कुमार अनुपम की रचनाएँ

डर 

अचानक एक दिन हुआ ऐसा कि
बुद्धू मास्टर का नाम लतीफ मियाँ में तब्दील हुआ
उनके सिले कपड़ों से निकलकर आशंका की चोर-सूइयाँ
चुभने लगीं हमारे सीने में

हमारी अम्मा की बनाई लजीज बड़ियाँ
रसीदन चच्ची की रसोई तक जाने से कतराने लगीं
घबराने लगीं हमारी गली तक आने से उनकी बकरियाँ भी

सविता बहिनी की शादी और
अफजल भाई के घर वलीमा एक ही दिन था
यह कोई सन 92 की रात थी
किसी धमाके का इंतजार दोनों तरफ हुआ

वे अब वहाँ नहीं रहते

चिट्ठियाँ जिनका तलाश रही हैं पता
वे अब वहाँ नहीं रहते
अखबारों में भी नहीं उनका कोई सुराग
सिवा कुछ आँकड़ों के

लेकिन अब भी
सुबह वे जल्दी उठते हैं
म्यूनिसिपलिटी के नलके से लाते हैं पूरे दिनभर का पानी
हड़बड़ाहट की लंबी कतार में लगकर

बच्चों का टिफिन तैयार करती पत्नी
की मदद करते हैं अखबार पढ़ने
के मौके के दरम्यान चार लुकमे तोड़ते हैं भागते भागते
देखते हैं दहलीज पर खड़ी पत्नी का चेहरा
बच्चों को स्कूल छोड़ते हैं
और नौकरी बजाते हैं दिनबदिन
ऑफिस से निढाल घर की राह लेते हैं
कि एक धमाका होता है सरेराह… फिर… कुछ नहीं…

वे अपनी अनुपस्थिति में लौटते हैं।

प्रेम 

पृथ्वी के ध्रुवों पर
हमारी तलाश
एक दूसरे की प्रतीक्षा में है

अपने अपने हिस्से का नेह सँजोए
नदी-सी बेसाख्ता भागती तुम्हारी कामना
आएगी मेरे समुद्री धैर्य़ के पास

एक-न-एक दिन
हमारी उम्मीदें
सृष्टि की तरह फूले-फलेंगी ।

पिता

पिता का केवल चेहरा था हँसमुख
लेकिन पिता को खुलकर हँसते हुए
देखा नहीं किसी ने कभी

नींव की ईंट की तरह
भार साधे पूरे घर का अपने ऊपर
अडिग खड़े रहे पिता

आए अपार भूकंप
चक्रवात अनगिन
गगन से गाज की तरह गिरती रहीं विपदाओं
में झुका नहीं पिता का ललाट

कभी बहन की फीस कम पड़ी
तो पिता ने शेव करवाना बंद रखा पूरे दो माह
कई बार तो मेरी मटरगश्तियों के लिए भी
पिता ने रख दिए मेरी जेब में कुछ रुपए
जो बाद में पता लगा
कि लिए थे उन्होंने किसी से उधार

पिता कम बोलते थे या कहें
कि लगभग नहीं बोलते थे
आज सोचता हूँ
उनके भीतर
कितना मचा रहता था घमासान
जिससे जूझते हुए
खर्च हो रही थी उनके दिल की हर धड़कन

माँ को देखा है हमने कई बार
पिता की छाती पर सिर धरे उसे अनकते हुए

माँ की उदास साँसों में
पिता की अतृप्त इच्छाओं का ज्वार
सिर पटकता कराहता था बेआवाज

यह एक सहमत रहस्य था दोनों का
जिसे जाना मैंने
पिता बनने के बाद

सूचना विस्फोट की पृष्ठभूमि में

रतनजोत की सुगंध परस गई पहले
मोबाइल पर बाद में चहकी चिड़िया –
मैटिनी शो तय रहा, ‘रब ने बना दी जोड़ी’,

सुबह इस सूचना में जागी भी नहीं थी अभी
कि आ गया अखबार

– इतने मरे उतने घायल
इतने बाढ़ में बहे उतनों के हाथों पर मंदी की फटकार
इतनी ट्रेन दुर्घटना उतनी अस्मत तार तार
तुरत-फुरत सूचनाओं के हाड़ मांस मारमार –

सनसनीखेज खुलासों में मुस्तैद मीडिया की नजर
से शायद ही बची हो कोई खबर
इसी सांत्वना और सूचना-समृद्ध होने की आश्वस्ति से भर
टूथब्रश पर लगाया पेप्सोडेंट और
सूचनाओं के झाग में लथपथ अचानक
कुछ ऐसा लगा कि खबरों में नहीं बची है
पिपरमिंट भर भी सनसनी

इतना अभ्यस्त और आदी बना दिया है एक मीडिया ने हमें
कि उदासीन या नृशंस अथवा क्रूर की हद तक कुंद

किसी सधे षड्यंत्र की क्या नहीं मिलती इसमें कोई खबर

गैरमुमकिन नहीं कि इन पंक्तियों को भी
इस सूचना विस्फोट की पृष्ठभूमि में
आप पढ़ें महज एक सूचना की तरह
कि अचानक बजे मोबाइल
और अपने खून-से सगे संबंधी
की अंतिम खबर मिले
(कृपया कवि की बदतमीजी माफ करें!)
और लगे यह भी महज एक सूचना

और ऊहापोह तय न कर सके
कि चिड़िया के साथ ‘रब ने बना दी जोड़ी’ के शो
और सगे की अंतिम विदा में किसमें शिरकत उचित
या यह भी संभव
कि इनकी तुलनात्मक समीक्षा भर
भी न जगे ऊहापोह

सूचना विस्फोट में संवेदना का हलाक होना खबर नहीं

कि रतनजोत की सुगंध कैसे तबदील हुई चिराइंध गंध में
कौन-सा परतालूँ अखबार
किस चैनल पर सेट करूँ
नेट पर कहाँ करूँ सर्फिंग
किसे घुमाऊँ मोबाइल
कहो कहो
सूचना विस्फोट के जेहादियो
इतनी-सी सूचना दो!

दंगा

बर्बरता का ऐतिहासिक पुनर्पाठ
आस्था की प्रतियोगिता
कट्टरता का परीक्षण काल था

यह
धार्मिकता का
सुपीरियारिटी सत्यापन था

फासिस्ट गर्व और भय
की हीनता का उन्माद था

यह
जातिधारकों
के निठल्लेपन का पश्चात्ताप था

यह
अकेलों के एकताबाजी प्रदर्शन
का भ्रमित घमंड था

कुंठाओं को शांत करने
के प्रार्थित मौके की लूट

मनुष्यता के खिलाफ
मनुष्यों की अमानुषिक स्थापना

धर्मप्रतिष्ठा के लिए
एक अधार्मिक प्रायोजन था

यह
व्यवस्था संरक्षक
के नपुंसक नियंत्रण
का तानाशाही साक्ष्य था

सभ्यता के कत्ल
की व्यग्र बेकरारी
का कर्मकांड था यह
हमारे समय में
जिसे मनाया जा रहा समारोह की तरह
जगह जगह

बड़ी बुआ 

बड़ी बुआ से दादी
कभी आँवला भिगवातीं
तो कभी हर्रा पिसवातीं
उलझाए रखतीं
तरह तरह के घरेलू नुस्खों में
लेकिन बड़ी बुआ के बालों पर
जमती ही गई समय की राख
और बड़ी बुआ के बाल
नहीं हो पाए कभी
मेरे बचपन के बालों की तरह गाढ़े और घने
जिन्हें छेड़ने
आया करती थीं बड़ी कक्षाओं की लड़कियाँ

बतलाती थीं दादी
कि बाबा हमारे
बड़े हठी थे
जब प्रतिज्ञा की उन्होंने
कि नौकरी मिलेगी तभी बनवाएँगे अपने बाल
तब बीस पार कर गई थीं बड़ी बुआ

बाल-बच्चे नौकरी की प्रतीक्षा की तरह बढ़ते गए
तो लोग चिढ़ाने लगे
और तंग आकर एक दिन
वे क्या गए
कि नहीं लौटे घर

लोगों ने कहा तो कि साधू हो गए पंडिज्जी
कि नदी में मिली थी जो नंगी विकृत लाश
हो न हो पंडिज्जी की ही थी
जिसे नोच डाला था सियारों ने

लेकिन दादी ने माना नहीं कभी
वह कहतीं अकसर –
‘खतम होते ही पुटकी का सत्तू
वो लौटेंगे घर
गए हैं बड़ी का वर ढूँढ़ने’

मेरे और बहन के मुंडन में
सबसे अधिक खुश थीं तो दादी
इतनी खुश…थीं इतनी खुश…
कि फफक पड़तीं

