
कैसे गाऊँ देशभक्ति का कोई गीत
आज़ादी की चौवनवीं वर्षगाँठ पर
जबकि आज़ादी शब्द का अर्थ
भूल चली हूँ मैं
गांधी, नेहरू, सुभाष, भगतसिंह और आज़ाद
महज नाम हैं चन्द
और स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए बहाया गया लहू
महज एक विवरण
जिन्हें परीक्षा भवन के भीतर ही याअ रखा जाता है सिर्फ़
इतिहास के पर्चे में
और इतिहास का पर्चा दिए
एक ज़माना गुज़र गया मुझे

आधी रात को एक आवाज़ 

आधी रात को
एक आवाज़ उगती है
अँधेरे के आवेष्टित अंगों पर
फ़ैलती जाती है
एच०आई०वी० वायरस की तरह
गली-कूचों में
आसमान में
दस्तक दे रही है
बन्द खिड़कियों पर
झाँक रही है
खुले रोशन्दान से
उतर आई है रेंगकर नीचे
बिस्तर पे
सहम के
अलग हो गए हैं प्रेमी युग्म
टटोल रहे हैं अनधिकृत आवाज़ को
उलझ गए हैं एक-दूसरे के अभिलाषित आगोश में फिर
टेलीविजन पर रो रहा है एक अनाथ बच्चा
पोस्टरों पर चिपका है एक सुखी परिवार
कॉण्डम के विज्ञापन के साथ
अख़बारों में लड़ी जा रही है एक लावारिस लड़ाई
मौत ले रही है मदहोश अंगड़ाई
आधी रात को
सहसा जग गई हूँ मैं
तरन्नुम में गा रहा है कोई।

औरतें कविताएँ नहीं पढ़तीं

औरतें साहित्यिक पत्रिकाएँ नहीं पढ़तीं
वे मनोरमा पढ़ती हैं
पढ़ती हैं वे गृहशोभा, मेरी सहेली और वनिता
पुरुष को वश में करने के नुस्खे तलाशती हैं वे
और बुनाई की नई-नई डिजाइनें
रेसिपी नए-नए व्यंजनों की

कुछ आधुनिक औरतें फेमिना पढ़ती हैं
और डिबोनेयर
देखती हैं स्त्री-देह को परोसा हुआ बाज़ार में
और अपनी देह को स्थानान्तरित कर लेती हैं वहाँ

औरतें कविताएँ नहीं पढ़तीं
लेकिन लिखती हैं
और गाड़ देती हैं अँधेरे तहख़ानों में
भूल जाने के लिए
जहाँ से युगों के बाद
कोई पुरातत्त्ववेत्ता
खोद कर निकालता है एक पूरी सभ्यता

औरतें इतिहास रचती हैं
और खाली छोड़ देती हैं अपने नाम की जगह

वलय 

उसने कहा – वापस लौट जाओ
मैंने कहा – नहीं लौटूंगी
उसने कहा – ठोकर खाओगी
मैंने कहा – तैयार हूँ
वह चुप हो गया
मैं बोलती रही
वह वलय में खो गया
मैं उसे ढूँढ़ती रही
और एक दिन मैंने पाया
कि वह मेरे भीतर-बाहर चारों ओर है
व्याप्त है हर धड़कन में
छूता है मुझे
बतियाता है मुझसे
मेरा सबसे अधिक अपना है।

खिड़की

उस खिड़की से कोई देता है आवाज़ मुझे
बार-बार
कहता है मत समेटो अपने को
खुल जाओ
बाहर आओ
इस अनन्त विस्तार में घुल जाओ
उतार डालो
एक-एक कर
समस्त आवरण
अपने को अपनी ही नग्नता में पहचानो
बना लो इसको अपनी ढाल
फिर कोई डर नहीं तुम्हें
किसी का डर नहीं तुम्हें
कोई देता है मुझे आवाज़
उस खिड़की से
जो खुलती है अनन्त की ओर

