कुमार अनिल की रचनाएँ

और कब तक चुप रहें (ग़ज़ल) 

ज़ुल्म है अब हद से बाहर, और कब तक चुप रहें
सामने है ख़ूनी मंज़र , और कब तक चुप रहें

रोक ली महलों ने जब ताज़ा हवा भी, धूप भी
हाथ में तब लेके पत्थर, और कब तक चुप रहें

तोड़ कर साहिल के बंधन हो गई पाग़ल नदी
अश्क आँखों में छिपाकर और कब तक चुप रहें

ज़ब्त की भी कोई आख़िर इंतिहा तो है ज़रूर,
होंठ दाँतों में दबाकर और कब तक चुप रहें

बाँटने निकला था सबको चिट्ठियाँ जो अम्न की
जाल में है वो कबूतर और कब तक चुप रहें

तोड़कर बंधन गले के, फाड़कर सीने के जोड़
चीख़ अब निकलेगी बाहर, और कब तक चुप रहें

पहले घायल जिस्म था, अब रूह भी ज़ख़्मी हुई
फिर बता तू ही सितमगर, और कब तक चुप रहें

घर लुटा कर, दिल जलाकर, छोड़कर अपनी अना
चुप रहें हैं हम तो अक्सर, और कब तक चुप रहें

बने हुए हैं इस नगरी में

बने हुए हैं इस नगरी में सब शीशे के घर लोगो
दरक गए तो कहाँ रहोगे मत फेंको पत्थर लोगो

इस सावन के सारे बादल दरियाओं में बरसे हैं
पानी-पानी टेर रहें हैं सूखे हुए शज़र लोगो

तुमको कैसे क़दम-क़दम पर हमराही मिल जाते हैं
अपना तो सारा का सारा तन्हा कटा सफ़र लोगो

होने को इस महानगर में छत भी हैं, दीवारें भी
कितना ढूँढा लेकिन हमको मिला नहीं इक घर लोगो

बात तभी है जब सूरज भी चमके पूरी शिद्दत से
सिर्फ़ हवाओं के चलने से घटता नहीं कुहर लोगो

अपने घर को आप जला कर सेंक रहे थे हाथों को
कल सपने में देखा हमने क्या अद्भुत मंज़र लोगो

मेरा अपना जीने का ढंग, मेरी अपनी राह अलग
चलती है जिस तरफ़ भीड़ मै चलता नहीं उधर लोगो

हर शख़्स है लुटा-लुटा

हर शख़्स है लुटा-लुटा हर शय तबाह है
ये शह्र कोई शह्र है या क़त्लगाह है

जिसने हमारे ख़ून से खेली हैं होलियाँ
हाक़िम का फ़ैसला है कि वो बेगुनाह है

ये हो रहा है आज जो मज़हब के नाम पर
मज़हब अगर यही है तो मज़हब गुनाह है

हम आ गए कहाँ कि यहाँ पर तो दोस्तों
रोशन-ज़हन है कोई, न रोशन निगाह है

दहशतज़दा परिंदा जो बैठा है डाल पर
यह सारे हादसों का अकेला गवाह है

मेरी ग़जल ने जो भी कहा, सब वो सच कहा
ये बात दूसरी है कि सच ये सियाह है

ये शहरे सियासत है यहाँ आजकल ‘अनिल’
इंसानियत की बात भी करना गुनाह है

हर तरफ़ इक सनसनी है

हर तरफ़ इक सनसनी है इस शहर में
मौत की चादर तनी है इस शहर में

दोस्तों के ही गले काटे गए हैं
ईद कुछ ऐसे मनी है इस शहर में

जो सितम की बात करते हैं, उन्ही की
आस्तीं खूँ में सनी है इस शहर में

हर गली बारूद ढोती हैं हवाएँ
हर सड़क खंजर बनी है इस शहर में

कितने मासूमों के घर फूँके गए हैं
तब हुई कुछ रौशनी है इस शहर में

रात फिर आने को है ये सोचकर ही
शाम कितनी अनमनी है इस शहर में

राम जाने रंग कैसा धूप का हो
रक्त रंजित चाँदनी है इस शहर में

वहम होता है ‘अनिल ‘ शमशान का अब
ख़ामुशी इतनी घनी है इस शहर में

मैं बनाने चला हूँ वो इक आशियाँ 

मैं बनाने चला हूँ वही आशियाँ
आ के जिसकी हिफाज़त करें बिजलियाँ

क्या हुआ छा गई हैं अगर बदलियाँ
चुप रहेंगी भला कब तलक आँधियाँ

ज़ुल्म जब हद से बाहर हुआ आदमी
आ गया सड़क पे भींच कर मुट्ठियाँ

बीज नफ़रत के मंचों से बोते हैं जो
उनके पाँवों से अब खींच लो सीढियाँ

पहने बैठे हैं महफ़िल में दस्ताने वो
ख़ून में तो नहीं भीगी हैं उँगलियाँ

कोई तिनका फ़कत न समझ ले हमें
अस्ल में हम तो माचिस की हैं तीलियाँ

फूल जितने थे जाने कहाँ खो गए
सिर्फ काँटों भरी रह गई डालियाँ

दिल के एवज ‘अनिल’ तुझको शीशा मिला
जिस्म के नाम पर रह गई हड्डियाँ

ठहरा है झील का पानी तो उठा लो पत्थर 

ठहरा है झील का पानी तो उठा लो पत्थर
कोई हलचल तो मचे, यारो, उछालो पत्थर

भूखे जो रह नहीं सकते हो तो इतना ही करो
रोटियाँ मिलती नहीं पीस के खा लो पत्थर

और कुछ भी नहीं इजहारे बगावत ही सही
तौल के हाथ हवाओं में उछालो पत्थर

तुम बड़े प्यार के हक़दार बने फिरते थे
प्यार के बदले में लो अब ये सँभालो पत्थर

ये न मुरझाएँगे, टूटेंगे, न बिखरेंगे कभी
फूल के बदले चलो घर में सजा लो पत्थर

वे तुम्हें लूटने आए हैं उठो कुछ तो करो
तीर, तलवार नहीं हैं तो सँभालो पत्थर

अब वहाँ गुल नहीं, कलियाँ नहीं, ख़ुशबू भी नहीं
कुछ मँगाना है वहाँ से तो मँगा लो पत्थर

