कृपाशंकर श्रीवास्तव ‘विश्वास’ की रचनाएँ

सजदे में सिर के साथ दिल भी है झुका करिवर-बदन

सजदे में सिर के साथ दिल भी है झुका करिवर-बदन अरदास है करिये अता मां शारदे अपनी शरन।

सच्चा सुख़न-परवर बना दें मातु आनंदेश्वरी इतनी इनायत कीजिये क्षेत्राधिपति बिल्लेश्वरन।

हर नज़्म ख़ुशबूदार हो हर शेर में पैग़ाम हो सारा अंधेरा खत्म हो निर्मल बने अन्तःकरन।

कर शीश पर हो आपका आलोक भरता ज्ञान का छूटे न धरती पांव से निर्भीक हो छू लें गगन।

हों भाव नित-नव अंकुरित रचना ऋचा जैसी बनें रस की करें वर्षा सदा नव चेतना के घन सघन।

बस आपके आशीष से है ‘रेत पर उंगली चली’ हर पृष्ठ पर मां सुरसती गौरी तनय रखिये चरन।

मातेश्वरी ‘विश्वास’ को वह शक्ति दो सामर्थ्य दो हर आवरण को भेद दे कौतुक लगे आवागमन।

रंग बदला, रूप बदला, रुख़ बदलना आ गया 

रंग बदला, रूप बदला, रुख़ बदलना आ गया हम को अपने को अय दोस्त छलना आ गया।

अब तो साज़िश नस्ल के बारे में भी होने लगी उनको अपनी वल्दियत को भी बदलना आ गया।

धार पर तलवार की झूली है ऐसे ज़िन्दगी भाप बन कर उड़ सकूँ इतना उबलना आ गया।

सभ्यता, शालीनता, तहज़ीब को, इखलास को बर्फ की मानिंद रिस रिस कर पिघलना आ गया।

ये ज़माना चाहता है जानना ‘विश्वास’ से। किस तरह उसको हवा के साथ चलना आ गया।

सदाक़त के उसूलों का अगर पाबन्द हो जाये

सदाक़त के उसूलों का अगर पाबन्द हो जाये ज़माना भूल कर सब तल्खियां गुलकंद हो जाये।

मुझे बनना नहीं सूरज न मंज़िल चांद है अपनी। नहीं मैं चाहता दुश्मन कभी फ़रज़न्द हो जाये।

बड़ी को रोकने में इतनी सख्ती भी नहीं वाजिब बग़ीचा नेकियों वाला महकना बंद हो जाये।

किसी के नाम में ये खूबियां आ ही नहीं सकतीं तुम्हारा नाम लिख दूँ तो मुक़म्मल छंद हो जाये।

अभी है मुंतज़िर आंखें ज़ियादा देर मत करना कहीं ऐसा न हो ‘विश्वास’ धड़कन बन्द हो जाये।

सजदे में सिर के साथ दिल भी है झुका करिवर-बदन

सजदे में सिर के साथ दिल भी है झुका करिवर-बदन अरदास है करिये अता मां शारदे अपनी शरन।

सच्चा सुख़न-परवर बना दें मातु आनंदेश्वरी इतनी इनायत कीजिये क्षेत्राधिपति बिल्लेश्वरन।

हर नज़्म ख़ुशबूदार हो हर शेर में पैग़ाम हो सारा अंधेरा खत्म हो निर्मल बने अन्तःकरन।

कर शीश पर हो आपका आलोक भरता ज्ञान का छूटे न धरती पांव से निर्भीक हो छू लें गगन।

हों भाव नित-नव अंकुरित रचना ऋचा जैसी बनें रस की करें वर्षा सदा नव चेतना के घन सघन।

बस आपके आशीष से है ‘रेत पर उंगली चली’ हर पृष्ठ पर मां सुरसती गौरी तनय रखिये चरन।

मातेश्वरी ‘विश्वास’ को वह शक्ति दो सामर्थ्य दो हर आवरण को भेद दे कौतुक लगे आवागमन।

