कुँअर रवीन्द्र की रचनाएँ

तितली

मेरे हाथों से छूट कर
दूर उड़ गयी थी वह तितली
मगर अब तक
उसके पंखों के नीले,सुनहरे काले रंग
मेरी उँगलियों में चिपके हुए हैं

मै रोज़ ताकता हूँ उन्हें
और उस बाग़ीचे को
यादों में ढूँढ़ता रहता हूँ
जहाँ मैंने उसे पकड़ा था
चुपके से
रातरानी की झाड़ी के पास
लुका-छिपी खेलते हुए

तब मै पूरा का पूरा
मीठी ख़ुशबू से भर गया था
लिसलिसा-सा गया था मै
मेरी उँगलियाँ भी

उसके पंखों का रंग लिए
आज भी कभी-कभी
लिसलिसा जाता हूँ मै
ख़ुशबू से भर जाता हूँ मै
आज भी

खिड़कियाँ खोल दी हैं 

मैंने खिड़कियाँ खोल दी हैं
खोल दिए सारे
रोशनदानों के पट

सारा घर रोशनी से भर गया
सुवासित हो गया तुम्हारी सुगंध से
दरवाज़े खोल देता हूँ

खिड़कियों से जो दिख रहे हैं
जंगल ,पहाड़, नदियों के दृश्य
शायद आ जाएँ भीतर

मै दरवाज़ों-खिड़कियों पर
पर्दे नहीं लटकाता

मोगरा 

मेरे बाग़ीचे में
गुलाबों ,डेहलियों,पपियों
और ढेर सारे ख़ूबसूरत फूलों के बीच

एक कोने में मोगरे का पौधा
लड़ रहा है वर्षों से
मेरे बाग़ीचे में गंधों-सुगंधों से
अपनी देसी महक लिए

उसे खाद की, दवाई की ज़रूरत नहीं है
नहीं चाहता गुलदस्तों में सजना

रसिकों की कलाई में
और
नव-यौवनाओं के जूड़े से ही सन्तुष्ट है

अपना देसीपन लिए
मोगरा

कानून और व्यवस्था

एक दिन
मैंने बारिश की
गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज़ कराई
कानूनी रोज़नामचे में

दूसरे दिन सुबह
मेरा घर बाढ़ में बह गया

मैंने ललकारा
गाँव में फैली ख़ामोशी को
छलनी कर दिया गया मेरा पूरा ज़िस्म
गोलियों से

यह कानून की व्यवस्था
या व्यवस्था का कानून है
मै नहीं समझ पाया
कानून और व्यवस्था

मगर तय है
जिसकी जड़े मजबूत हैं
बाढ़ भी नहीं बहा सकती उन्हें
जो छातियाँ पहले से छलनी हों
उन्हें और छलनी नहीं किया जा सकता

और
हाँ और
ख़ामोशियों की भी जुबान होती है
कान होते हैं, नाक होती है
होते हैं हाथ-पैर

एक दिन
हाँ, किसी एक दिन
जब खडी हो जाएँगी ख़ामोशियाँ
चीख़ती हुई
उठाए हुए हाथ

तब
और तब
छलनी होगी कानून की छाती
बह जाएगी ख़ामोशी की बाढ़ में
सारी व्यवस्था
एक दिन

यादें जाती नहीं

पूरी रात जागता रहा
सपने सजाता,
तुम आती थीं, जाती थीं
फिर आतीं फिर जातीं ,
परन्तु
यादें करवट लिए सो रही थीं

सुबह,
यादों ने ही मुझे झझकोरा
और जगाया,
जब मै जागा
यादें दूर खड़ी हो
घूर-घूर कर मुझे देखती
और मुस्कुरा रहीं थीं