प्रकाश की दुनिया 

मेरे सामने है प्रकाश की दुनिया
वहाँ अंधकार नहीं है
वहाँ दूख नहीं है
वहाँ आनन्द है और बस आनन्द है
मेरे सामने खुला है द्वार प्रकाश की दुनिया का
मैं जाती हूँ वहाँ
लेकिन लौट-लौट कर वापिस आती हूँ
अपनी इसी दुनिया में
मैं अकेले नहीं रहना चाहती वहाँ
मैं अपने परिवार के साथ वहाँ जाना चाहती हूँ
और सारी दुनिया है मेरा परिवार
मैं अपनी दुनिया के साथ
प्रविष्ट होना चाहती हूँ प्रकाश की दुनिया में

पूछती हैं बेटियाँ 

माँ ! यह व्रत किसके लिए कर रही हो तुम ?
पूछती हैं बेटियाँ
तेरे बाबूजी के लिए कर रही हूँ
बोलती हूँ मैं
और देने लगती हूँ चन्द्रमा को अर्ध्य

माँ ! यह व्रत किसके लिए कर रही हो तुम ?
पूछती हैं बेटियाँ
तेरे भैया के लिए कर रही हूँ
बोलती हूँ मैं
और देने लगती हूँ तारों को अर्ध्य

माँ ! यह व्रत किसके लिए कर रही हो तुम ?
पूछती हैं बेटियाँ
तेरे बाबूजी और तेरे भैया के लिए कर रही हूँ
अपने परिवार की खुशहाली के लिए कर रही हूँ
बोलती हूँ मैं
और काढ़ने लगती हूँ सकट देवता चकले पर गंगोटी से

माँ ! बेटियों के लिए व्रत किस दिन करोगी तुम ?
पूछती हैं बेटियाँ
हमारे शास्त्रों में ऐसे किसी व्रत का विधान नहीं है
बोलती हूँ मैं
रोली और तिल के छींटे सकट देवता पर लगाते हुए

माँ ! तो क्या हम तुम्हारे परिवार के बाहर हैं ?
पूछती हैं बेटियाँ
यह कैसी बातें करती हो तुम सब !

मैं सिर उठाकर देखती हूँ बेटियों को भरपूर नजर
माँ ! हम धर्म-शास्त्रों को बदल डालेंगे
हम क्यों मानें धर्म को या शास्त्र को
जो हमें नहीं मानता…

बहुत जबान चलने लगी है तुम लोगों की
खाली खा-खाकर मोटी हो रही हो
थप्पड़ मारने के लिए उठा मेरा हाथ
बीच में ही रुक गया है
लगता है बेटियों की जगह मैं खड़ी हूँ
और पूछ रही हूँ अपनी माँ से
माँ ! मेरे लिए व्रत किस दिन रखोगी तुम ?

वह और रोटी

उसकी आँखों में एक रोटी थी
गोल-मटोल
भाप उगलती हुई
स्टीम इंजन की तरह
जो पिछली शताब्दी ने दी थी उसे एक सुबह
फिर शताब्दी का राम-नाम सत्य हो गया
ठीक उसकी माँ की तरह

अब वह है और नई शताब्दी
नई शताब्दी की आँखों में नए सपने हैं
ग्लोबलाइजेशन के
नई शताब्दी की आँखों में हैं बिल क्लिंटन और बिल गेट्स
लैपटॉप और मोबाइल्स और इन्टरनेट
और उसकी आँखों में उसकी मरी हुई माँ है
और एक गोल-मटोल रोटी
भाप उगलती हुई
जो पिछली शताब्दी में उसने खाई थी माँ के हाथों से

गुफ़्तगू

अगर मैं रख दूँ शब्द तुम्हारी गर्दन पर
ठीक जिबह होते जानवर की
गर्दन पर रखे चाकू की तरह
जानती हूँ
तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे
और यही करना है मुझे
तुमने किया है इस्तेमाल चाकू का
आदमी को मारने के लिए
मुझे करना है शब्दों का इस्तेमाल
धारदार चाकू की तरह
इज़ाद करनी है वह भाषा
जो मेरी क़लम के इशारों की चेरी हो
जब तक इन्सान और इन्सानियत के बीच
गुफ़्तगू न हो जाए शुरू
विश्वास जानो
तुम्हें चैन से नहीं बैठने देना मुझे

वह कुछ नहीं कहता 

कहाँ गई वो गरमाहट अँगुलियों की
संवेदनाओं के रंगों में डूबे
आकार ग्रहण करते
एक-एक अक्षर
गुस्सा, प्यार, सुगबुगाहट, बैचेनी