इस शहर में ही अनिल रहना अगर है तुमको
शीशाए दिल को जरा पहले बना लो पत्थर

जितने भी लोग मुझे कल सरे बाज़ार मिले

जितने भी लोग मुझे कल सरे बाज़ार मिले
सब किसी और की अस्मत के ख़रीदार मिले

अहले गुलशन की भी नीयत पे यकीं क्या करते
फूल के परदे में जब हमको सदा ख़ार मिले

वे जिन्हें इल्म नहीं कुछ भी हवा के रुख़ का
आज हाथों में लिए कश्ती ओ पतवार मिले

जिस तरफ जाइये इक ख़ौफ़ज़दा आलम है
हर तरफ सर पे लटकती कोई तलवार मिले

बात करते थे जो आकाश को छूने की कभी
वक़्ते परवाज़ परिंदे वही लाचार मिले

हमने जो छत की मुंडेरो पे सजाए थे दीये
शाम होते ही जो देखा पसे दीवार मिले

ग़म से निस्बत ही कुछ ऐसी थी कि ठुकरा न सके
मिलने को राह में ख़ुशियों के भी अम्बार मिले

कौन टकराता भला बढ़ के हक़ीक़त से अनिल
सब ही इस दौर में ख़्वाबों के परस्तार मिले

वो शख़्स एक समंदर जो सबको लगता था

वो शख़्स एक समंदर जो सबको लगता था
किसे पता है भला वो भी कितना प्यासा था

अजीब बात ये अक्सर हुई है साथ मेरे
घटा थी, दोस्त थे, मय थी मगर मै तन्हा था

घटा को देख के हर शख़्स काँप-काँप गया
हमारे गाँव का हर एक मकान कच्चा था

ये बात और है ख़ुशियाँ वो लिखना भूल गया
सुना तो है कि नसीब उसने मेरा लिक्खा था

ये कौन याद के पत्थर यहाँ उछाल गया
ज़हन की झील का पानी तो कब का सोया था

किसी ने क़त्ल ही देखा न मेरी चीख़ सुनी
तमाशबीन थे अंधे , हुजूम बहरा था

हरेक क्यारी में उग आई कोई नागफनी
बड़ी उम्मीद से हमने गुलाब रोपा था

अगर ‘अनिल’ वो नहीं था तो कौन था यारो
जो शहरे संग में भी दिल की बात करता था

कौन किसको क्या बताए क्या हुआ 

कौन किसको क्या बताए क्या हुआ
हर अधर पर मौन है चिपका हुआ

जब भी ली हैं सिन्धु ने अँगड़ाईयाँ
तट को फिर देखा गया हटता हुआ

वक़्त की आँधी उमड़ कर जब उठी
आदमी तिनके से भी हल्का हुआ

बाँटने आए है अंधे रेवड़ी
हाथ अपना खींच लो फैला हुआ

भीड़ में इक आदमी मिलता नहीं
आदमी अब किस कदर तन्हा हुआ

सोचता सोया था अपने देश की
स्वप्न में देखा मकाँ जलता हुआ

कह रहें हैं आप जिसको दिल मेरा
दर्द का इक ढेर है सिमटा हुआ

व्यक्ति का आचरण विषैला है 

व्यक्ति का आचरण विषैला है
सारा वातावरण विषैला है

क्या सुनाएँ कथा विगत की तुम्हें
अपना हर संस्मरण विषैला है

सुन लो जंगल उजाड़ने वालो
इतना शहरीकरण विषैला है

वो क्या अमृत पिलाएगा जग को
जिसका अंत:करण विषैला है

साँस लेना भी हो गया मुश्किल
आज पर्यावरण विषैला है

रात पहुँचेगी भोर तक कैसे
जबकि पहला चरण विषैला है

क्या गजब है कि आदमीयत का
हर नया संस्करण विषैला है

अब न रस है, न छंद है, लय है
गीत का व्याकरण विषैला है

घटा से चाँद की सूरत निकल रहा हूँ मैं

घटा से चाँद की सूरत निकल रहा हूँ मैं ।
चिराग बनके अँधेरों में जल रहा हूँ मैं ।

तेरे ख़याल की उँगली पकड़ के दोस्त मेरे,
ग़ज़ल की वादी में कब से टहल रहा हूँ मैं ।

मैआर ऊँचा है सच का, खुलूस का माना,
मगर ये मान के ख़ुद को ही छल रहा हूँ मैं ।

न कारवाँ की ज़रूरत, न रहबरों से गरज,
जुनूने शौक में तन्हा ही चल रहा हूँ मैं ।

जहाँ पर सुबह के सूरज से हँस रहे हो तुम,
वहीं पर चाँद की मानिन्द गल रहा हूँ मैं ।

कभी ख़याल, कभी ख़्वाब की ख़लिश बनकर,
तुम्हारी नींदों में अक्सर ख़लल रहा हूँ मैं ।

मैं इक शज़र हूँ, बहारों के जश्न की ख़ातिर,
बदन पे सब्ज ये पत्ते बदल रहा हूँ मैं ।

