कृष्ण कुमार यादव की रचनाएँ

ईश्वर की खोज

मैं कई बार सोचता हूँ
ईश्वर कैसा होगा ?
कितनी ही तस्वीरों में
देखा है उसे
पर दिल को तसल्ली नहीं
मैं उससे मिलना चाहता हूँ
बचपन से ही देखा है मैंने
लोगों को पत्थर की मूर्तियों
और पीपलों को पूजते
लोगों की निगाहों से छुपकर
उन पत्थर की मूर्तियों को
उलट-पलट कर देखा
और उन्हें पुकारा भी
पर उसने नहीं सुना
लेकिन मुझे लगता है
जब-जब जरूरत हुई
किसी ने राह दिखायी मुझे
मैं उसे देख नहीं सकता
पर महसूस करता हूँ
शायद वह मेरे ही अंदर
कहीं बैठा है !!

मोक्ष

सागर के किनारे वह सीप
अनजानी सी पड़ी है
ठीक वैसे ही
जैसे शापित अहिल्या
पत्थर बनकर पड़ी थी
एक नन्हीं सी बूँद
पड़ती है उस सीप पर
और वह जगमगा उठती है
मोती बनकर
ठीक वैसे ही, जैसे शापित अहिल्या
प्रभु राम के पाँव पड़ते ही
सजीव हो जगमगा उठी थी
यही मोक्ष है उसका
पर वाह रे मानव
वह हर सीप में मोती खोजता है
हर पत्थर को प्रभु मान पूजता है
पर वह नहीं जानता
मोक्ष पाना इतना आसान नहीं
नहीं मिलता मोक्ष बाहर ढूँढने से
मोक्ष तो अन्तरात्मा में है
बस जरूरत है उसे एक बूँद की
ताकि वह जगमगा उठे।

सुविधा-शुल्क

वे कहते हैं
यह सुविधा-शुल्क है
कोई घूस या कमीशन नहीं
आपने हमें काम दिया
तो हमारा भी
कुछ फर्ज बनता है
आपकी सेवा करने का।

अरे साहब, सिद्धान्त व आदर्शवाद छोड़ो
ये कोई भ्रष्टाचार नहीं
हर विभाग में यह चलता है
आप नहीं लोगे
तो आपके नीचे वाला लेगा
पर कोई न कोई तो लेगा ही
फिर आप क्यों नहीं?

वैसे भी स्टेटस तनख्वाह से नहीं
सुविधा-शुल्क से ही बढ़ता है
अपने पड़ोस के अधिकारियों के
घरों की तरह झाँकें
सब कुछ जुटा रखा है उन्होंने
बाजार में नित नई आती सुविधायें
उस पर से बीबी-बच्चों की मासूम निगाहें
आखिर कब तक आप इनसे बचोगे
और फिर वो मना नहीं कर पाता।

फर्ज अदायगी 

एयर कंडीशनर कमरों में बैठ
रचते हैं वे देश का भविष्य
लाल-नीली बत्तियों और
हूटरों के साथ चिंघाड़ती
मँहगी गाडि़याँ
कराती हैं उनकी
विशिष्टता का एहसास।

आम जनता के दुख-दर्द से दूर
जीने हैं वे एक रूटीनी लाइफ
लम्बी-लम्बी टिप्पणियों
और लच्छेदार बातों के बीच
फ़र्ज अदा करते हैं
अपने अधिकारी होने का।

