कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह की रचनाएँ

वह नदी में नहा रही है

वह नदी में नहा रही है
नदी धूप में
और धूप उसके जवान अँगों की मुस्‍कान मे
चमक रही है।
मेरे सामने
एक परिचित ख़ुशबू
कविता की भरी देह में खड़ी है
धरती यहाँ बिल्‍कुल अलक्षित है —
अन्तरिक्ष की सुगबुगाहट में
उसकी आहट सुनी जा सकती है ।

आसमान का नीला विस्‍तार
और आत्‍मीय हो गया है ।
शब्‍द
अर्थ में ढलने लगे हैं ।
और नदी
उसकी आँखों में अपना रूप देख रही है ।

आसमान के भास्‍वर स्‍वर उसके कानों का छूते हैं,
और वह गुनगुना उठती है ।
उसके अन्दर का गीत
[एक नन्‍हा पौधा]
सूरज की ओर बाँहे उठाए लगातार बढता जा रहा है ।

हरिजन टोली

हरिजन टोली में शाम बिना कहे हो जाती है ।
पूरनमासी हो या अमावस
रात के व्यवहार में कोई फ़र्क नहीं पड़ता ।

और जब दिन के साथ चलने के लिए
हाथ-पैर मुश्किल से अभी सीधे भी नहीं हुए रहते,
सुबह हो जाती है ।

कहीं रमिया झाड़ू-झँखा लेकर निकलती है
तो कहीं गोबिन्दी ग़ाली बकती है ।
उसे किसी से हँसी-मजाक अच्छा नहीं लगता
और वह महतो की बात पर मिरच की तरह परपरा उठती है ।

वैसे, कई और भी जवान चमारिनें हैं,
हलखोरिनें और दुसाधिनें हैं,
पर गोबिन्दी की बात कुछ और है —
वह महुवा बीनना ही नहीं,
महुवा का रस लेना भी जानती है ।

उसका आदमी जूता कम, ज़्यादातर आदमी की जबान
सीने लगा है । मुश्किल से इक्कीस साल का होगा,
मगर गोबिन्दी के साल भर के बच्चे का बाप है ।
क्या नाम है? — टेसू ! हाँ, टेसुआ का बाप

गोबिन्दी टेसुआ और उगना के बीच बँटी है
मगर टेसुआ के क़रीब होकर खड़ी है ।

उस बार टोले के साथ-साथ उसका घर भी जला दिया गया था,
और फगुना के बच निकलने पर
उसका एक साल का बालू आग में झोंक दिया गया था।

इस बार गोबिन्दी टेसू को लेकर अपने उगना पर फिरण्ट है,
पर उगना कुछ नहीं सुनता
दीन-दुनिया को ठोकर मार दिन अन्धैत देवी-देवता पर थूकता है,
बड़े-बड़ों की मूँछें उखाड़ता-फिरता है —
और लोगों को दिखा-दिखाकर आग में मूतता है ।

गोबिन्दी को पक्का है :
आग एक बार फिर धधकेगी,
और उसके टेसू को कुछ नहीं होगा —
सारी हरिजन टोली उसकी बाँह पकड़ खड़ी होगी,
और उस आग से लड़ेगी ।

राम और राम के बीच

राम और राम के बीच गायब राम ही होता है,
लड़ता रह जाता है नाम उसका । भीतर से ताला
बन्द कर लेता है अल्ला और ईसा बाहर सूली
पर चढ़ता है । नदी पर बान्ध देने वाला घुटने भर
पानी में डूबता है, अपने आप टूटता पहाड़ तोड़ने वाला ।
और जो नया-नया रास्ता निकालता है, टकराता जा
रहा है दिशाओं से — हदों से, रास्ता अपना बन्द कर
लेता है, घुटता है मन के अन्धेरे में, सूरज जबकि
ठीक उसके सर पर चमकता है । आदमी जहाँ आदमी
नहीं रह जाता, सबसे बड़ा शत्रु पहले आदमी का
होता है । वैसे आदमी कभी कम नहीं था किसी से,
कम नहीं है । मगर आदमी, आदमी वह कहाँ है ?