सरे शहर में एक भी तो घर बचा नहीं 

सारे शहर में एक भी तो घर बचा नहीं
कल रात कोई हादसा जिसमे हुआ नहीं

चौरास्ते पे क़त्ल को मुद्दत गुजर गई
क्या बात है कि शोर भी अब तक मचा नहीं

कैसा ज़हर घुला था न जाने हवाओं में
कल रात जो भी सोया, अभी तक जगा नहीं

दहशत तमाम शहर में छाई है इस कदर
खिड़की भी कोई खोल के अब देखता नहीं

बेकार झूठी आस में फिरते हो दर बदर
कोई किसी का रास्ता अब देखता नहीं

सदियों से इंतजार था जिस शख्स का हमें
आया तो था करीब वह लेकिन रुका नहीं

माना ‘अनिल’ खरीद तू पाया न कुछ यहाँ
लेकिन यही क्या कम है अभी तक बिका नहीं

निकल आए किधर हम बेख़ुदी में

निकल आये किधर हम बेखुदी में
यहाँ तो है अँधेरा रौशनी में

न मेरी आँख क़ी खुश्की पे जाओ
कोई तूफां छुपा है खामुशी में

तुम्हारी याद ने ऐसा भिगोया
नहा जैसे लिया मैं चाँदनी में

किसे आवाज दूं किसको पुकारूँ
नहीं है दूर तक कोई गली में

छतों को कैसे दीवारें संभालें
यहाँ कमजोरियां हैं नीव ही में

‘अनिल’ तुमको भला क्या हो गया है
मजा आने लगा आवारगी में

मल्लाह बन के बैठे थे कल तक जो नाव में

मल्लाह बन के बैठे थे कल तक जो नाव में
लो आज वो भी व्यस्त हैं अपने बचाव में

कैसी तुम्हारे शहर क़ी आबो हवा हुई
हर शख्स जी रहा है, अजब से तनाव में

हथियार बन के उट्ठे तो कुछ बात भी बने
जो हाथ उठ रहा है अभी तक बचाव में

इस राख को कुरेद के देखो तो एक बार
थोड़ी सी आग बाकी हो शायद अलाव में

सैलाब नफरतों का गुजर तो गया मगर
रिश्तो के पुल भी बह गए उसके बहाव में

ख्वाहिश, तलब, शिकवे, गिले, नाकाम हसरतें
इन सबको छोड़ आये हैं पिछले पड़ाव में

दुनियावी सुख क़ी चाह में जीवन गुजर गया
सोना हमारा बिक गया मिट्टी के भाव में

मंदिर से कुछ लगाव न मस्जिद से कोई काम
ये लोग आ फँसे हैं सियासत के दाव में

देखो लहूलुहान है धरती का सारा ज़िस्म
मरहम लगाओ तुम ही ‘अनिल’ उसके घाव में

कभी तो चेहरे से चेहरा हटा के बात करो

कभी तो चेहरे से चेहरा हटा के बात करो
कभी तो खुद से भी आँखें मिला के बात करो

शदीद धूप में आये हैं चल के मीलो तक
अब आप छाँव में हमको बिठा के बात करो

पता बताएगा तुमको तुम्हारी मंजिल का
ये संगे राह है, इसको उठा के बात करो

हवा को देख के कांपोगे चरागों कब तक
अब आंधियों से भी सर को उठा के बात करो

मकान काँच के घेरे खड़े हैं राहों को
हरेक शब्द को पत्थर बना के बात करो

छुपाये फिरता हूँ दिल में गुबार सा कब से
मै रो लूँ, पास जो मुझको बिठा के बात करो

तुम्हारी फूल सी बातों को कौन समझेगा
क़ी अब जुबान में काँटे उगा के बात करो

सुनेगा कौन ‘अनिल’ तुमको हुजूम में इतने
कभी तो भीड़ से बाहर भी आके बात करो

इस तरह तारीकियों के हल निकले जाएँगे

इस तरह तारीकियों के हल निकाले जायेंगे
सिर्फ अंधों के घरों में दीप बाले जायेंगे

जिसको जो भी चाहियेगा वो उसे मिल जायेगा
उससे पहले हाथ लेकिन काट डाले जायेंगे

सोचते हैं आँख के आगे हथेली को रखे
कब लकीरें साफ़ होंगी कब ये छाले जायेंगे

रंगतें तो लूट ली फूलों क़ी, उजली धूप ने
गंध को झोंके हवाओं के उड़ा ले जायेंगे

फिर बिखर जायेगा तिनको क़ी तरह सारा हुजूम
चाँद सिक्के भीड़ में अब यूं उछाले जायेंगे

काँच के महलों में रह कर आज तो खुश हो बहुत
क्या करोगे कल अगर पत्थर उछाले जायेंगे

गुमशुदा इंसानियत को ढूँढने के वास्ते
सुन रहें हैं अब समंदर भी खंगाले जायेंगे

रोटियां सूखी इन्हें दे आप शर्मिंदा न हों
इतने भूखे हैं कि ये पत्थर पचा ले जायेंगे

घाट मुर्दा है, गली मुर्दा है, घर मुर्दा है 

घाट मुर्दा है, गली मुर्दा है, घर मुर्दा है
मैं जहाँ रहता हूँ वो सारा शहर मुर्दा है