करते हैं फैसले वे
उनकी तकदीरों का
जिनसे कभी वे
रूबरू ही न हुए।

टिक..टिक…टिक

टिक..टिक..टिक
अरे नौ बज गये
जल्दी-जल्दी तैयार होता हूँ
आॅफिस जाने के लिए
फिर वही ट्रैफिक जाम
लेट हो रहा है
आज एक महत्वपूर्ण मीटिंग भी है
जाते ही कुर्सी में धंस जाता हूँ
आज की डाक देखता हूँ
फिर फाइलें निपटाता हूँ
मीटिंग अटेण्ड करता हूँ
थोड़ा सा आराम…
फोन की घण्टी बजी
स्टेनो बता रही है
कोई सज्जन बात करना चाहते हैं
हलो…..हाँ मैं देख लूँगा
टिक…टिक….टिक
अरे एक बज गये
अर्दली खाना लगाता है
खाते ही फोन की घण्टी
दूसरी तरफ बाॅस हैं
सर…सर…सर…
कुछ फाइलें निपटाता हूँ
टिक…टिक…टिक
अरे छः बज गये
लोग घरों को जाने लगे हैं
मैं कया करूं
घर भी तो काटता है अकेले में
चैम्बर से बाहर आता हूँ
अपनी चमचमाती नेम प्लेट
पर नजर डालता हूँ
और मुस्कुरा कर रह जाता हूँ।

माँ का पत्र

घर का दरवाज़ा खोलता हूँ
नीचे एक पत्र पड़ा है
शायद डाकिया अंदर डाल गया है
उत्सुकता से खोलता हूँ
माँ का पत्र है
एक-एक शब्द दिल में उतरते जाते हैं
बार-बार पढ़ता हूँ
फिर भी जी नहीं भरता
पत्र को सिरहाने रख
सो जाता हूँ
रात को सपने में देखता हूँ
माँ मेरे सिरहाने बैठी
बालों में उंगलियाँ फिरा रही है ।

माँ के आँसू

बचपन से ही
देखता आ रहा हूँ माँ के आँसू
सुख में भी, दुख में भी
जिनकी कोई कीमत नहीं
मैं अपना जीवन अर्पित करके भी
इनका कर्ज नहीं चुका सकता।

हमेशा माँ की आँखों में आँसू आये
ऐसा नहीं कि मैं नहीं रोया
लेकिन मैंने दिल पर पत्थर रख लिया
सोचा, कल को सफल आदमी बनूँगा
माँ को सभी सुख-सुविधायें दूँगा
शायद तब उनकी आँखों में आँसू नहीं हो
पर यह मेरी भूल थी।

आज मैं सफल व्यक्ति हूँ
सारी सुख-सुविधायें जुटा सकता हूँ
पर एक माँ के लिए उसके क्या मायने?
माँ को सिर्फ चाहिए अपना बेटा
जिसे वह छाती से लगा
जी भर कर प्यार कर सके।

पर जैसे-जैसे मैं ऊँचाईयों पर जाता हूँ
माँ का साथ दूर होता जाता है
शायद यही नियम है प्रकृति का।

माँ की नजर 

ट्रेन के कोने में दुबकी सी वह
उसकी गोद में दुधमुँही बच्ची पड़ी है
न जाने कितनी निगाहें उसे घूर रही हैं,
गोद में पड़ी बच्ची बिलबिला रही है
शायद भूखी है
पर डरती है वह उन निगाहों के बीच
अपने स्तनों को बच्ची के मुँह में लगाने से
वह आँखों के किनारों से झाँकती है
अभी भी लोग उसको
सवालिया निगाहों से देख रहे हैं
बच्ची अभी भी रो रही है
आखिर माँ की ममता
जाग ही जाती है
वह अपने स्तनों को
उसके मुँह से लगा देती है
पलटकर लोगों की आँखों में झाँकती है
इन आँखों में है एक विश्वास, ममत्व
उसे घूर रहे लोग अपनी नजरें हटा लेते हैं
अब उनमें एक माँ की नजरों का सामना
करने की हिम्मत नहीं।

परी

बचपन में
माँ रख देती थी चाकलेट
तकिये के नीचे
कितना खुश होता
सुबह-सुबह चाकलेट देखकर।
माँ बताया करती
जो बच्चे अच्छे काम
करते हैं
उनके सपनों में परी आती
और देकर चली जाती चाकलेट।
मुझे क्या पता था
वो परी कोई और नहीं
माँ ही थी।

सभ्यताओं का संघर्ष

सभ्यताओं का संघर्ष
एक सभ्यता और दूसरी सभ्यता
के बीच अन्तर करता
और उनमें एक द्वन्द्व पैदा करता