बे-अमल शाह के सारे वादे हुए

बे-अमल शाह के सारे वादे हुए बाग़ी इस वास्ते शाहज़ादे हुए। कर्ज बापू चुकाये बिना चल बसा और बेटों के गिरवी लबादे हुए। इसलिए सीख-पर ने नहीं ली मदद उड़ न पाता वो एहसान लादे हुए। इतनी ग़ज़लों के कहने से क्या फायदा कीमती शेर कितने बता दे हुए। सीख लो बच के ‘विश्वास’ चलना ज़रा लूटते हैं यहां बुत खरादे हुए।

रंग बदला, रूप बदला, रुख़ बदलना आ गया

रंग बदला, रूप बदला, रुख़ बदलना आ गया हम को अपने को अय दोस्त छलना आ गया। अब तो साज़िश नस्ल के बारे में भी होने लगी उनको अपनी वल्दियत को भी बदलना आ गया। धार पर तलवार की झूली है ऐसे ज़िन्दगी भाप बन कर उड़ सकूँ इतना उबलना आ गया। सभ्यता, शालीनता, तहज़ीब को, इखलास को बर्फ की मानिंद रिस रिस कर पिघलना आ गया। ये ज़माना चाहता है जानना ‘विश्वास’ से। किस तरह उसको हवा के साथ चलना आ गया।

सदाक़त के उसूलों का अगर पाबन्द हो जाये 

सदाक़त के उसूलों का अगर पाबन्द हो जाये ज़माना भूल कर सब तल्खियां गुलकंद हो जाये। मुझे बनना नहीं सूरज न मंज़िल चांद है अपनी। नहीं मैं चाहता दुश्मन कभी फ़रज़न्द हो जाये। बड़ी को रोकने में इतनी सख्ती भी नहीं वाजिब बग़ीचा नेकियों वाला महकना बंद हो जाये। किसी के नाम में ये खूबियां आ ही नहीं सकतीं तुम्हारा नाम लिख दूँ तो मुक़म्मल छंद हो जाये। अभी है मुंतज़िर आंखें ज़ियादा देर मत करना कहीं ऐसा न हो ‘विश्वास’ धड़कन बन्द हो जाये।

नई ज़मीन नया आसमान रख देगा 

नई ज़मीन नया आसमान रख देगा ख़ुदा परस्त बदलकर जहान रख देगा। मरे सुभाष नहीं ताइवान में सुनकर उतार जिस्म से भारत थकान रख देगा। न था ख़याल कि देगा फ़रेब वो हमको ज़लील बांट के हिंदोस्तान रख देगा। किसे पता था शिखंडी के सामने रण में अजेय भीष्म धनुष और बान रख देगा। मुझे उसूल बताओ न, किस तरह टूटे ‘कलम वरक़ पे नई दास्तान रख देगा’। हुई न और जो ‘विश्वास’ चंद दिन बारिश तड़प के दार पे गर्दन किसान रख देगा।

बताओ ज़ुल्म कितने और दिन हम पर घना होगा

बताओ ज़ुल्म कितने और दिन हम पर घना होगा पगी मेवा तुम्हारे घर, हमारे घर चना होगा। जियेंगे शान से हम, कब हमारे दिन ये बदलेंगे गरीबी मुस्कुराएगी हमारा सर तना होगा। जुटाना दाल रोटी दिन-ब-दिन मुश्किल हुआ गर यूँ बग़ावत कर न दें बच्चे ज़रूरी देखना होगा। घटी महँगाई है, ये झूठ शायद सब समझते हैं ये गुपचुप पेट पर आरी चलाना रोकना होगा। जमा धन पर घटाई ब्याज़ दर ‘बेजा’ जनता को इलेक्शन में किसे दें वोट, फिर से सोचना होगा। कमर ‘विश्वास’ कसकर हम खुला ऐलान करते हैं गरीबों के लहू से अब नहीं अम्बर सना होगा।

