कुबेरदत्त की रचनाएँ

देह का सिंहनाद 

यह मेरा
अपमानित, तिरस्कृत शव…
शव भी कहाँ-
जली हडडियों की केस प्रापर्टी,
मुर्दाघर में अधिक-अधिक मुर्दा होती…
चिकित्सा विज्ञान के
शीर्ष पुत्रों की अनुशोधक कैंचियों से बिंधी,
विधि-विधान के जामाताओं का
सन्निपात झेलती…
ढोती
शोध पर शोध पर शोध-
यह तिरस्कृत देह…
सामाजिकों की दुनिया से
जबरन बहिष्कृत
अख़बारनवीसी के पांडव दरबार में नग्न पड़ी
यह कार्बन काया-
मुर्दाघर में अधिक-अधिक मुर्दा होती…
भाषा के मदारियों की डुगडुगी सुनती…
कट-कट
जल-जल
फुँक-फुँक कर भी
पहुँच नहीं पाती पृथ्वी की गोद तक…
न बची मैं
न देह
न शव…
भूमंडलीकरण की रासलीला के बीच
लावारिस मैं
अधिक-अधिक मुर्दा होती…
झेलती
पोस्ट-पोस्ट पोस्टमार्टम
उत्तर कोई नहीं
न आधुनिक, न उत्तर आधुनिक
न प्राचीन…
क्या
मुर्दों के किसी प्रश्न का
कोई उत्तर नहीं होता?

चितकबरे अर्थों के लिए 

वहाँ- जहाँ कि नापाक काली इयत्ताओं पर
एक रक्त वृत्त निरन्तर घूमता है,
भाषा जिसके सम्मान में
अपने सारे मुखौटे उतार कर नत रहती है,
तकलीफ़ जहाँ सभ्य कबूतरी की केंचुल फेंक
नंगी हो जाती है और
चितकबरे अर्थों को सही पहचान देती है
वहाँ मित्र !
समय और पड़ाव
सपाट रास्तों और उजले पदचिन्हों को ठेंगा दिखाकर
कोई मुहूर्त चोरी-चोरी नहीं बीत जाता है !

परछाइयों और आकृतियों में भेद करने वाली
तमाम षड़यंत्र-शृंखलाएँ टूट जाती हैं, और
निनाद और अनहद नाद के फ़र्क पर कोई
बहस नहीं जुड़ती !

बेशक, प्रतिबंधित शर्तें
छद्म को चीरकर उभरती हैं
और संधिपत्र
चिथड़े-चिथड़े हो जाते हैं
बच रहती है केवल नीली सुर्ख़ इबारतें
उसके बाद शोर और ढोल-मजीरे
और श्लोक
सब मिलकर जन्मते हैं शलथ-जीवनहीन माँस-पिंड
अथवा पत्थर की मानवाकृतियाँ
पर, सूरज डूबने से रात होती है,
यह किसने कहा ?

ओ केरल प्रिय-1

ऐसी मनहर शाम
कि जिसमें
ताड़-सुपारी
नारिकेल,
कटहल,
केले के
हहराते हैं अंतरिक्ष तक
हरे समन्दर…
मेरा सब अभिमान तिरोहित
मैं कुर्बान
देखकर ऐसी संध्या लोहित

ओ केरल प्रिय-2 

केरल के ये लम्बे कौवे
चम्पा के अधेड़ तरुवर पर
फुदकें, चहकें
दिन-भर मलयालम में बोलें
भेषज के रहस्य को खोलें
धनवंतरी
चरक के
नुस्खों की
करते हैं सहज व्याख्या
अँग्रेज़ीदाँ बहरे हैं पर
शिर-पीड़ा-निदान हित दौड़ें केमिस्टों तक
जीवन को ऐस्प्रीन बनाया
दीन बनाया
हीन बनाया
कव्वे बोल-बोल थकते हैं
आधुनिकों के नेता कहते—
‘ये तो ऐसे ही बकते हैं’ ।

रचनावली

एक दिन आएगी
मेरी भी रचनावली,
एक दिन आएगी
एक सजी-धजी दुनिया—
मेरी रचनावलियों से बाहर ।

एक दिन
मिलेंगे मुझे भी
बड़े
और सबसे बड़े पुरस्कार
एक दिन पहनूँगा मैं भी
दुनिया के महँगे फूलों का हार
एक दिन
खिलेगा मेरे आँगन में, तमगों, रुपयों
सोने का हरसिंगार ।