कहाँ गई एक-एक शब्द में लिपटी
तुम्हारी आँखों की नमी
तुम्हारे थरथराते लबों से लेकर
तुम्हारी काँपती अँगुलियों तक
फैलती जाती भाव-तरंग
जो कर देती थी तुम्हारे अक्षरों को
टेढ़ा-मेढ़ा
थोड़ा इधर या उधर

मेरे हाथ में तुम्हारा मशीनी-पत्र है
कम्प्यूटर पर लिखा गया
जहाँ सिर्फ़ तुम्हारा हस्ता़क्षर है
तुम्हारी हस्तलिपि का चश्मदीद गवाह

लेकिन वह भी कुछ नहीं कहता
नहीं हिलाता अपने हाथ-पैर-मुँह-गर्दन
बस अपनी सर्द आँखों से
ताकता है एकटक शून्य में
मानो उसी स्थिति में फ़्रीज हो गया हो

कविता के इलाके में

कविता के इलाके में
पुलिस से भाग कर नहीं घुसी थी मैं
वहाँ मेरा मुख्य-कार्यालय था
जहाँ बैठकर
जिन्दगी के कुछ महत्त्वपूर्ण फैसले करने थे मुझे

यह सच है तब मैं हाँफ रही थी
मेरी आँखों में दहशत थी
पर कोई ख़ून नहीं किया था मैंने
लेकिन मैं चश्मदीद गवाह थी अपने समय की हत्या की
जिसे ज़िन्दा जला दिया गया था धर्म के नाम पर

मैं पहचानती थी हत्यारों को
और हत्यारे भी पहचान गए थे मुझे
वे जो ढलान पर दौड़ते हुए मेरे पीछे आए थे
वह पुलिस नहीं थी
पुलिस की वर्दी में वही लोग थे वे
जो मुझे पागलों की तरह ढूँढ़ रहे थे
जो मिटा देना चाहते थे हत्याओं के निशान

किसी तरह उन्हें डॉज दे
घुस ली थी मैं कविता के इलाके में
और अब एक जलती हुई शहतीर के नीचे खड़ी हाँफ रही थी
जो कभी भी मेरे सिर पर गिर सकती थी

दंगाई मुझे ढूँढ़ते हुए यहाँ तक आ पहुँचे थे
मुझे उनसे पहले ही अपने मुख्य-कार्यालय पहुँचना था
और निर्णय लेना था कि किसके पक्ष में थी मैं
मुझे एक वसीयत लिखनी थी आने वाली पीढ़ी के नाम
और छुपा देना था उसे कविता की सतरों के भीतर
मुझे बनानी थी हत्यारों की तस्वीर
और लिख देने थे उनके नाम और पते

सूर्योदय 

सूरज पूरब से नहीं निकला आज
न पश्चिम से
सूरज निकला आज
एक साहित्यकार की कामान्ध कलम से

कुछ अलसाया-सा
कुछ भरमाया-सा
अपने स्खलित वीर्य को
उषा की अधखुली जंघाओं पर बिखेरता

देखते ही देखते
केबल टी०वी० के
नेटवर्क में उलझ गया

मध्याह्न

दोपहर में फिर दिखा सूरज मुझे
संसद भवन के चक्कर लगाता
घोटालों की दुनिया में
छुपता-छुपाता

एक मंत्री की
भारी-भरकम
कुर्सी पर बैठा हुआ ।

सूर्यास्त

महानगर के पीछे
सूरज डूब गया

गटर में
काला पड़ गया आसमान

ज्यों इन्सान के चेहरे के पीछे
इन्सानियत ।

लापता सूरज

दूसरे दिन
अख़बार के मुखपृष्ठ पर
था सनसनीखेज समाचार
सूरज लापता हो गया

कद : असंख्य किरणों फुट
रंग : सोने-सा तपता हुआ
उम्र : कोई नहीं जानता

अन्तिम बार उसे
बापू की समाधि पर देखा गया था

उस दिन हो रही थी लगातार बरसात
आकाश था बादलों से आच्छन्न
कहीं नहीं था सूरज का नामोनिशान

