केदारनाथ अग्रवाल की रचनाएँ

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है 

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है जो रवि के रथ का घोड़ा है वह जन मारे नहीं मरेगा नहीं मरेगा

जो जीवन की आग जला कर आग बना है फौलादी पंजे फैलाए नाग बना है जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा है जो युग के रथ का घोड़ा है वह जन मारे नहीं मरेगा नहीं मरेगा

पहला पानी

पहला पानी गिरा गगन से

उमँड़ा आतुर प्यार,

हवा हुई, ठंढे दिमाग के जैसे खुले विचार ।

भीगी भूमि-भवानी, भीगी समय-सिंह की देह,

भीगा अनभीगे अंगों की

अमराई का नेह

पात-पात की पाती भीगी-पेड़-पेड़ की डाल,

भीगी-भीगी बल खाती है

गैल-छैल की चाल ।

प्राण-प्राणमय हुआ परेवा,भीतर बैठा, जीव,

भोग रहा है

द्रवीभूत प्राकृत आनंद अतीव ।

रूप-सिंधु की

लहरें उठती,

खुल-खुल जाते अंग,

परस-परस

घुल-मिल जाते हैं

उनके-मेरे रंग ।

नाच-नाच

उठती है दामिने

चिहुँक-चिहुँक चहुँ ओर

वर्षा-मंगल की ऐसी है भीगी रसमय भोर ।

मैं भीगा,

मेरे भीतर का भीगा गंथिल ज्ञान,

भावों की भाषा गाती है

जग जीवन का गान ।

हमारी जिन्दगी

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं। हमेशा काम करते हैं, मगर कम दाम मिलते हैं। प्रतिक्षण हम बुरे शासन– बुरे शोषण से पिसते हैं!! अपढ़, अज्ञान, अधिकारों से वंचित हम कलपते हैं। सड़क पर खूब चलते पैर के जूते-से घिसते हैं।। हमारी जिन्दगी के दिन, हमारी ग्लानि के दिन हैं!!

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं! न दाना एक मिलता है, खलाये पेट फिरते हैं। मुनाफाखोर की गोदाम के ताले न खुलते हैं।। विकल, बेहाल, भूखे हम तड़पते औ’ तरसते हैं। हमारे पेट का दाना हमें इनकार करते हैं।। हमारी जिन्दगी के दिन, हमारी भूख के दिन हैं!!

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं! नहीं मिलता कहीं कपड़ा, लँगोटी हम पहनते हैं। हमारी औरतों के तन उघारे ही झलकते हैं।। हजारों आदमी के शव कफन तक को तरसते हैं। बिना ओढ़े हुए चदरा, खुले मरघट को चलते हैं।। हमारी जिन्दगी के दिन, हमारी लाज के दिन हैं!!

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं! हमारे देश में अब भी, विदेशी घात करते हैं। बड़े राजे, महाराजे, हमें मोहताज करते हैं।। हमें इंसान के बदले, अधम सूकर समझते हैं। गले में डालकर रस्सी कुटिल कानून कसते हैं।। हमारी जिन्दगी के दिन, हमारी कैद के दिन हैं!!

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं! इरादा कर चुके हैं हम, प्रतिज्ञा आज करते हैं। हिमालय और सागर में, नया तूफान रचते हैं।। गुलामी को मसल देंगे न हत्यारों से डरते हैं। हमें आजाद जीना है इसी से आज मरते हैं।। हमारी जिन्दगी के दिन, हमारे होश के दिन हैं!!

