किरण मल्होत्रा की रचनाएँ

विविधता

पौधों की तरह
लोगों की भी
कई किस्में हैं
कई नस्लें हैं

कुछ लोग
गुलाब की तरह
सदा मुस्कुराते हुए
कुछ रजनीगंधा की तरह
सिर्फ शामों में
महकते हुए
कुछ बरगद की तरह
जीवन की
गहराईयों और
सुदूर आकाश तक
फैले हुए
कुछ घास की तरह
गहराईयों और ऊँचाइयों से
अनभिज्ञ
जीवन की ऊपरी तह तक
सिमटे हुए

कुछ सूरजमुखी की तरह
बाह्यमुखी
कुछ छुईमुई की तरह
अंतर्मुखी
कुछ धतूरे की तरह
जहरीले
कुछ नागफनी की तरह
कंटीले
कुछ सदाबहार की तरह
हरदम साथ निभाने वाले
कुछ मौसमी फूलों की तरह
मौसम के साथ बदलने वाले

प्रकृति
कितनी विविधता
तुममें समाई
बहुत जानकर भी
आँखे कहाँ
जिन्दगी को
ठीक से
समझ पाई

जीवन के अर्थ

तुमने जो कहा
वो
मैं समझी नही
मैने
जो समझा
वो
तुमने कहा नही

इस
कहने-सुनने में
कितने दिन
निकल गए
और
फिर समझने में
शायद
पूरी जिन्दगी
निकल जाए

लेकिन
फिर भी
अगर तुम
मेरी समझ को
समझ सको
किसी दिन
ज़िन्दगी को
शायद
अर्थ मिल जाए
उस दिन

आकाश के आंगन में 

आकाश के आंगन में
खरगोश-सी सफ़ेद
रेशम-सी कोमल
छोटी-छोटी बदलियाँ

कल थी
आज नहीं हैं
जैसे यादें कुछ पुरानी
कल थी
आज नहीं हैं

मन भी शायद
एक आकाश है
कभी पल में
उमड़ती-घुमड़ती
घटाएँ घनघोर
तो कभी
मीलों तक
लंबी खामोशियाँ…

कुछ पल

कुछ पल
साथ चले भी
कोई
तो क्या होता है
क़दम-दर-क़दम
रास्ता तो
अपने क़दमों से
तय होता है

कुछ क़दम संग
चलने से फिर
न कोई अपना
न पराया होता
बस, केवल
वे पल जींवत
और
सफ़र सुहाना होता है

बेटियाँ 

बेटियाँ
मन का वह
कोमल हिस्सा होती
जहाँ असहनीय होता
कुछ भी सहना

जरा सी वेदना
रूलाती ज़ार-ज़ार
विश्व सम्राट पिता को

बेटियों के
प्रेम में बंधा मन
करता व्याकुल

हो जाता जैसे
पल में पराजित
सुलगता
मंदिर की धूनी-सा
जब देखता
खिली धूप-सी
बेटी की
ठहरी सूनी आँखें

ज़िन्दगी भी तो ऐसे ही 

अच्छा लगता है
कभी कभी यूँ ही
गाड़ी में से
पीछे छूट रहे
पेड़ो को देखना
हरे-भरे खेतों का
नजरों से फिसलना
और अपलक
आकाश को निहारना
ज़िन्दगी भी
ऐसे ही
सब कुछ
पीछे छोड़ती हुई
अपनी ही
धुन में खोई
बढ़ती चली जाती है
जिसमें कितने शख़्स
पेड़ो की तरह
पीछे छूट गए
कितने हसीन लम्हें
आँखों से फिसल गए
कितने ख़यालों के बादल
जाने कहाँ उड़ गए
लेकिन आकाश ने
सदा मेरा
साथ निभाया
अंधेरे में
उजाले में
एक दोस्त की तरह
अपना हाथ बढ़ाया
कितना अपना पन
यूँ ही
मुझ पर जतलाया

क्य़ूँ नहीं हम भी

लफ़्ज़ मेरे
कह नहीं पाते
दिल की आवाज़
तुम भी नहीं
सुन सकते
दोनों की
अपनी-अपनी
मज़बूरियाँ हैं
पास होने पर भी
शायद इसलिए
रहती दूरियाँ हैं
बोल कुछ
अनकहे
क्यूँ नहीं
हम समझ पाते
या फिर कहीं
जानकर भी
अनजान बने रहते
अपने ही
ख़यालों में खोए
आवारा बादल की तरह
अपने ही आकाश में
भटकते रहते
एक गहरी बदली
बन कर
क्यूँ नहीं हम भी
कुछ पल के लिए
बरस पाते