जुर्म पर उनके हमें सज़ा हो गई 

जुर्म पर उनके हमें सज़ा हो गई दोस्ती किस क़दर बेवफ़ा हो गई। रोते-रोते कहा रख के क़ासिद नर ख़त फूल वाली गली लापता हो गई। होश आया ज़ईफ़ी की दहलीज़ पर जिस्म से जब जवानी हवा हो गई। दी तसल्ली कलेजे को ये सोच कर हमसे किस्मत हमारी खफ़ा हो गई। हम न शायर बुढ़ापे तलक बन सके वो जवानी में ही शायरा हो गई। पल वो ‘विश्वास’ पहचान पाए न हम किस घड़ी इश्क़ की इब्तिदा हो गई।

मत समझिये मुल्क कायम है भरम पर आपके 

मत समझिये मुल्क कायम है भरम पर आपके और बस्ती जी रही रहमो-करम पर आपके। आपकी फ़ितरत से वाकिफ़ ख़ूब पूरा गांव है एकता ने ज़ख़्म खाये हर क़दम पर आपके। दीजिये कुछ दिन गुज़रने वक़्त छोड़ेगा नहीं दाग़ आएंगे उभर नोके-अलम पर आपके। ग़ालिबन खुलकर बताया ये ज़रूरी हो गया आपको धोखा है ज़िंदा कौम दम पर आपके। मशविरा, लिखिये महब्बत , मत लिखें, चिंगारियां वरना लग जायेगी इक तोहमत कलम पर आपके। चाहिए तख़लीक़ से हर सू बिख़र जाये खुशी ढंग है ‘विश्वास’ उलझे पेचो-खम पर आपके।

ये ख़त पाकर इसी ख़त के बहाने तुम चले आना

ये ख़त पाकर इसी ख़त के बहाने तुम चले आना महब्बत को हमारी आज़माने तुम चले आना। तुम्हें वादा अगर हो याद अपना तो ये ख़त पढ़कर इजाज़त है कि वादे को निभाने तुम चले आना। जगाया चूमकर पलकें हमें जिस दिन, हुआ था तय कभी मैं रूठ जाऊं तो मनाने तुम चले आना। पहुंचने से तेरे पहले, अगर ये दम निकल जाये मैं ‘लावारिस’ नहीं हूँ, ये बताने तुम चले आना। कोई आये न आये तुम से ये मेरी गुज़ारिश है दिया इक कब्र पर मेरी जलाने तुम चले आना। तुम्हारी याद में जब हम कभी बैचैन हो जाएं ग़ज़ल कोई हमारी गुनगुनाने तुम चले आना। हमेशा जीतते ‘विश्वास’ आये शर्त अब तक तुम चलो इक बार मुझको फिर हराने तुम चले आना।

उसको हर हाल में तकलीफ उठानी होगी

उसको हर हाल में तकलीफ उठानी होगी जिसने बचपन में बुज़ुर्गों की न होगी। अपनी औक़ात की हद में जो रहेगा हरदम उसका बेकार बुढापा न जवानी होगी। मुझको मंज़ूर नहीं शर्त कोई उल्फ़त में मोड़ हर बात इसी बात पे लानी होगी। पर तू बुलबुल के रहा नोंच मगर ध्यान रहे एक दिन तेरी ये बेटी भी सयानी होगी। ऐसे घर को न विदा होगी हमारी दुख्तर जिसके आंगन में न देवर न जिठानी होगी। जब तलक आप पढ़ाएंगे सबक़ नफ़रत का ख़त्म तब तक न अदावत की कहानी होगी। हंस के ‘विश्वास’ यहां लोग गले मिलते हैं रस्म ये जब भी मिलोगे तो निभानी होगी।