रास्ता बंद नहीं होता

रास्ता कहीं बंद होता तो इरादा मज़बूत हो।
पहले क़दम उठाते हैं, रास्ता फिर पीछे लग जाता है
मंज़िल जो नई हो, ऐसा कभी नहीं होता कि जहाँ
जाने का रास्ता पहले ही से बिछा हो। मंज़िलों
तक पहुँचने वाले क़दम अपना रास्ता ख़ुद निकाल
लेते हैं। उस मंज़िल का आख़िर क्या होना जिससे
हमक़लाम होने को दिलो-दिमाग़ से बेचैन कोई
क़दम न हो। और क़दम अक्सर ग़लत उठ जाते हैं
जब इरादा साफ़ नहीं होता। अन्दर से ख़ुद विभाजित
हुआ रहा अपनी ज़मीन और अपना आसमान भी
विभाजित कर लेता है। क्रांतियाँ मंज़िलों से नहीं,
अपनी ओर बढ़े आ रहे क़दमों से धोखा खा जाती हैं-
इसके कब्ल कि उसका सूरज धरती पर उतर कर कण-कण से
सम्वाद करे, सूर्यग्रहण लग जाता है।

रौशनी अंधेरे का विलोम नहीं होती

यहाँ से वहाँ तक दौड़ती रहती है।
कभी-कभी
जब बहुत घना हो जाता है अंधेरा,
लगता है,/ नहीं है–

पेड़-पौधे,/ पर्वत और झरने,
झीलें, नदियाँ–
ग़म में घुलते हुए कुनबे
और घोंसले / ख़ुशियों से कुलबुलाते–

सभी
नीली नींद में डूबे रहते हैं अपनी

मगर तब भी
पर्त-पर-पर्त पड़े अंधेरे की
छाती छेदती रहती है–
अपना पूरे वजूद लिए होती है रौशनी–
रौशनी अंधेरे का विलोम नहीं होती।

मौसम बीमार है

एक अरसा हुआ
फूलों के पास नहीं गया
न तितलियों को उड़ते हुए देखा
खुले आसमान के नीचे बैठ
बातें नहीं की हरियाली से

झील पर पड़ती छायाएँ
काँप-काँप रह गईं
व्यर्थ हुआ नदी का गाना और रोना
चमकना / शिखरों पर सूरज का
सूरज पर शिखरों का पिघलना
मुँह उधर कभी नहीं किया
बच्चों को लगा रहा
शीत से बचाने में वसन्त
आने का वादा कर
आते-आते रह गया।

चवरी 

चवरी आरा के पास बसी एक बस्ती का नाम है, जिसमें ज़्यादातर हरिजन और दलित वर्ग के शोषित-दमित-प्रताड़ित लोग रहते हैं। कुछ दिन पहले पुलिस ने धनी किसानों के साथ मिलकर उन पर ‘छापा’ डाला था, क्योंकि वे लोग मज़दूरी की एवज़ में भर-पेट खाना माँगते थे। उन्होंने पुलिस के धावे का प्रतिरोध किया, पर सशस्त्र पुलिस के धावे के सामने वे कितना टिक पाते !)

कभी चन्दना — रूपसपुर
कभी चवरी !
यह चवरी कहाँ है ?

भोजपुर
यानी बाबू कुँवर सिंह का ज़िला शाहाबाद
यानी दलितों के पैग़म्बर महात्मा गान्धी के
हिन्दुस्तान
यानी अब इस नए समाजवाद में —
आख़िर कहाँ है चवरी ?

जलियाँवाला बाग़ से कितनी दूर —
वियतनाम के कितनी क़रीब ?

कोई भी ठीक-ठीक नहीं बोलता !
फिर, तू ही बोल — कहाँ है चवरी ?

तूने तो देस-बिदेस के ड्राइँगरूमों में सजे
किसिम किसिम के आइनों में झाँका होगा —
कहीं चवरी को भी देखा ?

