किशोर कुमार खोरेन्द्र की रचनाएँ

एक नन्ही चिड़िया 

यह कैसा है महावृत्त
जो है अपरिमित

जिसमें व्यास है न त्रिज्या

उसे छूना जितना चाहूँ
उसकी परिधि भी लगती है
तब क्षितिज सी मिथ्या

बिना केंद्र बिंदु के
किस प्रकार से –
खींची है किसने यह
बिना आकार की यह गोलमाल दुनिया

न ओर का पता, न छोर का
फिर भी –
आकाश को भी
अपने परों से ..नाप रही है

हर मन के घोंसलों से ……उड़कर
एक नन्ही चिड़िया

मुझे गाने लगे हैं भजन

मैंने कर दिया है
अपना सर्वस्व तुम्हें अर्पण
मेरे पास अब
न रूप है, न मन
कोरे पन्ने सा हो गया मेरा
श्वेत रंग
अब न बिम्ब है, न प्रतिबिम्ब
शेष है सर्वत्र
प्रेममय भावो के निर्मल
कांच से निर्मित
बस एक दर्पण

करते-करते तुम्हारा पूजन
मुझे गाने लगे हैं भजन

मुझे भाने लगे हैं
तुम्हारे स्मरनो के पवित्र चरण

पड़ा रहता हूँ वहीं पर
होऊं जैसे –
ढेरों अर्पित सुगन्धित शुष्क सुमन

न जड़ हूँ न चेतन
शेष हैं सर्वत्र
तुम्हारी यादों की महक से –
भरा बस
एक उपवन

टूट कर मैं पर्वत
तुम नदी में घुल गया
मुझे ढूँढने के लिये
बचा नहीं एक भी कण

न रेत हूँ, न हूँ पवन
शेष है सर्वत्र
बूंदों में सागर का
लिये सपन
बस एक उदगम

फिर लौट आया प्यार का मौसम

अनुराग से भरी होगी शिकायत
दूर क्यों मुझसे रहते हो
जब नजदीक हैं हम
फिर लौट आया प्यार का मौसम

रजनीगन्धा सी महकेगी रात
जब मुझे आयेगी उसकी याद
चाँदनी को बुलाकर वह पूछेगी
सचमुच करते हैं क्या वे मेरा इंतज़ार
जान कर सच
तब बढ़ जायेगी उसके ह्रदय की धड़कन
फिर लौट आया प्यार का मौसम

एक धुन गूँजती रहेगी
मन की अकुलाहट बाँसुरी सी बजती रहेगी
बार-बार दुहराएंगे ………
सात जन्मों तक न अब बिछड़ेंगे हम
फिर लौट आया प्यार का मौसम

तुम वही हो ..न 

तुम वही हो ..न
जिसे मैं ..ढूँढता रहता था
बचपन से लेकर ..आज तक

तुम अचानक
पहले भी
और आज भी ….
कभी गर्म-गर्म मूंगफलियों को
मेरे जेब में भरते ही
नमक और मिर्ची सहित एक कागज़ के
पतंग की तरह उड़ जाया करती हो

और
मेरी शाम ..बेस्वाद हो जाया करती हैं
या
मेरी किसी किताब पर
चढी सुन्दर जिल्द हुआ करती थी
मेरे स्कूल के दिनों में ..
बरसात में अपने सीने में उसे छिपाकर
लाते समय भीग कर उखड़ जाया करती थी

और तब
उस रात मैं होमवर्क नहीं कर पाता था
तुम वही मेरी प्यारी उखड़ी हुई
मेरी सुन्दर जिल्द हो
जो वापस मिल गई
या
तुम वही …लौट कर ..आ गई
पतंग हो

जिसके पास
मेरे लिये
नमक भी है और मिर्ची भी

नाद कल -कल

प्रकृति का यही है नियम
प्यासा रह जाए जीवन

लहरों के संग आये जल
घुल न पाए कभी पत्थर

सुख आये तो लगे शीतल
दुःख आये तो वही पाषाण
कहे छूना मुझे अभी मत
मैं हूँ बहुत गरम

मिलन की आश लिये
ह्रदय में प्यास लिये
लौट जाते –
लहरों के भी अधर

इसी तरह ….
संयोग की इच्छा लिये
विरह के अतृप्त जीवन को
जीता है …
हर ठोस हर तरल

इस सत्य का साक्षात्कार लगता
मनुष्य को ..
कभी अति जटिल
और कभी बहुत सरल

इसीलिए रहता है
समय के अंतराल के अनुभव में
एक व्याकुल एकांत
हर चेतना में अविरल

इस मध्यांतर के मौन की स्मृति में
गूंजता है हरदम
एकसार प्रवाहित नाद कल –कल

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