जिन्दगी

देश की छाती दरकते देखता हूँ! थान खद्दर के लपेटे स्वार्थियों को, पेट-पूजा की कमाई में जुता मैं देखता हूँ! सत्य के जारज सुतों को, लंदनी गौरांग प्रभु की, लीक चलते देखता हूँ! डालरी साम्राज्यवादी मौत-घर में, आँख मूँदे डाँस करते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! मैं अहिंसा के निहत्थे हाथियों को, पीठ पर बम बोझ लादे देखता हूँ। देव कुल के किन्नरों को, मंत्रियों का साज साजे, देश की जन-शक्तियों का, खून पीते देखता हूँ, क्रांति गाते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! राजनीतिक धर्मराजों को जुएँ में, द्रोपदी को हारते मैं देखता हूँ! ज्ञान के सब सूरजों को, अर्थ के पैशाचिकों से, रोशनी को माँगते मैं देखता हूँ! योजनाओं के शिखंडी सूरमों को, तेग अपनी तोड़ते मैं देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! खाद्य मंत्री को हमेशा शूल बोते देखता हूँ भुखमरी को जन्म देते, वन-महोत्सव को मनाते देखता हूँ! लौह-नर के वृद्ध वपु से, दण्ड के दानव निकलते देखता हूँ! व्यक्ति की स्वाधीनता पर गाज गिरते देखता हूँ! देश के अभिमन्युयों को कैद होते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! मुक्त लहरों की प्रगति पर, जन-सुरक्षा के बहाने, रोक लगाते देखता हूँ! चीन की दीवार उठते देखता हूँ! क्राँतिकारी लेखनी को, जेल जाते देखता हूँ! लपलपाती आग के भी, ओंठ सिलते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! राष्ट्र-जल में कागजी, छवि-यान बहता देखता हूँ, तीर पर मल्लाह बैठे और हँसते देखता हूँ! योजनाओं के फरिश्तों को गगन से भूमि आते, और गोबर चोंथ पर सानंद बैठे, मौन-मन बंशी बजाते, गीत गाते, मृग मरीची कामिनी से प्यार करते देखता हूँ! शून्य शब्दों के हवाई फैर करते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! बूचड़ों के न्याय-घर में, लोकशाही के करोड़ों राम-सीता, मूक पशुओं की तरह बलिदान होते देखता हूँ! वीर तेलंगानवों पर मृत्यु के चाबुक चटकते देखता हूँ! क्रांति की कल्लोलिनी पर घात होते देखता हूँ! वीर माता के हृदय के शक्ति-पय को शून्य में रोते विलपते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! नामधारी त्यागियों को, मैं धुएँ के वस्त्र पहने, मृत्यु का घंटा बजाते देखता हूँ! स्वर्ण मुद्रा की चढ़ौती भेंट लेते, राजगुरुओं को, मुनाफाखोर को आशीष देते, सौ तरह के कमकरों को दुष्ट कह कर, शाप देते प्राण लेते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! कौंसिलों में कठपुतलियों को भटकते, राजनीतिक चाल चलते, रेत के कानून के रस्से बनाते देखता हूँ! वायुयानों की उड़ानों की तरह तकरीर करते, झूठ का लम्बा बड़ा इतिहास गढ़ते, गोखुरों से सिंधु भरते, देश-द्रोही रावणों को राम भजते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! नाश के वैतालिकों को संविधानी शासनालय को सभा में दंड की डौड़ी बजाते देखता हूँ! कंस की प्रतिमूर्तियों को, मुन्ड मालाएँ बनाते देखता हूँ! काल भैरव के सहोदर भाइयों को, रक्त की धारा बहाते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! व्यास मुनि को धूप में रिक्शा चलाते, भीम, अर्जुन को गधे का बोझ ढोते देखता हूँ! सत्य के हरिचंद को अन्याय-घर में, झूठ की देते गवाही देखता हूँ! द्रोपदी को और शैव्या को, शची को, रूप की दूकान खोले, लाज को दो-दो टके में बेचते मैं देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! मैं बहुत उत्तप्त होकर भीम के बल और अर्जुन की प्रतिज्ञा से ललक कर, क्रांतिकारी शक्ति का तूफान बन कर, शूरवीरों की शहादत का हथौड़ा हाथ लेकर, श्रृंखलाएँ तोड़ता हूँ जिन्दगी को मुक्त करता हूँ नरक से!!

(कविता संग्रह, “कहें केदार खरी खरी”” से)

मजदूर का जन्म

एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ ! हाथी सा बलवान, जहाजी हाथों वाला और हुआ ! सूरज-सा इन्सान, तरेरी आँखोंवाला और हुआ !! एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ! माता रही विचार, अँधेरा हरनेवाला और हुआ ! दादा रहे निहार, सबेरा करनेवाला और हुआ !! एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ ! जनता रही पुकार, सलामत लानेवाला और हुआ ! सुन ले री सरकार! कयामत ढानेवाला और हुआ !! एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ !

वह चिड़िया जो

वह चिड़िया जो- चोंच मार कर दूध-भरे जुंडी के दाने रुचि से, रस से खा लेती है वह छोटी संतोषी चिड़िया नीले पंखों वाली मैं हूँ मुझे अन्‍न से बहुत प्‍यार है।

वह चिड़िया जो- कंठ खोल कर बूढ़े वन-बाबा के खातिर रस उँडेल कर गा लेती है वह छोटी मुँह बोली चिड़िया नीले पंखों वाली मैं हूँ मुझे विजन से बहुत प्‍यार है।

वह चिड़िया जो- चोंच मार कर चढ़ी नदी का दिल टटोल कर जल का मोती ले जाती है वह छोटी गरबीली चिड़िया नीले पंखों वाली मैं हूँ मुझे नदी से बहुत प्‍यार है।