अब अमल है न किसी बात का है रद्दे अमल
ऐसा लगता है कि हर एक बशर मुर्दा है

छाँव ही देगा, न फल- फूल ही देगा यारो
अब तो इस बाग का हर एक शज़र मुर्दा है

ऐसे माहौल में तख्लीके ग़ज़ल, शेरो सुखन
कौन कहता है कि शायर का हुनर मुर्दा है

वक्त के साथ हर एक बात के मतलब बदले
अब दुआ हो या दवा , सबका असर मुर्दा है

जुम्बिशे ज़िस्म से जिन्दा न समझ लेना इन्हें
ज़िस्म जिन्दा है तो क्या रूह मगर मुर्दा है

कतरा रहें है आज कल पंछी उड़ान से 

कतरा रहें हैं आज कल पंछी उडान से
पत्थर बरस रहे हैं बहुत आसमान से

कब तक उठाऊँ बोझ भला इस जहान का
अक्सर ये पूछती है जमीं आसमान से

ग़ुरबत ने गम भुला दिया बेटे के क़त्ल का
लाचार बाप फिर गया अपने बयान से

ऊपर पहुँच के लोग भी छोटे बहुत लगे
कुछ अपने भी देखा था उनको ढलान से

मैं बेवफ़ा हूँ मान ये लूँगा हज़ार बार
लेकिन वो एक बार कहे तो जुबान से

फिर आज हँस न पायेगा शायद तू शाम तक
अख़बार पढ़ रहा है क्यों इस दर्जा ध्यान से

इस शहर में ये अज़ब यारो तमाशा देखा 

इस शहर में ये अज़ब यारो तमाशा देखा
थी जरूरत जहाँ सूरज की कुहासा देखा

प्यास ही सिमटी हुई हमको दिखाई दी वहाँ
झाँक कर एक कुँए में जो जरा सा देखा

पीठ में घोंपते देखा था, छुरा रात जिन्हें
सुबह देते हुए उनको ही दिलासा देखा

कल तलक ज़र्द थे फूलों के ही चेहरे यारों
आज तो कलियों का भी रंग उड़ा सा देखा

रास्ता भूल के हम जाने कहाँ आ पहुँचे
जिसको भी देखा यहाँ पर तो लुटा सा देखा

दुनिया वालों ने तभी फेंकी है घर की कीचड़
जब भी दामन को ‘अनिल’ तेरा धुला सा देखा

जाने किसकी साजिश है ये 

जाने किसकी साजिश है ये जाने किसने फेंके हैं
मेरे शहर के दामन पर फिर ताजा खून के छींटें हैं

किसी सड़क पर नहीं सुरक्षा, कोई गली नहीं महफ़ूज
चप्पे चप्पे पर हत्यारे चेहरे बदले बैठे हैं

इस सीमा से उस सीमा तक चुप्पी ,सन्नाटा है
सूरज, चाँद सितारे, बादल सहमे सहमे लगते हैं

वे सब पंछी शौक जिन्हें था ऊँचा ऊँचा उड़ने का
छिप कर बैठे हैं पिंजरे में, बाहर आते डरते हैं

कल जब बिछड़े थे वे दोनों, पक्के दोस्त परस्पर थे
आज अगर मिलते भी हैं तो आँख तरेरे मिलते हैं

कौन धरा को धीर बंधाये, कौन बताये मौसम को
हरे भरे थे वृक्ष सभी जो इस आँधी में उजड़े हैं

गुलशन को शमशान बनाना जिनकी पहली ख्वाहिश थी
उन पर ही सब जुल्म हुए हैं, मयखानों में चर्चे हैं

अपनी, ख़ुशियाँ अपने सपने सब के सब बेकार हुए

अपनी खुशियाँ अपने सपने सब के सब बेकार हुए
फूलों जैसे लोग भी जाने क्यों जलते अंगार हुए

अपने ही कुछ भाई आकर दुश्मन के बहकावे में
अपने घर के टुकड़े टुकड़े करने को तैयार हुए

पुल होने का दावा करते फिरते हैं जो यहाँ- वहां
तेरे मेरे बीच में अक्सर लोग वही दीवार हुए

अज़ब बात है जब भी सोचा, कुछ दुनिया का हाल सुनें
सदा लूट व हत्याओं की खबरों से दो चार हुए

वहाँ वहाँ सूरज के आगे कोई बादल आ ठहरा
इस बस्ती में जहाँ सवेरा होने के आसार हुए

जो इस्पाती ढाल बने थे कभी हमारे सीने पर
जाने क्या हो गया उन्हें अब लोग वही तलवार हुए

इतनी बार खरीदे बेचे गए कि अब ये लगता है
जैसे हम इक जिन्स हुए हों, सब रिश्ते बाज़ार हुए

