कुँवर दिनेश की रचनाएँ

शिमला

बड़ा ही नाज़ुक मिज़ाज है―
शहर मेरा।

ज़रा धूप हुई तेज़
कि फूट पड़ता है―
शहर मेरा।

ज़रा बादल हुए जमा
कि उदास हो जाता है―
शहर मेरा।

ज़रा हवा बही तेज़
कि थिरक जाता है―
शहर मेरा।

ज़रा बर्फ़ क्या गिरी
कि दुबक जाता है―
शहर मेरा।

बड़ा ही नाज़ुक मिज़ाज है―
शहर मेरा।

कल्कि के नाम फ़ैक्स

कब आओगे, कल्कि?
परित्राणाय साधूनाम्
विनाशाय च दुष्कृताम्
पुन: धर्मसंस्थापनार्थाय
प्रण अपना कब निभाओगे, कल्कि?
कब आओगे?

हम प्रतीक्षकों को
कोई ढाढ़स तो दे दो,
अपने अवतरण की
आकाशवाणी कर दो,
कोई दृष्टान्त तो दे दो;
प्रभाव अपना कब दिखाओगे, कल्कि?
कब आओगे?

हाँ आओगे जब
तो इतना ध्यान रहे-
तुम्हारे पूर्वावतार काल के शस्त्रास्त्र सब-
कोई चाप, कोई गदा, कोई वज्र,
कोई खड्ग, कोई त्रिशूल, कोई चक्र,
नहीं चलेंगे अब;

न्यूक्लियर अस्त्रों की तैयारी कर लेना,
अत्याधुनिक बम-वर्षक विमान जुटा लेना,
ए.के. सैंतालीस, छप्पन आदि से लैस होकर आना,
किसी बंकर में अपना ठिकाना बनाना।

देखो कल्कि,
मैं डरा नहीं रहा तुमको,
कहीं तुम अपना प्रोग्राम बदल न लेना!
मैं तो अवगत करा रहा हूँ तुमको-
आज की आसुरी शक्तियाँ बदल गई हैं,
ये साइबर असुर कुछ जटिल-प्रकृति हैं,
ये भावनाशून्य, विध्वंसक-प्रवृत्तिहैं ।

तुम त्रिदेव से मिलकर
कोई विशेष युक्ति कर
उतरना धरती पर
और उतरते समय भी रहे ध्यान में-
कहीं माईन्ज़ न बिछीं हों मार्ग में,
तुम्हारे उन्मुख लगी न हों मिसाईलें,
रहना सचेत, सतर्क, सैन्य-सहित,
हम तुम्हारे सुहृद्, सहृदय प्रतीक्षक-
तुम्हारे शुभागमन के हेतु
बनाते हैं क्षेम-कामनाओं का सेतु।

बँटा हुआ एक घर 

मैंने कविता लिखनी चाही
एक घर पे:
एक ही छत के नीचे
बंटा हुआ एक घ र
कितने ही कट-
घ रों में विभाजित,
सब में पृथक्-
पृथक् चूल्हा,
चूल्हे से उठता धुँआ-
सब क-ट-घ-रों में फैल रहा,
धुँए में कुछ भी
साफ़ नहीं दीख पड़ रहा…
धुँआ हटे
तो कविता बने…

घर की देवी 

सूर्य आ खड़ा होता है
हमारे घर की देहली पर,

उसके महाघोष के सथ ही,
हमें रज़ाई से
बाहर खदेड़ने को;

आलस्य के वशीभूत, पलंगतोड़ हम,
घोंघों के जैसे,
धँसते जाते हैं
ऊनी लिहाफ़ों में;

जागकर सबसे पहले,
लवे के सथ-साथ,
स्वागत करते
दर्वाज़े को खटखटाती
सूर्याँशुओं का;

और फिर सुनते हुए
हमारी पुकार―
प्रात: की बिस्तरी चाय के लिए;

वह रहती है हमेशा
वक्त की पाबंद,
चाहे गर्मी हो, बर्सात हो,
या फिर कड़कड़ाती
सर्दी हो, बाहर हिमपात हो,

वह करती है सेवा
नि:स्वार्थ भाव से,
भृकुटि पर
बिना किसी बल के;

वह माँ है, पत्नी है,
चाची है, भाभी है,
बहू है―सब
एक ही समय पर;