मात देना नहीं जानतीं 

घर की फुटन में पड़ी औरतें ज़िन्दगी काटती हैं मर्द की मौह्ब्बत में मिला काल का काला नमक चाटती हैं

जीती ज़रूर हैं जीना नहीं जानतीं; मात खातीं- मात देना नहीं जानतीं

और का और मेरा दिन

दिन है किसी और का सोना का हिरन, मेरा है भैंस की खाल का मरा दिन। यही कहता है वृद्ध रामदहिन यही कहती है उसकी धरैतिन, जब से चल बसा उनका लाड़ला।

बसंती हवा 

हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ

वही हाँ, वही जो युगों से गगन को बिना कष्ट-श्रम के सम्हाले हुए है हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ

वही हाँ, वही जो धरा की बसंती सुसंगीत मीठा गुंजाती फिरी हूँ हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ

वही हाँ, वही जो सभी प्राणियों को पिला प्रेम-आसन जिलाए हुई हूँ हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ

कसम रूप की है, कसम प्रेम की है कसम इस हृदय की, सुनो बात मेरी– अनोखी हवा हूँ बड़ी बावली हूँ

बड़ी मस्तमौला। न हीं कुछ फिकर है, बड़ी ही निडर हूँ। जिधर चाहती हूँ, उधर घूमती हूँ, मुसाफिर अजब हूँ।

न घर-बार मेरा, न उद्देश्य मेरा, न इच्छा किसी की, न आशा किसी की, न प्रेमी न दुश्मन, जिधर चाहती हूँ उधर घूमती हूँ। हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!

जहाँ से चली मैं जहाँ को गई मैं – शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन, हरे खेत, पोखर, झुलाती चली मैं झुमाती चली मैं! हवा हूँ, हवा मै बसंती हवा हूँ।

चढ़ी पेड़ महुआ, थपाथप मचाया; गिरी धम्म से फिर, चढ़ी आम ऊपर, उसे भी झकोरा, किया कान में ‘कू’, उतरकर भगी मैं, हरे खेत पहुँची – वहाँ, गेंहुँओं में लहर खूब मारी।

पहर दो पहर क्या, अनेकों पहर तक इसी में रही मैं! खड़ी देख अलसी लिए शीश कलसी, मुझे खूब सूझी – हिलाया-झुलाया गिरी पर न कलसी! इसी हार को पा, हिलाई न सरसों, झुलाई न सरसों, मज़ा आ गया तब, न सुधबुध रही कुछ, बसंती नवेली भरे गात में थी हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!

मुझे देखते ही अरहरी लजाई, मनाया-बनाया, न मानी, न मानी; उसे भी न छोड़ा- पथिक आ रहा था, उसी पर ढकेला; हँसी ज़ोर से मैं, हँसी सब दिशाएँ, हँसे लहलहाते हरे खेत सारे, हँसी चमचमाती भरी धूप प्यारी; बसंती हवा में हँसी सृष्टि सारी! हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!

कनबहरे

कोई नहीं सुनता झरी पत्तियों की झिरझिरी न पत्तियों के पिता पेड़ न पेड़ों के मूलाधार पहाड़ न आग का दौड़ता प्रकाश न समय का उड़ता शाश्वत विहंग न सिंधु का अतल जल-ज्वार सब हैं – सब एक दूसरे से अधिक कनबहरे, अपने आप में बंद, ठहरे।

वीरांगना

मैंने उसको जब-जब देखा लोहा देखा लोहे जैसा- तपते देखा- गलते देखा- ढलते देखा मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा।

नागार्जुन के बाँदा आने पर

यह बाँदा है। सूदख़ोर आढ़त वालों की इस नगरी में, जहाँ मार, काबर, कछार, मड़ुआ की फ़सलें, कृषकों के पौरुष से उपजा कन-कन सोना, लढ़ियों में लद-लद कर आ-आ कर, बीच हाट में बिक कर कोठों-गोदामों में, गहरी खोहों में खो जाता है जा-जा कर, और यहाँ पर रामपदारथ, रामनिहोरे, बेनी पंडित, बासुदेव, बल्देव, विधाता, चंदन, चतुरी और चतुर्भुज, गाँवों से आ-आ कर गहने गिरवी रखते, बढ़े ब्याज के मुँह में बर-बस बेबस घुसते, फिर भी घर का ख़र्च नहीं पूरा कर सकते, मोटा खाते, फटा पहनते, लस्टम-पस्टम जैसे-तैसे भरते-खपते, न्याय यहाँ पर अन्यायों पर विजय न पाता, सत्य सरल होकर कोरा असत्य रह जाता, न्यायालय की ड्योढ़ी पर दब कर मर जाता, यहाँ हमारे भावी राष्ट्र-विधाता, युग के बच्चे, विद्यालय में वाणी-विद्या-बुद्धि न पाते, विज्ञानी बनने से वंचित रह जाते, केवल मिट्टी में मिल जाते।