मैंने कहा
चलो हटो ,
आज नई सुबह है
मै नई यादों के साथ रहूँगा

वे नज़दीक आईं
और ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगीं

लाख जतन किए
वे गईं नहीं

यादें जाती नहीं
पूरे घर पर
कब्ज़ा कर बैठी हैं

यादें जो एक बार जुड़ जाती है
वे जाती नहीं
बस करवट लेकर
सो जाती हैं

नई सुबह

चलो,
पूरी रात प्रतीक्षा के बाद
फिर एक नई सुबह होगी
होगी न,
नई सुबह?
जब आदमियत नंगी नहीं होगी
नहीं सजेंगीं हथियारों की मंडिया
नहीं खोदी जायेगीं नई कब्रें
नहीं जलेंगीं नई चिताएँ
आदिम सोच, आदिम विचारों से
मिलेगी निजात
होगी न,
नई सुबह?
सब कुछ भूल कर
हम खड़े हैं
हथेलियों में सजाये
फूलों का बगीचा,
पूरी रात जाग कर
फिर एक नई सुबह के लिए
होगी न
नई सुबह?

सुरज देवता आए 

सुरज देवता आये
जंगल-घाट सिहाये

धूप आरती हुई
गंध के पर्व हुए दिन
ओस-भिगोई
बिरछ-गाछ की साँसें कमसिन

हरी घास ने
इन्द्रधनुष हैं उमग बिछाये

बर्फ पिघलने लगी
नदी-झरने भी लौटे
हटा दिये किरणों ने
अपने धुंध-मुखौटे

भौरों ने हैं
गीत फागुनी दिन-भर गाये

पीली चूनर ओढ़
हवा ने रंग बिखेरे
व्यापे घर-घर
सरसों के रँग-रँगे उजेरे

ऋतु फगुनाई
बूढ़े बरगद भी बौराये

बुद्धिमान लड़की 

एक बुद्धिमान लड़की
सप्ताह में एक दिन
डिग्रियों पर से धूल पोंछ कर
सहेज कर रख देती है
आलमारी में
एक बुद्धिमान लड़की
तितलियों की तरह
अब पंख नहीं संवारती
नहीं चहकती चिड़ियों की तरह
पिता या भाई की आवाज़ पर
एक बुद्धिमान लड़की
अब नही देखती आईना बार-बार
नहीं सम्हालती अपनी ओढ़नी
नहीं जाती खिड़की के पास बार-बार
एक बुद्धिमान लड़की
चीखती भी है जब कभी
एकांत में
तो अब नहीं लौटती उसकी आवाज़
टकरा कर किसी दीवार से
सोख ली जाती है
उसकी आवाजें दीवारों में
एक बुद्धिमान लड़की
सुबह उठती है
बच्चे को दूध पिलाती है नास्ता कराती है
स्कूल भेजती है
और तमाम घरेलू काम करती है
फिर रात में सो जाती है
सुबह फिर उठने
डिग्रियों को सम्हाल कर रखने
फिर रात में सो जाने के लिए
एक बुद्धिमान लड़की

शहर

इस शहर में
एक घर
जहाँ मै ठहर गया हूँ
रहस्य में लिपटा सा
फिर भी पहचाना सा
और घर में
एक छज्जा
छज्जे पर मै
सामने एक घर,फिर दो घर,ढेर सारे घर
घर
घर
घर पर घर
पतझर में बिखरे पत्तो की तरह

आदमी 

आजकल मैं
एक ही बिम्ब में
सब कुछ देखता हूँ
एक ही बिम्ब में ऊंट और पहाड़ को
समुद्र और तालाब को
मगर आदमी
मेरे बिम्बों से बाहर छिटक जाता है
पता नहीं क्यों
आदमी बिम्ब में समा नहीं पता है ?

कभी 

चट्टानों के बीच से बूँदों का टपकना
साबित करता है
कभी तो बर्फ़ पिघली होगी

रेत में निशान
अब भी बाक़ी हैं
कभी तो इस नदी में
पानी बहा होगा

इन दरख़्तों में
कभी कोंपलें भी फूटती थीं
जो अब ठूँठ का बस
पर्यायवाची रह गया है

परिन्दे भी ठूँठों पर
घरौंदे नहीं बनाते
ठूँठों के शिखर पर
सिर्फ चील या बाज़ ही बसा करते हैं …..