हमीं मिसाले-वफ़ा बूए-गुल चमन में रहे

हमीं मिसाले-वफ़ा बूए-गुल चमन में रहे रहे हरा ये गुलिस्तां इसी लगन में रहे। वो और थे जो मुसीबत में गांव छोड़ गये वतन परस्त हैं हम इसलिए वतन में रहे। सबब बता न सकेंगे मगर है चाह बहुत दरख़्त उनका लगाया मेरे ज़ेहन में रहे। मेरी निगाह दे छुपाता नहीं कोई दुश्मन भले वो शख्स किसी खास पैरहन में रहे। बदलते दौर रहे फिर भी रुख़ बदल न सका वही रिवाज़ पुराने बने चलन में रहे। वो हमको ग़ैर समझते हैं आज भी लेकिन हमें है फख्र कि हम उनकी अंजुमन में रहे। बदन के ज़ख़्म ही बनते हैं आबरू ‘विश्वास’ शहीद कोई ज़रूरी नहीं कफ़न में रहे।

मन मुताबिक इस ज़माने के अदाकारी न हो पाई 

मन मुताबिक इस ज़माने के अदाकारी न हो पाई हर क़दम पर ज़िन्दगी के दोस्त अय्यारी न हो पाई। हम न पूरी कर सके, हर शर्त जो रक्खी ज़माने ने फिर किसी से दांत-काटी, दोस्ती-यारी न हो पाई। लोग घड़ियाली बहाते आंसुओं को मिले मुझसे नम ज़ियादा देर तक ये आंख बेचारी न हो पाई। जी-हुजूरी करते करते एक दिन खुद्दार उठ बैठा फिर ज़रूरत कोई भी ताज़िन्दगी भारी न हो पाई। फूट पैदा कर लड़ाना था न सीखा इसलिए, हमसे गांव क्या, कुनबे की भी अफ़सोस मुख्तारी न हो पाई। दुश्मनी की फ़स्ल बोना चाहते कुछ लोग थे लेकिन शुक्र है अल्लाह तेरा तीरगी तारी न हो पाई। गौर से ‘विश्वास’ को पढ़ना खले जब भी अकेलापन आज तक भी कमतरी की जिसको बीमारी न हो पाई।

ताज़गी, ज़िंदादिली, रौनक, नज़ाकत आपकी

ताज़गी, ज़िंदादिली, रौनक, नज़ाकत आपकी डाल देती जान हर महफ़िल में शिरकत आपकी। मुस्करा, मुड़-मुड़ पलट कर कनखियों से देखना जादुई हर इक अदा, ढाये क़यामत आपकी। नज़्म है या यह मेरे दिल की खुली तहरीर है आप जैसी लेखनी है ख़ूबसूरत आपकी। दर्ज ख़त में जाफरानी शेर दिलकश आपका दिल ये कहता चूम लूं गर हो इजाज़त आपकी। ‘मीर’ के लहज़े में वो उम्दा ग़ज़ल कहने लगा मिल गई ऐजाज़ में जिसको महब्बत आपकी। मशवरा, वादे पे वादा तोड़ना अब रोकिये जान ले लेगी किसी की ये शरारत आपकी। दे रही ‘विश्वास’ महफ़िल आपको दिल से दुआ दिन ब दिन बढ़ती रहे दुनिया में शोहरत आपको।

याचना है दास की दर्शन मधुर होते प्रभो

याचना है दास की दर्शन मधुर होते प्रभो आते जन की प्रार्थना धर धीर सुन लेते प्रभो। सब्र गायब हो गया बेसब्र हम सब हो गये पाप अब तो तीर्थ पावन भी नहीं धोते प्रभो। प्रश्न उठता जीभ कडुवी सबकी कैसे हो गयी अब तो सीता राम भी पढ़ते नहीं तोते प्रभो। क्वालिटी के माल का क्या बन्द उत्पादन हुआ क्यों श्रवण होते न अब ये पुत्र इकलौते प्रभो। आ गया कैसा ज़माना काटने से पेश्तर अब तो मच्छर भी नहीं चेतावनी देते प्रभो। कीजिये हल प्रश्न सारे, बोलिये कैसे हुआ जो न होना चाहिए था, आपको होते प्रभो। खोखले ‘विश्वास’ निकलें, श्राप क्या वरदान भी सल्तनत ख़तरे में है जल्दी न यदि चेते प्रभो।