यह बाँदा है, और यहाँ पर मैं रहता हूँ, जीवन-यापन कठिनाई से ही करता हूँ, कभी काव्य की कई पंक्तियाँ, कभी आठ-दस बीस पंक्तियाँ, और कभी कविताएँ लिखकर, प्यासे मन की प्यास बुझा लेता हूँ रस से, शायद ही आता है कोई मित्र यहाँ पर, शायद ही आती हैं मेरे पास चिट्ठियाँ।

मेरे कवि-मित्रों ने मुझ पर कृपा न की है, इसीलिए रहता उदास हूँ, खोया-खोया, अपने दुख-दर्दों में डूबा, जन-साधारण की हालत से ऊबा-ऊबा, बाण-बिंधे पक्षी-सा घायल, जल से निकली हुई मीन-सा, विकल तड़पता, इसीलिए आतुर रहता हूँ, कभी-कभी तो कोई आए, छठे-छमाहे चार-पाँच दिन तो रह जाए, मेरे साथ बिताए, काव्य, कला, साहित्य-क्षेत्र की छटा दिखाए, और मुझे रस से भर जाए, मधुर बनाए, फिर जाए, जीता मुझको कर जाए।

आख़िर मैं भी तो मनुष्य हूँ, और मुझे भी कवि-मित्रों का साथ चाहिए, लालायित रहता हूँ मैं सबसे मिलने को, श्याम सलिल के श्वेत कमल-सा खिल उठने को।

सच मानो जब यहाँ निराला जी आए थे, कई साल हो गए, यहाँ कम रह पाए थे, उन्हें देख कर मुग्ध हुआ था, धन्य हुआ था, कविताओं का पाठ उन्हीं के मुख से सुनकर, गंधर्वों को भूल गया था, तानसेन को भूल गया था, सूरदास, तुलसी, कबीर को भूल गया था, ऐसी वाणी थी हिंदी के महाकृती की।

तब यह बाँदा काव्य-कला की पुरी बना था, और साल पर साल यहाँ मधुमास रहा था, बंबेश्वर के पत्थर भी बन गए हृदय थे, चूनरिया बन गई हवा थी, गौने वाली, और गगन का राजा सूरज दूल्हा बन कर, चूम रहा था प्रिय दुलहन को।

फिर दिन बीते, मधु-घट रीते, फिर पहले-सा यह नीरस हो गया नगर था, फिर पहले-सा मैं चिंतित था, फिर मेरा मन भी कुंठित था, फिर लालायित था मिलने को कवि-मित्रों से, फिर मैं उनकी बाट जोहता रहा निरंतर, जैसे खेतिहर बाट जोहता है बादल की, जैसे भारत बाट जोहता है सूरज की, किंतु न कोई आया, आने के वादे मित्रों के टूटे, कई वर्ष फिर बीते, रंग हुए सब फीके, और न कोई रही हृदय में आशा।

तभी बंधुवर शर्मा आए, महादेव साहा भी आए, और निराला-पर्व मनाया हम लोगों ने, मुंशी जी के पुस्तक-घर में, एक बार फिर मिला सुअवसर मधु पीने का, कविता का झरना बन कर झर-झर जीने का, लगातार घंटों, पहरों तक, एक साथ साँसें लेने का, एक साथ दिल की धड़कन से ध्वनि करने का, ऐसा लगा कि जैसे हम सब, एक प्राण हैं, एक देह हैं, एक गीत हैं, एक गूँज हैं इस विराट फैली धरती के, और हमी तो वाल्मीकि हैं, कालिदास हैं, तुलसी हैं, हिंदी कविता के हरिशचंद्र हैं, और निराला हमी लोग हैं, बंधु! आज भी वह दिन मुझको नहीं भूलता, उसकी स्मृति अब भी बेले-सी महक रही है, उस दिन का आनंद आज कालिदास का छंद बना मन मोह रहा है, मुक्त मोर बन श्याम बदरिया भरे हृदय में, दुपहरिया में, शाम-सबेरे नाच रहा है, रैन-अँधेरे में चंदनियाँ बाँह पसारे, हमको, सबको भेंट रहा है।