तैयारी में लगा हूँ
भभका चालू है
औषध सब खदबद खदबद है…
बूँद-बूँद जोड़ता हूँ अर्क
चौपड़ पर चौपड़
रहा खेल
एक-एक चाल पर
होती कुरबान मेरी शतरंजी
सँभल-सँभल चलता हूँ चाल
सम्मोहनी घोड़ी
की ठोंकी हैं नई-नई नाल
चढ़-चढ़ जिस पर
न्यास और अकादमी और संस्थान
होंगे कुरबान
महकेगी मेरी कवितावली
एक दिन आएगी मेरी भी रचनावली ।

अयोध्या 

बाकर अली
बनाते थे खड़ाऊँ
अयोध्या में ।
खड़ाऊँ जातीं थीं
मन्दिरों में
राम जी के
शुक्रगुज़ार थे बाकर अली ।
ख़ुश था अल्लाह भी ।
उसके बन्दे को
मिल रहा था दाना-पानी
नमाज और समाज
अयोध्या में ।
एक दिन
जला दी गई
बाकर मियाँ की दुकान
जल गईं खड़ाऊँ तमाम—
मन्दिरों तक जाना था जिन्हें
हे राम !

कविता से बाहर

कभी-कभी सोचता हूँ
बहुत हो गई
बहुत हो गई कविताई ।

जीवन के नाम पर शेष
चेक एक पग़ार का
कविता उसमें कुछ कर पाई ?
कभी-कभी सोचता हूँ
बहुत हो गई कविताई ।

जीवन के नाम पर
उजड़ता रचना-प्रदेश
उसमें भी यहाँ-वहाँ साँप, बिच्छू, अजदहे
कहीं कंटाल
कहीं खंदक, कहीं खाई
कभी-कभी सोचता हूँ
बहुत हो गई कविताई ।

जीवन के नाम पर बच रहे ढकोसले
पकोड़े, चाय, विमोचन, नोचन
चाय, चूँ-चूँ, चरड़-चरड़
कुछ भाषाई झाड़-फूँक
कुछ शाब्दिक शबाब
कुछ मरियल-मरियल शब्द-क्रीड़ा
सुनने की इच्छा अन्ततः
बूढ़ा शाब्दिक रबाब
शब्द न हुए शब्द ।

आँखों में रहना

दुख का पारावार भले हो
जीवन-गति लाचार भले हो
हे सूरज
हे चांद-सितारो
आँखों में रहना।

मतिभ्रम का बाज़ार भले हो
हे समुद्र
हे निर्झर, नदियो
आँखों में रहना।

स्त्री के लिए जगह

कोई तो होगी
जगह
स्त्री के लिए

जहाँ न हो वह माँ, बहिन, पत्नी और
प्रेयसी
न हो जहां संकीर्तन
उसकी देह और उसके सौन्दर्य के पक्ष में

जहाँ
न वह नपे फ़ीतों से
न बने जुए की वस्तु
न हो आग का दरिया या अग्निपरीक्षा
न हो लवकुश
अयोध्या,
हस्तिनापुर,
राजधानियाँ और फ्लोर शो
और विश्व सौन्दर्य मंच
निर्वीय
थके
पस्त

पुरुष अहं
को पुनर्जीवित करने वाली
शाश्वत मशीन की तरह
जहाँ न हों
मदान्ध पुरुषों की गारद

जहाँ न हों
संस्कारों और विचारों की
बन्दनवार
उर्फ हथकड़ियाँ

कोई तो जगह अवश्य होगी
स्त्री के लिए
कोई तो जगह होगी

जहाँ प्रसव की चीख़ न हो
जहाँ न हों पाणिग्रहण संस्कारों में छुपी
भविष्यत की त्रासद
कथा- शृंखलाएँ

जहाँ न हो
रीझने रिझाने की कला के पाठ
और सिन्दूर-बिन्दी के वेदपुराण

कोई तो जगह होगी
स्त्री के लिए
जहाँ
न वह अधिष्ठित हो
देवियों की तरह
रानियों, पटरानियों
जनानियों की तरह
ठीक उसी तरह
जैसे कि
उस जैसे पीड़ित पुरुष के लिए
जो जन्मा है
उसी से