सारे मेहमान आए
बाबा नहीं आए

बड़ी बुआ बस बटोरती रहीं
गिरते हुए बाल और नेग

सिर पर हमारे फिर आए बाल
पर बाबा को न आना था न आए

मेरी बहन का बाल सँवारतीं जब बड़ी बुआ
दुहरातीं दादी का गीत –
‘बबुनी के सिर पर हैं बाल जितने
उसके भी दो गुने, दस गुने, सौ गुने
लहर लहर लहकें अरमान सपने।’

हमजोलियाँ दस दिशा से पुरियातीं गीत
किंतु हर बार
कंघी में अरझ अरझ जाती
बड़ी बुआ की आवाज।

दुखों में रास्ता बनाते हुए

(नीरज के लिए)

पापा बीमार थे
और माँ का परेशान होना जायज था
संकट तमाम थे और दुखों की अच्छी खासी भीड़
फिर भी कोई न कोई रास्ता
बनाते हुए गुपचुप
हम मिल लेते थे

हमारे मिलने से पहले के इंतजार में
शामिल हो जाते थे
बेघर लोग – और उनकी उदासी
और बेसब्री – जो ठंड का दिन
जैसे-तैसे बिताने के बाद
बीड़ियों और अपने रक्त की गर्मी के सहारे
रात काटने की कोशिश
और जल्दी दिन निकलने की उम्मीद जगाए
किसी पेड़ तले बैठे होते

तो हम मिलते और साथ-साथ निकलते
दुखों में रास्ता बनाते हुए बचते बचाते जैसे
अपने कस्बे के सिनेमाघर में देखकर ब्लू फिल्म
कोई दर्शक मु्ख्य सड़क तक आता है
(हरबार नाइट-शो से नया-नया चेहरा निकलता
और हम अपने छोटे-से पूरे कस्बे
से अपने परिचय के भ्रम के आगे
लगभग शब्द जोड़ते मजबूरन और
साथ-साथ सहमत होते
कि कस्बे की आबादी बढ़ी है अचानक)

सच, कितना कम पहचानते हैं हम
अपने ही कस्बे को खुद को भी
कितना कम महसूस कर पाते हैं हम ठंड से सुन्न
अपने हाथों को देखकर साथ-साथ महसूस करते

धुंध में खोजते हुए रास्ता
हम कस्बे के रेलवे-स्टेशन तक आते
हालाँकि हमारा
न तो कोई परिचित आनेवाला होता
न हम कहीं जा ही पाते थे

फिर भी हम आते साथ-साथ
और अँधेरे के मुहाने पर बैठ जाते
देखते रहते रेलवे-लाइन के पार जहाँ
जरा-सी रौशनी कटी हुई फसल
की तरह लेटी होती

हमारे आसपास अँधेरा होता
और सहारा ढूँढ़ती हमारी आँखें अंततः
मँडराती रिक्शेवालों (की बीड़ियों) के इर्द-गिर्द
जो पास के गाँवों से
कमाने कस्बे में हफ्तों-हफ्तों पर आते थे
हम बीड़ियों की जलन में देखते रहते
उनके चेहरे पर जमा घर से दूर होने का दुख

हफ्तों पर
परिवार में वापस लौटने
के उत्सव जैसे पलों की कल्पना के भरोसे
अपने छोटे-से कस्बे में
हम साथ-साथ लौटते थे।

अन्तरण

तुम्हें छूते हुए
मेरी उँगलियाँ
भय की गरिमा से भींग जाती हैं

कि तुम
एक बच्चे का खिलौना हो
तुम्हारा स्पर्श
जबकि लपेट लेता है मुझे जैसे कुम्हड़े की वर्तिका
लेकिन तुम्हारी आँखों में जो नया आकाश है इतना शालीन
कि मेरे प्रतिबिम्ब की भी आहट
भंग कर सकती है तुम्हारी आत्म-लीनता
कि तुम्हारा वजूद
दूध की गन्ध है
एक माँ के सम्पूर्ण गौरव के साथ
अपनाती हो
तो मेरा प्रेम

बिलकुल तुम्हारी तरह हो जाता है
ममतामय ।

दोनों

दोनों में कभी
रार का कारण नहीं बनी
एक ही तरह की कमी-

‘चुप’ रहे दोनों
फूल की भाषा में
शहर नापते हुए
रहे इतनी दूर… इतनी दूर
जितनी बिछोह की इच्छा

बाहर का तमाम धुआँ-धक्कड़ और तकरार सहेजे
नहाए रंगों में
एक दूसरे के कूड़े में बीनते हुए उपयोगी चीज

खुले संसार में एक-दूसरे को
समेटते हुए चुम्बनों में
पड़ा रहा उनके बीच एक आदिम आवेश का परदा
यद्यपि वह उतना ही उपस्थित था
जितना ‘नहीं’ के वर्ण युग्म में ‘है’
कई रंग बदलने के बावजूद
रहे इतना पास…. इतना पास
जितना प्रकृति।

भानियावाला विस्थापित

(ग्राम-बागी के एक वाशिंदे का वक्तव्य)

भाईजी
देख रहे हो जो हरी-भरी फसल
यूँ ही न आई
जंगल थे जंगल
पत्थर ही पत्थर
जब धकेल दिया गया हमें
टिहरी डेम की बेकार टोकरियों की तरह

छूट गए वहीं
बहुत-से अभिन्न
जो सिर्फ नदी-पहाड़ दरत-जंगल
कीट-पखेरू सरीसृप-जंतु खेत-खलिहान
धूप-हवा जमीन-आसमान नहीं
परिवार के सदस्य थे हमारे

वह बोले जा रहा था अनलहक

उसकी भाषा में
कुछ चीटियाँ ढो रही थीं अपने अंडे
और कोशिश थी
एक लहराती कतार में संयत होकर चलने की

वह बोले जा रहा था लगातार –
पत्थर में रहनेवाले हम पत्थरदिल
आन बसे इस ओर
कुरेद कुरेद कर
बटोर बटोर कर पत्थर
बनाए खेत
बसाया घर-संसार पुनः

भाईजी
इधर फिर आई है खबर
पड़ोस की हवाई-पट्टी है यह
आएगी हमारे आँगन तक
फिर खदेड़ा जाएगा हमें कहीं और
फिर जारी है
हमारी सृष्टि से हमें बेदखल करने की तैयारी।

भानियावाला विस्थापित: टिहरी बाँध के कारण विस्थापित हुए लोगों को देहरादून में जिस जगह बसाया गया उस गाँव का नाम ‘बागी’ है। विडंबना है कि इस गाँव के लोगों को यहाँ के पूर्व बाशिंदे ‘विस्थापित’ कह कर पुकारते हैं और गाँव को ‘भानियावाला विस्थापित’। अपने ही देश में विस्थापन और बार बार उसकी याद दिलाए जाने का दंश झेल रहे लोगों का गाँव।

समुद्री मछुवारों का गीत

हमारी रोटी है समुद्र
हमारी पोथी है समुद्र

हमारे तन में जो मछलियाँ
समुद्र की हैं
हमारे जीवन में जो रंग विविध
समुद्र के हैं

धैर्य और नमक है
हमारे रक्त का रास्ता

हवा ओ हवा
कृतज्ञ हैं
विपरीत हो तब भी

आकाश ओ आकाश
कृतज्ञ हैं
छेड़े हो असहयोग तब भी

पानी ओ पानी
कृतज्ञ हैं
छलक रहे हो ज्यादा फिर भी

हवा का सब रंग देखा है
आकाश का देखा है रंग सब
पानी का सब रंग देखा है

मरी हुई मछली है हमारा सुख

सह लेंगे
मौसम का द्रोह

एक मोह का किनारा है हमारा
सजगता का सहारा है
रह लेंगे लहरों पर
हम अपनी साँसों के दम पर जिएँगे
जैसे जीते हैं सब

अपने भीतर के समुद्र का भरोसा है प्रबल।

प्रतीक्षावादी का गीत

एक दिन जब समुंदरों में नहीं बचेगा एक कतरा भी नमक
इस समय खुद पर गुजर रहे विकट क्षणों की एक एक खरोंच को
खुरच खुरच पुनः महसूस करूँगा रोऊँगा अथक विलाप करूँगा
और समुंदरों को आँसुओं से पाट दूँगा
ऐसे ही आपातकाल के मद्देनजर इन्हें खर्चता नहीं

एक दिन जब पृथ्वी पर गर्म हाथों की आहट को मशीनों की धड़धड़ाहट
से चुप करने का कार्यक्रम होगा सफलता के अतिनिकट
चिल्लाऊँगा अछोर चीखूँगा
और असह्य कष्टों को झेलते हुए बचाई गई चीख को मशीनों पर दे मारूँगा
ऐसे ही आपातकाल के मद्देनजर फिलहाल चुप हूँ