संभवतः उस दिन मेरा नव जन्म हुआ था, संभवतः उस दिन मुझको कविता ने चूमा, संभवतः उस दिन मैंने हिमगिरि को देखा, गंगा के कूलों की मिट्टी मैंने पाई, उस मिट्टी से उगती फ़सलें मैंने पाईं, और उसी के कारण अब बाँदा में जीवित रहता हूँ, और उसी के कारण अब तक कविता की रचना करता हूँ, और तुम्हारे लिए पसारे बाँह खड़ा हूँ, आओ साथी गले लगा लूँ, तुम्हें, तुम्हारी मिथिला की प्यारी धरती को, इसमें व्यापे विद्यापति को, और वहाँ की जनवाणी के छंद चूम लूँ, और वहाँ के गढ़-पोखर का पानी छू कर नैन जुड़ा लूँ, और वहाँ के दुखमोचन, मोहन माँझी को मित्र बना लूँ, और वहाँ के हर चावल को हाथों में ले हृदय लगा लूँ, और वहाँ की आबहवा से वह सुख पा लूँ जो नृत्यों में नाचा जा कर कभी न चुकता, जो आँखों में आँजा जा कर कभी न चुकता, जो ज्वाला में डाला जा कर कभी न जलता, जो रोटी में खाया जा कर कभी न कमता, जो गोली से मारा जा कर कभी न मरता, जो दिन दूना रात चौगुना व्यापक बनता, और वहाँ नदियों में बहता, नावों को ले आगे बढ़ता, और वहाँ फूलों में खिलता, बागों को सौरभ से भरता।

अहोभाग्य है जो तुम आए मुझसे मिलने, इस बाँदा में चार रोज़ के लिए ठहरने, अहोभाग्य है मेरा, मेरे घर वालों का, जिनको तुम स्वागत से हँसते देख रहे हो। अहोभाग्य है इस जीवन के इन कूलों का, जिनको तुम अपनी कविता से सींच रहे हो। अहोभाग्य हैं हम दोनों का, जिनको आजीवन जीना है काव्य-क्षेत्र में। अहोभाग्य है हम दोनों की इन आँखों का, जिनमें अनबुझ ज्योति जगी है अपने युग की। अहोभाग्य है दो जनकवियों के हृदयों का जिनकी धड़कन गरज रही है घन-गर्जन-सी।

अहोभाग्य है कठिनाई में पड़े हुए प्रत्येक व्यक्ति का, जिनका साहस-शौर्य न घटता। अहोभाग्य है स्वयं उगे इन सब पेड़ों का, जिनके द्रुम-दल झरते फिर-फिर नए निकलते। अहोभाग्य है हर छोटी चंचल चिड़िया का, जिनका नीड़ बिगड़ते-बनते देर न लगती। अहोभाग्य है बंबेश्वर की चौड़ी-चकली चट्टानों का, जिनको तुमने प्यार किया है, सहलाया है। अहोभाग्य है केन नदी के इस पानी का, जिसकी धारा बनी तुम्हारे स्वर की धारा। अहोभाग्य है बाँदा की इस कठिन भूमि का, जिसको तुमने चरण छुला कर जिला दिया है।

आज नदी बिलकुल उदास थी

आज नदी बिलकुल उदास थी। सोई थी अपने पानी में, उसके दर्पण पर- बादल का वस्त्र पडा था। मैंने उसको नहीं जगाया, दबे पांव घर वापस आया।

ओस की बूंद कहती है 

ओस-बूंद कहती है; लिख दूं नव-गुलाब पर मन की बात। कवि कहता है : मैं भी लिख दूं प्रिय शब्दों में मन की बात॥ ओस-बूंद लिख सकी नहीं कुछ नव-गुलाब हो गया मलीन। पर कवि ने लिख दिया ओस से नव-गुलाब पर काव्य नवीन॥

हम और सड़कें

सूर्यास्त मे समा गयीं सूर्योदय की सड़कें, जिन पर चलें हम तमाम दिन सिर और सीना ताने, महाकाश को भी वशवर्ती बनाने, भूमि का दायित्व उत्क्रांति से निभाने, और हम अब रात मे समा गये, स्वप्न की देख-रेख में सुबह की खोयी सड़कों का जी-जान से पता लगाने

मैना 

गुम्बज के ऊपर बैठी है, कौंसिल घर की मैना । सुंदर सुख की मधुर धूप है, सेंक रही है डैना ।।

तापस वेश नहीं है उसका, वह है अब महारानी । त्याग-तपस्या का फल पाकर, जी में बहुत अघानी ।।

कहता है केदार सुनो जी ! मैना है निर्द्वंद्व । सत्य-अहिंसा आदर्शों के, गाती है प्रिय छंद ।।