कोई तो जगह होगी।
हर जगह
सर्व शक्तिमानों के लिए
कभी नहीं थी
जैसे कि
अज्ञान और अधर्म के
लिए नहीं है हर जगह
कोई तो जगह अवश्य होगी।

प्रेयसी से 

कहाँ गए वे दिन
जिन्हें हमने छोटे-छोटे अल्युमीनियम के गमलों में बोया था?
धीरे-धीरे बड़े हो रहे थे दिन।

हमारे श्रमकर्षित जिस्मों से निकलती थीं ठोस इरादों की उसाँसें,
बाँस की छोटी-सी झोपड़ी की खिड़की से आती ठण्डी हवा
हमें सुबह की लड़ाई के लिए लोहा बना देती थी।
दिन भर हम भट्ठी में गलते थे
और शाम को देखते थे एल्युमीनियम के गमलों में
पलते-बड़े होते अपने दिनों को।

वे दिन थे हमारे लिए — तुलसी दल
पीपल
कनेर, बेला, गुलमेहदी, सूरजमुखी
गुलमोहर, तीज त्योहार, नए कपड़े,
नई किताबें, नई कविताएँ, नये नृत्य-
संगीत रचनाएँ, संघर्ष की नई ख़बरें,
नई तैयारियाँ, नई सफलताएँ, नए मित्र
नए संवाद…

गमलों में उगते उन दिनों में
झलकते थे इन्द्रधनुष, अलकापुरी, सैर सपाटे, अभियान,
पर्वत, समन्दर, फूलों की घाटी की सैर…
चाबुक खाते लोगों के साथ हम भी लगाते थे इंकलाब का नारा
हो जाते थे लहूलुहान…. पर
गमलों को सिरहाने रख हम
सो जाते थे अगली सुबह की लाली को मस्तक पर
गालों पर
होठों पर
हृदय पर मलने के लिए…
कि जब एक-दूजे के चेहरों में ख़ुद को
और अपने जैसों करोड़ों अनाम साथियों को देख
रीझ रीझ जाते थे हम।

बिस्तर की सलवटों को
निकालते-चहकते हम सुनते थे प्रभात फेरियों के ताज़ा स्वर
और दुनिया भर के अन्धे कुओं की मुण्डेर पर
खड़ी होकर चीख़ती भीड़ की आवाज़ —
‘सुबह हो गई,
अन्धेरा बेदख़ल हो!’
…कि जब अख़बारों के तेज़-तुर्श शीर्षकों को
कैंची से काट
हम असली ख़बरों की अलबम में चिपकाते थे…
…कि जब दफ़्तर के बॉस को मुँह चिढ़ाते थे
और अपनी पसंद के शब्द लिखते थे सरकारी नोटशीट पर
कि जब मार्क्स और आदि शंकराचार्य
लेनिन और भगतसिंह
कबीर और पुरन्धरदास और हरिदास
मीरा और आण्डाल — सबको मथते थे अपने अध्ययन कक्ष में
कि जब घर की खिड़कियों से झाँकते
भेड़ियों को हम भगा देते थे जंगलों में —
डरा कर अपनी आंखों की लाल चिंगारियों से।

मगर फिर क्या हुआ?
याद है?
मुझे याद है।
मुझे याद है कि सचिवालय से आया था एक तेज़ाब का बादल
बरस गया था हमारे गमलों पर।

फिर भी हमारे इरादे सुरक्षित थे
तेज़ाब के बादलों के छँटते ही हमने देखी थी माफ़िया टोली
नहीं नहीं, वे जादूगर नहीं थे —
बाजीगर नहीं थे
बहुरूपिए नहीं थे
उनमें थे व्यापारी, आरक्षी, अधिकारी-राजपुरुष-गुण्डे-क़ातिल,
लबारची, चारण, चमचे, दलाल, कमीशनख़ोर, सटोरिए,
जुएबाज़, चोर, बटमार और गोएबल्स के नए कम्प्यूटरी संस्करण।
उनमें हरेक के जबडों में फँसे थे
हमारे छोटे छोटे गमले
जिनमें रोपे थे हमने अपने दिन।

वे हमारे दिन चबा रहे थे….
हमारे शरीर का तमाम लोहा और रक्त उन्होंने सोख लिया है
वे सोख चुके हैं हमारे मस्तिष्क का
तमाम विवेकी द्रव…
अपनी अपनी पोशाक पर
तीन रंगों का उलटा स्वस्तिक सजाए….वे
हमें गुलाम बना चुके हैं…
हमें बेहोश कर
हमारी नींद में उन्होंने ले लिए हैं हमारे अँगूठों के निशान —
अपने सोने-चांदी-हीरे और झूठ के
स्टाम्प पेपरों पर।
दशक धँस रहे हैं काल के गाल में।

धंस सकती है शताब्दी भी…
अगले दशक भी, अगली शताब्दी भी…
हमारी जलती लालटेन की बत्ती
उन्होंने निकालकर फेंक दी है।
…………….