सत्र नियमित पूर्ण होने पर परीक्षा लीजिये

सत्र नियमित पूर्ण होने पर परीक्षा लीजिये फल नियति देगी उचित ऋतु की प्रतीक्षा कीजिये। जग लगायेगा गले, अनुयाइयों को आप यदि मूल में ‘जनहित’ छिपा हो वह सुदीक्षा दीजिये। सोच ओछी त्याग उठिये स्वार्थ से ऊपर ज़रा छीन ले जो धीरता ऐसी न इच्छा कीजिये। दूसरों को कष्ट देना सूत्र है किस धर्म का घोल कर विष, वायु में दूषित न कक्षा कीजिये। देश को संदेश दो यह, न्याय जीवित है अभी बाघ के संग गाय को समुचित सुरक्षा दीजिये। जांचिए कैसा लिखा है क्या लिखा है और क्यों सर्वदा निष्पक्ष होकर ही समीक्षा कीजिये। याचना ‘विश्वास’ करता, हो अगर मतभेद भी मत कमण्डल तोड़िएगा, यदि न भिक्षा दीजिये।

सजदे में सिर के साथ दिल भी है झुका करिवर-बदन

सजदे में सिर के साथ दिल भी है झुका करिवर-बदन अरदास है करिये अता मां शारदे अपनी शरन।

सच्चा सुख़न-परवर बना दें मातु आनंदेश्वरी इतनी इनायत कीजिये क्षेत्राधिपति बिल्लेश्वरन।

हर नज़्म ख़ुशबूदार हो हर शेर में पैग़ाम हो सारा अंधेरा खत्म हो निर्मल बने अन्तःकरन।

कर शीश पर हो आपका आलोक भरता ज्ञान का छूटे न धरती पांव से निर्भीक हो छू लें गगन।

हों भाव नित-नव अंकुरित रचना ऋचा जैसी बनें रस की करें वर्षा सदा नव चेतना के घन सघन।

बस आपके आशीष से है ‘रेत पर उंगली चली’ हर पृष्ठ पर मां सुरसती गौरी तनय रखिये चरन।

मातेश्वरी ‘विश्वास’ को वह शक्ति दो सामर्थ्य दो हर आवरण को भेद दे कौतुक लगे आवागमन।

बे-अमल शाह के सारे वादे हुए

बे-अमल शाह के सारे वादे हुए बाग़ी इस वास्ते शाहज़ादे हुए। कर्ज बापू चुकाये बिना चल बसा और बेटों के गिरवी लबादे हुए। इसलिए सीख-पर ने नहीं ली मदद उड़ न पाता वो एहसान लादे हुए। इतनी ग़ज़लों के कहने से क्या फायदा कीमती शेर कितने बता दे हुए। सीख लो बच के ‘विश्वास’ चलना ज़रा लूटते हैं यहां बुत खरादे हुए।

रंग बदला, रूप बदला, रुख़ बदलना आ गया

रंग बदला, रूप बदला, रुख़ बदलना आ गया हम को अपने को अय दोस्त छलना आ गया। अब तो साज़िश नस्ल के बारे में भी होने लगी उनको अपनी वल्दियत को भी बदलना आ गया। धार पर तलवार की झूली है ऐसे ज़िन्दगी भाप बन कर उड़ सकूँ इतना उबलना आ गया। सभ्यता, शालीनता, तहज़ीब को, इखलास को बर्फ की मानिंद रिस रिस कर पिघलना आ गया। ये ज़माना चाहता है जानना ‘विश्वास’ से। किस तरह उसको हवा के साथ चलना आ गया।