हिन्दू है कोई, कोई मुसलमान शहर में

हिन्दू है कोई, कोई मुसलमान शहर में
ढूँढे न मिला एक भी इन्सान शहर में

शायद कोई पुकार ले ये सोचता हुआ
कब से भटक रहा हूँ मै अनजान शहर में

बिखरे पड़े हैं आदमी लाशों की शक्ल में
होकर चुका है कोई घमासान शहर में

अच्छा नहीं तो कोई बुरा ही कहे मुझे
अपना हो कोई इतना तो अनजान शहर में

सब लुट गया है फिर भी दीया इक उम्मीद का
जलता है मेरे दिल के बियाबान शहर में

बच्चा कोई हंसेगा कि महकेगा कोई फूल
लौटेंगी फिर से रौनकें वीरान शहर में

दीवारों को घर समझा था 

दीवारों को घर समझा था
मैं कम से कमतर समझा था

सच का मोल नहीं है, सच में
तू मुझसे से बेहतर समझा था

सिक्के के दो पहलु सुख-दुःख
दुनिया ने अन्तर समझा था

थका हुआ था रात बहुत मैं
धरती को बिस्तर समझा था

आखिर वो पत्थर ही निकला
मैं जिसको ईश्वर समझा था

प्रश्न ही था वह प्रश्न के बदले
मैं पागल उत्तर समझा था

सबकी आँखों में झाँकता हूँ मै 

सबकी आँखों में झाँकता हूँ मैं
जाने क्या चीज ढूँढता हूँ मैं

अपनी सूरत से हो गयी नफरत
आईने यूं भी तोड़ता हूँ मैं

आदमी किस कदर हुआ तन्हा
तन्हा बैठा ये सोचता हूँ मैं

एक जंगल है वो भी जलता हुआ
अब जहाँ तक भी देखता हूँ मैं

कोई कहता है आदमी जो मुझे
भीड़ में खुद को ढूँढता हूँ मैं

अस्ल में अब ग़ज़ल नहीं कहता
खून दिल का निचोड़ता हूँ मैं

महफ़िल में तनहा रहता हूँ

महफ़िल में तन्हा रहता हूँ
देखो मै क्या क्या सहता हूँ

जब पुख्ता बुनियाद है मेरी
फिर क्यों खंडहर सा ढहता हूँ

लफ्फाजों की इस दुनिया में
इक मैं हूँ जो सच कहता हूँ

तुम हँसते हो फूलों जैसे
मैं आँसू आँसू बहता हूँ

बाहर से हूँ ठंडा- ठंडा
अन्दर से कितना दहता हूँ

आज जो आपको सुनानी है

आज जो आपको सुनानी है
ज़िन्दगी की अजब कहानी है

तब मिले हैं ग़ज़ल के ये मोती
हमने दुनिया की ख़ाक छानी है

घर के बाहर निकल के देखो तो
आज की रुत बहुत सुहानी है

सौंधी ख़ुशबू से भर गया घर को
पहली बारिश का पहला पानी है

मेरी ग़ज़लों में दर्दे मुफ़लिस है
कोई राजा, न कोई रानी है

फिर से महकेगा आज घर मेरा
आज फिर याद उनकी आनी है

इतना छोटा क़द बच्चों का

छोटा छोटा कद बच्चों का
बोझ मगर कितना बस्तों का

जैसी बातें करते हो तुम
मतलब क्या ऐसी बातों का

जो मंजिल तक पहुंचाते हैं
पता बताओ उन रास्तो का

सर पर चढ़ कर सूरज बोला
अब ढूँढो साया पेड़ों का

कैसे बिछड़ गया वो मुझसे
साथ हमारा था जन्मों का

बहुत खोखले निकले हैं वो
भरम बहुत था जिन रिश्तों का

जीवन की सुनसान डगर में 

जीवन की सुनसान डगर में
तनहा हूँ हर एक सफ़र में

हवा, धूप, पानी से बढ़कर
तुम रहते हो मेरे घर में

भूखे बच्चे बाट जोहते
आटा-दाल नहीं है घर में

घर में ज़्यादा शोर सड़क से
अंतर क्या है घर बाहर में

मारा-मारा फिरता है वो
इस खंडहर से उस खंडहर में

घर कहता है छोड़ के आना
दफ़्तर की बातें दफ़्तर में

घर में भर लूँ सारी दुनिया
घर तो हो पर दुनिया भर में

इन्हें काट कर छोटा कर दो
पाँव नहीं छिपते चादर में

होटों को सच्चाई दे 

होठों को सच्चाई दे
बस इतनी अच्छाई दे

मेरा ही आसेब मुझे
घर में रोज़ दिखाई दे

ऐसी क्यों है ये दुनिया
यारब आज सफ़ाई दे

रिश्ते अगर बनाए हैं
रिश्तों को गहराई दे

ख़ुद से भी कुछ बात करूँ
इतनी तो तन्हाई दे

अगर कहीं है ईश्वर तू
मुझको कभी दिखाई दे

मुद्दत से आँख नहीं झपकी 

मुद्दत से आँख नहीं झपकी
है कहाँ वो माँ वाली थपकी

उस सुख को क्या बतलाऊँ
पापा कह कर बिटिया लपकी

आँसू बनकर फिर लाचारी
उन बूढी आँखों से टपकी

फिर आज पिता ने बच्चा बन
वर्षा के जल में छप छप की

फिर बहुत दिनों के बाद आज
हमने भी खुद से गपशप की/>

एक कविता मृत्यु के नाम

मृत्यु तू आना
तेरा स्वागत करूँगा

किन्तु मत आना
कि जैसे कोई बिल्ली
एक कबूतर की तरफ़
चुपचाप आती
फिर झपट्टा मारती है यकबयक ही
तोड़ गर्दन
नोच लेती पंख
पीती रक्त उसका

मृत्यु तुझको
आना ही अगर है पास मेरे
तो ऐसे आना
जैसे एक ममतामयी माँ
अपने किसी
बीमार सुत के पास आए
और अपनी गोद में
सिर रख के उसका
स्नेह से देखे उसे
कुछ मुस्कुरा कर
फिर हथेली में
जगत का प्यार भर कर
धीरे से सहलाए उसका तप्त मस्तक
थपथपा कर पीर
कर दे शांत उसकी
और मीठी नींद में
उसको सुला दे

मृत्यु !
स्वागत है तेरा
जब चाहे आना

किन्तु मत आना
कि आता चोर जैसे
और ले जाता
उमर भर क़ी कमाई
तू दबे पाँव ही आना चाहती है
तो ऐसे आना
जैसे कोई भोला बच्चा
आके पीछे से अचानक
दूसरे की
अपने कोमल हाथ से
बंद आँख कर ले
और फिर पूछे
बताओ कौन हूँ मैं ?