एक दिन जब विकट शांति होगी
नदियों के बहने और हवा के चलने तक की नहीं होगी आवाज
उछलूँगा कूदूँगा पगला जाऊँगा और
जिंदा रहने के सारे नियम अनुशासन तोड़ डालूँगा
ऐसे ही आपातकाल के मद्देनजर मूर्खता की हद तक शालीन हूँ अभी

एक दिन जब दिन में रात हो जाएगी अचानक
और कुछ संभव नहीं होगा अधिक
खुद को
आग को सौंप दूँगा रोशनी करूँगा भरसक
ऐसे ही आपातकाल के मद्देनजर बना पड़ा हूँ अभी ठूँठ।

दूब का गीत

हमारी अनिच्छाओं में शामिल है आकाश
जबकि हवा से अधिक धरती में हमारा प्रशांत विस्तार

सितारे पुकारते हमारे स्वप्नों को चँदोवा तान रुपहला
जबकि नई नई छवि उन्हें बख्शती सतत
हमारी सूफी निगाह

तितलियाँ पंख पसार प्रार्थना करतीं
जबकि हमारी कोख का फूल
नहीं मानता स्वयं को ईश्वर खुदमुख्तार

लहरों और प्रशस्तियों और इंद्रधनुष और पुरस्कार
की बिसात ही क्या
जबकि क्लोरोफिल पर हमारे
निसार दुनिया का दिल

कोई रूमानी आत्मदया न मानें कृपया
किंतु रहा नहीं
अब रहा नहीं रहने का मन
कि अपने ही हरियाले सावन में होकर यूँ अंधी
रहूँ क्या?

आप ही बताएँ
भला क्या करूँगी खून खून धरती
कि खरगोश की पुतलियों-सा नहीं रहा सूरज
सद्यःप्रसूता की काया-सी नहीं रही सृष्टि

नहीं रहा अब हमारे होने का नैसर्गिक अर्थ
कि अश्वमेध यज्ञों में चाहा ही नहीं था
शामिल होना कभी अच्छत के साथ भी
अब तो नाध दिया जा रहा हमें भी
हत्यारों और लंपटों और मूर्खों की मालाओं, वंदनवारों में

किंतु
आँधियाँ प्रचंड और समय के चक्रवात अनगिन
उखाड़ नहीं पाए जिसे जड़ से
हमारे होने का गुरुत्व गौरव : ज्वाला की हरिताभ लौ।

बातूनी 

कुछ न करते हुए बैठे-ठाले
ऊब होती और इस तरह
बात शुरू होती

तो बात करनी हो कुछ भी
शुरुआत मौसम से होती अकसर
मुहावरे बनते कि जनाब
लड़कियों और शहर के मिजाज
का ठिकाना नहीं तनिक भी

मूँगफली फोड़ते बातों के दाने
पास बैठे लोग भी टूँगते
चिंता की चटनी चाटते चटखारे लेते
कि सचमुच मौसम बड़ा ही खराब है आजकल

अगली पिछली सीटों की तरफ
उमस की तरह फैलने लगता
एक सहकारी दुख

होते-होते
बातूनी दुखी होते
और बात अंततः
पहुँच ही जाती राजनीति की ऐशगाह तक
जहाँ सार्वजनिक समर्थन के साथ
बलात्कार का आयोजन जारी अहर्निश

असह्य पीड़ा से लथपथ
कसमसाते बातूनी अपनी सीट पर और सब
उठाकर हाथ
असहाय होने का रोना रोते कि अचानक
बातूनी एक
बात और पीड़ा और सहानुभूति और सीट अपनी छोड़कर
उठ जाता था कहता हुआ कि अच्छा भई
मेरा तो आ गया स्टॉप!

एक खड़ा हुआ बातूनी सीट छेंक लेता था

नाम

जिस नाम से पुकार कर
माँ थमा देती थी उसे सामान का खर्रा
मित्र उस नाम से अनजान थे

मित्र उसे ही समझते थे वास्तविक नाम
महज तुक पुकारने पर जिसका
वह फाँद आता था दीवार

एक नाम उसका
पहचान की पुस्तक-सा
खुला रहता था जिसकी भाषा
नहीं समझती थी उसकी प्रेमिका

जिस नाम से अठखेलियाँ करती थी उसकी प्रेमिका
वह अन्य सबके लिए हास्यास्पद ही था

इस तरह
सबके हिस्से में
हँसी बाँटने की भरसक कोशिश करता डाकिए-सा
जब हो जाता था पसीना पसीना
वह खोल देता था अपने जूते
अपनी आँखें मूँद कर
कुछ देर सोचता था –
अपने नामों और अपने विषय में
हालाँकि ऐसा कम ही मिलता था एकांत

हवाओ

हवाओ आओ
चली आओ बच्चे-सी दौड़ती
मेरे आरपार चली जाओ खिलखिलाती
छू आओ
मेरी नवागत उच्छवास का ‘पाहला’[1]

आओ हवाओ आओ
सहलाओ मेरी पलकें
भुट्टे की मांसल गंध
और रेशों की शीतल छुवन से जो मुझे
रोमांच से भर देती है

आओ गंभीर जवानी की पदचाप की तरह
कर दो सराबोर
मेरी एक एक कोशिका
भिगोओे चिड़ियों के कलरव से मेरा पोर पोर
जो तब्दील हो चुका है
सिर्फ शोर में

आओ आओ हवाओ
मेरी शिराओं में जम रहा है कार्बन
आओ और समेट ले जाओ सारा अवसाद
जैसे अपनी अदृश्य रूमाल से पोछ देती हो
पसीना और कालिख और थकान

हवाओ
मेरी जमीन की हवाओ
फावड़े-सा बैठा हूँ मैं
बस उठने-उठने की लय साधता!

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें कबड्डी के खेल में बनाए जाने वाले दो छोर

कविता नयनतारा डैश डैश डैश 

तह करके
रखता रहा हूँ
सपने कई स्थगित और अधनींद
और यन्त्रवत भटकते कई सफ़र भी

कि चलने से ही
नहिं तय होती हैं दूरियाँ

अर्थ का शिल्प है एक अबोला भी
वर्णमाला की मूर्तता के विरुद्ध

जहाँ लिखा है ज़ीरो किलोमीटर
वहीं से ही
नहीं शुरू होती राह
जैसे शब्द जो दुहराए जा रहे आदतन
नियमित ध्वनि तक ही
नहीं उनका आयतन

स्वन का सौन्दर्यशास्त्र
अनूठा उनके हित
सम्बन्ध भी नहीं
जिनका स्वर से

जूड़े में खुभा बैंजनी एक फूल भर
नहीं हैं स्मृतियाँ
भोपाल अफ़गानिस्तान नन्दीग्राम भी है
खोई हुई सरस्वती के सुराग

अबोध आँखों की प्यास अथाह
भटकती तलाशती नयनतारा
सुनामी के अवक्षेप में
कविता ‘…’ के स्वागत में प्रतीक्षातुर

कि सम्भावना एक ज़िन्दा शब्द है।

रोज़नामचा 

सुबह काम पर निकलता हूँ
और समूचा निकलता हूँ

काम पर जाते-जाते हुए
पाँव होता हूँ या हड़बड़ी
धक्के होता हूँ या उसाँस

काम करते-करते हुए
हाथ होता हूँ या दिमाग़
आँख होता हूँ या शर्मिन्दा
चारण होता हूँ या कोफ़्त
उफ़्फ़ होता हूँ या आह

काम से लौटते-लौटते हुए
नाख़ून होता हूँ या थकान
बाल होता हूँ या फ़ेहरिस्त

शाम काम से लौटता हूँ समूचा
(उम्मीद की आँखें टटोलती हैं मुझे मेरे भीतर)
हड्डियों और नसों और शिराओं में रात
कलपती रहती है सुबह के लिए।

दिल्ली में प्रार्थना 

इन्द्रियों की थकान में
याद आता है अत्यधिक अपना तन
जो आदत के भुलावे में रहा
सगरदिन

ज़र्द पन्ने की मानिन्द
फटने को आमादा होती है त्वचा
रक्त की अचिरावती
ढहाना की चाहती हर तट
बेक़रारी रिसती है नाख़ून तक से
अटाटूट ढहता है दिल

मांगता है पनाह
ठाँव-कुठाँव का आभिजात्य भेद भी

ऎसे ही असहाय समय में
दुनिया के असंख्य बेक़रारों की समवेत प्रार्थना
दुहराती है रग-रग
एक उसी ‘आवारा’ के समक्ष
जिससे अनुनय करता है
कठिन वक़्तों का हमारा अधिक सजग कवि
-आलोक धन्वा भी।