सदाक़त के उसूलों का अगर पाबन्द हो जाये 

सदाक़त के उसूलों का अगर पाबन्द हो जाये ज़माना भूल कर सब तल्खियां गुलकंद हो जाये। मुझे बनना नहीं सूरज न मंज़िल चांद है अपनी। नहीं मैं चाहता दुश्मन कभी फ़रज़न्द हो जाये। बड़ी को रोकने में इतनी सख्ती भी नहीं वाजिब बग़ीचा नेकियों वाला महकना बंद हो जाये। किसी के नाम में ये खूबियां आ ही नहीं सकतीं तुम्हारा नाम लिख दूँ तो मुक़म्मल छंद हो जाये। अभी है मुंतज़िर आंखें ज़ियादा देर मत करना कहीं ऐसा न हो ‘विश्वास’ धड़कन बन्द हो जाये।

नई ज़मीन नया आसमान रख देगा 

नई ज़मीन नया आसमान रख देगा ख़ुदा परस्त बदलकर जहान रख देगा। मरे सुभाष नहीं ताइवान में सुनकर उतार जिस्म से भारत थकान रख देगा। न था ख़याल कि देगा फ़रेब वो हमको ज़लील बांट के हिंदोस्तान रख देगा। किसे पता था शिखंडी के सामने रण में अजेय भीष्म धनुष और बान रख देगा। मुझे उसूल बताओ न, किस तरह टूटे ‘कलम वरक़ पे नई दास्तान रख देगा’। हुई न और जो ‘विश्वास’ चंद दिन बारिश तड़प के दार पे गर्दन किसान रख देगा।

बताओ ज़ुल्म कितने और दिन हम पर घना होगा

बताओ ज़ुल्म कितने और दिन हम पर घना होगा पगी मेवा तुम्हारे घर, हमारे घर चना होगा। जियेंगे शान से हम, कब हमारे दिन ये बदलेंगे गरीबी मुस्कुराएगी हमारा सर तना होगा। जुटाना दाल रोटी दिन-ब-दिन मुश्किल हुआ गर यूँ बग़ावत कर न दें बच्चे ज़रूरी देखना होगा। घटी महँगाई है, ये झूठ शायद सब समझते हैं ये गुपचुप पेट पर आरी चलाना रोकना होगा। जमा धन पर घटाई ब्याज़ दर ‘बेजा’ जनता को इलेक्शन में किसे दें वोट, फिर से सोचना होगा। कमर ‘विश्वास’ कसकर हम खुला ऐलान करते हैं गरीबों के लहू से अब नहीं अम्बर सना होगा।

जुर्म पर उनके हमें सज़ा हो गई 

जुर्म पर उनके हमें सज़ा हो गई दोस्ती किस क़दर बेवफ़ा हो गई। रोते-रोते कहा रख के क़ासिद नर ख़त फूल वाली गली लापता हो गई। होश आया ज़ईफ़ी की दहलीज़ पर जिस्म से जब जवानी हवा हो गई। दी तसल्ली कलेजे को ये सोच कर हमसे किस्मत हमारी खफ़ा हो गई। हम न शायर बुढ़ापे तलक बन सके वो जवानी में ही शायरा हो गई। पल वो ‘विश्वास’ पहचान पाए न हम किस घड़ी इश्क़ की इब्तिदा हो गई।

मत समझिये मुल्क कायम है भरम पर आपके 

मत समझिये मुल्क कायम है भरम पर आपके और बस्ती जी रही रहमो-करम पर आपके। आपकी फ़ितरत से वाकिफ़ ख़ूब पूरा गांव है एकता ने ज़ख़्म खाये हर क़दम पर आपके। दीजिये कुछ दिन गुज़रने वक़्त छोड़ेगा नहीं दाग़ आएंगे उभर नोके-अलम पर आपके। ग़ालिबन खुलकर बताया ये ज़रूरी हो गया आपको धोखा है ज़िंदा कौम दम पर आपके। मशविरा, लिखिये महब्बत , मत लिखें, चिंगारियां वरना लग जायेगी इक तोहमत कलम पर आपके। चाहिए तख़लीक़ से हर सू बिख़र जाये खुशी ढंग है ‘विश्वास’ उलझे पेचो-खम पर आपके।