हर सुबह
होती है प्रकट वह-
चाय की प्यालियाँ लेकर
हर पलंग के पाये पर।

इच्छाएँ 

मेरे उर में है
अतृप्य इच्छा―

एक ऐसे गुलाब की
जिसके साथ कण्टक न हो;

एक ऐसे कमल की
जिसका उद्गम पंक न हो;

एक ऐसे संदल की
जिसमें लिपटा भुजंग न हो;

एक ऐसे चन्द्र की
जिसके भाल पर कलंक न हो;

एक ऐसे पूर्णचन्द्र की
जिसका कभी क्षय न हो;

एक ऐसे दिवस की
जिसका अंधकार में विलय न हो;

एक ऐसे नद की
जिसका सागर में अन्त न हो;

एक ऐसे नभ की
जिसका क्षितिज अनन्त न हो;

एक ऐसे सूर्य की
जो कभी अस्त न हो;

एक ऐसे जीवन की
जो मृत्यु से परास्त न हो;

एक ऐसे यौवन की
जो जरा से जर्जर न हो;

एक ऐसे तन की
जो नश्वर न हो;

एक ऐसी आत्मा की
जो निराकार न हो;

एक ऐसे समाज की
जिसमें वर्ग प्रकार न हो;

एक ऐसे राष्ट्र की
जिसमें सीमाओं का आधार न हो;

मैं करता हूँ इच्छाएँ ऐसी
क्योंकि मैं बचाना चाहता हूँ
पहचान सब की;

मैं अक्सर पूछता हूँ
सर्वशक्तिमान रचयिता से―
क्यों वह रचता नहीं
वस्तुएँ ऐसी?

और मैं कह सकता हूँ
मानवी गर्व से―
यहाँ हार गया है सर्वशक्तिमान!

आम आदमी 

मैं आम आदमी हूँ,
मैं आम आदमी हूँ।

मैं उपवन में अपतृण -सा उग आया हूँ,
मैं जनपथ पर कुहरा सा घिर आया हूँ,
मैं पावस ऋतु में छाई नमी हूँ;
मैं आम आदमी हूँ,
मैं आम आदमी हूँ।

मैं सरकार के सिर पर राहु सा छाया हूँ,
मैं विभ्रान्त आत्मा की अवाञ्छित काया हूँ,
स्पर्शातीत हूँ, किन्तु लाज़मी हूँ;
मैं आम आदमी हूँ,
मैं आम आदमी हूँ।

मुझे संदेह है

वह व्यक्ति जो हँस रहा अधिक है,
मुझे उस पर संदेह है।

वह व्यक्ति जो रो रहा अधिक है,
मुझे उस पर संदेह है।

वह व्यक्ति जो बोल रहा अधिक है,
मुझे उस पर संदेह है।

वह व्यक्ति जो चुप रहता अधिक है,
मुझे उस पर संदेह है।

वह व्यक्ति जिसमें अनुरक्ति अधिक है,
मुझे उस पर संदेह है।

वह व्यक्ति जिसमें रोष अधिक है,
मुझे उस पर संदेह है।

वह व्यक्ति जिसमें दर्प अधिक है,
मुझे उस पर संदेह है।

वह व्यक्ति जिसमें विनय अधिक है,
मुझे उस पर संदेह है।

जो दिखता है जैसा, हो भी वैसा,
यह आवश्यक तो नहीं।

चेहरा होता है मन का आईना―
मुझे उस पर संदेह है।

वे और मैं 

प्रात:
मैं हूँ उगता सूरज
वे
झुकाते हैं सिर
और चढ़ाते हैं
भेंट भी
क्योंकि मेरे पास है
प्रचुर प्रकाश
उन्हें देने के लिए।

मध्याह्न:
मैं हूँ तपता सूरज
वे
झुकाते हैं सिर
मैं उष्णता में
उनकी भेंट का
करता हूँ प्रत्यार्पण
वे
समझ नहीं पाते हैं
मेरा हृदय।

सायं:
मैं हूँ डूबता सूरज
वे
फेर लेते हैं मुंह
क्योंकि मेरे पास
है अल्प अब
उन्हें देने के लिए।

रात्रि:
मैं छिप जाता हूँ
बचाने को
अपने स्वयं को
क्योंकि अब मेरे पास
कुछ भी नहीं है
उन्हें देने के लिए-