शहर-2

शहर है कि पसरता जा रहा है
हमारी आँखों में
हमारे सपनों में

अपरिचित होते जा रहे हैं
परिचित चहरे
साँसें पड़ने लगीं हैं कम

दस मंज़िल ऊँची खिड़कियों से
लोगों को दिखते नहीं
ज़मीन पर हम

शहर है कि पसरता जा रहा है
तुम कहते हो
छोड़ो न अपनी ज़मीन

बच्चे

बच्चे,
मुँह-अँधेरे जब सो रहे होते हैं
माँ की छाती / पेट से चिपके
तब वे निकलते हैं
हाँ, वे बच्चे निकलते है
ममियों की तरह सूखे
लत्तों में लिपटे नंगे पाँव
हवेली के पीछे कूड़े में
रात के जश्न की बची
सामग्रियों के ढेर पर
पॉलीथिन के टुकड़े बीनने
और कुछ
अघाएपन की गंध के साथ
अधखाई रोटियों के टुकड़े ढूँढने

तब हवेलियों की छत पर
खाया पचाते
मोटापा कम कर रहा सेठ
उन्हें हिकारत से देखते हुए
दुत्कारता है
जैसे वे बच्चे
उसकी तिजोरी से निकाल रहे हों
हराम की कमाई

मेरे सामने है

मेरे सामने है
एक दृश्य
या उसका चेहरा

बेहद कोमल रंगों से भरा
मगर
एक लम्बी अन्तहीन दूरी
और सन्नाटे की काली लकीर भी
झुर्रियों की तरह खिंची हुई है

मेरे सामने है
उसका चेहरा
या एक दृश्य

छुअन से लजाई
एक किनारे सिमटी ,बहती नदी
मिलन की प्रफुल्लता से भरा
क्षितिज
और ..
नई सृष्टि की कल्पना में
अपलक आकाशगंगा को निहारता
क्रौंच का एक जोड़ा भी

मेरे सामने है
एक चेहरा एक दृश्य
और ..
पृथ्वी से आकाशगंगा की दूरी

परिदृश्य में तुम्हारा होना 

परिदृश्य में
तुम्हारा होना या न होना
मायने नहीं रखता

सारी सम्वेदनाओं को
दरकिनार करते हुए
मैं अब भी महसूस करता हूँ
तुम्हारी ऊष्मा
तुम्हारी छुअन
अब भी मेरे सामने है
मुझमें कुछ तलाशती
तुम्हारी पनीली आँखें
तुम्हारी वह अन्तिम मुस्कराहट

और
उसके पीछे छिपी पीड़ा
जिससे तुम मुक्त हो चुके हो
नहीं भूल सकता कभी

नही भूल सकता
फिर आना, आओगे न !
कह कर तुम्हारा चला जाना

काग़ज़ हरिया गया

मैंने जब भी
फ़क्क सफ़ेद कागज़ पर लिखा —
प्रेम !
कागज़ धूसर हो गया

लिखा — दुःख
कागज़ हरिया गया

आदमी तो ठीक
कागज़ का रंग बदलना
मेरी समझ से परे हैं

लोकतन्त्र का मतलब

मली हुई तम्बाखू
होठ के नीचे दबाते हुए
उसने पूछा
अरे भाई ! लोकतन्त्र का मतलब समझते हो ?

और सवाल ख़त्म होते ही
संसद की दीवार पर
पीक थूक दी

थोड़ी दूर पर
उसी दीवार को
टाँग उठाए एक कुता भी गीला कर रहा था

लोकतन्त्र का अर्थ
सदृश्य मेरे सामने था

चुप रहने वाला आदमी 

मैं जब भी सहज ढंग से
चुपचाप
बैठ जाता हूँ
वे मुझे हारा हुआ मानकर
खड़े हो जाते हैं

खड़े होने के बावजूद
वे थरथराते, कँपकँपाते रहते है
इस भय से कि
कहीं यह चुपचाप बैठा आदमी
फिर से खड़ा तो नहीं हो जाएगा