ये ख़त पाकर इसी ख़त के बहाने तुम चले आना

ये ख़त पाकर इसी ख़त के बहाने तुम चले आना महब्बत को हमारी आज़माने तुम चले आना। तुम्हें वादा अगर हो याद अपना तो ये ख़त पढ़कर इजाज़त है कि वादे को निभाने तुम चले आना। जगाया चूमकर पलकें हमें जिस दिन, हुआ था तय कभी मैं रूठ जाऊं तो मनाने तुम चले आना। पहुंचने से तेरे पहले, अगर ये दम निकल जाये मैं ‘लावारिस’ नहीं हूँ, ये बताने तुम चले आना। कोई आये न आये तुम से ये मेरी गुज़ारिश है दिया इक कब्र पर मेरी जलाने तुम चले आना। तुम्हारी याद में जब हम कभी बैचैन हो जाएं ग़ज़ल कोई हमारी गुनगुनाने तुम चले आना। हमेशा जीतते ‘विश्वास’ आये शर्त अब तक तुम चलो इक बार मुझको फिर हराने तुम चले आना।

उसको हर हाल में तकलीफ उठानी होगी

उसको हर हाल में तकलीफ उठानी होगी जिसने बचपन में बुज़ुर्गों की न होगी। अपनी औक़ात की हद में जो रहेगा हरदम उसका बेकार बुढापा न जवानी होगी। मुझको मंज़ूर नहीं शर्त कोई उल्फ़त में मोड़ हर बात इसी बात पे लानी होगी। पर तू बुलबुल के रहा नोंच मगर ध्यान रहे एक दिन तेरी ये बेटी भी सयानी होगी। ऐसे घर को न विदा होगी हमारी दुख्तर जिसके आंगन में न देवर न जिठानी होगी। जब तलक आप पढ़ाएंगे सबक़ नफ़रत का ख़त्म तब तक न अदावत की कहानी होगी। हंस के ‘विश्वास’ यहां लोग गले मिलते हैं रस्म ये जब भी मिलोगे तो निभानी होगी।

हमीं मिसाले-वफ़ा बूए-गुल चमन में रहे

हमीं मिसाले-वफ़ा बूए-गुल चमन में रहे रहे हरा ये गुलिस्तां इसी लगन में रहे। वो और थे जो मुसीबत में गांव छोड़ गये वतन परस्त हैं हम इसलिए वतन में रहे। सबब बता न सकेंगे मगर है चाह बहुत दरख़्त उनका लगाया मेरे ज़ेहन में रहे। मेरी निगाह दे छुपाता नहीं कोई दुश्मन भले वो शख्स किसी खास पैरहन में रहे। बदलते दौर रहे फिर भी रुख़ बदल न सका वही रिवाज़ पुराने बने चलन में रहे। वो हमको ग़ैर समझते हैं आज भी लेकिन हमें है फख्र कि हम उनकी अंजुमन में रहे। बदन के ज़ख़्म ही बनते हैं आबरू ‘विश्वास’ शहीद कोई ज़रूरी नहीं कफ़न में रहे।

