किशन कारीगर की रचनाएँ

बूढा बरगद का पेड़ बोला

मेरी ही टहनियों को काटकर
छाँव की तलाश में भटक रहे लोग
कराहते हुए कहीं यहीं पर जैसे
बूढा बरगद का पेड़ बोला

कुछ याद है “किशन” की सभ भूल गए?
अपने दादाजी की अंगुलियाँ थामे
मुझसे मिलने तुम भी आते
वो मुझसे और तुम चिड़ियों से बतियाते

मेरी डाल पे बैठे
वो चिड़ियों की टोली
हम सभी अरोसी-पड़ोसी बन जाते
बतियाते और कितनी खुशियां बाँटते

तुम सभी ने काट दी मेरी टहनियाँ
अब उन चिड़ियों के घर भी उजाड़ दिए
दर्द से कराह रहा मैं कब से
पर कोई नहीं सुनता

अब कोई भी ईधर को नहीं आता
न ही कोई पेड़ लगाता
कराहते हुए यहीं पर जैसे
बूढा बरगद का पेड़ बोला

ठंडी हवा, मीठे फल, धूप-छाँव
सब कुछ मैं तुम सबको देता
खुद जहरीला कार्बन पीकर रह लेता
पर शुद्ध ऑक्सीजन सभी को देत

फिर भी अंधाधुंद बृक्षों को काट रहे
प्रकृति की दी हुई चिजें उजाड़ रहे
पर्यावरण सरंक्षण की कौन सोचे?
बूढा बरगद का पेड़ बोला

किसे फुर्सत है?

हर कोई भाग रहा किसे फुर्सत है?
शहर बन गया है तमाशाबीन
कोई दर्द से चीखता-कराहता
पर कोई करता तक धिनाधीन.

कोई दौलत के पीछे तो
हर कोई शोहरत के पीछे
बेहताशा इस क़दर भाग रहा
की किसे फुर्सत है?

इस भागम-भाग में तो लोग
अपने आप को भूल गए
रिश्ते-नाते सब ईधर-उधर
रिश्तों की मर्यादा टूटकर बिखर गए.

बेशुमार दौलत की चाहत में
कुछ भी करने को तैयार
अब तो फ़र्ज़ अदायगी भी याद नहीं
कौन समझे, किसे फुर्सत है?

बिकास की अंधी दौर में हम
प्रकृति को ही छेड़ बैठे
प्राकृतिक बिपदा दस्तक दे रही
फिर भी न सोचे, किसे जरूरत है?

मनुष्य अपने ही बिनाश को है बेताब
वेबजह भी, हर कोई भागम-भाग
प्रकृति के साथ चलने में ही भलाई
मगर कौन सोचे, किसे फुर्सत है?

अपनेपन की बजाय, अब तो लोग
फ़िल्मी ठुमको में खुशियाँ तलाशते
आस-पड़ोस के हँसी-ठहाके सब गायब
लाफ्टर और कॉमेडी नाईट से जी लेते.

क्या हो गया उन सभी को?
अपने ही सामजिक कर्तब्य भूलकर
मनुष्य और मानवता सब पीछे छूटे
“किशन” किससे कहे, किसे फुर्सत है?

हाई रे मेरी तोंद

उफ़ हाई रे मेरी तोंद
ये कितनी हिलती डुलती है
सेक्रेटरी से कितनी बार पूछा
चल ये बता क्या, ये दिखती भी है?

डरते डरते उसने इतना बताया
जनता सालों-साल तक लुटती है
बम्बई के शेयर बाज़ार की तरह
आपकी तोंद दिनोदिन कितनी चढ़ती है.

तो फिर तूँ ही बता
इस तोंद का मैं क्या करूँ?
इतने खर्च जो किये चुनाव लड़ने में
फिर मैं अपनी जेब ना भरूँ?

सेक्रेटरी को कितना समझाया
की इस तोंद के चर्चे ही मत किया कर
जनता को सिर्फ इतना बता
भ्रष्टाचार नहीं, कब्ज़ियत से ये ऐसी दिखती है.

मंत्रिपद मिलते ही मनो मुझको
मेरी तोंद में गुड़गुड़ाहट होने लगती
सरकारी ख़जाने पर कैसे हाथ साफ़ करूँ
यही तो हर पल चिंता रहती है.