कंकरीला मैदान

कंकरीला मैदान ज्ञान की तरह जठर-जड़ लम्बा चौड़ा गत वैभव की विकल याद में- बडी दूर तक चला गया है गुमसुम खोया। जहाँ-तहाँ कुछ कुछ दूरी पर, उसके उँपर, पतले से पतले डंठल के नाजुक बिरवे थर-थर हिलते हुए हवा में खड़े हुए बेहद पीड़ित। हर बिरवे पर मुँदरी जैसा एक फूल है अनुपम, मनोहर, हर एसी मनहर मुंदरी को मीनों नें चंचल आँखों से नीले सागर के रेशम के रश्मि तार से, –हर पत्ती पर बड़े चाव से–बड़ी जतन से– अपने अपने प्रेमीजन को देने के खातिर काढ़ा था सदियों पहले। किंतु नहीं वे प्रेमी आये और मछलियाँ सूख गयी हैं–कंकड़ हैं अब। आह! जहाँ मीनों का घर था वहाँ बड़ा मैदान हो गया॥

लंदन में बिक आया नेता 

लंदन में बिक आया नेता, हाथ कटा कर आया । एटली-बेविन-अंग्रेज़ों में, खोया और बिलाया ।।

भारत-माँ का पूत-सिपाही, पर घर में भरमाया । अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद का, उसने डिनर उड़ाया ।।

अर्थनीति में राजनीति में, गहरा गोता खाया । जनवादी भारत का उसने, सब-कुछ वहाँ गवायाँ ।|

गोटवव

पुकार

ऐ इन्सानों! आँधी के झूले पर झूलो आग बबूला बन कर फूलो कुरबानी करने को झूमो लाल सवेरे का मूँह चूमो ऐ इन्सानों ओस न चाटो अपने हाथों पर्वत काटो पथ की नदियाँ खींच निकालो जीवन पीकर प्यास बुझालो रोटी तुमको राम न देगा वेद तुम्हारा काम न देगा जो रोटी का युद्ध करेगा वह रोटी को आप वरेगा!

पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा

इसी जन्म में, इस जीवन में, हमको तुमको मान मिलेगा। गीतों की खेती करने को, पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा।

क्लेश जहाँ है, फूल खिलेगा, हमको तुमको ज्ञान मिलेगा। फूलों की खेती करने को, पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा।

दीप बुझे हैं जिन आँखों के, उन आँखों को ज्ञान मिलेगा। विद्या की खेती करने को, पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा।

मैं कहता हूँ, फिर कहता हूँ, हमको तुमको प्राण मिलेगा। मोरों-सा नर्तन करने को, पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा।

एक खिले फूल से 

एक खिले फूल से झाड़ी के एक खिले फूल ने नीली पंखुरियों के एक खिले फूल ने आज मुझे काट लिया ओठ से, और मैं अचेत रहा धूप में

लिपट गयी जो धूल 

लिपट गयी जो धूल पांव से

वह गोरी है इसी गांव की

जिसे उठाया नहीं किसी ने

इस कुठांव से।

ऐसे जैसे किरण

ओस के मोती छू ले

तुम मुझको

चुंबन से छू लो

मैं रसमय हो जाऊँ!

तुम भी कुछ हो

तुम भी कुछ हो लेकिन जो हो, वह कलियों में रूप-गन्ध की लगी गांठ है जिसे उजाला धीरे धीरे खोल रहा है। यह जो नग दिये के नीचे चुप बैठा है, इसने मुझको काट लिया है, इस काटे का मंत्र तुम्हारे चुंबन में है, तुम चुंबन से मुझे जिला दो।

वह पठार जो जड़ बीहड़ था

कटते-कटते ध्वस्त हो गया, धूल हो गया, सिंचते-सिंचते, दूब हो गया, और दूब पर वन के मन के- रंग -रूप के, फूल खिल उठे, वन फूलों से गंध-गंध संसार हो गया।

समुद्र वह है

समुद्र वह है

जिसका धैर्य छूट गया है

दिककाल में रहे-रहे !

समुद्र वह है

जिसका मौन टूट गया है,

चोट पर चोट सहे-सहे !

प्रक्रति चित्र

जिसने सोने को खोदा, लोहा मोड़ा है जो रवि के रथ का घोड़ा है वह जन मारे नहीं मरेगा

मार्क्सवाद की रोशनी

 दोषी हाथ हाथ जो चट्टान को तोडे़ नहीं वह टूट जाये,

लोहे को मोड़े नहीं सौ तार को जोड़े नहीं वह टूट जाये।

पूंजीवादी व्यवस्था

हे मेरी तुम डंकमार संसार न बदला प्राणहीन पतझार न बदला बदला शासन, देश न बदला राजतंत्र का भेष न बदला, भाव बोध उन्मेष न बदला, हाड़-तोड़ भू भार न बदला कैसे जियें? यही है मसला नाचे कोैन बजाये तबला?