झलक

इतना सरल था कि क्या था पर अवश्य है यह तो
कि बेसुध हो कुछ क़दम वह चला ही जाता था
साथ-साथ जैसे दुःख न हों, दोस्त हों

हालाँकि मिलना इस तरह नापसंद था उसे किन्तु
बना रहता था सहज अपनी ही धुनता हुआ
चलता रहता था किसी रिक्शे वाले की तरह जो
सबसे ज़्यादा चिल्लाते ज़ोर से गाते या
अकेले ही बड़बड़ाते हुए दिखते हैं जैसे कर रहे हों
दुखों को भरमाने की कोशिश, वह कुछ ऐसा ही
करता था फिर भी बचाव की लाख ज्यादती के बावजूद
चलने वाला उसके साथ अचानक बदल ही जाता था
प्रश्न में- आजकल कर क्या रहे हो? -की टंगड़ी मार
गिरा ही देता था

इतना सरल था कि क्या था पर इतना तो अवश्य था
कि बिना शिकवा किये वह चौंक कर उठता अपनी डिग्रियों
और हाथों को झाड़ता देखता इस तरह जैसे दिख गया हो
कई दिनों की कठिन धुंध को चीरता सूरज जैसे मिल गई हो
पिता को अपने बच्चे के पहले दाँत की झलक।

महानायक

इस सहस्राब्दि की
सबसे अविश्वसनीय कहानी
के महानायक थे वे
कि पढ़े-लिखे थे
और बेरोजगार नहीं थे

उनके खेत थे
और वे खेतों के थे।

कुछ असंवैधानिक पंक्तियाँ 

कुछ असंवैधानिक पंक्तियाँ

(दुनिया के एक सर्वहारा का बयान)

हूँ
अनारक्षित हूँ
जबकि बहुसंख्यक हूँ

हूँ हूँ
को क्यों सुनते हो हुआँ हुआँ की तरह?

लोककथा

समझने की बात थी
सुनाने को कहानी
जिसमें एक राजा था
और थी
एक गँवार स्त्री

राजा था प्रेम में
यही कहा राजा ने
मित्रों से मंत्री से
कहा यही सब से

स्त्री थी प्रेम में
यही कहा स्त्री ने
नदी से जंगल से
पर्वत से हवा से

दोनों थे प्रेम में
बात बड़ी सीधी थी सादी थी
कानोंकान फैल गई तन गई
और बात टूट गई

मित्र बहुत खुश थे
मंत्री बहुत खुश थे
और सब खुश थे करके प्रतिकार –
अच्छा हुआ बच गई महल की गरिमा
कुलीनता का अधिकार

नदी बहुत खुश थी
कि रहेगी मयस्सर
उसे अल्हड़ चाल

जंगल बहुत खुश थे
कि बँधेंगे फिर फिर
आजाद बाँहों में

पर्वत बहुत खुश थे
कि सुनेंगे जबतब
कस्तूरी छमक

हवा बहुत खुश थी
कि होगी अब भी साथ
गँवार खुशबूदार वो खिलखिल की खिलखिल

बीत गए साल
कई साल
न तो निराश था राजा
न ही गँवार स्त्री
क्योंकि प्रेम था बीचोबीच

और हुआ ऐसा

किसी से कह गया राजा
– गाती है गँवार स्त्री
नदी के साथ-साथ अब भी

बाप हो गया राजा
– गाती है गँवार स्त्री
जंगल के साथ-साथ अब भी

वृद्ध हो गया राजा
– गाती है गँवार स्त्री
पर्वत के साथ-साथ अब भी

हवा हो गया राजा
– गाती है गँवार स्त्री
हवा के साथ-साथ अब भी…

(ऐसी मनभावन प्रेमकथाएँ असंख्य
स्वयंसिद्ध किसी आदर्श पारस्परिकता से
धमकाती रहती हैं
बावजूद इसके
प्रेम करनेवाले
प्रेम करते रहते हैं
सुधारते हुए ऐसी लोककथाओं का अंत।)

हमारी कहानियाँ 

हम बच्चे थे सिर्फ
नाम भले हों अलग अलग
जैसे हर नदी
होती है फकत नदी

हम बच्चे थे
किंतु लोग तो यहाँ तक कहते थे
कि हमारे हिरन के पाँव हैं

बचपन में टहलते हुए
हम लौटते थे थकान के साथ साथ
हमारी थकान की शरमीली सहेली थी एक
जब हम आँखें मूँद लेते
चुप्पे चुप्पे आती थी वो
फिर तो
हम घर-घरौंदा खेलते
पापा-ममी खेलते
आइस-पाइस खेलते
और खिलखिलाते रहते

हम बच्चे थे
और हमारी कहानियाँ थीं

हमारी कहानियों में
पहाड़ों से उतरी हुई नदियों का
कुतूहल था
नदियों के कुतूहल वाली हमारी कहानियों में
था कई उपकहानियों का सुराग
जो चिकनी कौड़ियों
सतरंगी सीपियों और
मोरपंखियों-सा दिलफरेब था
हमारी कहानियों में कितने ही
आमों का रस था महुओं की चटख महक थी
गुलेल की कंकड़ी से भी तेज
दौड़ थी
दादी रैफुल की बकरी
के कच्चे दूध की गुनगुनाहट थी
पहाड़ों को ढोती हुई
उठक बैठक थी हमारी कहानियों में

हमारी कहानियों में महानायक थे हम
और खलनायक भी

हम बच्चे थे
और हमारी कहानियाँ थीं

हमारी कहानियाँ घटनाओं की तरह
रहती हैं अब भी
इसी समय
इसी कालखंड के इसी शहर में
जो गाहेबगाहे
मिल जाती हैं परिचित चेहरों की तरह
किंतु जब तक आए आए याद
सोख लेता है उन्हें
शहर का तमाम धुआँ और शोर और रफ्तार

यात्रा

हम चले
तो घास ने हट कर हमें रास्ता दिया

हमारे कदमों से छोटी पड़ जाती थीं पगडंडियाँ
हम घूमते रहे घूमती हुई पगडंडियों के साथ

हमारी लगभग थकान के आगे
हाज़ी नूरुल्ला का खेत मिलता था
जिसके गन्नों ने हमें
निराश नहीं किया कभी

यह उन दिनों की बात है जब
हमारी रह देखती रहती थी
एक नदी

हमने नदी से कुछ नहीं छुपाया
नदी पर चलाये हाथ पाँव
ज़रूरी एक लड़ाई सी लड़ी

नदी ने
धारा के ख़िलाफ़
हमें तैरना सिखाय

लड़कियाँ हँस रही हैं 

लड़कियाँ हँस रही हैं

इतनी रँगीली और हल्की है उनकी हँसी
कि हँसते-हँसते
गुबारा हुई जा रही हैं लड़कियाँ

हँस रही हैं लड़कियाँ
लड़कियाँ हँस रही हैं

कि खुल-खुल पड़ते हैं बाजूबंद
पायल नदी हुई जा रही है
हार इतने लचीले और ढीले
कि शरद की रात
कि लड़कियों की बात
कि पंखों में बदल रहे हैं
सारे किवाड़
सारी खिड़कियाँ

लड़कियाँ हँस रही हैं

लड़कियाँ हँस रही हैं
इस छोर से
उस छोर तक
अँटा जा रहा है इंद्रधनुष
रोर छँटा जा रहा है
धुली जा रही है हवा
घटा चली आ रही है मचलती
तिरोहित हो रहा है
आकाश का कलुष
धरती भीज रही है उनकी हँसी में

उनकी हँसी में
फँसा जा रहा है समय

रुको
रुको चूल्हा-बर्तनो
सुई-धागो रुको
किसी प्रेमपत्र के जवाब में
उन्हें हँसने दो!