जो सड़क चवरी से निकलकर दिल्ली जाती है
उसका दिल्ली से क्या वास्ता है ?
चवरी की हरिजन टोली के नौजवानों के धुन्धुआते पेट से
खींच कर लाई गई अन्तड़ियों की लम्बाई क्या है ?
(कुछ पता है वे कब फिर पलीता बन जाएँगी !)
००

चन्दना-रूपसपुर से चवरी पहुँचने में
समय को कितना कम चलना पड़ा है !
और कितनी कम बर्बाद हुई है राजधानी की नींद
पुलिस के ‘ख़ूनी’, और न्यायपालिका के ‘बूचड़ख़ाना’
बन जाने में !
००

जिसे कहते हैं
मुल्क़
प्रशासन
न्यायपालिका
उसका रामकली के लिए क्या अर्थ रह गया है ?
रामकली ग़ुम हो कर सोचती है
और उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा है ।
लाली गौने आई है
और लालमोहर उससे छीनकर मिटा दिया गया है —
वह समय के सामने
अकेले, बुत बनी रहती है — उसकी बेबाक आँखों के लिए
दिन और रात में कोई फ़र्क़ नहीं रह गया है !
दीना और बैजू और रघुवंश की छाँह के नीचे
जनतन्त्र
किसी बड़े मुजरिम-सा
सिर नीचे किए बैठा है
और कहीं कुछ नहीं हो रहा है !
००

मज़बूरी का नाम महात्मा गान्धी है;
फिर, भूख और तबाही और ज़ोरो-ज़ुल्म का क्या
नाम होगा?
क्या नाम होगा इस नए जनतन्त्र और समाजवाद का ?
नक्सलबाड़ी या श्रीकाकुलम बहुत छोटा नाम होगा !
फिर, सही नाम क्या होगा ?
००

तुझे
मुल्क़ ने जाने-अनजाने
जी-जान से चाहा है
तेरी मुस्कान को तरोताज़ा रखने के लिए
(ख़ुद भूखा रहकर भी)
एक-से-एक ख़ूबसूरत गुलाब पैदा किए हैं !
तेरे फूल को
(जब तू नहीं रहेगी)
गोद में ले लेने के लिए
हरी-से-हरी घास उगाई है !
और तेरे होठों को चूमने के लिए
बड़ा-से-बड़ा जानदार आइना तैयार किया है !
फिर क्या कमी रह गई है
कि उसकी सुबह अब तक
शाम से अलग नहीं हो सकी है ?
०००

ठण्डे लोहे पर टँगी
काठ की घण्टियों के सहारे
आँगन के पार द्वार
कठपुतली उर्वशी का यह नाटक
आख़िर कब तक जारी रहेगा ?
००

आत्महत्या के लिए सबसे माकूल वक़्त तब होता है
जब रौशनी से अन्धकार का फ़र्क़ मिट जाता है
बोल, फिर क्या बात है — आत्महत्या कर लेगी ?
या अन्धेरे से घबराया हुआ कोई हाथ बढ़कर
तेरा गला दबोच लेगा ?
छिपकर कहाँ रहेगी ?

आज सारा हिन्दुस्तान चवरी है
जिसके हिस्से से रौशनी ग़ायब है ।

आदमी के लिए एक नाम

जिसे कहते हैं मुल्क़
उसके लिए हम जान देते हैं —
मगर वो मुल्क़ हमारा नहीं होता

जिसे कहते हैं लोकतन्त्र
उसके लिए हम वोट देते हैं
मगर वो लोकतन्त्र हमारा नहीं होता

जिसे कहते हैं सरकार
उसके लिए हम टैक्स देते हैं
मगर वो सरकार हमारी नहीं होती

और जिसके लिए हम कुछ नहीं करते
वो आदमी हमारा होता है,
हमारे साथ मरता है, जीता है
हमसे झगड़ता भी है
तो भी बिल्कुल हमारा होता है

क्या जो हम सब करते हैं, ग़लत होता है ?
लगता है,
हमने अपना नाम ग़लत रख लिया है —
जिसे हम अपना मुल्क़ कहते हैं वो हमारा
मुल्क़ नहीं होता, जिस जाति और वंश पर
हमें अभिमान होता है वह जाति हमारी नहीं होती —
उस वंश में हम पैदा हुए नहीं रहते

हमें अपने लिए कोई और मुल्क़
खोजना चाहिए । अपने लिए कोई और
नाम तजबीज़ कर लेना चाहिए । और
ज़रूरत पड़े (पड़ती ही है) तो ‘मैं’ को निकालकर
‘हम’ को पोख्ता कर लेना चाहिए ।

‘मैं’ को ‘हम’ के लिए
मिटा दिया जा सकता है
कि ‘मैं’ के लिए ‘हम’ ज़रूरी — सबसे सही
नाम है ।

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