राजनीति

राजनीति नंगी औरत है कई साल से जो यूरुप में आलिंगन के अंधे भूखे कई शक्तिशाली गुंडों को देश-देश के जो स्वामी हैं जो महान सेनाएँ रखते जो अजेय अपने को कहते ऐसा पागल लड़वाती है आबादी में बम गिरते हैं; दल की दल निर्दोषी जनता गिनती में लाखों मरती है; नष्ट सभ्यता हो जाती है- कभी किसी के, कभी किसी के, गले झूलकर मुसकाती है। हार-जीत के इस किलोल से संधि नहीं होने देती है॥

रचनाकाल: ०७-०२-१९४६

घोड़े का दाना 

सेठ करोड़ीमल के घोड़े का नौकर है भूरा आरख।– बचई उसका जानी दुश्मन!

हाथ जोड़कर, पाँव पकड़कर, आँखों में आँसू झलकाकर, भूख-भूख से व्याकुल होकर, बदहवास लाचार हृदय से, खाने को घोड़े का दाना आध पाव ही बचई ने भूरा से माँगा।

लेकिन उसने बेचारे भूखे बचई को, नहीं दिया घोड़े का दाना; दुष्ट उसे धक्का ही देता गया घृणा से!

तब बचई भूरा से बोला : ‘पाँच सेर में आध पाव कम हो जाने से घोड़ा नहीं मरेगा भूखा; वैसे ही टमटम खींचेगा; वैसे ही सरपट भागेगा; आध पाव की कमी न मालिक भी जानेगा; पाँच सेर में आध पाव तो यों ही भूरा! आसानी से घट जाता है; कुछ धरती पर गिर जाता है; तौल-ताल में कुछ कमता है; कुछ घोड़ा ही, खाते-खाते,- इधर उधर छिटका देता है।

आध पाव में भूरा भैया! नहीं तुम्हारा स्वर्ग हरेगा नहीं तुम्हारा धर्म मिटेगा; धर्म नहीं दाने का भूखा!- स्वर्ग नहीं दाने का भूखा!- आध पाव मेरे खाने से कोई नहीं अकाल पड़ेगा।’

पर, भूरा ने, अंगारे सी आँख निकाले, गुस्से से मूँछें फटकारे, काले नोकीले काँटों से, बेचार बचई के कोमल दिल को छलनी छलनी कर ही डाला। जहर बूँकता फिर भी बोला : ‘नौ सौ है घोड़े का दाम!- तेरा धेला नहीं छदाम। जा, चल हट मर दूर यहाँ से।’

अपमानित अवहेलित होकर, बुरी तरह से जख्मी होकर, अब गरीब बचई ने बूझा : पूँजीवादी के गुलाम भी बड़े दुष्ट हैं;- मानव को तो दाना देते नहीं एक भी, घोड़े को दाना देते हैं पूरा; मृत्यु माँगते हैं मनुष्य की, पशु को जीवित रखकर!

रचनाकाल: १२-०४-१९४६

एका का बल 

डंका बजा गाँव के भीतर, सब चमार हो गए इकट्ठा। एक उठा बोला दहाड़कर : “हम पचास हैं, मगर हाथ सौ फौलादी हैं। सौ हाथों के एका का बल बहुत बड़ा है। हम पहाड़ को भी उखाड़कर रख सकते हैं। जमींदार यह अन्यायी है। कामकाज सब करवाता है, पर पैसे देता है छै ही। वह कहता है ‘बस इतना लो’, ‘काम करो, या गाँव छोड़ दो।’ पंचो! यह बेहद बेजा है! हाथ उठायो, सब जन गरजो : गाँव छोड़कर नहीं जायँगे यहीं रहे हैं, यहीं रहेंगें, और मजूरी पूरी लेंगे, बिना मजूरी पूरी पाए हवा हाथ से नहीं झलेंगें।” हाथ उठाये, फन फैलाये, सब जन गरजे। फैले फन की फुफकारों से जमींदार की लक्ष्मी रोयी!!