तानाशाह

इस बार आया
तो पूछा इसने कौन बनेगा करोड़पति
दस सरलतम सवाल पूछे
एक सवाल तो यही, तिरंगे में कितने रंग होते हैं
पूछते हुए इसकी वाणी से इतना परोपकार टपक रहा था
जैसे हमें हर हाल में जीतने की मोहलत दी उसने
सही जवाब पर हमारी पीठ ठोंकी
बढ़कर हाथ मिलाया और कुशलतम बुद्धि की
तारीफ़ की दिल खोलकर

फिर भला किसकी मज़ाल
जो पूछे उससे
लेकिन तुम क्या मूर्ख हो अव्वल जो इतने सरलतम सवालों पर
दिये दे रहे हो करोड़ों
यहाँ तक कि सन्देह भी नहीं हुआ तनिक उसकी किसी चतुर चाल पर
हमारी अचानक अमीरी की खुशी में वह इस क़दर शरीक हुआ
कि नाचने तक लगा हमारे साथ-साथ
बल्कि तब अपने निम्न-मध्य रहन-सहन पर हमें लाजवाब लज्जा हुई
हम निहाल होकर उसकी सदाशयता पर सहर्ष सब कुछ हार बैठे

इस बार आया
तो अपने साथ लाया देह-दर्शना विश्वसुन्दरियों का हुजूम
वे इतनी नपी-तुली थीं कि खुद एक ब्रांडेड प्रॉडक्ट लगती थीं
उनकी हँसी और देह और अदाएँ इतनी कामुक
कि हर क़ीमत उनके लायक बनना हमने ठान लिया मन ही मन
तब गृहस्थी की झुर्रियों और घरेलूपन की मामूलियत
से घिरी अपनी पत्नियों पर हमें एक कृतघ्न घिन-सी आई
वे शुरू शुरू में किसी लाचारी और आशंका में
अत्यधिक मुलायम शब्दों में प्रार्थना करती हमारे आगे काँपती थीं थर-थर
किन्तु इस आपातकाल
से उबरने में उन्होंने गँवाया नहीं अधिक समय
और किसी ईष्र्या के वशीभूत मन ही मन
उन्होंने कुछ जोड़ा कुछ घटाया

और हम एक विचित्र रंगमहल में कूद पड़े साथ-साथ

जीवन की तमाम प्राथमिकताओं और पुरखा-विश्वासों
को स्थगित करते हुए हम
अपनी आउटडेटेड परम्पराओं से नजात पाने के लिए दिखने लगे आमादा
यह मानने के बावजूद कि हमारा सारा किया-धरा ब्रांडेड बनावट के बरक्स
बहुत फूहड़ और हमारी औकात क्षेत्रीय फिल्मों के नायक-नायिकाओं से भी गई-गुज़री
फिर भी एक अजब दम्भ में हम
एक आभासी विश्व की पाने के लिए विश्वसनीयता
सब कुछ करने को तत्पर थे फौरन से पेशतर
हमने अपनी अस्मिता से पाया छुटकारा और जींस पैंट्स और शर्ट की
एक रंग आइडेंटिटी में गुम हो गए हमने खुरच-खुरच कर छुड़ा डाले
अपने मस्तिष्क से चिपके एक-एक विचार सिवा इस ख्य़ाल के कि अब
हमें सोचना ही नहीं है कुछ
कि हमारे लिए सोचनेवाला
ले चुका है इस धराधाम पर अवतार

अगली बार आया
तो उसके मुखमंडल पर एक दैवीय दारुण्य था
दहशतगर्दी के खिलाफ़ उसने शुरू किया विश्वव्यापी आन्दोलन जिसे सब
उसी की पैदाइश मानते रहे थे अपने पूर्व पापों के पश्चात्ताप में विगलित उसने
एक देश के ऊर्जा संसाधनों को पूरे विश्व की पूँजी मानने
का सार्वजनीन प्रस्ताव पेश किया विरुद्धों से भी कीं वार्ताएँ सन्धियाँ कीं उसने रातोंरात
और प्राचीन सभ्यताओं की गारे-मिट्टी से बनी रहनवारियों
को नेस्तनाबूत कर डाला यहाँ तक कि हाथ-पंखों और कोनों-अँतरों में छुपती लिपियों
और भाषाओं और नक्काशीदार पतली गर्दनोंवाली सुराहियों को भी कि अगली पीढिय़ों
को मिल न सके उनका एक भी सुराग कि उन्हें शर्मिन्दा न होना पड़े कतई
नये-नवेले उत्तर-आधुनिक विश्व में
उसने कितना तो ध्यान रखा हमारी भावनाओं का

इस बार आया जबकि कहीं गया ही नहीं था
वह यहीं था हमारे ही बीच पिछले टाइप्ड तानाशाहों के किरदारों से मुक्ति की युक्ति
में इतना मशगूल इतना अन्तर्धान कि हमें दिखता नहीं था
पूरी तैयारी के साथ आया इस बार तो उसकी कद-काठी और रंग
बहुत आम लगता था और बहुत अपना-सा
उसने नदी में डगन डालकर धैर्य से मछलियाँ पकड़ीं
उसकी तसवीरें छपती रहीं अख़बारों में लगातार
उसने तो सोप-ऑपेरा की औचित्य-अवधारणा में चमत्कारी चेंज ही ला दिया
टी०वी० पर कई कई दिनों तक उसके फुटेज दिखाए जाते रहे जब वह
हमारी ही तरह अपने बच्चों को स्कूल छोडऩे गया और अपनी दाढ़ी बनवाते हुए
हज्जाम से गाल और गले पर चलवाता रहा उस्तरा
बिना किसी भी आशंका के
उसने कई प्रेम कर डाले और गज़ब तो यह
कि उसने स्वीकार भी किया सरेआम
महाभियोग झेलकर उसने पेश किया प्रेम के प्रति ईमानदार समर्पण का नायाब नमूना
और सबका दिल ही जीत लिया

धीरे धीरे वह ऐसा सेलिब्रिटी दिखने लगा
कि छा गया पूरे ग्लोब पर अपनी मुस्कुराहट के साथ
राष्ट्रों का सबसे बड़ा संघ घबराकर अन्तत:
तय करने लगा अपने कार्यक्रम उसके मन-मुताबिक
तमाम धर्म राजनीति साहित्य दर्शन वगैरह उसकी शैली से प्रभावित दिखने लगे बेतरह

इस तरह तमाम कारनामों के बावजूद
वह इतना शान्त और शालीन दिखता था
कि उसकी इसी एक अदा पर रीझकर
दुनिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठित शान्ति पुरस्कार के लिए उसका नाम
सर्व सम्मति से निर्विरोध चुन लिया गया

अब सिरफिरों का क्या किया जाए
सिरफिरे तो सिरफिरे
जाने किस सिरफिरे ने फेंककर मार दिया उसे जूता
जो खेत की मिट्टी से बुरी तरह लिथड़ा हुआ था और जिससे
नकार भरे कदमों की एक प्राचीन गन्ध आती थी।

वे 

वे गर्म माहौल में
बाँट देते हैं पहले
वादों की फ्रिज
और ढाल देते हैं
विचारों को
बर्फ की शक्ल में
क्योंकि
उन्हें बखूब मालूम है
कि बर्फ तोड़ना आसान है
पानी चीरने की अपेक्षा।

पराए शहर में माँ की याद

नींद नहीं आ रही और याद आ रही है माँ
हालाँकि कहीं भी कभी
आ जाती थी नींद मुझे लोरी के बिना भी
(जो माँ ने कभी नहीं गाया मेरी नींद के लिए)

आ जाती थी मुझे नींद कहीं कभी
मसलन, पापा के भीषण खर्राटों
और दारू की असह्य बू के बीच भी
भले ही
चीथड़ा होती रहती थी मेरी नींद और आत्मा

लौटता था
पानी से सींच कर भूख का खेत
तो पड़ते ही खाट पर आ जाती थी नींद
पर जाने क्या बात है कि नींद नहीं आ रही
और याद आ रही है माँ

याद आ रही है माँ
जिसे नहीं देखा कभी हँसते हुए खुल कर
कभी गाते हुए नहीं देखा
जिसे नहीं देखा नाचते हुए कभी

खिलखिलाती तो कैसी दिखती माँ?
कैसी दिखती गीत गुनगुनाती हुई माँ?
माँ ठुमुकती तो कैसी दिखती?
मशीन से इतर होती अगर
तो कैसी दिखती माँ?