लेकिन इससे पहले कि
एक सभ्यता विजित होती
उसके द्वारा पल्लवित-पुष्पित
दूसरी सभ्यता भी
सर उठाकर खड़ी हो जाती

अब
वह किसी सभ्यता के
रहमो-करम पर नहीं
ख़ुद को
सभ्यता का मानदंड मानती है

बस
ऐसे ही चलता है
सभ्यताओं का संघर्ष
कोई नहीं सोचता
सभ्यताओं की आड़ में
यह मानवीय संघर्ष है ।

विज्ञापनों का गोरखधंधा

विज्ञापनों ने ढँक दिया है
सभी बुराईयों को
हर रोज़ चढ़ जाती हैं उन पर
कुछ नामी-गिरामी चेहरों की परतें
फिर क्या फ़र्क़ पड़ता है

उसमें कीडे़ हों या कीटनाशक
या चिल्लाए कोई सुनीता नारायण
पर इन नन्हें बच्चों को कौन समझाए
विज्ञापनों के पीछे छुपे पैसे का सच
बच्चे तो सिर्फ टी०वी० और बड़े परदे
पर देखे उस अंकल को ही पहचानते हैं
ज़िद करते हैं
उस सामान को घर लाने की

बच्चे की ज़िद के आगे
माँ-बाप भी मज़बूर हैं
ऐसे ही चलता है
विज्ञापनों का गोरखधंधा ।

माँस का लोथड़ा 

ख़ामोश व वीरान-सी आँखें
आसपास कुछ ढूँढती हैं
पर हाथ में आता है
सिर्फ माँस का लोथड़ा

किसी के लिए वह हिन्दू का है
किसी के लिए मुसलमाँ का
किसी ने उसे सांप्रदायिकता
का उन्माद बताया
किसी ने धर्मनिरपेक्षता
का राग अलापा

पर उस दूधमुँहे मासूम
का क्या दोष
माँ की छाती समझ
वह लोथड़े को भी मुँह
लगा लेता है
मुँह में दूध की बजाय
खून भर आता है
लाशों के बीच
खून से सना मुँह लिए
एक मासूम का चेहरा

वह इस देश का भविष्य है

माँ 

‘मेरा प्यारा-सा बच्चा’
गोद में भर लेती है बच्चे को
चेहरे पर नज़र न लगे
माथे पर काजल का टीका लगाती है
कोई बुरी आत्मा न छू सके
बाँहों में ताबीज़ बाँध देती है।

बच्चा स्कूल जाने लगा है
सुबह से ही माँ जुट जाती है
चौका-बर्तन में
कहीं बेटा भूखा न चला जाए।

लड़कर आता है पड़ोसियों के बच्चों से
माँ के आँचल में छुप जाता है
अब उसे कुछ नहीं हो सकता।

बच्चा बड़ा होता जाता है
माँ मन्नतें माँगती है
देवी-देवताओं से
बेटे के सुनहरे भविष्य की खातिर
बेटा कामयाबी पाता है
माँ भर लेती है उसे बाँहों में
अब बेटा नजरों से दूर हो जाएगा।

फिर एक दिन आता है
शहनाईयाँ गूँज उठती हैं
माँ के क़दम आज जमीं पर नहीं
कभी इधर दौड़ती है, कभी उधर
बहू के क़दमों का इंतज़ार है उसे
आशीर्वाद देती है दोनों को
एक नई ज़िन्दगी की शुरूआत के लिए।

माँ सिखाती है बहू को
परिवार की परम्पराएँ व संस्कार
बेटे का हाथ बहू के हाथों में रख
बोलती है
बहुत नाजों से पाला है इसे
अब तुम्हें ही देखना है।