क्योंकि वे जानते है
जिस दिन यह चुप रहने वाला आदमी
खड़ा हो जाएगा
सारी सत्ताएँ,
सारी हवाई विचारधाराएँ
कुत्ते की उठी हुई टाँग के नीचे होंगी

इसलिए वे जल्द से जल्द
झूठ के बीज बो देना चाहते हैं

हम बनैले सूअर

जिस तरह
बनैले सूअर को
हाँका लगा कर,
घेर कर मारा जाता है
वैसे ही
इस देश के जन
मारे जा रहे हैं,
और मारे जाएँगे ।

हमें अपने दन्तेल होने का भान
शायद नहीं है
जैसे शिकारियों से घिरा
एक बनैला , दन्तैल सूअर
फाड़ देता है शेर का भी कलेजा
वैसे ही
इन शिकारियों के बीच
घिरे हुए तुम
बनैले सूअर क्यों नहीं बन सकते

ग़ुम हुआ आदमी 

जब से हम सभ्य हुए
बस तब से ही
ढूँढ़ रहा हूँ
उस आदमी को

जो अपने बीच कही
किसी शहर किसी गाँव में

गुम हो गया है
बाज़ार में

हम आज़ाद हैं

मैं चीख़ कर बोला
हम आज़ाद हैं
अपनी कनपटी पर टिकी हुई
पिस्तौल को छुपाते हुए

उसने कहा
हम आज़ाद हैं
अभी -अभी लुटी
अस्मत के दाग़ शरीर से मिटाते हुए

फिर सबने कहा एक स्वर में
हम आज़ाद हैं
और डूब मरे चुल्लू भर पानी में
शर्म से

इंद्रधनुष होना चाहता हूँ 

बचे हुए रंगों में से
किसी एक रंग पर
उंगली रखने से डरता हूँ

में लाल. नीला केसरिया या हरा
नहीं होना चाहता

में इंद्रधनुष होना चाहता हूँ
धरती के इस छोर से
उस छोर तक फैला हुआ

कविता

कविता की भी जाति होती है
धर्म. सम्प्रदाय. वर्ग भी
और
कविता छूत-अछूत भी होती है

किस कविता को छुआ जाना है
किस कविता को नहीं
पाठक से पहले
कवि ही तय करता है
इसीलिए आज
कोई भी कविता
कविता नहीं होती
उसकी आयु भी छोटी होती है
वह असमय ही मर जाती है

जो कविता
दलित. आदिवासी. वर्ग. जाति. कुंठा आदि-आदि से
ऊपर उठकर लिखी जाती है
वह कविता. कविता होती है
और चिरायु भी

प्रेम पत्र

मेरे पास
ढेर सारे प्रेम पत्र हैं.

किसी और के
किसी और के लिए लिखे गए

वह अंतिम पत्र भी
जो किसी और के बाद
किसी अन्य को लिखे जाने के
ठीक पहले का था

शब्दों में फर्क सिर्फ़ नाम का है
किसी और के बाद. किसी अन्य को
लिखे गए पत्र में

ज़रूरी

आदमी के लिए
वह सब ज़रूरी है
जो वास्तव में ज़रूरी नहीं है

आदमी के लिए
वह सब बेकार है
जो वास्तव में बेकार नहीं होता
उतना ही जितना कि
आदमी का आदमी होना
या फिर नहीं होना

हर बेकार चीज़
बेकार होती है
चाहे वह आदमी हो या चीज़
तब हर बेकार चीज़ की तरह
आदमी भी
एक विचार भर रह जाता है
आदमियों के बीच
बेकार चीज़ों की तरह

प्रेम!