भ्रष्टाचार के कई मिक्सचर मसाले
हमारी इस तोंद में भड़े-पड़े हैं
उजले कुर्ते से कितना इसको ढके रखा
फिर भी जनता देख ही लेती है
जनता भी कितनी अवल्ल दर्ज़े की वेबकूफ
जनसेवक बना हमें पार्लियामेंट भेजती है
हम तो अपनी सेवा में सरेआम रहते
क्या करें “किशन” ये तोंद इतनी हिलती डुलती क्यों है?

घोटालेवाजों की मेरिटलिस्ट

सभी एक दूसरे पे चिल्ला रहे थे
आखिर क्यों नहीं मैं?
बनी है घोटालेवाजों की मेरिटलिस्ट
इस लिस्ट में मेरा नाम नहीं।

एक ने दूसरे को धकियाआ
चल हट जा पीछे
मैंने तो इतने सारे घोटाले किए
फिर भी इस लिस्ट में मैं नहीं?

जल्दी से इस लिस्ट में सुधार कर
नहीं तो ये समझ ले फिर
मेरे हस्ताक्षर के बगैर कैसे मैं?
सरकारी टेंडर पास होने दूँगा?

किसने कह दिया की भ्रष्टाचारमुक्त भारत?
ये तो सिर्फ झूठी अफ़वाह है
सिर्फ़ एक बार मंत्रिपद मिलने दे
देख कितनी जल्दी मैं अपनी जेब भरूँगा।

क्यों तुम सभी काले धन की रट्ट लगा रहे?
नेताजी को बेमतलब बदनाम किये जा रहे
बता तूँ , किसलिए राजनीती में आया मैं?
एक घोटाले तेरे नाम कर दूँगा, समझा भी करो.

घोटालेवजी में ही तो मैं बेचैन रहता
अरे बुद्धू तू भी ये नहीं समझता?
जनता की सेवा सिर्फ़ चुनावी घोषणा
जनाधार कैसे बढ़ाऊँ? इसी फ़िराक़ में मैं रहता।

सिर्फ़ एक बार इस घोटाले में
तू मेरा साथ दे दे,फिर देख
पब्लिक से कहना मत कभी
घोटाले की आधी रकम मैं तेरे नाम कर दूँगा।

ऐसा है तो फिर हम सभी मिलकर
दिन-रात घोटाला करेंगे यहीं
घोटालेवाजों की मेरिटलिस्ट में भी घपला
कोई तो बता इस लिस्ट में क्यों मेरा नाम नहीं?

जिस्म के लुटेरे 

यहाँ भी वहाँ भी कुछ उधर भी
सफेदपोश चादर ओढ़े कुछ लोग
ये खरोंच डालेंगे तेरे जिस्म
हर कहीं बैठें हैं जिस्म के लुटेरे

क्या कर लोगे तुम इनका?
गिरफ्तार हुए भी तो
ऊँची पहुँच है इनकी
ये जमानत पे छूट जायेंगे

सिर्फ अपने घर के बहू बेटियों की
इज्ज़त इन्हें नज़र आती है
दूसरे की तो रात दिन इन्हें
जिस्म ही दिखाई पड़ती है

अपनों की इज्ज़त करते
सरेआम दूसरों की जिस्म खरोंचते
ऐसा फर्क क्यूँ वे ही बताएं?
पैसों की खातिर धर्म-ईमान तक बेचते

क्या किसी मासूम किसी बेबश की?
इज्ज़त आबरू ईमान की इज्ज़त नहीं?
अर्धनग्न हुई जैसे दिखतें हो उसके जिस्म
उस अबला की आबरू को ढकना इनका फ़र्ज़ नहीं?

अय्याशी के नशे में मक़बूल हुए
एसे लोगों को सराफ़त नहीं भाता
पैसा ही इनके लिए सब कुछ है
हर कहीं इन्हें जिस्म ही नज़र आता

ख़ुदा न करे कहीं ऐसा हो?
तुम्हारें बहू बेटियों की आबरू लूट जाये
ऊँची पहुँच हो पैसो की ताकत होगी
मौकेवारदात कुछ काम न आये

औरत तो औरत होती है ज़रा सोचो?
अपने घर की हो या पराये घर की
आलीशान बंग्लें या झोपड़पट्टी में रहनेवाली
इज्ज़त आबरू तो हर एक की है?

“किशन “तुम किसके पास चीखोगे चिल्लाओगे
हबश की बदहोशी में ये कुछ नहीं सुनेगें
शराफ़त की चादर ओढ़े कुछ लोग
हर कहीं बैठें हैं जिस्म के लुटेरे

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