माँ की ख़ुशी भरी आँखों से
आँसू की एक गरम बूँद
गिरती है बहू की हथेली पर।

पेज थ्री 

मँहगी गाड़ियों और वातानुकूलित कक्षों में बैठ
वे जीते हैं एक अलग ज़िन्दगी
जब सारी दुनिया सो रही होती है
तब आरम्भ होती है उनकी सुबह
रंग-बिरंगी लाइटों और संगीत के बीच
पैग से पैग टकराते
अगले दिन के अख़बारों में
पेज थ्री की सुर्खियाँ
बनते हैं ये लोग

देर शाम किसी चैरिटी प्रोग्राम में
भारी-भरकम चेक देते हुए और
मंत्रियों के साथ फोटो खिंचवाते हुए
तैयार कर रहे होते हैं
राजनीति में आने की सीढ़ियाँ

सुबह से शाम तक
कई देशों की सैर करते
कर रहे होते हैं डीलिंग
अपने लैपटॉप के सहारे
वे नहीं जाते
किसी मंदिर या मस्जिद में
कर लेते हैं ईश्वर का दर्शन
अपने लैपटॉप पर ही
और चढ़ा देते हैं चढ़ावा
क्रेडिट-कार्ड के जरिये

सुर्खियाँ बनती हैं
उनकी हर बात
और दौड़ता है
मीडिया का हुजूम उनकी पीछे
क्योंकि
तय करते हैं वे
सेंसेक्स का भविष्य

पर्दे के पीछे से करते हैं
सरकारों के भविष्य का फैसला
बनती है आकर्षण का केन्द्र-बिंदु
सार्वजनिक स्थलों पर उनकी मौजूदगी
और इसलिए वे औरों से अलग हैं ।

गौरैया

चाय की चुस्कियों के बीच
सुबह का अख़बार पढ़ रहा था
अचानक
नज़रें ठिठक गईं
गौरैया शीघ्र ही विलुप्त पक्षियों में ।

वही गौरैया,
जो हर आँगन में
घोंसला लगाया करती
जिसकी फुदक के साथ
हम बड़े हुए।

क्या हमारे बच्चे
इस प्यारी व नन्हीं-सी चिड़िया को
देखने से वंचित रह जाएँगे!
न जाने कितने ही सवाल
दिमाग में उमड़ने लगे ।

बाहर देखा
कंक्रीटों का शहर नज़र आया
पेड़ों का नामो-निशाँ तक नहीं
अब तो लोग घरों में
आँगन भी नहीं बनवाते
एक कमरे के फ्लैट में
चार प्राणी ठुँसे पड़े हैं ।

बच्चे प्रकृति को
निहारना तो दूर
हर कुछ इण्टरनेट पर ही
खंगालना चाहते हैं ।

आख़िर
इन सबके बीच
गौरैया कहाँ से आएगी ?

लोकतन्त्र ख़ामोश है 

लोकतन्त्र ख़ामोश है
हर किसी ने उसे
आगे कर दिया है ढाल की तरह ।

लोकतंत्र की आड़ में
रोज़ बदलते हैं पाले
गिरती हैं सरकारें
पर लोकतंत्र ख़ामोश है।

किस-किस को चुप कराए ये लोकतन्त्र
पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, ईराक
और भी न जाने कितने देश
इसका मुलम्मा चढ़ाकर
इसे ही चिढ़ाए जा रहे हैं

हर कहीं, लोकतंत्र लाने की ख़ातिर
घोंटा जा रहा है
लोकतंत्र का ही गला
पर लोकतंत्र ख़ामोश है ।

रक्तबीज

रक्तबीज फिर आ गए हैं
एक आतंक की छाया
ख़त्म नहीं होती
दूसरे की ख़बर आ जाती है

आज अमेरिका में
कल अफ़गानिस्तान में
फिर, किसी और जगह
जाति-धर्म की म्यानों में क़ैद
इन रक्तबीजों ने ओढ़ रखा है
सभ्यता और संस्कृति का झीना आवरण

हर सभ्यता और संस्कृति में
घुल जाने वाले ये रक्तबीज
दिन के उजाले में करते हैं
नर-कंकालों के अवशेष पर तांडव