मैंने जब भी
फ़क्क सफ़ेद कागज़ पर लिखा
प्रेम!
कागज़ धूसर हो गया
लिखा. दुःख
कागज़ हरिया गया

आदमी तो ठीक
कागज़ का रंग बदलना
मेरी समझ से परे हैं

विकसित देश

एक दिन जब तुम सुबह
सो कर उठोगे
तो देखना
तुम्हारे पैरों तले न ज़मीन होगी
न सर पर आसमान
पानी पीने के लिए नदियाँ भी नहीं होंगी

जब तुम सो कर उठोगे
तो देखोगे कि तुम्हारा गाँव
स्मार्ट सिटी बन चुका है
बुलेट ट्रेन
तुम्हारे गाँव के बीच से गुज़र रही है

जब तुम सो कर उठोगे
तो खुद को स्मार्ट सिटी के
किसी फुटपाथ पर
भीख मांगते हुए पाओगे
तब समझ लेना
देश का विकास हो चुका है
और तुम एक विकसित देश के
सभ्य व सम्माननीय नागरिक हो..

विकल्प

जिस देश की जवानी
नाच गाने और मुजरे में व्यस्त हो
स्खलित हो रही हो कोठों में

जिस देश की
नदियाँ. पहाड़ और ज़मीन
यहाँ तक कि
आसमान भी बिक चुका हो

अन्न उपजा कर भी
किसान मर रहे हों भूख से

और निज़ाम हो मूर्ख
तब उस देश के
आम आदमी के लिए
क्या बचता है
सिर्फ कोई एक विकल्प?

हाँ!
बचता है सिर्फ़ विकल्प
छीन ले वह बांसुरी
और मेघ बन बरस पड़े
रोम पर

दुःख 

मुझे दुःख नहीं होता
ईसाइयों के मारे जाने पर
मुसलमानो या हिंदुओं
या फिर यहूदियों के मारे जाने पर
मुझे दुःख नहीं होता

मुझे बहुत दुःख होता है
सिर्फ
इंसानों के मारे जाने पर

लोकतंत्र

मली हुई तंबाखू
होठ के नीचे दबाते हुए
उसने पूछा
अरे भाई! लोकतंत्र का मतलब समझते हो?
और सवाल ख़त्म होते ही
संसद की दीवार पर
पीक थूक दी

थोड़ी दूर पर
उसी दीवार को
टांग उठाये एक कुता भी गीला कर रहा था

लोकतंत्र का अर्थ
सदृश्य मेरे सामने था

फर्क 

एक आदमी
गला फाड़ चीखता हुआ
सुना रहा है वेद पुराण की कथा
लोग ताली पीटते हिहिया रहे हैं
वे जानते हैं यह चीखने वाला
और साथ के ढोलकिये
नगाड़े पर दी गई थाप को नहीं सुन पा रहे हैं

नगाड़े पर थाप तो पड़ चुकी है
अर्जुन का स्वांग धरे यह आदमी
अब अपने ही चक्रव्यूह में
फंसता नज़र आ रहा है

अर्जुन होना और
अर्जुन के स्वांग में फर्क तो होता ही है

उतना ही
जितना सत्य और असत्य में

मुक्ति 

दरवाज़े. खिड़किया
खोल देने भर से
हम मुक्त नहीं हो जाते
मुक्ति के लिए
दीवारें भी गिरानी पड़ती हैं

परन्तु दीवारों की जगह
जब आदमी गिरने लगे
तब समझ लेना चाहिए कि
मिला हुआ समय
अब ख़त्म हो चुका है

डूबने की तैयारी

छाया जब आदमी के कद से
लम्बी होने लगे
या अन्धेरा सतह से
जब ऊपर उठने लगे
तब निश्चित ही
सूरज एकांत में कहीं
डूबने की तैयारी कर रहा होता है

इतिहास में जगह

जो बचेगा इतिहास लिखेगा!
यह सोचना भी मत
इतिहास वह लिखता है
जो मारा जाता है

कायर हत्यारों. नपुंसकों और बुद्धिहीन लोगो को
इतिहास में जगह नहीं मिलती

जो मारा जाता है उसकी बहादुरी
इतिहास में दर्ज़ होती है
वह देता है
भविष्य के लिए एक दिशा भी

कायर हत्यारे
हमेशा कुत्ते की ही मौत मरते है
मरेंगे वे भी
और उनकी सड़ती हुई लाश पर
युग!
घृणा से थूकता हुआ
आगे बढ़ जाएगा वहाँ
जहाँ मारे गए व्यक्ति की
फूलों से ढंकी समाधि होगी