मन मुताबिक इस ज़माने के अदाकारी न हो पाई 

मन मुताबिक इस ज़माने के अदाकारी न हो पाई हर क़दम पर ज़िन्दगी के दोस्त अय्यारी न हो पाई। हम न पूरी कर सके, हर शर्त जो रक्खी ज़माने ने फिर किसी से दांत-काटी, दोस्ती-यारी न हो पाई। लोग घड़ियाली बहाते आंसुओं को मिले मुझसे नम ज़ियादा देर तक ये आंख बेचारी न हो पाई। जी-हुजूरी करते करते एक दिन खुद्दार उठ बैठा फिर ज़रूरत कोई भी ताज़िन्दगी भारी न हो पाई। फूट पैदा कर लड़ाना था न सीखा इसलिए, हमसे गांव क्या, कुनबे की भी अफ़सोस मुख्तारी न हो पाई। दुश्मनी की फ़स्ल बोना चाहते कुछ लोग थे लेकिन शुक्र है अल्लाह तेरा तीरगी तारी न हो पाई। गौर से ‘विश्वास’ को पढ़ना खले जब भी अकेलापन आज तक भी कमतरी की जिसको बीमारी न हो पाई।

ताज़गी, ज़िंदादिली, रौनक, नज़ाकत आपकी

ताज़गी, ज़िंदादिली, रौनक, नज़ाकत आपकी डाल देती जान हर महफ़िल में शिरकत आपकी। मुस्करा, मुड़-मुड़ पलट कर कनखियों से देखना जादुई हर इक अदा, ढाये क़यामत आपकी। नज़्म है या यह मेरे दिल की खुली तहरीर है आप जैसी लेखनी है ख़ूबसूरत आपकी। दर्ज ख़त में जाफरानी शेर दिलकश आपका दिल ये कहता चूम लूं गर हो इजाज़त आपकी। ‘मीर’ के लहज़े में वो उम्दा ग़ज़ल कहने लगा मिल गई ऐजाज़ में जिसको महब्बत आपकी। मशवरा, वादे पे वादा तोड़ना अब रोकिये जान ले लेगी किसी की ये शरारत आपकी। दे रही ‘विश्वास’ महफ़िल आपको दिल से दुआ दिन ब दिन बढ़ती रहे दुनिया में शोहरत आपको।

याचना है दास की दर्शन मधुर होते प्रभो

याचना है दास की दर्शन मधुर होते प्रभो आते जन की प्रार्थना धर धीर सुन लेते प्रभो। सब्र गायब हो गया बेसब्र हम सब हो गये पाप अब तो तीर्थ पावन भी नहीं धोते प्रभो। प्रश्न उठता जीभ कडुवी सबकी कैसे हो गयी अब तो सीता राम भी पढ़ते नहीं तोते प्रभो। क्वालिटी के माल का क्या बन्द उत्पादन हुआ क्यों श्रवण होते न अब ये पुत्र इकलौते प्रभो। आ गया कैसा ज़माना काटने से पेश्तर अब तो मच्छर भी नहीं चेतावनी देते प्रभो। कीजिये हल प्रश्न सारे, बोलिये कैसे हुआ जो न होना चाहिए था, आपको होते प्रभो। खोखले ‘विश्वास’ निकलें, श्राप क्या वरदान भी सल्तनत ख़तरे में है जल्दी न यदि चेते प्रभो।

सत्र नियमित पूर्ण होने पर परीक्षा लीजिये

सत्र नियमित पूर्ण होने पर परीक्षा लीजिये फल नियति देगी उचित ऋतु की प्रतीक्षा कीजिये। जग लगायेगा गले, अनुयाइयों को आप यदि मूल में ‘जनहित’ छिपा हो वह सुदीक्षा दीजिये। सोच ओछी त्याग उठिये स्वार्थ से ऊपर ज़रा छीन ले जो धीरता ऐसी न इच्छा कीजिये। दूसरों को कष्ट देना सूत्र है किस धर्म का घोल कर विष, वायु में दूषित न कक्षा कीजिये। देश को संदेश दो यह, न्याय जीवित है अभी बाघ के संग गाय को समुचित सुरक्षा दीजिये। जांचिए कैसा लिखा है क्या लिखा है और क्यों सर्वदा निष्पक्ष होकर ही समीक्षा कीजिये। याचना ‘विश्वास’ करता, हो अगर मतभेद भी मत कमण्डल तोड़िएगा, यदि न भिक्षा दीजिये।

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