जाने कितने रहस्य की ग्रंथियों का पुलिंदा
माँ
जो नहीं लिखती
पहली बार घर से दूर
अपने बेटे को एक चिट्ठी भी

बहन लिखती है चिट्ठी में अकसर –
‘भइया, जब से गए हो ट्रेनिंग के लिए घर से बाहर
और रहस्यमय हो गई है माँ
जिस दिन बनाती हूँ कोई बढ़िया व्यंजन
अचानक बताती है माँ
कि आज तो उपवास है मेरा…’

माँ के उपवास की ऊष्म बेचैनी से लथपथ
मेरी नींद
कहीं माँ के आस-पास चली गई है
स्वप्न भर ऊर्जा की तलाश में
दुनिया की तमाम चिंताओं को स्थगित करती हुई

पुनर्जन्म 

मरता हूँ प्रेम में पुनः पुनः जीता हूँ
अगिनपाखी-सा स्वतःस्फूर्त

जैसे फसल की रगों में सिरिजता तृप्ति का सार
जैसे फूल फिर बनने को बीज
लुटाता है सौंदर्य बारबार
सार्थक का पारावार साधता
गिरता हूँ
किसी स्वप्न के यथार्थ में अनकता हुआ
त्वचा से अंधकार
और उठता हूँ अंकुर-सा अपनी दीप्ति से सबल
इस प्राचीन प्रकृति को तनिक नया बनाता हूँ

धारण करता हूँ अतिरिक्त जीवन और काया

अधिक अधिक सामर्थ्य से निकलता हूँ
खुली सड़क पर समय को ललकारता सीना तान
बजाते हुए सीटी।

अदृश्य दृश्य 

वे सिर्फ दिखते नहीं हैं
वे हैं यहीं कहीं
हमारे बिलकुल आसपास और अंतरंग
अपने होने का आभास देते कभी कभी
जब कोई कहता है कि देखो देखो
कितनी मिलती है
तुम्हारी आँख में तुम्हारी दादी की आँखों की चमक
तुम्हारे नक्श में बाबा की झलक दिखती है

अपनी पहचान की गाढ़ी रोशनाई से
बनाई गई आकृतियों में रंग भरते हुए
वे दृश्य रचते हैं ठोस
पिता के निपट अकेलेपन-सा हूबहू

अदृश्यपन को अप्रत्यक्ष साबित करते हुए
हमारे स्वर में गाते हैं
जब अपना मनपसंद लोकगीत
जिसमें पेट
पत्थरकाल से इस पत्थरकाल तक
भटकाता ही रह रहा बंजारे की तरह
एक स्त्री
ठिठक कर देखने लगती है हमारे कंठ की तरफ नहीं
किवाड़ से आनेवाली किसी अनागत आहट की ओर
अनादि प्रतीक्षा की पूरी बेचैनी में डूब

कई दुनियावी लोगों को तो देखा है हमने
किसी कृतज्ञता या किसी कोरी रंजिश में
अधीर हो
उम्र की घिसती जाती कमीज
की जर्जर बाँहों से पलकों की कोर पोछते हुए

कि अचानक उन्हें कुछ याद आता है
रात-मिल का सायरन चाक कर जाता है उनकी भावुकता
चौंक कर
वे शहद की किसी बे-हद नदी से जैसे छिटकते हैं
नए तीखे यथार्थ के वशीभूत हो सच में
जीना चाहने लगते हैं
दुनिया में पूरे होशोहवास के साथ कुछ दिन और
जिसकी मोहलत नहीं देते ऐसे अदृश्य उन्हें लगने लगता है

संचित इन पुरखा-पहचानों
के साथ का ध्यान धर हमने जाना है इतना
कि जिया जा सकता है
इस अत्याचारी समय की आँखों में आँख डाल
एक उसी खेतिहर गर्व के साथ सीना तान
एक पुराने गमछे और स्वाभिमान से पोछते हुए
माथे की बढ़ती जाती सिलवटों
और पसीने को बदला जा सकता है अब भी
पौधों के लिए जरूरी जीवन-जल में

ऐसे अदृश्य दृश्यों को देखना
ताकत देता है दृष्टि को
कठिनतम और अनाथ रातों में जिनके भरोसे
देखी जा सकती है धारदार धूप भी एक गाँधी चश्मे से सुरक्षित
जिसके शीशों को धुँधला और त्याज्य बताता
चीख रहा है समस्त सूचना संयंत्रों पर यह उत्तर-आधुनिक समय

उसका झूठ
किसी भय में भयानक होता जा रहा है।

बेरोज़गार 

यद्यपि महान चिन्ताओं में इसका शुमार नहीं
था कि हम क्या कर रहे हैं आजकल किन्तु थे कुछ जो
अहर्निश चिन्तित रहते हालचाल पूछते कि क्या कर रहे
हो आजकल पूछते और अकसर पूछते थे और पूछते हुए
उनके भीतर तथाकथित सांसारिक सुविधाएँ लपक लेने
का गर्व लड्डू-सा फूटता था और अपने कौशल पर मुग्ध
थे वे कि जिसके कारण उन्हें बैंकबैलेंस और कालगर्ल-
सी ख़ूबसूरत एक मादा और ऐशगाह-सी कोठी नसीब
हुई कि डूबे हुए सुख में वे किसी जज की तरह देखते थे
हमारे आरपार जैसे बेरोज़गारी सबसे बड़ा अपराध है इस
दौर का और कुछ तो करना ही चाहिए का फैसला देते
यह बूझते हुए भी कि कुछ करने के लिए जरूरी है और
भी बहुत कुछ बात को साइकिल के पहिये की तरह घुमा
देते थे कि भई, कमाने के लिए कुछ करना तो बहुत
जरूरी है और धन के एक आलीशान सोफे में धँसते हुए
कि ’इधर देखो, जो आज यहाँ हैं हम; जैसे सफलता जो
दरअसल कोई राज नहीं थी, को राज की तरह बताने
की कृपा करते हुए हमारी कर्मण्यता को ललकारते थे
सफल आदमी की बात में लाग हाँ में मँूड़ हिलाते और
हमारे प्रति उनकी हिकारत शाश्वत चिंता की बू की तरह
फैल जाती थी दसों दिशाओं में फिर तो लोग कहने पर
मजबूर हो जाते थे पुनः कि कुछ न कुछ तो करना ही
चाहिए, नाकारो!

हम कुछ क्यों नहीं कर पा रहे तमाम महान संसदीय
चिन्ताओं की मानवीय जैविकी में इसका शुमार ही नहीं था

किनकू महराज

(लालदास और हाजी अब्दुल गफ़्फ़ार के लिए)

अब तो नब्बे के हुए किनकू महराज
मगर आवाज़
अब भी जवानी की ठसक लिए
रहन अब भी उसी तरह
जैसे देखा था जब छोटा था बहुत
लुंगी लपेटे सुफ़ेद बँहकटी कुर्ता
सँभालते काँधे पर अँगौछा जैसे कोई राग
जो फिसलता रह-रह उम्र की तरह
बारीक़ झक्क दाढ़ी और बाल सिर के
जैसे धान की किनकी या पिसान
ध्रुपद या ठुमरी ग़ज़ल जारी सारी जैसे गान
मालूम नहीं
कि किनकू महराज को इनका भी कोई भान
अब तो आख़िरी कीर्तनिया ठहरे
आख़िरी इस गँवई-गान के गवैये किनकू महराज जैसे आज
बहुत सारे आदर्श स्थापत्यों के भग्नावशेष
कहते कभी-कभी —
नाम भी ढकोसला है
कितनों को पता
कि ‘हनुमान चालीसा’ गोसाईं बाबा की लिखी ही नहीं
कहीं बताओ उनकी रचनाओं में इसका जिकर
पहले और बाद में गाँठ कर दो-दो चौपाई गोसाईं बाबा की
लोग भरमे बैठे हैं
यह तो यहीं ‘तुलसीपुर’ के ‘तुलसीदास जी’ की लिखी
पाण्डुलिपि आज भी ‘पाटन मन्दिर’ में सुरक्षित
लेकिन मूल है भाव और आस्था
वही सर्वस्व है तो नाम का कैसा पाखण्ड
उनका निरक्षर होना
हमें और और चकित करता जब पता चलता
कि अभी गाई गई जो कजरी या सोहर या उलारा की बन्दिश
किनकू महराज की ही रची जैसे और बहुत सारी रागिनियाँ और कीर्तन
हम अपने ज्ञान पर तरस खाते
कहते हैं, जीत कर लाए तमगे
कुम्भ में हुए संकीर्तन प्रतियोगिता से कई बार

हम इस ग्रामकवि के आगे झुकाते बार-बार अपना माथ
कि अपने नाम की रौनक से बेपरवाह और निर्लिप्त
बस अपने आराध्य के प्रति
झूम झूम गाए ही जाते
भाव-सजल सबद
यूँ तो हमने
कभी देखा नहीं उन्हें बजाते हारमोनियम या ढोलक
मगर नाद उनकी नाड़ियों से गूँजता
उठता एक मज़बूत आलाप के साथ
और उठते जाते आह्वान में हाथ विह्वल गगन की ओर
फिर तो जैसे घटा घहराती
वैसे गाना हो कोई भी बन्दिश

शुरू में पढ़ते
स्थानीय कवि स्वामीदयाल शान्त का लिखा मुक्तक
फिर आते मूल गान की ओर
बदलती जाती उनकी देह-भाषा
कभी धीर ललित तो कभी धीर उदात्त
धीर उद्धत तो कभी धीर प्रशान्त
धीरे धीरे धीरे जैसे रस साक्षात