सूर्य

मैंने उगते हुए सूर्य को देखा है
भारी भीड़ के बीच खड़े होकर

मैंने डूबते हुए सूर्य को भी देखा है
अकेले खड़े रह कर
सूर्य जब भी डूबा है
अकेला ही
आस पास
दूर-दूर तक कोई और नहीं
और लोग तुरंत ही
नये दिन के साथ नए सूर्य की
अगवानी के लिए
उत्साहित हो जुट जाते हैं

झूठ के बीज

मैं जब भी खड़ा हो जाता हूँ
वे दुबक कर बैठ जाते हैं
मैं जब भी सहज ढंग से
चुपचाप
बैठ जाता हूँ
वे मुझे हारा हुआ मानकर
खड़े हो जाते हैं

खड़े होने के बावजूद
वे थरथराते. कंपकपाते रहते है
इस भय से कि
कहीं यह चुपचाप बैठा आदमी
फिर से खड़ा तो नहीं हो जाएगा
क्योंकि वे जानते है
जिस दिन यह चुप रहने वाला आदमी
खड़ा हो जाएगा
सारी सत्ताएँ.
सारी हवाई विचारधाराएँ
कुत्ते की उठी हुई टांग के नीचे होंगी

इसलिए वे जल्द से जल्द
झूठ के बीज बो देना चाहते हैं

दंतैल होने का भान

जिस तरह
बनैले सूअर को
हांका लगा कर.
घेर कर मारा जाता है
वैसे ही
इस देश के जन
मारे जा रहे हैं.
और मारे जायेंगे.

हमें अपने दंतैल होने का भान
शायद नहीं है
जैसे शिकारियों से घिरा
एक बनैला. दंतैल सूअर
फाड़ देता है शेर का भी कलेजा
वैसे ही
इन शिकारियों के बीच
घिरे हुए तुम
बनैले सूअर क्यों नहीं बन सकते

हे जन आओ 

हे जन आओ!
हे गण आओ!
भ्रष्ट तंत्र के सम्मुख
शीश नवाऒ
आओ जन!
गाओ जन गण मन.

हे गण गाओ
भारत भाग्य विधाता
जय हो
अधिनायक जय हो

जन गाए
गण गाए
मन गाए

मेरा देश महान
जय हो

ढूंढ रहा हूँ 

जब से हम सभ्य हुए
बस तब से ही
ढूंढ रहा हूँ
उस आदमी को
जो अपने बीच कही
किसी शहर किसी गाँव में
गुम हो गया है
बाज़ार में

हरियर सपने 

पूरे साल धरता रहा हरियर सपने
अगले साल के लिए
तह दर तह
तह दर तह
नए साल में खोला
देखा
सब सूख या सड़ गए थे

गाँव अब शहर हो गया

मेरा गाँव अब शहर हो गया है
शहर हो गया है जंगल

शहरों में होती हैं मशीने
और जंगल में होते हैं जानवर

आदमी न तो शहरों में होते हैं
न ही जंगलों में

जंगलों में रहने वाले आदिवासी
न तो आदमी होते हैं
न ही जानवर
वे सिर्फ़ होते हैं “वोट”

रात का अंतिम प्रहर

रात का अंतिम प्रहर
और

कुछ शब्द
कल की उम्मीदों से भरे हुए
कुछ शब्द अलसाए
कुछ थके-थके से
कुछ धुले-धुले
कुछ गीले

तुम मारे जाओगे

कवि!