दूर कहीं बैठा कोई
तैयार कर रहा होता है
कुछ नये रक्तबीज ।

बच्चे की निगाह

कभी देखो समाज को
बच्चे की निगाहों से
पल भर में रोना
पल भर में खिलखिलाना ।

अरे! आज लड़ाई हो गई
शाम को दोनों गले मिल रहे हैं
एक दूसरे को चूम रहे हैं ।

भीख का कटोरा लिए फिरते
बूढ़े चाचा की दशा देखी नहीं गई
माँ की नज़रें चुराकर
अपने हिस्से की दो रोटियाँ
दे आता है उसे ।

दीवाली है, ईद है
अपनी मंडली के साथ
मिठाईयाँ खाए जा रहा है
क्या फ़र्क़ पड़ता है
कौन हिन्दू है, कौन मुसलमाँ ।

सड़क पर कुचल आता है आदमी
लोग देखते हुए भी अनजान हैं
पापा! पापा! गाड़ी रोको
देखो उन्हें क्या हो गया ?

छत पर देखा
एक कबूतर घायल पड़ा है
उठा लाता है उसे
ज़ख़्मों पर मलहम लगाता है
कबूतर उन्मुक्त होकर उड़ता है ।

बच्चा ज़ोर से तालियाँ बजाकर
उसके पीछे दौड़ता है
मानों सारा आकाश
उसकी मुट्ठी में है ।

कश्मीर 

भारतीय कश्मीर, आजाद कश्मीर
पर कश्मीरी अवाम कहीं नहीं

चंद मुट्ठी भर लोग
लाखों अवाम की ज़िन्दगी के
फ़ैसले का दावा करते हैं
पर कोई उस स्वर्ग से
कश्मीर की बात नहीं करता

एक कश्मीर को लेकर
खींची गयी नफ़रत की रेखाएँ
तुम सिर्फ़ कश्मीर को लेने की
बात क्यों करते हो
पूरा भारत ही क्यों नहीं
तुम्हारा हो सकता

अतीत की परछाईयों से क्या डरना
चाहे भारत पाक में जाए
या पाक भारत में आए
पर हम एक तो होंगे

फिर यह तो अवाम तय करेगा
कि शासकों का भविष्य क्या होगा ?

भिखमंगों का ईश्वर

मंदिर के सामने
भिखमंगों की कतारें
एक साथ ही उनके कटोरे

ऐसे आगे बढ़ जाते हैं
मानों सब यंत्रवत हों

दस-दस पैसे की बाट जोहते वे
मंदिर के सामने होकर भी
मंदिर में नहीं जाते

क्योंकि वे सिर्फ
एक ही ईश्वर को जानते हैं
जो उनके कटोरे में
पैसे गिरा देता है ।

मताधिकार

लोकतंत्र की इस चकरघिन्नी में
पिसता जाता है आम आदमी
सुबह से शाम तक
भरी धूप में कतार लगाए
वह बाट जोहता है
अपने मताधिकार की

वह जानता भी नहीं
अपने इस अधिकार का मतलब
बस एक औपचारिकता है
जिसे वह पूरी कर आता है
और इस औपचारिकता के बदले
दे देता है अधिकार
चंद लोगों को
अपने ऊपर
राज करने का

जो अपने हिसाब से
इस मताधिकार का अर्थ निकालते हैं
और फिर छोड़ देते हैं
आम आदमी को
इंतज़ार करने के लिए
अगले मताधिकार का ।

पालिश 

साहब पालिश करा लो
एकदम चमाचम कर दूँगा
देखता हूँ उसकी आँखों में
वहाँ मासूमियत नहीं, बेबसी है

करा लो न साहब
कुछ खाने को मिल जायेगा
सुबह ही पालिश किया जूता
उसकी तरफ बढ़ा देता हूँ
जूतों पर तेज़ी से
फिरने लगे हैं उसके हाथ
फिर कंधों से रूमाल उतार
जूतों को चमकाता है