एक गहरा अहसास

कभी लगता
जैसे पूरी ज़िन्दगी
कभी न
ख़त्म होने वाली
अमावस की
रात है
सैकड़ों सितारे
टिमटिमा रहे
लेकिन
चांद के
न होने का
एक गहरा
अहसास है
जो चीज़
खो जाती है
फिर क्यूँ वह
इतनी ज़रूरी
हो जाती है
शायद
पूरी ज़िन्दगी
कुछ खोई हुई
चीज़ों के
पीछे की भटकन है
बाहर मुस्कुराहटें
भीतर वही
तड़पन है ।

पीले फूल कीकर के

सुर्ख़ फूल गुलाब के
बिंध जाते
देवों की माला में
सफेद मोगरा, मोतिया
सज जाते
सुंदरी के गजरों में
रजनीगंधा, डहेलिया
खिले रहते
गुलदानों में
और
पीले फूल कीकर के
बिखरे रहते
खुले मैदानों में

बंधे हैं
गुलाब, मोगरा, मोतिया
रजनीगंधा और डहेलिया
सभ्यता की जंजीरों में
बिखरे चाहे
उन्मुक्त हैं लेकिन
फूल पीले कीकर के
हवा की दिशाओं
संग संग बह जाते
बरखा में
भीगे भीगे से
वहीं पड़े मुस्कुराते

देवों की माला में
सुंदरी के गजरों में
बड़े गुलदानों में
माना नहीं कभी
सज पाते
फिर भी लेकिन
ज़िन्दगी के गीत
गुनगुनाते

मोल नहीं
कोई उनका
ख्याल नहीं
किसी को उनका
इन सब बातों से पार
माँ की गोद में
मुस्काते
वहीं पड़े अलसाते

अनुभूतियों के दस्तावेज़

अनुभूतियों के दस्तावेज़
स्मृतियों के संग्रहालयों में
एक कोने में पडे़
आज भी
अनुभवों की कहानी कहते

बीते पलों की
पगडंडियों पर
हर ओर बिखरे
अतीत के ज़र्द पत्ते
बहारों की दास्तां सुनाते

दिन आते
फिर जाने कहाँ
खो जाते

ख़यालों के
चंद सिक्के
कुछ जमा-पूंजी
रह जाते

पुराना ख़त 

कोई पुराना ख़त
महज एक
पीला पड़ चुका
काग़ज़ का टुकडा
नहीं होता

दस्तावेज़ होता है
पीली पड़ चुकी
अनुभूतियों का
परिचित-सा
अहसास होता है
मंद पड़ चुकी
सम्बन्धों की गर्माहट का
साक्षी होता है
बह चुकी स्नेह- सलिला का

कोई पुराना ख़त
केवल ख़त नहीं
गूँज होती है
अतीत की
छाया होती है
जीवन व्यतीत की
पहचान होती है
खो चुके
व्यक्तित्व की

रोशनाई

दुःखों की स्याही
फैल जाए अगर
देती केवल कालिमा

और यही कहीं अगर
कलम में भर ली जाए
करती रोशन

आने वाली पीढियाँ
दीप-सी प्रज्जवलित
आभामान

प्रकाश पुंज-सी
बन कर रोशनाई

दूरी

एक ऊँचे देवदार ने
मुझे बुलाया
मेरे स्वागत में
बडी- बडी बाहों को
खूब हिलाया

चाह कर भी
मैं
उससे मिल न पाई
बातें कुछ जो
कहनी थी कभी
कह न पाई

दोंनो के बीच
ऊँचाई आ गई
अपने अपने मन की
मन में रह गई

ऊँचे पहाडों पर बैठ
तुम देवदार
होते चले गए
और ऊँचे
समय की गर्दिशों से
होती चली गई
मैं और गहरी

अंततः फिर वही
बीच की दूरी
वहीं रह गई
ऊँचाई और गहराई
एक-दूजे की
पूरक बन
मौन-सी रह गईं

जीवन के रंग

जीवन के
रंग भी
कोई समझ पाया है
बहते पानी को
कोई रोक पाया है

आज गम है
तो कल खुशी
आज दोस्त है
तो कल अजनबी

जितनी जल्दी
दिन नहीं ढलता है
उतनी जल्दी
चेहरे बदल जाते है

जो आज
तुम्हारा है
कल किसी
और का
हो जाता है

सब कुछ
मिट जाता है
चंद यादें
रह जाती हैं

जो सिर्फ़
तुम्हारी होती है
सिर्फ तुम्हारी

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