अन्धेरे, घुप्प अन्धेरे में
छू रहा हूँ मैं तुम्हें
टटोल रहा हूँ
कोशिश कर रहा हूँ जगाने की….
ताकि तुम्हारे चेहरे की
मायावी रंगत बेदख़ल हो….

तुम एक नहीं हो मेरी प्रेयसी
तुम महादेश की करोड़ो-करोड़ जनता हो
तुम्हारी अधखुली, नींद भरी आखों की कोरों से रिसते
सपनों के दृश्यबन्ध और
तुम्हारी चेतना में नर्तन करते
एक गोल गुम्बद में रचे जादू के करिश्मों के
मायाजाल के तार काट सकूँ…
बेताब हूँ इसके लिए…

देखो तो / जागो तो / सुनो तो
सबके साथ यही हुआ है… ठीक यही…
हम सबके साथ यही हुआ है…
…………………..

हाँ मैं देख रहा हूँ साफ़-साफ़
तुम जाग रही हो धीरे-धीरे / लोग जाग रहे हैं धीरे-धीरे
रंगीन, सुगन्धित कोमा की दलदल से लोग
धीरे-धीरे उठ रहे हैं, सम्भल रहे हैं….
बुझी हुई लालटेनों की बत्तियां ढूँढ़ रहे हैं लोग…
अपने अपने गमलों में फिर से रोपेंगे
अपने पौधे, अपने स्वप्न
जिन्हें पोसेगी आज़ाद हवा।

मेरी प्रिय
आज़ाद साँस और आज़ाद हवा
और आज़ाद धरती से बड़ा
कुछ नहीं होता।
…मैं तुम्हारी आँखों की
रक्ताभा में देख रहा हूं
आज़ादी का
स्वप्न, पुनर्नवा !

टी०वी० पर भेड़िए

भेड़िए
आते थे पहले जंगल से
बस्तियों में होता था रक्तस्राव
फिर वे
आते रहे सपनों में
सपने खण्ड-खण्ड होते रहे।

अब वे टी०वी० पर आते हैं
बजाते हैं गिटार
पहनते हैं जीन
गाते-चीख़ते हैं
और अक्सर अँग्रेज़ी बोलते हैं

उन्हें देख
बच्चे सहम जाते हैं
पालतू कुत्ते, बिल्ली, खरगोश हो जाते हैं जड़।

भेड़िए कभी-कभी
भाषण देते हैं
भाषण में होता है नया ग्लोब
भेड़िए ग्लोब से खेलते हैं
भेड़िए रचते हैं ग्लोब पर नये देश
भेड़िए
कई प्राचीन देशों को चबा जाते हैं।
लटकती है
पैट्रोल खदानों की कुँजी
दूसरे हाथ में सूखी रोटी

दर्शक
तय नहीं कर पाते
नमस्ते किसे दें
पैट्रोल को
या रोटी को।
टी०वी० की ख़बरे भी
गढ़ते हैं भेड़िए
पढ़ते हैं उन्हें ख़ुद ही।

रक्तस्राव करती
पिक्चर-ट्यूब में
नहीं है बिजली का करण्ट
दर्शक का लहू है।

कैमरा : एक 

सिर्फ़ दृश्य ही नहीं पकड़ता है कैमरा
दृश्यों के रंग भी बदलता है
ख़ुद नहीं रोता
दर्शक के तमाम आंसुओं को
श्रीमन्तों के पक्ष में घटा देता है।

चमड़े के सिक्कों को
बदलता है स्वर्ण मुद्राओं में
भाषा नहीं है कैमरा
गढ़ लेकिन सकता है रत्नजड़ित भाषा
उजाड़ में उतार देता है परिस्तान
धरती पर स्वर्ग बसा देता है।

जहाँ नहीं है धरती
रच सकता है धरती वहाँ।
जहाँ है उखड़ी हुई ज़मीन
बसाता है बस्तियाँ वहाँ।