हो गया साहब
उसकी खाली हथेली पर
पाँच का सिक्का रखता हूँ
सलामी ठोक आगे बढ़ जाता है

सामने खड़े ठेले से
कुछ पूड़ियाँ खरीद ली हैं उसने
उन्हीं गंदे हाथों से
खाने के कौर को
मुँह में डाल रहा है
मैं अपलक उसे निहार रहा हूँ ।

प्रेयसी

छोड़ देता हूँ निढाल
अपने को उसकी बाँहों में
बालों में अँगुलियाँ फिराते-फिराते
हर लिया है हर कष्ट को उसने ।

एक शिशु की तरह
सिमटा जा रहा हूँ
उसकी जकड़न में
कुछ देर बाद
ख़त्म हो जाता है
द्वैत का भाव ।

गहरी साँसों के बीच
उठती-गिरती धड़कनें
ख़ामोश हो जाती हैं
और मिलने लगती हैं आत्माएँ
मानो जन्म-जन्म की प्यासी हों ।

ऐसे ही किसी पल में
साकार होता है
एक नवजीवन का स्वप्न ।

गुर्दा

निकाल लिया है उन्होंने
उसका एक गुर्दा धोखे से
उस बेरोज़गार ने भी
चंद पैसों के लालच में
लगा दी अपनी ज़िदगी दाँव पर
पर उसका क्या कसूर ?

वह तो व्यवस्था का मारा हुआ है
पर उस संभ्रान्त और सुशिक्षित डॉक्टर का क्या
जिसे दूसरा भगवान माना जाता है
और जिसने एक अमीर
की जान बचाने के लिए
एक ग़रीब की ज़िन्दगी
दाँव पर लगा दी ।

न जाने रोज़ कितनी ऐसी घटनाएँ
सुनने को मिलती हैं
कभी पैसे के अभाव में
किसी ग़रीब का दम तोड़ देना
कभी चंद पैसों की आड़ में
नवजात शिशु को बेच देना
और कभी कानूनी प्रक्रियाओं में
भटकाये जाते आम जन

पर फिर भी ग़रीब आदमी
मानता है उन्हें दूसरा भगवान ।

सुबह का अख़बार 

आज सुबह का अख़बार देखा
वही मार-काट, हत्या और बलात्कार

रोज़ पढ़ता हूँ इन घटनाओं को
बस पात्रों के नाम बदल जाते हैं
क्या हो गया है इस समाज को

ये घटनाएँ उसे उद्वेलित नहीं करतीं
सिर्फ ख़बर बनकर रह जाती हैं
कोई नहीं सोचता कि यह घटना
उसके साथ भी हो सकती है

और लोग उसे अख़बारों में पढ़कर
चाय की चुस्कियाँ ले रहे होंगे ।

फाइलें 

हर अधिकारी की मेज़ पर
लगा रहता फ़ाइलों का अंबार
कभी-कभी तो फ़ाइलों के बीच
साहब का चेहरा तक देखना
मुश्किल हो जाता

औपचारिकताओं और आपत्तियों के बीच
जूझती फ़ाइलें
पर उन फ़ाइलों में कैद
व्यक्तियों की दास्ताँ का क्या ?
बाबू से लेकर अधिकारी तक
हर किसी ने उनकी दास्ताँ को
फ़ाइल पर लगे नम्बरों में
क़ैद कर दिया है

शायद उनका वश चले तो
हर व्यक्ति के चेहरे पर भी
एक नम्बर चस्पा कर दें
फ़ाइलों व नम्बरों के इस खेल में
न जाने कितनों का भाग्य घुटता है

पर बाबू और अधिकारी
अपनी धीमी रफ़्तार से
फ़ाइलों को सरकाते रहते हैं
इसीलिये कभी-कभी
फाइलों में क़ैद व्यक्ति को
दीमक भी चाटने से बाज नहीं आता

शायद हर दफ़्तर में है
फ़ाइलों की यही दास्ताँ ।

घड़ियाँ 

घड़ियाँ
अब सिर्फ समय नहीं बतातीं
लोगों की हैसियत भी बताती हैं
जितने बडे़ लोग, उतनी मँहगी घड़ियाँ