न वह प्रकाश
और न वह उष्णता।

एकाकीपन

कई बार मैं बन जाता हूँ
एक प्रेतवाहित घर

मेरे अतीत के चमगादड़
चिपक जाते हैं
मेरे अन्तस्वक्, मेरे अन्तर्वयव में

स्मृतियों के मकड़े
फैला देते हैं अपने ऊतक जाले
मेरे मस्तिष्क के कोटरों में

खूनी खटमल
मेरे व्यतीत प्रेम के
बनाने लगते हैं अपना निवास
मेरे हृदय में

उम्मीद के बिच्छू
करते हैं मैथुनी नृत्य
मेरी आँखों में

प्रेम प्रेतनी फिरने लगती है
समस्त नाड़ी संस्थान में
परितंत्रिका के हर एक तंतु में
हर शिरा, हर धमनी में
करती है संचरण
यह सब होता है अक्सर
रात्रि के अजीब से सन्नाटे में

विलग प्रेम की स्मृति में
एक काव्यानुभूति
बन ओझा करती है
झाड़-फूँक

करने को वशीभूत
मेरे भीतर का भूत―

मेरा प्रेताविष्ट एकाकीपन।

अल्पदृष्टि 

मानसून का सघन शून्य,
आर्द्र अश्माएँ,
धरा की ओर
लुपलुपाता, आँख मिचकाता सूर्य,
धुँधकार में धँसता – शिमला।

मैं
खड़ा ऐकिक
नगर के नुक्कड़ से
देखता हूँ ताज़ा―
ताज़ा धुँधेरी―
उमड़ती घुमड़ती हुई
घाटी की दरारों में से,
परिवेश का आच्छादन करती,
प्रत्येक वस्तु को ढाँपती;

बचा रहता हूँ मैं
मेरी एकलता में
एकमात्र मैं
अस्तित्व में,
एक हस्ती
लुप्त होते नगर में।

मेरा जलना

मैं
जलता हूँ
निरन्तर
एक मोमबत्ती की तरह
किन्तु
मैं
राख नहीं छोड़ता
मैं
छोड़ता हूँ मोम
पुनर्पुन: जलने के लिए…

खड्ड 

और अब यहाँ यह खड्ड
मेरे गाँव की सीमा में
प्रवेश करती है

जाने कहाँ से
कितने गाँवों से
होती हुई

यह खड्ड
हमारे गाँव में आती है
और फिर चली जाती है
अन्य गाँवों की ओर…

हम।ने
गाँव की सीमाओं को छूती
खद्द के इस भाग को
कई भागों में बाँट रखा है-

वह
ऊपर वाला भाग है
पीने का पानी लाने के लिए
लेकिन सिर्फ़ इनर कास्ट लोगों के लिए

और थोड़ा नीचे है
जगह आऊट कास्ट के लिए

और वहीं,
वहीं पास में
जगह है पशुओं के भी
पानी पीने की,

फिर आता है
खड्ड का वह हिस्सा
जहाँ गाँव के लोग,
विशेषकर युवा,
अक्सर गर्मियों में नहाते हैं,
ठण्डे-ठण्डे पानी की सिहरन का
आनन्द उठाते हैं;

उनके साथ ही
स्नान का आनन्द उठाते
दिखती हैं गाँव की भैंसें;
वहीं पास में
थोड़ा नीचे
शौच-निवृत्ति के लिए लोग जाते हैं;

फिर
उस छोर पर-
जहाँ हमारे गाँव कि सीमा
समाप्त होती दिखती है,
और सीमा आरम्भ होती है
दूसरे गाँव की-

वहीं
वहीं पर है
कुछ-कुछ दूरी पर
अन्तिम संसकार के निमित्त बने
जाति अनुसार घाट;

पर जब कभी यहाँ चिताएँ
जलती दीख पड़ती हैं तो-
अचम्भे की बात है कि-
उन सब से उठती लपटें
सभी एक ही रंग की होती हैं,
उन सब से उठता धुआँ
एक ही रंग का होता है,
एक ही रंग की होती है-
उन सब की राख,

और इन सब के साथ
एक ही रंग है
उस खड्ड के पानी का
जिसकी अजस्र धारा को हमने
कृत्रिम सीमाओं में
विभक्त कर रखा है।

दर्पण

दर्पण क्या समझेगा
तुम्हारे मन की इच्छा,
यह तो वही दिखाएगा
जो कि तुम हो…

इसे परवाह नहीं तुम स्वयम् को
किस रूप में देखना चाहते हो,
तुम कैसा दिखना चाहते हो…

तुम्हारी चाह
यथार्थ से बढ़कर तो है नहीं;

अब जो जैसा है
वैसा ही तो दिखेगा…

दर्पण को कोसो मत,
दर्पण पर बिगड़ो मत,
यह बिगड़ गया अगर
तो तुम्हें तुम्हारा चेहरा
कौन दिखाएगा?