तू ही बता
वह क्या करे फिर
मीची गई हैं आँख जिसकी
और जिससे
प्रश्न यह पूछा गया है
है पता उसको
कि किसके हाथ हैं ये
कौन उसकी पीठ के पीछे खड़ा है
किन्तु फिर भी
अभिनय तो करता है
थोड़ी देर को वह
जैसे बिल्कुल
जानता उसको नहीं है
और जब बच्चा वह
ख़ुश होता किलकता
सामने आता है उसके
क्या करे वह ?
खींच लेता अंक में अपने
पकड़ कर
एक चुम्बन
गाल पर जड़ देता उसके

मृत्यु
तू भी इस तरह आए अगर तो
यह वचन है
तुझको कुछ भी
यत्न न करना पड़ेगा
मै तुझे
ख़ुद खींच लूँगा
पास अपने
और
उँगली थाम
तेरी चल पडूँगा
तू जहाँ
जिस राह पर भी ले चलेगी

मृत्यु !
स्वागत है तेरा
जब चाहे आना

आँख अश्कों का समंदर 

आँख अश्को का समंदर है तो है
वक्त के हाथों में खंजर है तो है

मैंने कब माँगी खुदा तुझसे ख़ुशी
दर्द ही मेरा मुकद्दर है तो है

फूल कुछ चाहे थे तुझसे बागबां
हाथ में तेरे भी पत्थर है तो है

थक गया हूँ अब तो सोने दो मुझे
सामने काँटों का बिस्तर है तो है

मेरे संग भी है मेरी माँ की दुआ
तू मुकद्दर का सिकंदर है तो है

तूने ही कब घर को घर समझा ‘अनिल’
घर से जो तू आज बेघर है तो है

ज़माने को बदलना

पास कभी तो आकर देख
मुझको आँख उठाकर देख

याद नहीं करता, मत कर
लेकिन मुझे भुलाकर देख

सर के बल आऊँगा मै
मुझको कभी बुलाकर देख

अब तक सिर्फ गिराया है,
चल अब मुझे उठा कर देख

इन पथराई आँखों में
सपने नए सजा कर देख

हार हवा से मान नहीं
दीपक नया जला कर देख

दिल की बंजर धरती पर
कोई फूल खिलाकर देख

तेरा है अस्तित्व अलग
खुद को जरा बता कर देख

टूटे ख्वाबों 

टूटे ख्वाबों के मकबरों में हूँ
न मै जिन्दों में न मरों में हूँ

चीटियाँ लाल भर गया कोई
यूँ तो मखमल के बिस्तरों में हूँ

मुझको फँसी दो या रिहा कर दो
मै खड़ा कब से कटघरों में हूँ

जो जलाते है आँधियों में चराग
उन्ही पगलों में, सिरफिरों में हूँ

तुम मुझे ढूँढते हो प्रश्नों में
मै छिपा जब की उत्तरों में हूँ

बरहना रूह ले के मैं यारो
आजकल कांच के घरो में हूँ

कल सहारा था सारी दुनिया का
आजकल खुद की ठोकरों में हूँ

सबके पाँवों में चुभते रहते हैं
मै उन्ही काँटों, कंकरों में हूँ

अपने जख्मो पे हँस रहा हूँ ‘अनिल’
किसी सर्कस के मसखरों में हूँ

दिल में दर्द

दिल में दिल का दर्द छिपाए बैठा हूँ
होठों पे मुस्कान सजाए बैठा हूँ

ऊपर वाले इसको मत जाने देना
थोड़ा सा सम्मान बचाए बैठा हूँ

आँखों से निकले या तन मन से फूटे
सीने में तूफ़ान छिपाए बैठा हूँ

जो जैसा है मुझको वैसा दिखता है
दिल के शीशे को चमकाए बैठा हूँ

तुम को जब भी आना हो, तुम आ जाना
मै ड्योढ़ी पर दीप जलाए बैठा हूँ

मेरा भाई झाँक ले न कहीं इधर
आँगन में दीवार उठाए बैठा हूँ

मुझको सूरत से कोई पहचान न ले
चेहरे पर चेहरा चिपकाए बैठा हूँ

जाने क्यों अपने ही घर में कुछ दिन से
मै खुद को मेहमान बनाए बैठा हूँ

कभी देवता बनने की ख्वाहिश थी, अब
मुश्किल से इन्सान बनाए बैठा हूँ

ख्वाबों में अब आए कौन 

ख्वाबों में अब आए कौन
देखूँ साथ निभाए कौन

सूरज, मुर्गा, चिड़िया चुप
मुझको आज जगाए कौन

दीपक रख तो आया हूँ
देखूँ इसे जलाए कौन

समय स्वयं समझा देगा
अपने और पराए कौन

मैं मुद्दत से उसका हूँ
लेकिन उसे बताए कौन

खुला छोड़ दर सोता हूँ
जाने कब आ जाए कौन

मैं खुद से ही बिछड़ा हूँ
मेरा पता बताए कौन

बिटिया भी ससुराल गयी
अब माथा सहलाए कौन

वो पत्ता है, पेड़ नहीं
पर उसको समझाए कौन

सारे जग से रूठा हूँ
आकर मुझे मनाए कौन

घर से बाहर

घर से बाहर आया मैं
सबसे हुआ पराया मैं

कोशिश तो सबने ही की
किससे गया भुलाया मैं

चुनने निकला था मोती
कुछ पत्थर ले आया मैं

बस तब तक ही जीवित था
जब तक हँसा हँसाया मैं

इक अनबूझ पहेली का
उत्तर रटा रटाया मैं

इंसानों की बस्ती से
जान बचा कर आया मैं

अपने अन्दर झाँका था