दिन या रात
या गहरी रात के किसी प्रकाश-इन्तज़ाम में
कैमरा
स्लम और झोपड़-पट्टियों की कतारों को
बनाता है आकर्षक
सजाता है बन्दनवार शवों पर
मुर्दाघर को कर सकता है सराबोर
समृद्ध शास्त्रीय संगीत से।
गैस पिए कंकालों के ढेर पर
रच देता है विश्व कविता मंच।

नैतिकता के
असमाप्त प्रवचन के दरमियाँ
ताबड़तोड़ गालियाँ देता है कैमरा।
प्रेम-मुहब्बत को
बना देता है
प्रेम-मुहब्बत की डमी।
आमात्यों के पक्ष में रचता है
नई बाइबिल
रामायण, गीता नई,
वेद, कुरान, पुराण नए,
और तो और दास कैपिटल नई,
परिवारों और दिलों के
गुप्त कोनों, प्रकोष्ठों को
करता है ध्वस्त।

दिखाता नहीं है फकत युद्ध
रचता है युद्ध भी
खा सकता है इतिहास
उगल भी सकता है, इतिहास का मलबा,
निगल भी सकता है भूगोल —
राज और समाज का

एक चेहरे पर अजाने ही
चस्पाँ कर देता है चेहरा ए और बी और सी
या
कोई भी नोट, पुरनोट
मुद्रा, स्फीति, प्रतिभूति, बैंक,
राष्ट्रीय पुरस्कार
अन्तरराष्ट्रीय तमगे
किरीट या गोबर के टोकरे
आदमी की काया को करता है फिट
मनचाहे जानवर के सिर पर।

सिर के बल खड़े
औचक भौचक इनसानों को
बदलता है
भाप
इंजन
ईंधन
इलेक्ट्रान
शून्य
संख्या या गणित में।

अचेत इनसानों के इरादों तक को
गुज़ार देता है इन्फ्रा-रेड इन्द्रजाल से
या खालिस सैनिक संगीत में
अनूदित कर देता है।

सिलसिला शवाब पर है
कैमरा प्रमुदित है
हे दर्शक
चाहे तो
ग़ौर से देख
दिखाता जो कैमरा है
शक्तिशाली उससे भी
तीन आयामी फ़िल्में असंख्य
चलती हैं तुम्हारी चेतना के पर्दे पर
तुमने ज़्यादा देखा है।

अभी तो
कुछ-कुछ नींद में हो
नहीं जो तुम्हारी कमाई हुई पूरी-पूरी
तुम चाहो तो
जा सकते हो
कैमरों के पीछे
चाहो तो
मोड़ सकते हो
कैमरों का लैंस भी
मोड़ते जैसे हो बन्दूक की नाल
कभी-कभी।
यक़ीन कर
हे दर्शक
व्यू फाइण्डर देखेगा वही
जो तुम देखना चाहोगे।
तय करो
कहाँ रहोगे अन्ततः
कैमरों के आगे
या पीछे?

कैमरा : दो

टी०वी० सब दिखाता है
फौजी विजयघोष।
राजपथ विजयपथ दर्पपथ
लेफ़्ट राइट, लेफ़्ट राइट
लेफ़्ट राइट, थम।
साँस थामे
जीन कसे घोड़ों की
चमकीली पीठ पर
लहरियाँ लेता संगीत
बरतानी बाजों से
साँप की फुफकार-सा
बाहर आता है
राजा गाल बजाता है!

पार्श्व में
रोता है भारत का दलिद्दर!
सुरक्षा कवच पहन-पहन
बैठे सिपहसालार और सालारजंग
दायें-बायें नगर-प्रान्तों में गोली-वर्षा जारी
शासन पर विजय का पल-पल नशा तारी।

ढेर-ढेर होता है
भारत का दलिद्दर
सचिवालय के पार्श्व में रोता है!
खद्दर से रेशम तक
खोई से साटन तक
पहुँच गया गणराज्य
सैनिक के बूटों के नीचे जो
बजता है
महाकुठार शवों-अस्थियों का
शस्त्रों का नहीं।

कनस्तर ख़ाली है
माल-असबाब सब
अन्न, खाद्यान सब
तन्न, मन्न, धन्न सब
विजय गीत की
स्वरलिपियों में बदल चुका।