प्रतिक्रिया 

लोग थे हैरान / परेशान
धरती होती जा रही थी
जल-निमग्न

जमुना कसमसा रही थी
अपनी परिधि में
इच्छाएँ थीं
भ्रष्टाचार के पुल-सी भग्न
प्रेयसी की मांसल देह
खो चुकी थी आज अपनी आँच

बन्द
कमरों में भी
लोग काँप रहे थे

खोज 

और तब
शुरू हुई खोज
सूरज की

आसमान से लेकर
धरती तक
प्रधानमंत्री के बँगले से
झुग्गी-झोंपड़ी तक
सारे क़ब्रिस्तानों
और समाधियों को
छान डाला गया

अन्त में
सूरज एक अँधेरे गोदाम में मिला
आर०डी०एक्स० के ढेर पर सोया हुआ

इति 

एक भयभीत ख़ुशी
चूम गई
लोगों के कुम्हलाए चेहरों को
वे समवेत चिल्लाए—
‘सूरज भाई उठो
अपने घर चलो
देखो तुम्हारे बिना हमारी क्या दशा हो गई’
‘हू डेयर्ड टु वेक मी अप फ़्रॉम माई ड्रीम ?’
सूरज ने खोल दीं अपनी रक्तिम आँखें
‘लेट मी हैव वन ए०के०-42 राइफ़ल ऐट लीस्ट’
वह मुस्कराया
और आसमान पर चढ़ आया

धमकी 

उन्होंने मुझे धमकी दी
‘जो कुछ तुम कर रही हो अच्छा नहीं कर रही हो
वापस लौट आओ
हमारा कहा नहीं मानेगी तो मारी जाओगी
जान प्यारी है तो वापस लौट आओ’

मैंने कहा ‘मुझे जान प्यारी नहीं है
तुम चाहो तो मार सकते हो मुझे’

उन्होंने एक तमंचा निकाला
और मेरी कनपटी से लगा दिया
‘अब क्या कहती है जबान-दराज़ औरत!’

‘अब भी मेरा वही कहना है
तुम चाहो तो खुशी से मार सकते हो मुझे’

उन्होंने तमंचा मेरी कनपटी से हटाकर
वापस अपनी जेब में डाल लिया!

दाखिल 

वे मनुवादी दरवाजे़ से भीतर दाखिल हुए
और लाइन में सबसे आगे खड़े हो गए
एक लम्बी दुनिया उनके पीछे थी
थकी-हारी और टूटी
पर विश्वास से आगे सरकती हुई

वे इस दुनिया का हिस्सा होते हुए भी इस दुनिया से ऊपर थे
वे आम कायदे कानून से ऊपर थे

उन्होंने एक गुप्त कमरे में जाकर गुप्त मंत्रणा की
उन्होंने एक गूंगी-कमसिन बच्ची पर
अपना पौरुष सिद्ध किया
उन्होंने भगवान को अपनी पूजा अर्पित की
और बाहर खड़ी वातानुकूलित कार में बैठ
उड़न-छू हो गए!

एक लम्बी दुनिया पसीने में डूबी
सरकती रही उनके पीछे-पीछे…

परहेज

मैं सांस लेना चाहती हूं करवट बदलती
इस दुनिया में
मैं भी सदियों की कैद से मुक्त हो
खोल देना चाहती हूं
अपने पंख
मैं उन आदमियों की स्याह बस्तियों में
जाना चाहती हूं
जिनकी परछाई से भी दूर रहे
हमारे पुरखे
जो खेतों में हमारे लिए
पैदा करते रहे अनाज
जो हमारे घर-बाहर को
साफ-सुथरा बनाते रहे
जो हमारे देवी-देवताओं को
तराशते रहे हमारे लिए
लेकिन जिनके मुंह पर बंद होते रहे
हमारे मंदिरों के पट
मैं उनके पास बैठ उनसे
पूछना चाहती हूं
उन्हें तो मेरी परछाई से
कोई परहेज नहीं…?