खुद से ही शरमाया मैं

बिना पता लिखा ख़त हूँ
वो भी खुला खुलाया मैं

छोटा सा उसका कद

छोटा सा उसका कद है
पर बाहर से बरगद है

रोज बहस सी होती है
मेरे अन्दर संसद है

मन में घुंघरू बजते हैं
जाने किसकी आमद है

कोई पार करे इसको
मन ये मेरा सरहद है

कोई परिंदा तो आए
कब से सूना गुम्बद है

रोज डराता है मुझको
मेरा मन ही शायद है

जब से बेसरमाया हूँ 

जब से बेसरमाया हूँ
सबके लिए पराया हूँ

अब मैं कोई जिस्म नहीं
एक मुकम्मल साया हूँ

मेरे सर पे हाथ तो रख
मैं तेरा ही जाया हूँ

किसी ग़ज़ल का शेर हूँ मैं
लेकिन सुना सुनाया हूँ

एक घरौंदा तोडा था
फिर कितना पछताया हूँ

लेने गया था कुछ खुशियाँ
बस आँसू ले आया हूँ

तू तुलसी का पौधा है
और मैं तेरी छाया हूँ

कैसे दूर रहूँ तुझसे
मैं तेरा हमसाया हूँ

अपना चेहरा बेच के मैं
इक दर्पण ले आया हूँ

इक दरवाजा बंद हुआ
दो मैं खोल के आया हूँ

दर्द तुम्हारा पढ़ लूँ मैं
इतना तो पढा पढाया हूँ

वो इस जहाँ का खुदा है

वो इस जहाँ का खुदा है, मुगालता है उसे
हैं सब बुरे वो भला है, मुगालता है उसे

उछालता है वो कीचड़ लिबास पर सबके
और खुद दूध धुला है, मुगालता है उसे

नजर के सामने इक चीज जो चमकती है
फलक पे चाँद खिला है, मुगालता है उसे

गई है कान में सरगोशियाँ सी करके हवा
कुछ उससे मैंने कहा है, मुगालता है उसे

चमकती रेत में डाली जरूर है उँगली
पर उसका नाम लिखा है, मुगालता है उसे

है कुछ मुक्तक कुछ में जलता बुझता हुआ
किसी सूरज का सगा है, मुगालता है उसे

तब तक कोइ दीप जला ले 

तब तक कोई दीप जला ले

माना गम की रात बडी. है,
हृदय शूल सी सॉस गडी. है
फिर भी मत घबरा ओ साथी
कुछ दूरी पर सुबह खडी. है

तम से ओ घबराने वाले, तुझे अगर दरकार उजाले
जब तक किरण सुबह की फूटे, तब तक कोई दीप जला ले

माना तेरे मन आंगन में,
गम ने डेरा डाल दिया है
लेकिन यह तो सोच बावरे
कहां यह अतिथि सदा रूका है

जाने को ही यह आता है, फिर क्यों व्यर्थ ही घबराता है
जब तक है यह घर में तेरे, तब तक गीत कोई तू गा ले

गहरे से गहरे सागर में
तिनका भी सम्बल होता है
दो बॉंहें पतवार हैं तेरी
फिर क्यों अपना बल खोता है

माना कि प्रतिकूल है धारा, मगर दूर भी नहीं किनारा
और जरा से हाथ मार ले, और जरा से पैर चला ले

ओ सूनी राहों के पंथी
थक कर मत तू ढॅंूढ ठिकाना
कहता है मंजिल जिसको जग
तुझको उसके आगे जाना

क्या करना फिर खटिया बिस्तर, क्या करना फिर तकिया चादर
नींद जहां भी आये तुझको, गगन ओढ ले धरा बिछा ले

पंख कटा मैं एक पखेरू

पंख कटा मैं एक पखेरू, मुझको मत आकाश दिखाओ

रंगहीन सपने हैं सारे
देंखूँ भी तो क्या पा लूँगा
आख़िर तो रोना है मुझको
माना दो पल मुस्का लूँगा

मै काँटा हूँ दूर रहो तुम, मुझसे मत आँचल उलझाओ
पंख कटा मैं एक पखेरू…

मुझसे मेरी बात न पूछो
सच तो ये है जन्म-जला हूँ
उस मंज़िल की राह नहीं है
जिस मंज़िल की ओर चला हूँ

मै पत्थर सूनी राहों का, मत पूजा के फूल चढ़ाओ
पंख कटा मै एक पखेरू….

इन सूनी राहों पर मुझको
अब तो चलते जाना होगा
जाने मौत कहाँ आएगी
जाने कहाँ ठिकाना होगा

मैं मरघट का नीरव कोना, मत पनघट के गीत सुनाओ
पंख कटा मैं एक पखेरू…

इन सूनी आँखों में केवल
सपनो के अवशेष बचे हैं
जहाँ-जहाँ थे महल ख़ुशी के
अब कुछ खंडहर शेष बचे हैं

हाथ लगाए ढह जाऊँगा, मुझको मत आधार बनाओ
पंख कटा मैं एक पखेरू…

कैसे भूलूँ बचपन अपना

कैसे भूलूँ बचपन अपना, अपना बचपन कैसे भूलूँ

मन गंगाजल-सा निर्मल था डर था नहीं पाने खोने का
रूठे भी कभी जो मीत से तो झगडा था एक खिलौने का
वो प्रीत मधुर कैसे भूलूँ, मधुरिम अनबन कैसे भूलूँ

माँ की गोदी में शावक-सा जब थक कर मैं सो जाता था
उस आँचल के नीचे मेरा, ब्रह्माण्ड सकल हो जाता था
अब जाकर कहाँ हँसूँ किलकूँ, गलबहियाँ डाल कहाँ झूलूँ