दासानुदास प्रवर
बना बैठा है प्रधान
लोक-लोक बज रहा
सज रहा तन्त्र-तन्त्र
सत्ता के मन्त्र पर
गर्दन हिलाता है
विषधर वह
जिसकी फुफकार
आती बाहर है
बरतानी बाजों की नलियों से
छिद्रों से।

आसमान बारूदी
हवा, पानी, धरती सब बारूदी
भारत का दलिद्दर
खाँसता है, खाँसता है।

संसद में संसद

1

संसद में बिकी संसद टके सेर
राजपथ पर सुलभ सारे हेर-फेर
बिना मूल्य बिके मूल्य टके सेर
संसद में बिकी संसद टके सेर।

भाजपा जपा इंका तिंका
जद फद, जदस फदस
अगप सकप
सपा बसपा
लुक छिप सरे-आम
बिना दाम
लुट रहे टके सेर
संसद में बिकी संसद टके सेर।

2

कीचड़ मल सने राजकाज
हत्या हथियारों के व्यापारी
लूट चके शर्म लाज
मादर
बिरादर तक सत्ता के
दरबदर घूम रहे —
सत्ता के अपने ही गलियारे
त्राहि-त्राहि रहे टेर
संसद में बिकी संसद टके सेर।

3

भाषण पर भाषण देता है दुःशासन
अनुशासन की चीर जांघ
सजा-धजा हत्यासन
कविचारण, कलावन्त, पत्रकार,
कलाकार
भाट रचनाकार करते
संकीर्तन
द्रौपदी का चीरहरण फिर जारी
वृहन्नला बने खड़े हैं —
जबर-बबर-रबर-शेर
संसद में बिकी संसद टके सेर।

4

जनता को
गाय-वाय
भेड़-भूड़
बकरी या ठेठ मूढ़
समझे हैं सदियों से
धवल वस्त्रधारी पिण्डारी
भाषा के आखेटक,
नियमों-अधिनियमों के
नादिरी बहेलिए
हाड़-माँस नगर-गाँव
इनसानी हाथ-पाँव एक साथ खाते जो
सभ्यता चबाते जो
मूल, सूद, पंचायत, पालिका, जिला, प्रान्त…
देश-द्वीप-महाद्वीपखोर
ग्लोब की नसों पर, चिपके हैं —
जोंक से…
बारूदी, रक्तबुझी, स्वर्णतुला
तौल रही देश-दुनिया
संसदी चंगेज मुखरित हैं, मगन हैं
मगन उनके धूर्त, हिंसक पुतुल-सर्कस
संसदी चँगेज के गुण्डे बजाते तालियाँ हैं
राम-महिमा के निकट ही
दाम-महिमा का हरम है
गरम है, ख़ासा गरम है
शासनी बन्दूक के घोड़े के पीछे —
राम-रथ के,
रोज़ की तनख़ा-ख़रीदे
खच्चरी घोड़े खड़े हैं
उनके पीछे
क्रूर चेहरे
न्याय, समता की नटी की
ओढ़नी ओढ़े खड़े हैं
पोस्टर पर पोस्टर पर पोस्टर है
शब्दकोषों की धुनाई चल रही है
जन-लहू की
उन को बट कर
बुनाई चल रही है
हर अन्धेरा मुँह छिपाए
भागता है —
देखकर यह
ख़ून से तर-बतर अजब अंधेर
संसद में बिकी संसद टके सेर।

5

संसदी चँगेज़ के ख़ूनी जमूरे
औरतों, मज़दूर, बच्चों को, किसानों को
दफ़्तरों, सड़कों, मुहल्लों को
कारख़ानों, मदरसों को
खेत को, खलिहान को
रायफ़ल की नोक पर टाँगे खड़े हैं…
पेटियाँ मत की हुईं तैयार
हुलसते हैं सेठ-साहूकार
लो,
उधर सुविधा-सलौने
उर्फ़ बौने
बिके, सत्ता-सिंके वे सब पत्रकार
झूठ की रपटें बनाने में जुटे हैं,
पत्रकारी के सभी आदर्श —
स्वर्ण बिस्कुट
मोद-मदिरा से पिटे हैं
स्वेच्छा से, लुटे हैं,
खौफ़ के मँज़र हैं या
जम्हूरियत के ख़ाक पिंजर
रोज़ टी० वी० पर दिखाए जा रहे हैं
ख़ून पीते
ग्लोब भर का नून खाते, चून खाते
संसदी चँगेज़
रोज़ टी० वी० पर दिखाए जा रहे हैं
आदमी से आदमी तक
खिंच रही है बोल-भाषा की दीवार
इस सदी से दूसरी में
हो रही दाख़िल
गुनाहों की मीनार…
कालिमा की
किंगडम का बनैला अन्धेर…
संसद में बिकी संसद टके सेर।

