किश्वर नाहिद की रचनाएँ

हौसला शर्ते वफ़ा क्या करना

हौसला शर्त-ए-वफ़ा क्या करना
बंद मुट्ठी में हवा क्या करना

जब न सुनता हो कोई बोलना क्या
क़ब्र में शोर बपा क्या करना

क़हर है, लुत्फ़ की सूरत आबाद
अपनी आँखों को भी वा क्या करना

दर्द ठहरेगा वफ़ा की मंज़िल
अक्स शीशे से जुदा क्या करना

शमा-ए-कुश्ता की तरह जी लीजे
दम घुटे भी तो गिला क्या करना

मेरे पीछे मेरा साया होगा
पीछे मुड़कर भी भला क्या करना

कुछ करो यूँ कि ज़माना देखे
शोर गलियों में सदा क्या करना

मैं नज़र आऊँ हर इक सिम्त जिधर चाहूँ

मैं नज़र आऊँ हर इक सिम्त जिधर चाहूँ
ये गवाही मैं हर इक आईना गर से चाहूँ

मैं तिरा रंग हर इक मत्ला-ए-दर से माँगूँ
मैं तिरा साया हर इक रहगुज़र से चाहूँ

सोहबतें ख़ूब हैं ख़ुश वक़्ती-ए-ग़म की ख़ातिर
कोई ऐसा हो जिसे जानो-जिगर से चाहूँ

मैं बदल डालूँ वफ़ाओं की जुनूँ सामानी
मैं उसे चाहूँ तो ख़ुद अपनी ख़बर से चाहूँ

आँख जब तक है नज़ारे की तलब है बाक़ी
तेरी ख़ुश्बू को मैं किस ज़ौक़े-नज़र से चाहूँ

घर के धंधे कि निमटते ही नहीं हैं ‘नाहिद’
मैं निकलना भी अगर शाम को घर से चाहूँ

हसरत है तुझे सामने बैठे कभी देखूँ 

हसरत है, तुझे सामने बैठे, कभी देखूँ
मैं तुझ से मुख़ातिब हूँ, तेरा हाल भी पूछूँ

दिल में है मुलाक़ात की ख़्वाहिश की दबी आग
मेहन्दी लगे हाथों को, छुपा कर कहाँ रखूं

जिस नाम से तूने मुझे, बचपन से पुकारा
इक उम्र गुज़रने पे भी, वो नाम न भूलूँ

तू अश्क़ ही बन के, मेरी आँखों में समा जा
मैं आईना देखूँ तो, तेरा अक़्स भी देखूँ

पूछूँ कभी गुंचों से, सितारों से, हवा से
तुझ से ही मगर आ के तेरा नाम न पूछूँ

ऐ मेरी तमन्ना के सितारे, तू कहाँ है
तू आए तो ये ज़िस्म, शब-ए-ग़म को न सौंपूँ

कहानियाँ भी गईं, क़िस्सा ख़्वानियाँ भी गईं 

कहानियाँ भी गईं क़िस्सा_ख़्वानियाँ भी गईं
वफ़ा के बाब की सब बेज़ुबानियाँ भी गईं

वो बेज़ियाबी-ए-गम की सबिल भी न रही
लूटा यूँ दिल की सभी बे-सबातियाँ भी गईं

हवा चली तो हरे पत्ते सूख कर टूटे
वो सुबह आई तो हैरां नूमानियाँ भी गईं

वे मेरा चेहरा मुझे आईने में अपना लगे
उसी तलब में बदन की निशानियाँ भी गईं

पलट-पलट के तुम्हें देखा पर मिले भी नहीं
वो अहद-ए-ज़ब्त भी टूटा, शिताबियाँ भी गईं

मुझे तो आँख झपकना भी था गराँ लेकिन
दिल-ओ-नज़र की तसव्वुर_शीआरियाँ भी गईं

हम कि मग़लूब-ए-गुमाँ थे पहले 

हम कि मगलूब-ए-गुमाँ थे पहले
फिर वहीं हैं कि जहाँ थे पहले

ख़्वाहिशें झुर्रियाँ बन कर उभरीं
ज़ख़्म सीने में निहाँ थे पहले

अब तो हर बात पे रो देते हैं
वाक़िफ़-ए- सूद -ओ-ज़ियाँ थे पहले

दिल से जैसे कोई काँटा निकला
अश्क आँखों से रवाँ थे पहले

अब फक़त अंजुमन आराई हैं
ऐतबार-ए-दिल-ओ-जाँ थे पहले

दोश पे सर है कि है बर्फ जमी
हम तो शोलों की ज़ुबाँ थे पहले

अब तो हर ताज़ा सितम है तस्लीम
हादसे दिल पे गराँ थे पहले

मेरी हमज़ाद है तन्हाई मेरी
ऐसे रिश्ते भी कहाँ थे पहले

बीमार हैं तो अब दम-ए-ईशा कहाँ से आए 

बीमार हैं तो अब दम-ए-ईसा कहाँ से आए
उस दिल में दर्द-ए-शौक़-ओ-तमन्ना कहाँ से आए

बेकार शरा-ए-लफ्ज़-ओ-मानी से फायदा
जब तू नहीं तो शहर में तुझ सा कहाँ से आए

हर चश्म संग-ए-खीज़्ब-ओ-अदावत से सुर्ख़ है
अब आदमी को ज़िंदगी करना कहाँ से आए

वहशत हवस की चाट गई ख़ाक-ए-ज़िस्म को
बे-दर घरों शक़्ल का साया कहाँ से आए

जड़ से उखड़ गये तो बदलती रुतों से क्या
बे-आब आइनों में सरापा कहाँ से आए

सायो पे ऐतमाद से उकता गया है जी
तूफ़ाँ में ज़िंदग़ी का भरोसा कहाँ से आए

गम के थपेरे ले गये नागिन से लंबे बाल
रातों में जंगलों का वो साया कहाँ से आए

‘नाहिद’ फैशनों ने छुपाए है ऐब भी
चश्में न हो तो आँख का परदा कहाँ से आए

ये हम गुनाहगार औरतें हैं

ये हम गुनाहगार औरतें हैं
जो अहले जुब्बा की तमकनत से
न रौब खाएं न जान बेचें
न सर झुकाएं, न हाथ जोडें

ये हम गुनाहगार औरतें हैं,
के जिनके जिस्मों की फसल बेचें जो लोग
वे सरफराज ठहरे न्याबतें इम्तियाज ठहरें
वो दावर-ए-अहल-ए-साज ठहरें

ये हम गुनाहगार औरतें हैं
के सच के पचरम उठा के निकले
तो झूठ से शाहराहें अटी मिले हैं
जो बोल सकती थीं वो जबाने कटी मिली हैं
हर एक दहलीज पर सजाओं की दास्तानें रखी मिले हैं

ये हम गुनाहगार औरतें हैं
के अब तअक्कुब में रात भी आए
तो ये आंखे नहीं बुझेंगी
के अब जो दीवार गिर चुकी है
इसे उठाने की जिद न करना
ये हम गुनाहगार औरतें हैं
जो अहले जुब्बा की तमकनत से
न रौब खाएं न जान बेचें
न सर झुकाएं, न हाथ जोडें

Share