बचपन की भेंट चढ़ा कर जो पाया तो क्या पाया यौवन
स्पर्श-परस सब पाप हुए बदनाम हैं चुम्बन-आलिंगन
हर तरफ खिंची हैं सीमायें, किसको पकड़ूँ किसको छू लूँ

हमने तुमको ओ साथी पुकारा बहुत

हमने तुमको ओ साथी पुकारा बहुत,
मुड़ के तुमने ही एक बार देखा नहीं
चौंधियाए रहे रूप की धूप से
और ह्रदय में बसा प्यार देखा नहीं ।

क्या बताऊँ कि कल रात को किस तरह
चाँद तारे मेरे साथ जगते रहे
जाने कब तुम चले आओ ये सोच कर
खिड़की दरवाज़े सब राह तकते रहे

महलों- महलों मगर तुम भटकते रहे
इस कुटी का खुला द्वार देखा नहीं

कल की रजनी पपीहा भी सोया नहीं
पी कहाँ-पी कहाँ वो भी गाता रहा
एक झोंका हवा का किसी खोज में
द्वार हर एक का खटखटाता रहा

स्वप्न माला मगर गूँथते तुम रहे
फूल का सूखता हार देखा नहीं

फूल से प्यार करना है अच्छा मगर
प्यार की शूल को ही अधिक चाह है
अहमियत मंज़िलों की उन्ही के लिए
जिनके बढ़ने को आगे नहीं राह है

बिन चले मंज़िलें तुमको मिलती रहीं
तुमने राहों का विस्तार देखा नहीं

हमने तुमको ओ साथी पुकारा बहुत
मुड़ के तुमने ही एक बार देखा नहीं .

चल मन, उठ अब तैयारी कर

चल मन, उठ अब तैयारी कर
यह चला – चली की वेला है ।

कुछ कच्ची – कुछ पक्की तिथियाँ
कुछ खट्टी – मीठी स्मृतियाँ
स्पष्ट दीखते कुछ चेहरे
कुछ धुँधली होती आकृतियाँ

है भीड़ बहुत आगे – पीछे,
तू, फिर भी आज अकेला है ।

माँ की वो थपकी थी न्यारी
नन्ही बिटिया की किलकारी
छोटे बेटे की नादानी,
एक घर में थी दुनिया सारी

चल इन सबसे अब दूर निकल,
दुनिया यह उजड़ा मेला है ।

कुछ कड़वे पल संघर्षों के
कुछ छण ऊँचे उत्कर्षों के
कुछ साल लड़कपन वाले भी
कुछ अनुभव बीते वर्षों के

अब इन सुधियों के दीप बुझा
आगे आँधी का रेला है ।

जीवन सोते जगते बीता
खुद अपने को ठगते बीता
धन-दौलत, शौहरत, सपनो के
आगे पीछे भगते बीता

अब जाकर समझ में आया है
यह दुनिया मात्र झमेला है ।

झूठे दिन, झूठी राते हैं
झूठी दुनियावी बाते हैं
अंतिम सच केवल इतना है
झूठे सब रिश्ते- नाते हैं

भूल के सब कुछ छोड़ निकल
अब तक यहाँ जो झेला है ।

इससे पहले तन सड़ जाए
मुट्ठी से रेत बिखर जाए
पतझर आने से पहले ही
पत्ता डाली से झर जाए

उससे पहले अंतिम पथ पर
चल, चलना तुझे अकेला है ।

यह सूर के अंतर की झाँकी

यह सूर के अंतर की झाँकी,
यह तुलसी का अरमान भी है ।
यह भूषण की ललकार भी है,
औ संत कबीर का ज्ञान भी है ।
है पन्त निराला का स्वप्न अगर
तो दिनकर का अभिमान भी है ।
हिंदी भाषा ही नहीं केवल,
यह भारत की पहचान भी है ।

हम प्याले थे प्रीत सुधा रस भरे 

हम प्याले थे प्रीत सुधा रस भरे,
क्यों जाने ज़हर का जाम हुए ।
आगाज़ में उषा बन के उगे,
अंजाम में ढलती शाम हुए ।
एक प्यार के सौदे की बात ही क्या,
हर काम में हम नाकाम हुए ।
हमें नाम भी अपना न याद रहा,
इतना जग में बदनाम हुए ।

एक रात का खंडित स्वप्न हैं या

एक रात का खंडित स्वप्न हैं
या दिन का टूटा विश्वास हैं हम ।
क्या पूछते हो क्या बतलाएँ,
एक भूला हुआ इतिहास हैं हम ।
हमें दिल से ज़रा महसूस करो,
एक दर्द भरा एहसास हैं हम ।
कभी एक समंदर थे लेकिन,
अब रेगिस्तान की प्यास हैं हम ।

तुमने हँस के जो देखा जरा सा मुझे

तुमने हँस के जो देखा ज़रा-सा मुझे,
हर तरफ़ चाँदनी की फ़सल हो गई ।
एक पल के लिए भी जो रूठ गए
अपनी साँस भी मुझको गरल हो गई ।
तुम हमसे मिले, मिल कर बिछुड़े,
हमें कविता की भाषा सरल हो गई ।
सुख के-दुख के यूँ शेर मिले,
ज़िन्दगी एक मुकम्मल ग़ज़ल हो गई ।

जिनको इन राहों में फूल मिले 

जिनको इन राहों में फूल मिले
वो बहार के गीत सुनाते चले ।
जिनके पग में बस ख़ार चुभे,
पतझर के गीत सुनाते चले ।
ये जीत के गीत सुनाते चले ,
वो हार के गीत सुनाते चले ।
हमको तो तुम्हारा प्यार मिला,
हम प्यार के गीत सुनाते चले ।

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