घड़ियाँ अब
कलाईयों की ही शोभा नहीं
बेडरूम, ड्राइंग रूम और गाड़ियों
की भी शोभा बढ़ाती हैं

हर अवसर के लिए
अलग तरह की घड़ियाँ
जितने देश
उतने तरह के समय
ऐसी ही कुछ
जिंदगी की भी घड़ी है

कोई नहीं जानता
कब और कहाँ रूक जाय ।

पागल कौन 

सड़क के किनारे पड़ी है वो
अधनंगी-सी कुछ बुदबुदाते हुए
शायद कुछ कहना चाहती है
लेकिन कह नहीं पाती

बगल से लोग निकलते जाते हैं
जितने मुँह, उतनी बातें
कोई कहता बेचारी सतायी हुई है
तो कोई कहता पागल हो गई है

गुजरता है मनचले जवानों का एक झुंड
वे उस पर हँसते और फब्तियाँ कसते हैं
कुछ दूर आगे जाकर, उसे लेकर
न जाने इशारों में क्या बातें करते हैं

अगली सुबह, सड़क के दूसरे किनारे पर
पड़ी रहती है खून से लथपथ एक नंगी देह
लोग गुजरते हुए कहते जाते हैं
च…च…च….बेचारी पगली!

पर मैं अनवरत मौन हूँ
कौन है वास्तव में पागल
हवस की शिकार वह अधनंगी
या वे जिन्होंने उसे नंगा करके
मानवता को नंगा किया है ।

नया जीवन 

टकटकी बाँधकर देखती है
जैसे कुछ कहना हो
और फुर्र हो जाती है तुरन्त
फिर लौटती है
चोंच में तिनके लिए

अब तो क़दमों के पास
आकर बैठने लगी है
आज उसके घोंसले में दिखे
दो छोटे-छोटे अंडे
कुर्सी पर बैठा रहता हूँ
पता नहीं कहाँ से आकर
कुर्सी के हत्थे पर बैठ जाती है
शायद कुछ कहना चाहती है
फिर फुर्र से उड़कर
घोंसले में चली जाती है

सुबह नींद खुलती है
चूँ…चूँ …चूँ…की आवाज़
यानी दो नए जीवनों का आरंभ
खिड़कियाँ खोलता हूँ
उसकी चमक भरी आँखों से
आँखें टकराती हैं
फिर चूँ…चूँ…चूँ…।

तितलियाँ 

आज मैंने उसको देखा
वह दौड़ रही थी
तितलियों के पीछे

जूही, गेंदा, गुलाब
और न जाने
कितने-कितने फूलों के पास
तितलियाँ भी छेड़ती थीं उसे
हाथ में आकर भी छूट जातीं

पर एक तितली को
शायद अच्छा न लगा
वह उसके हाथ आ ही गई
उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा
उसे लेकर वह वहीं
फूलों के बीच लेट गई
अपनी अल्हड़ धड़कनों पर
काबू पाने के लिए
तभी हवा का तेज़ झोंका आया
और उसके सीने पर रखे
दुपट्टे को उड़ा ले गया

ऐसा लगा, मानों तितलियों का झुंड
फूलों का रस पीकर उड़ा जा रहा हो ।

महात्मा गाँधी

महात्मा गाँधी
सत्य और अहिंसा की मूर्ति
जिसके सत्याग्रह ने
साम्राज्यवाद को भी मात दी
जिसने भारत की मिट्टी से
एक तूफ़ान पैदा किया
जिसने पददलितों और उपेक्षितों
की मूकता को आवाज़ दी
जो दुनिया की नज़रों में
जीती-जागती किवदंती बना
आज उसी गाँधी को हमने
चौराहों, मूर्तियों, सेमिनारों और क़िताबों
तक समेट दिया
गोडसे ने तो सिर्फ़
उसके भौतिक शरीर को मारा
पर हम रोज़ उसकी
आत्मा को कुचलते देखते हैं
ख़ामोशी से ।

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