पता चलेगा जब
पानी में मुंह देखना पड़ेगा…

अभी जो बनते-संवरते हो,
चौखटे को थोड़ा सजा पाते हो,
वह भी न हो सकेगा;
फिर से जानवर सदृश हो जाओगे…

दर्पण ही तो
तुम्हें इन्सान बनाता है,
बार-बार तुम को
तुम्हारी सूरत दिखाता है,
ताकि जो कोई मैल जमी हो
उसे तुम मिटा सको…
अपने चेहरे को तुम
यदि कल्चर्ड नहीं
तो कम-अज़-कम
सिविलाइज़्ड तो बना सको…

वंश+वृक्ष

… और वह वृक्ष जड़ दिया गया
दीवारों में और छत में।

वह, जो करता रहा अंशदान
अपने अंगों का-
एक वंशवृक्ष के
अनेकानेक संसकारों में।

किसी पूर्वज ने
सम्भवत:
उगाया था उसे
और पूजा था उसे,
अनुवंशज
लेते रहे स्वाद
उसके फलों का।

आज
नई पीढ़ी ने
काट डाला उस वृक्ष को
पुराने मकान की
मुरम्मत के लिए।

फिर भी वृक्ष वह
आनन्दित था
उस परिवार में
समा जाने पर।

अकेला पेड़

1
अकेला पेड़
घर की दीवार से
सटा है पेड़
2
नन्हा सा सोता
बीहड़ जंगल में
एकल रोता
3
तारों का मेला
रात है जगमग
चाँद अकेला
4
नार अकेली
छेड़ती बार बार
हवा सहेली
5
डगर सूनी
जी बहलाने आयी
हवा बातूनी
-0-

अपना कोई

1
सपना कोई
चंदा की सूरत में
अपना कोई ।
2
छैल चिनार
रंग बदल रहा
ऋतु विचार ।
3
अकेला पेड़
घर की दीवार से
सटा है पेड़ ।
4
बर्फ़ के फाहे
आसमानी नेमत
मन सराहे ।
5
रुत फाल्गुनी
धरा की जिजीविषा
बढ़ी चौगुनी ।
6
राह एकांत
पथिक को जोहती
हुई अशान्त ।
7
समता– भरी
आकाश की आँखें हैं
ममता –भरी ।
8
कोहरा छाए
स्वागत में आकाश
बाहें फैलाए ।
9
आती है पौन
दर को खटकाती
रहती मौन ।
10
नार अकेली
छेड़ती बार -बार
हवा सहेली ।
11
डगर सूनी
जी बहलाने आई
हवा बातूनी ।

मायावी संत

1
फूलों के रंग
बसंत की रौनक
तितली संग ।
2
झूमे वसन्त
श्यामल भ्रमर की
चली पढ़ंत ।
3
मोहे वसंत
भ्रम लिये भ्रमर
मायावी संत ।
4
सर्षप -सेना
गणना में अगण्य
वसन्त सेना ।
5
वसन्तोत्सव
आम्र -मञ्जरी पर
पिकी का रव ।
-0-

शब्दों की फाट 

1
शब्दों की फाट
संबंधों के खेत में
मन उचाट ।
2
शब्द हैं सही
अर्थ बदल रहे
शब्दों की कही ।
3
शब्द है वही
अर्थ बना रहे हैं
दूध का दही।
4
शब्द भी थके
मन को मनाने में
जीत ना सके।
5
शब्द गलत!
अर्थ भी सारे हुए
क्षत– विक्षत।
-0-

सिन्धु का टोना

1
समुद्र तले
सूर्य को देखा मैंने
जल चुराते ।
2
चन्द्र की सत्ता
ज्वार-भाटा में डोले
समुद्र सारा ।
3
सिन्धु का टोना
सूर्य की किरणों से
वारि हो सोना ।
-0-