उलाहना राग और विराग से भरी जब गाते ‘लीला’
तो ब्रज की कोई गोपिका लगते अपनी साध में अटल
मुझे लगता है कई बार
आटाचक्की के पट्टों की ‘फट्-फट्’
से करते हुए एकउम्र संगत
उनकी भक्ति को मिला होगा कर्मशील स्वर का प्रताप
इसीलिए
झगड़कर खाली हाथ लौटाते रहे
गुरु-गम्भीर-ज्ञान के समझौवे हरकारे
जो जब जब आए
उन्हें एकान्त दुनियादारी का पढ़ाने पाठ

लेकिन
भीतर उनके
ध्वस्त हुआ कुछ और
ऐन बानबे में भीषण
और अचानक जार-जार जब-तब
विलाप में बदल जाने लगा उनका गान
मैंने एक बार पूछा उनसे इस बाबत
तो संयत होते-होते बोले —
ढाँचा गिरा तो गिरा रंज नहीं
कि अयोध्या में बसता नहीं मेरा राम

जिस ‘अजोध्या’ में बसता था पोर-पोर रोम-रोम
उसे तहस-नहस किया गया बेपरवाह
बताओ कोई बताओ
कि कहाँ उछिन्न हुए रहमत सुनार नन्नू सुनार
वो माहिर दस्तकार जो बनाते थे सियाराम का मुकुट
कहाँ गए बालम बढ़ई और उनके वो कलाकर हाथ
जो अब तक तो बनाते थे मेरे राम का सिंहासन
किसे पसंद नहीं आया भला
मालियों का देवसिंगार
तब तो किसी ने टोका नहीं कि ये फूल मुसल्ले हैं

राम के प्यारों का वध किया जिसने
वो नहीं हो सकता मेरे राम का प्रिय
ये कौन है राम के नाम से पुकारा जाता हुआ
कोई नकली है मेरे राम का वेश-धारे
कि नहीं मिलती
‘राम राम, जै जै सियाराम’ से उसकी आवाज

बाबू, तुम तो कमनिष्ट नहीं समझोगे यह भेद
मगर गाँठ बाँध लो यह सूत्र
कि कमनिष्ट रहो तो रहो
कम-निष्ठ नहीं होना कभी
यही अधर्म है

‘संघ’ जब टूटा था तब तुम छोटे रहे होगे
गोर्बाचोब थे भारत के दोस्त
तब भी बहुत रोये-धोये थे तुम जैसे लोग
और तुम्हारे दादा पिंटू तो उसी दिन
चुक गए
दौड़ पड़े पाखण्डी धर्म की ओर मुझे तब भी
ऐसा ही हुआ था दुक्ख कि वो तो कमनिष्ट थे
लेकिन कम निष्ठ

जान लो बाबू
ढाँचा टूटने से विचार नहीं टूटते
लक्ष्य के लिए एकनिष्ठा दरकार है
निष्ठा ही है मेरा ज्ञान-ध्यान
अयोध्या में बसने वाला नहीं मेरा राम
कि राम क़ातिल तो नहीं हो सकते अपनों के

और आख़िरी बात
इक्यानबे का होऊँ तो होऊँ
बिलकुल साफ़ मना करता बानबे का होने से
अब तो यही मेरी साध
यही मुराद अपने आराध्य से

कहते हुए ऐसा
फफक-फफक रोने लगते हैं जब-तब
हमारे क़स्बे के आख़िरी कीर्तनिया किनकू महराज
उनसे होड़ लेती फ़िल्मी धुनों पर कीर्तन काढ़ती
एक पूरी गलेबाज जमात
हथियाने के लिए बेतरह ‘गुरु पद’ की गरिमा

मगर बेपरवाह किनकू महराज
तब भी किनकू गुरु और अब भी
अब तो नब्बे के हैं किनकू महराज
मगर आवाज़
अब भी जवानी की ठसक लिए
लेकिन कुछ भीगी
रहन अब भी उसी तरह
जैसे देखा था जब छोटा था बहुत ।

अशीर्षक

बेहया उदासी मेरी नागरिकता की रखैल
मुझसे बेसाख्ता मज़ाक करती है

मुझे घिन आती है और यह छद्म है
मुझे दया आती है और यह परोपकार का भ्रम
मुझे नशा है आदमी होने का
यही पश्चात्ताप

अपने समय का ज़ाहिर खिलवाड़ हूँ
आइस-पाइस, एक्ख्खट-दुख्खट, पोशम्पा और खो-खो
मुझे ढूँढना आसान नहीं मेरे लिए भी इतना गर्त में हूँ
एक रेखा मुझे जला नहीं पाएगी
मुझे कोई धकेल कर नहीं दौड़ा पाएगा चोर के ऐन पीछे

मेरा खेल मुझे ख़त्म करता है
और एक चीख़
गूँगा बनाती है मेरे शब्दों को
एक आत्महत्या और एक अनशन अनवरत
मेरी सारी उम्र माँगता है

कहाँ है मेरी ख़ुद्दारी
मेरी इज़्ज़त मेरी वफ़ादारी

मैं बाँकी भवों की कश्मीरियत में
जातीयता ढूँढता हुआ अंततः मरता हूँ
मेरी खाक़ उड़ेगी और
संविधान की कोई इबारत
न बनेगी
न मिटेगी
रंगरूट मेरे शब्दों से ज़्यादा खटकाएँगे अपने बूट
मेरी उँगलियाँ उनकी बन्दूक की नालियाँ
साफ़ करने के
कब तक काम आएँगी

कुछ नहीं खाऊँगा
कुछ न पीयूँगा
कुछ भी नहीं बोलूँगा
लेकिन तब
जब वे हमें ख़ामोश करना बन्द कर दें

अपने समय की शर्ट के एक्स्ट्रा बटन
से अधिक
चाहता भी नहीं अपना उपयोग जब कि जानता हूँ
जो टूट गया उसका कत्तई विकल्प नहीं …

‘उसने कहा था’ को याद करते हुए

पानी पर लिखा
एक ने संदेश
दूसरे ने ठीक-ठीक पढ़ा
समझ लिया
गढ़ा नया वाक्य
नयी लिपि
नयी भाषा का जैसे आविष्कार किया

दौर की हवा कुल हवा
से एक की साँसों की हवा
को चुम्बन में चुना
होंठों पर सजा लिया

प्रेम में
उन पर
जैसे सच साबित हुए
घटिया फ़िल्मों के गाने
बहाने भी
कितने विश्वसनीय लगे

प्रेम में
चुना क्या शब्द कोई एक
नया वाक्य नई लिपि नई भाषा
महसूस सका?
पूछूँ जो कविता से- “तेरी कुड़माई हो गई?”-
– “धत्‌” -कहे और भाग जाये ऐसे
कि लगे
सिमट आई है और… और पास।

वसंत शुक्रिया

ख़ुद को बटोरता रहा
हादसों और प्रेम में भी

रास्ते हमारी उम्मीदों से उलझते ही रहे
ठोकरों की मानिन्द

घरेलू उदासियाँ रह-रह गुदगुदाती रहीं

कटे हुए नाखून सा चांद धारदार
डटा आसमान में
काटता ही रहा एक उम्र हमारी अधपकी फसल

रंध्रों में अँटती रही कालिख़ और शोर और बेचैनी अथाह

पनाह

जहाँ का अन्न जिन-जिन के पसीनों, खेतों, सपनों का
पोसा हुआ
जहाँ की ज़मीन जिन-जिन की छुई, अनछुई
जहाँ का जल जिन-जिन नदियों, समुद्रों, बादलों में
प्रथम स्वास-सा समोया हुआ
जहाँ की हवा जिन-जिन की साँसों, आकांक्षाओं, प्राणों
से भरी हुई
अब, नसीब मुझे, ऐन अभी-अभी पतझर में

सबके हित
अपने हित
समर्पित
एक दूब
(कृपया, ‘ऊब’ से न मिलाएँ काफिया!)

वसन्त शुक्रिया!