बोल, अबोले बोल

1

बोल
अबोले बोल
अबोले बोल
फँसे जो,
भाषा के संकरे
भोजन-तलघर से लेकर
भाषा की वर्तुल ग्रीवा में
गाँठ-गाँठ
गठरी-गठरी में
भाषा की ठठरी में बजती है
अर्थ-समर्थ
अनर्थ
हुए सब डाँवाडोल।
बोल
अबोले बोल
अबोले बोल।

2

तम से उपजा
काल
हुआ आपात
उधेड़ा गात प्रात का
वणिक चक्र से ब्रह्मचक्र तक
काल काल आपात।
काल चबेना राजकाज का
जनता के आमाशय में जबरन ठूँसा जाता
चुभता बनकर विष-शूल।
कभी कलदार-खनक,
दक्षिणा-दण्ड वह
कुत्तों तक को नहीं हुआ मंज़ूर,
हुआ मगरूर….
खोल, काल की ऐंठन खोल।
बोल
अबोले बोल, अबोले बोल।

3

मुर्दे घूम रहे।
बस्ती में।
सस्ती, सुन्दर और टिकाऊ
सरकारों का
दण्ड-विधान लिए।

प्रेत-बाध को कील, कवि।
कर, सर-सन्धान प्रिये
घर,
मग में अब
लौह-चरण
सत्ता का उड़े मखौल।
बोल
अबोले बोल, अबोले बोल।

4

शस्त्रों की
खेती उजाड़
भकुओं के भाषण
फाड़
स्वेद कणों की देख बाढ़
भागें लबाड़
लुच्चे, बैरी, कुटिल-कबीले
मुफ़्तखोर, साधू-कनफाड़
काट डाल सपनों के बन्धन,
तन के, मन के।
दाएँ-बाएँ उगी हुई जो
खरपतवारी बाढ़,
खूब चले हँसिया कुदाल….
सोने की हेठी के
नाकों में लोहे की दे नकेल
शोषक साँप-बिच्छुओं को
धरती से नीचे दे ढकेल…
शिशुओं का क्रन्दन बन्द करो कवि
उनके आँसू का मण्डी में लगे न कोइ्र मोल
दोहन का मिट्टी-गारा,
श्रम-कर्म-सम्पदा को, हे कवि।
पूरा-पूरा तोल
बोल, अबोले बोल
अबोले बोल।
परहित
जनहित के ध्वज फहरें
राजमहल पर, प्रासादों पर
दहल-दहल जाएँ
भूपतियों के क़ातिल संसार संवत्सर
स्वर्ण-बिस्कुटों की
जाजम
बिछ जाए वहाँ जनपथ पर।
जनता के घायल पद-दल से
फूटें
नव दिनकर।
क्रान्ति-राग के सम्मुख हारे
ख़ूनी शंख, ढपोल
बोल
अबोले बोल
अबोले बोल।

केरल-प्रवास : तीन

कैण्टीन के भीतर से आती
ख़ुशबू ने मुझे लुभाया…
कैण्टीन के भीतर जाकर
सांबर के संग चावल खाया
ऊपर से एक
छोटा पापड़
चरड़-चरड़-चड़ खूब चबाया
कूट्ट भी खाया
कद्दू का कुछ…
चार ओक पी रसम चरपरी
छाछ पिया फिर तीन कटोरी।
भूलभाल कर
दिल्ली, हिन्दी
भूलभाल कर
शर्ट-पैण्ट, अँग्रेज़ी की दुम
मैंने भी लुंगी डाटी थी
तबियत खासी खाँटी थी।

चलन हुआ रंगीला मेरा
चाल हो गई गबरू मेरी
मुझे देखकर
कैंटीन का पतला-सा वह
ख़ुशदिल बैरा
फरर-फरर हँसता जाता था
मानो कहता हो वह मुझको —
‘दिल्ली वाले के बस का यह
इमली रोज़ पचाना
यूँ आसान नहीं जी
मुश्किल है जी।