उषा काल में 

1
कहीं बुराँश
वसन्त -वह्नि लिये
कहीं पलाश
2
ज़रूरी काम
ठहर जा शहर!
ट्रैफिक जाम
3
हर पहर
कहे व्यथा नदी की
हर लहर
4
नदी में बाढ़
नेता-अधिकारी की
मैत्री प्रगाढ़
5
उषा काल में
खगों की आकुलता
डाल -डाल पे
6
साँझ सावनी
शिमला क्षितिज पे
बदली घनी
7
सोए हैं सब
जग रहा जुगनू
जगती शब
8
राह पुरानी
बच्चों की किलकारी
शाम सुहानी
(‘जग रहा जुगनू’: हाइकु -संग्रह-2018से)

हिम जो झरे 

1
हिम धवल –
धरा पर उतर
हो रहा जल!
2
आकाश झुके
हिम के स्वागत में
हवा भी रुके!
3
पवन रुके
हिम जब झरता –
मेघ भी रुके!
4
भू की तृषा से
हिम बरसता है
देव-कृपा से!
5
हिम जो झरे
कंक्रीट का शिमला
घावों को भरे!
6
बर्फ़ का हौआ
ख़ामोश शहर में
उड़ता कौआ!
7
हवा बर्फ़ानी –
सामना करने की
पेड़ों ने ठानी।
8
पेड़ चीड़ के
बर्फ़ में भी रहते –
हरे के हरे!
9
झोंके हवा के –
धौलाधार से आते –
बर्फ़ मिलाके!

पृथ्वी का रोष!

1.
क्यों रोना आया?
थम गया संसार,
कोरोना आया।
2.
आए न कोई
एक-दूजे के पास
जाए न कोई।
3.
है मजबूरी
अपने पराए से
रखना दूरी।
4.
मिला ना हाथ,
तू बस दूर ही से
हिलाना हाथ।
5.
दुनिया रुकी
वायरस के आगे
दुनिया झुकी।
6.
घमण्ड चूर,
मानव से मानव
हुआ है दूर।
7.
क्या हो भविष्य?
मुश्किल है लड़ाई,
शत्रु अदृश्य।
8.
कमरे तक!
सिमटा है जीवन―
अपने तक!
9.
बना था ख़ुदा
इन्सान ख़ुद ही से
हुआ है जुदा।
10.
कोरोना रोग
अपना या पराया
शक़ में लोग।
11.
खाली सड़कें
चिड़ियों के दल भी
खुले में उड़ें।
12.
लॉकडाउन:
शुद्ध हुई है हवा,
स्वच्छ टाउन!
13.
सहमा, डरा―
आदमी ने छिपाया
निज चेहरा।
14.
शान्ति पसरी,
चिड़ियों की चहक
मिठास भरी!
15.
धुआँ जो हटा,
सुदूर का पर्वत
सुन्दर दिखा!
16.
स्वच्छ हवा में
चिड़ियों की टोलियाँ
उन्मत्त उड़ें।
17.
गौरैया आई,
खाली सड़क देख
छटपटाई!
18.
डरा आदमी!
छिपा-छिपा घर में
आज़ाद पंछी!
19.
लॉकडाउन:
चिड़ियों के क़ब्ज़े में
सारा टाउन!
20.
मन्दिर बंद,
मन के मंदिर में
मिले आनन्द!
21.
रुका शहर:
उतर आए पंछी
सड़कों पर।
22.
जी भरमाए!
कोई आए न जाए―
कागा क्यों आए?
23.
धरती माता!
मानवता की यही
भाग्य विधाता!
24.
उड़े हैं होश!
कोरोना का प्रकोप―
पृथ्वी का रोष!
25.
बचाएँ पृथ्वी!
पीढ़ियों का सहारा,
स्वर्ग है यही!

झरने फूटे 

1
झरने फूटे
सावन में नगों के
हौसले टूटे।
2
श्याम या श्वेत
सावन के बादल
हैं अनिकेत।
3
जाएँ किधर?
आकाश में कहाँ है
मेघों का घर?
4
ढूँढते नैन
धुँध में गुम हुआ
मन का चैन।
5
कुहेलिका- सी
सावन में तुम हो
प्रहेलिका- सी!
6
बादल गाँव
आया चाँद बटोही
उड़ते पाँव!
7
सावन आया
बूढ़ा बांज का पेड़
ख़ूब नहाया।
8
झरती बूँदें
बैठी रात अकेली
आँखों को मूँदे।
9
पूनम रात
अकेला पड़ा चाँद
मेघों की घात!
10
घास है घना
कानन कहे यहाँ
आना है मना।

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