साथ

चाँद
तुम्हारी किरचें टूट टूटकर
बिखर रही हैं तारों की तरह
यह किस समुच्चय की तैयारी है

वह बावड़ी जिसके जल में
देखा था एक दिन हमने सपनों का अक्स
उस पर रात घिर आई स्थाई रंग लिए
रोज़ की ही तरह
हमारी खिलखिलाहट की चमक
गिरती रही चक्कर खाते हुए पत्ते की तरह उसी जल में

दरअस्ल
घरेलू आदतों से ऊब गई थी वह बदलना चाहती थी केंचुल
अपने समय में छूटती जाती साँस की-सी असमर्थता
से घबराना मेरा नियम बन गया था

अब हम
किसी मुक्ति की तलाश में भटकते संन्यासी थे

और एक दिन
उसने बदल दिया अपनी मोबाइल का वह रिंगटोन
जो मुझे प्रिय था
और रिबन बाँधना कर दिया शुरू जो उसे तो
कभी पसन्द नहीं था
मैं भी पहनने लगा चटख़ रंग के कपड़े जो आईने में
मुझ पर नहीं फबते रहे थे कभी
फिर भी

अचानक नहीं हुआ यह
कि
मैं किसी और के स्वप्न में रहने लगा हूँ
वह किसी और की आँखों में बस गई है

और हम
अपने बढ़ते हुए बच्चे के भविष्य में
अब भी साथ रहते रह रहे हैं ।

जिनके हक़ को रोशनी दरकार है

वे देर रात तक खेलते रहते हैं
कैरम लूडो या सोलहगोटी
अधिकतम एकसाथ रहने की जुगत करते हैं
जबकि दूकानें उनकी जागती रहती हैं

वे मुड़-मुड़कर देखते हैं बार-बार
अँधेरे में से गुज़रती एक-एक परछाईं
अपनी आश्वस्ति पर सन्देह करते हैं

एक खटका उन्हें लगा रहता है
पुलिस सायरन से भी
जिससे महसूस करना चाहिए निशाख़ातिर
उससे दहल जाता है उनका कलेजा

एक-दूसरे को समझाते हैं कि हम लोकतन्त्र में हैं
यह हमारा ही देश है
और हम इसके नागरिक

लेकिन तीसरा अचानक
बुदबुदाने लगता है वे जवाब
जिस पर उसे यातनाएँ दी गई थीं
पुलिसिया बेहूदा सवालों की ऐवज
जब वह यही सब बोला था तफ़्तीश में और तब से
वह साफ़-साफ़ बोलने के क़ाबिल भी नहीं रहा

दाढ़ी ही तो रखते हैं पहनते हैं टोपी
पाँचों वक़्त पढ़ते हैं नमाज़
यह ज़ुर्म तो नहीं है हुज़ूर
चीख़ती है उनकी ख़ामोशी
जिसे नहीं सुनती है कोई भी कोर्ट

हम आतंकवादी नहीं हैं जनाब
मेहनतकश हैं
दुरुस्त करते हैं घडि़याँ, सिलते हैं कपड़े
बुनते हैं चादर, पालते हैं बकरियाँ
आपके लिए सब्ज़ियाँ उगाते हैं

हम गोश्त नहीं हैं आपकी दस्तरख़ान में सजे हुए
हमें ऐसे मत देखिए
लेकिन मिन्नतें उनकी
बार-बार साबित कर दी जाती हैं
एक ख़ास क़ौम का ज़ुर्माना इरादतन

उन्हें जेलें नसीब होती हैं या एनकाउंटर

बचे रहने की ज़िद में वह क्या है
जो उन्हें कट्टर बनाता है

कभी सोचिए कि
दरगाहों के लिए
जिनकी आमदनी से निकलती है चिराग़ी
मोअज्जिन की सदाओं से खुलते
जिन ख़ुदाबंद पलकों के दर
उनके गिर्द
क्यों लगे हैं मायूसी के स्याह सियासी जाले

उनके ख़्वाब में भला किस देश का पल सकता है भविष्य

इसे सवाल नहीं
मुस्तकबिल की सचाई की तरह सुनें !

सिर्फ़ रात होने से ही नहीं घिरते हैं अँधेरे

उनके हक़ को रोशनी दरकार है
जिनकी दरूद-सीझी फूँक से
उतर जाती है हमारे बच्चे को लगी
दुनिया की तीख़ी से तीख़ी नज़र ।

क़तरा-क़तरा कुछ

छत से यह छिपकली मेरी देह पर ही गिरेगी
बदलता हूँ लिजलिजी हड़बड़ाहट में अपनी जगह

एक पिल्ला कुँकुआता है और मेरी नींद सहमकर
दुबक जाती है बल्ब के पीछे अँधेरी गुफ़ा में

यह मच्छर जो इत्मीनान से चूस रहा है मेरा ख़ून डेंगू तो नहीं दे रहा
(कैसे ख़रीद पाऊँगा महँगा इलाज)

लगता है कोई है जो खड़का रहा है साँकल

अगर
दिनभर की कमाई 26 रुपये 45 पैसे गए
तो मेरे कान में बोलेगा
अपनी खरखराती सरकारी आवाज़ में उत्पल दत्त-
-“ग़रीब!”
उसकी अमीर कुटिलता
बर्दाश्त करने की निरुपाय निर्लज्जता कहाँ से लाऊँगा

ये क्यों बज रहा है पुलिस-सायरन
मेरी ही गली में बार-बार
ठीक ही किया
जो पिछवाड़े का बल्ब जलता भूल गया
(इस बार तो कट कर ही रहेगा बिजली का कनेक्शन, तय है)

तरा-क़तरा कुछ
मुझमें भरता समुद्र हुआ जा रहा है ।

समुद्री मछुआरों का गीत

हमारी रोटी है समुद्र
हमारी पोथी है समुद्र

हमारे तन में जो मछलियाँ
समुद्र की हैं
हमारे जीवन में जो रंग विविध
समुद्र के हैं

धैर्य और नमक है
हमारे रक्त का रास्ता

हवा ओ हवा
कृतज्ञ हैं
विपरीत हो तब भी

आकाश ओ आकाश
कॄतज्ञ हैं
छेड़े हो असहयोग तब भी

पानी ओ पानी
कृतज्ञ हैं
छलक रहे हो ज़्यादा फिर भी

हवा का सब रंग देखा है
आकाश का देखा है रंग सब
पानी का सब रंग देखा है

मरी हुई मछली है हमारा सुख

सह लेंगे
मौसम का द्रोह

एक मोह का किनारा है हमारा
सजगता का सहारा है
रह लेंगे लहरों पर
हम अपनी साँसों के दम पर जिएंगे
जैसे जीते हैं सब

अपने भीतर के समुद्र का भरोसा है प्रबल।

और फिर आत्महत्या के विरुद्ध

यह जो समय है सूदखोर कलूटा सफ़ेद दाग से चितकबरे जिस्म वाला रात-दिन तकादा करता है
भीड़ ही भीड़ लगाती है ठहाका की गायबाना जिस्म हवा का और पिसता है छोड़ता हूँ उच्छवास…
उच्छवास…
कि कठिनतम पलों में जिसमें की ही आक्सीजन अंततः जिजीविषा का विश्वास…

कहता हूँ कि जीवन जो एक विडम्बना है गो कि सभ्यता में कहना मना है कहता हूँ कि सोचना ही पड़ रहा है कुछ और करने के बारे में क्योंकि कम लग रहा है अब तो मरना भी ।

पुकार 

मेरे भीतर इन दिनों जो उमग रही है पुकार
आऊँगा
इसी के सहारे आऊँगा
और कहूँगा एक दिन
चलो साँसें उलझाएँ…

परछाईं के पीछे 

आसमान सरस था चिड़िया भर
चिड़िया की परछाईं भर आत्मीय थी धरती

लाख-लाख झूले थे रंगों के मन को लुभाने के लाख-लाख साधन थे

लेकिन वो बच्चा था
बच्चा तो बच्चा था

बच्चा परछाईं के पीछे ही चिड़िया था

आसमान काँप गया
धरती के स्वप्नों के तोते ही उड़ गए

हवा समझदार थी
लान के बाहर
बाहर और बहुत बाहर खेद आई चिड़िया की परछाईं को भी

घर भर का होश अब दुरुस्त था
दुनिया अब मस्त और आश्वस्त

किन्तु बच्चा …?

प्रतीक्षा 

 पापा जब घर लौटते थे पहाड़ों से भोलापन लाते थे

पापा बताते थे कि पहाड़ों पर चलने वाली गाड़ियाँ
बूढ़ों का भी बहुत ख़याल रखती हैं
इसीलिए इतनी तेज़ चलती हैं
कि बच्चे भी आसानी से चढ़ और उतर लें

पापा जब घर लौटते थे तो बातों ही बातों में बताते थे कि पहाड़ों पर चलने वाली गाड़ियाँ…

लेकिन आज जिसके लिए आ गए थे एक घंटा पहले
वह गुज़र चुकी है सामने से “जनसेवा एक्सप्रेस”
प्लेटफ़ॉर्म पर गुज़र चुकी गाड़ी के बाद की नमकीन उदासी और गर्दिश है

एक ओर किनारे
अपना सामान सहेजते काँप रहे हैं पापा
जैसे समुद्री लहरों से किनराया हुआ कचरा हों

किसी अगली कम भीड़ वाली गाड़ी की प्रतीक्षा करते
चाहते तो हैं किन्तु उचित नहीं समझते बताना कि पहाड़ों पर चलने वाली गाड़ियाँ…

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