तुम मारे जाओगे
हत्यारे रोबोट ताक में हैं
वे कविता की तपिश से परेशान हैं
कविता का सच
उनकी फ्रीक़ोइन्सी को गड़बड़ा रहे हैं

वे सच नहीं जानना चाहते
वे सिर्फ़ झूठ के बल पर
तकत्य भाषा के शब्दों से
अभिमंत्रित कर
तुम्हे अपना गुलाम बनाना चाहते हैं

कवि यदि तुम सच लिखोगे
कविता लिखोगे
तो निःसंदेह तुम
मारे जाओगे

मगर हाँ
मरने से पहले
लिख देना एक ऐसी कविता
कि इन रोबोटों से डरे हुए लोग
अपनी ताकत को समझ सकें

अच्छे दिन आयेंगे 

अंततः मेरे बच्चे का आज निधन हो गया
जाति. धर्म. सम्प्रदाय और विचारधारा से लहुलुहान
भूख और प्यास से वह हार गया
मेरे आंसू उसे नहीं बचा सके
नहीं भर सके मेरे आंसू उसके घाव को
मेरे आंसू नहीं बुझा पाए उसकी प्यास

वत्स!
इस देश में रोज़ ही इस तरह मरने वाले बच्चों को
उनके माँ-बाप के आंसू नहीं बचा पाते
मरने वाले वे सब बेनाम होते हैं
इतिहास तो दूर
वर्तमान में भी कही उनका नाम दर्ज नहीं होता
मगर वत्स!
तुम्हारा तो कुर्सी पर बैठना. चांदी की थाली में भोजन करना.
चलना-फिरना सब तिथि और समय के साथ
शिलालेखों में दर्ज होता है

गीता. क़ुरान या बन्दूक से अच्छे दिन नहीं आते
फिर भी हम रोते हुए अपने बच्चे के लिए
धोका देते हैं खुद को कि
अच्छे दिन आयेंगे
वत्स!
क्या तुम्हारा अध्यात्मवाद
सूखे कुओं को. सूखी नदियों को जल से भर सकता है?
नहीं न
धन के लिए तुम्हारी वासना
भूमिपुत्रों का सिर्फ़ कत्लेआम कर सकती है

मगर हम अभी भी जीवित हैं वत्स!
प्रेम और शान्ति का गीत फुसफुसाते हुए
आंसुओं के साथ
अपने मरे हुए बच्चे की आत्मा की शान्ति के लिए

आँखों में नमी

इस भीषण गर्मी में
जब सूरज उगल रहा हो
दहकते अंगारे
तब तुम्हारे बच्चे स्विमिंग पूल में
शरीर ठंडा कर रहे होते हैं
और तब हमारे बच्चे
सूखी नदियों. तालाबों में
रेत के नीचे
कीचड की सूखी पपड़ियों के नीचे
ढूंढ रहे होते हैं बूँद भर पानी
सिर्फ जीभ की
नमी बचाए रखने के लिए
और शायद इसीलिये
उनकी आँखों में नमी अब भी बची हुई है

अंधेरी रातों में

इन अंधेरी रातों में
सुबह का इंतजार मत करो
मशाल खुद जलाओ
सूखती उम्मीद को हरा करो

दिन बहुत उमस भरे और खराब हैं
नसीहतों. सलाहियतों का वक़्त अब नहीं रहा
प्यासे मर जाओ कि
उसके पहले
कुआं तुम्हे ही खोदना है

रोशनी तो होगी ही
बस इसी यकीन पर
एक बार फातिहा पढ़ कर आमीन तो कहो

साथ 

एक ने कहा में पूरब हूँ.
एक ने कहा मैं पश्चिम
मैं उत्तर
मैं दक्षिण हूँ
सब यह भूल गए
कि वे जिस जमीन पर खड़े हैं
दिशाएँ इस ज़मीन ने तय की हैं
अपनी धुरी पर अडिग खड़े रह कर

पृथ्वी की दिशाएँ तय और अडिग हैं
तय तुम्हे करना है
कि तुम दिशाओं के साथ हो या ज़मीन के

जेहन में न बैठे

मेरी आकांक्षाओं
करो अराधना
मेरी कल्पना साकार हो
परन्तु
न तो अज्ञेय की “प्रारब्ध में लिपटी” हो
न ही उसे दुष्यंत के “दरख्तों के साए में धुप लगे”
न तो शमशेर की कविता की तरह हो
कि हौले से छूना पड़े
इतनी गेय भी न हो
कि उसे हर कोई गा सके
न तो इतनी अतुकांत हो कि
किसी के जेहन में न बैठे

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