एक साल कम से कम रह लो
थोड़ी-सी मलयालम सीखो
थोड़ा-सा कर्नाटक म्यूजिक
केरल कला मण्डलम जाकर
थोड़ी सीखो कला-कथकली
नम्बूदरियों से भिड़ने का कौशल सीखो
थोड़ा सीखो हाथ चलाना, पैर चलाना
थोड़ा सीखो नाव चलाना
कई-कई दिन
घरवालों से दूर
समंदर के जबड़ों में
रहना सीखो।

मच्छी पकड़ो
कच्छी पहनो
पैण्ट-शर्ट को अलमारी की भेंट चढ़ाओ…
नारिकेल के
ऊँचे-ऊँचे शहतीरों पर
सरपट-सरपट चढ़ना सीखो।
केरल की जनता के संग-संग
जीना सीखो, मरना सीखो,
ताप, घाम, बारिश-थपेड़ को
सिर-माथे पर धरना सीखो।
धारा के विरुद्ध तैरो तो
बात बनेगी
इमली तभी पचेगी।

वरना श्रीमन्
नारिकेल की चटनी खाकर
केले के पत्तों पर थोड़ी
उपमा लेकर
अप्पम लेकर
लेकर थोड़ा
पान-सुपारी,
ताड़ी की कुछ
लाल खुमारी
हरियाली का
चुम्बन लेकर
लौटो अपनी दिल्ली वापस
पहनो अपनी पैण्ट महाशय
पकड़ो अपनी ट्रेन महाशय
केरल को
केरल रहने दो।’

संगीत : एक 

कहाँ से आ रहा है संगीत यह?
शेल्फ़ में अँटी, धूल-सनी
किताबों में सम्भावनाएँ भरता हुआ….
यह संगीत कहां से आ रहा है…?

दिशाओं के
श्वेत परदों पर उभरने लगीं
सपनों में देखे सच की शक्ल…
मैले-चीकट चेहरों पर नाचने लगे
जुगनू…
खण्डहरों में धूनी रमा रहे हैं
बिस्मिल्ला खाँ…
भूतकाल के लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ी
खलास-बदहवास आकृतियों में
उभरने लगे हाथ पैर सिर
अभियान…

अकादमियों की कारा से
मुक्त होकर दौड़ पड़े रचनाकार
विस्तृत मैदानों में
साँस लेते खुलकर
हवाओं को आलिंगनबद्ध करते….
मुक्तिकामी रचनाओं का
चुम्बन लेते, चुम्बन देते….
जादू कर रहा है संगीत यह…

खुल रही है बस्ती की
डरी दुबकी खिड़कियाँ
सड़कों पर जुट रहे हैं लोग
शिरस्त्रान कस रही हैं राजधानियाँ
रक्षाकवच पहन रहे हैं भद्रजन….
चाबुक खाई माँओं की गोद में
लोरियां सुनते
शिशु
उठ बैठे हैं
सीख रहे हैं जल्दी-जल्दी चलना

मौसम के तमाम
आदिम अर्थ लेकर
इतिहास की लावारिस
काली-सफ़ेद सुर्ख़ियाँ लेकर
आँसुओं के सूर्यमुखी लेकर
जड़ आत्माओं के विलुप्त गीत लेकर
और
मेरे समय के आधे हरे, आधे भरे
घावों को दुलराता
और
मेरे समय के शब्दों को
अर्थवान करता….
और
करता हुआ हज़ारों सुराख़
अन्धेरे की दीवार में
यह संगीत…
आख़िर
कहाँ से आ रहा है?

संसद से राजघाट तक फैले हुए हैं आप

महलों से मुर्दघाट तक फैले हुए हैं आप
मखमल से लेके टाट तक फैले हुए हैं आप

बिजनेस बड़ा है आपका तारीफ़ क्या करें
मन्दिर से लेके हाट तक फैले हुए हैं आप

सोना बिछाना ओढ़ना सब ख़्वाब हो गए
डनलप पिलो से खाट तक फैले हुए हैं आप

ईमान तुल रहा है यहाँ कौडि़यों के मोल
भाषण से लेके बाट तक फैले हुए हैं आप

दरबारियों की भीड़ में जम्हूरियत का रक़्स
आमद से लेके थाट तक फैले हुए हैं आप

जनता का शोर ख़ूब है जनता कहीं नहीं
संसद से राजघाट तक फैले हुए हैं आप

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