एक थी अच्छी लड़की 

एक थी अच्छी लड़की
सात भाइयों की बहन प्यारी
माँ-बाप की दुलारी

उसके साथ की बाक़ी लड़कियाँ ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगातीं
लेकिन अच्छी लड़की कभी ज़ोर से नहीं हँसती थी
बाक़ी लड़कियाँ जानबूझकर
किसी भी राह चलते मजनूँ से टकरा जातीं

उनके चंचल चितवन
चकरघिन्नी की तरह
चारों ओर का जायजा लेते
और उनके दिमाग़ में सदा किसी कारस्तानी के बीज अँकुराते रहते
लेकिन अच्छी लड़की चुपचाप
इन सबसे दूर
एक किनारे चलती रहती

उसका सिर सदा नीचे धरती में धँसा रहता
पास-पड़ोस के लोग
उसे ईर्ष्यापूर्ण नज़रों से ताकते
और अपनी लड़कियों की बेशरमी पर
अपने भाग्य को कोसते
उनकी डाँट-डपट का भी
उन आवारा लड़कियों पर
कोई असर नहीं पडता था

एक बार पता नहीं कैसे क्या हुआ
उस अच्छी लड़की को एक लड़के से प्यार हो गया
जब उसके घरवालों को इस बारे में पता चला
तो उन्होंने अच्छी लड़की को समझाया —

जो हुआ सो हुआ
अब इस अध्याय को यहीं समाप्त कर दो
क्योंकि अच्छी लड़कियाँ प्रेम नहीं करतीं
लोगों को पता चलेगा तो कितनी बदनामी होगी
लज्जा से हमारा सिर नीचे झुका जाएगा

अच्छी लड़की मन ही मन रोई
लेकिन उसने अपना सिर चुपचाप नीचे झुका लिया
जल्दी ही गाजे-बाजे के साथ
अच्छी लड़की की शादी हो गई
ससुराल में सास-ससुर ख़ुश थे
कि उन्हें इतने सुविचारों वाली कमेरी बहू मिली

जेठ-जेठानी ख़ुश थे
नंद-नंदोई ख़ुश थे
ख़ुश था अच्छी लडकी का पति परमेश्वर
इतनी आज्ञाकारिणी, सर्वगुण सम्पन्न पत्नी को पाकर
सब ख़ुश थे

बस एक अच्छी लड़की ख़ुश नहीं थी
दूसरों का जीवन जीते-जीते वह थक चुकी थी
वह एक बुरी लड़की बनना चाहती थी

ख़ानाबदोश औरत

ख़ानाबदोश औरत
अपनी काली, गहरी पलकों से
ताकती है क्षितिज के उस पार

सपना जिसकी आँखों में डूबकर
ख़ानाबदोश हो जाता है
उसकी ही तरह
समय
जो लम्बे-लम्बे डग भरता
नापता है ब्रह्मांड को

समय
जिसकी नाक के नथुनों से
निकलता रहता है धुआँ
जिसके पाँवों की थाप से
थर्राती है धरती

दिन
जिसके लौंग-कोट के बटन में उलझकर
भूल जाता है अक्सर रास्ता
औरत उसके दिल की धडकन है
रूक जाए
तो रूक जाएगा समय

और इसलिए टिककर नहीं ठहरती कहीं
चलती रहती है निरन्तर ख़ानाबदोश औरत
अपने काफ़िले के साथ
पडाव-दर-पडाव

बेटी — पत्नी — माँ….
वह खोदती है कोयला
वह चीरती है लकडी
वह काटती है पहाड
वह थापती है गोयठा
वह बनाती है रोटी
वह बनाती है घर
लेकिन उसका कोई घर नहीं होता

ख़ानाबदोश औरत
आसमान की ओर देखती है तो कल्पना चावला बनती है
धरती की ओर ताके तो मदर टेरेसा
हुँकार भरती है तो होती है वह झाँसी की रानी
पैरों को झनकाए तो ईजाडोरा

ख़ानाबदोश औरत
विज्ञान को खगालती है तो
जनमती है मैडम क्यूरी
क़लम हाथ में लेती है तो महाश्वेता
प्रेम में होती है वह क्लियोपैट्रा और उर्वशी
भक्ति में अनुसुइय्या और मीरां

वह जन्म देती है पुरूष को
पुरूष जो उसका भाग्य-विधाता बन बैठता है
पुरूष जो उसको अपने इशारे पर हाँकता है
फिर भी बिना हिम्मत हारे बढ़ती रहती है आगे
ख़ानाबदोश औरत

क्योंकि वह समय के दिल की धडकन है
अगर वह रूक जाए
तो रूक जाएगी सृष्टि

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