रचनाकाल: १२-०४-१९४६

कारण-करण

गेहूँ में गेरुआ लगा, घोंघी ने खा लिया चना, बिल्कुल बिगड़ा, खेल बना।

अब आफत से काम पड़ा, टूटा सुख से भरा घड़ा, दिल को धक्का लगा बड़ा।

जमींदार ने कहा करो, सब लगान अब अदा करो, वरना जिंदा आज मरो।

जोखू ने घर बेंच दिया रूपया और उधार लिया खंड-खंड हो गया हिया।

विधि से देखा नहीं गया, जोखू बाजी हार गया लकवा उसको मार गया।

रचनाकाल: १०-०८-१९४६

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है 

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है जो रवि के रथ का घोड़ा है वह जन मारे नहीं मरेगा नहीं मरेगा

जो जीवन की आग जला कर आग बना है फौलादी पंजे फैलाए नाग बना है जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा है जो युग के रथ का घोड़ा है वह जन मारे नहीं मरेगा नहीं मरेगा

पहला पानी

पहला पानी गिरा गगन से

उमँड़ा आतुर प्यार,

हवा हुई, ठंढे दिमाग के जैसे खुले विचार ।

भीगी भूमि-भवानी, भीगी समय-सिंह की देह,

भीगा अनभीगे अंगों की

अमराई का नेह

पात-पात की पाती भीगी-पेड़-पेड़ की डाल,

भीगी-भीगी बल खाती है

गैल-छैल की चाल ।

प्राण-प्राणमय हुआ परेवा,भीतर बैठा, जीव,

भोग रहा है

द्रवीभूत प्राकृत आनंद अतीव ।

रूप-सिंधु की

लहरें उठती,

खुल-खुल जाते अंग,

परस-परस

घुल-मिल जाते हैं

उनके-मेरे रंग ।

नाच-नाच

उठती है दामिने

चिहुँक-चिहुँक चहुँ ओर

वर्षा-मंगल की ऐसी है भीगी रसमय भोर ।

मैं भीगा,

मेरे भीतर का भीगा गंथिल ज्ञान,

भावों की भाषा गाती है

जग जीवन का गान ।

हमारी जिन्दगी

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं। हमेशा काम करते हैं, मगर कम दाम मिलते हैं। प्रतिक्षण हम बुरे शासन– बुरे शोषण से पिसते हैं!! अपढ़, अज्ञान, अधिकारों से वंचित हम कलपते हैं। सड़क पर खूब चलते पैर के जूते-से घिसते हैं।। हमारी जिन्दगी के दिन, हमारी ग्लानि के दिन हैं!!

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं! न दाना एक मिलता है, खलाये पेट फिरते हैं। मुनाफाखोर की गोदाम के ताले न खुलते हैं।। विकल, बेहाल, भूखे हम तड़पते औ’ तरसते हैं। हमारे पेट का दाना हमें इनकार करते हैं।। हमारी जिन्दगी के दिन, हमारी भूख के दिन हैं!!

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं! नहीं मिलता कहीं कपड़ा, लँगोटी हम पहनते हैं। हमारी औरतों के तन उघारे ही झलकते हैं।। हजारों आदमी के शव कफन तक को तरसते हैं। बिना ओढ़े हुए चदरा, खुले मरघट को चलते हैं।। हमारी जिन्दगी के दिन, हमारी लाज के दिन हैं!!

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं! हमारे देश में अब भी, विदेशी घात करते हैं। बड़े राजे, महाराजे, हमें मोहताज करते हैं।। हमें इंसान के बदले, अधम सूकर समझते हैं। गले में डालकर रस्सी कुटिल कानून कसते हैं।। हमारी जिन्दगी के दिन, हमारी कैद के दिन हैं!!

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं! इरादा कर चुके हैं हम, प्रतिज्ञा आज करते हैं। हिमालय और सागर में, नया तूफान रचते हैं।। गुलामी को मसल देंगे न हत्यारों से डरते हैं। हमें आजाद जीना है इसी से आज मरते हैं।। हमारी जिन्दगी के दिन, हमारे होश के दिन हैं!!

जिन्दगी

देश की छाती दरकते देखता हूँ! थान खद्दर के लपेटे स्वार्थियों को, पेट-पूजा की कमाई में जुता मैं देखता हूँ! सत्य के जारज सुतों को, लंदनी गौरांग प्रभु की, लीक चलते देखता हूँ! डालरी साम्राज्यवादी मौत-घर में, आँख मूँदे डाँस करते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! मैं अहिंसा के निहत्थे हाथियों को, पीठ पर बम बोझ लादे देखता हूँ। देव कुल के किन्नरों को, मंत्रियों का साज साजे, देश की जन-शक्तियों का, खून पीते देखता हूँ, क्रांति गाते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! राजनीतिक धर्मराजों को जुएँ में, द्रोपदी को हारते मैं देखता हूँ! ज्ञान के सब सूरजों को, अर्थ के पैशाचिकों से, रोशनी को माँगते मैं देखता हूँ! योजनाओं के शिखंडी सूरमों को, तेग अपनी तोड़ते मैं देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! खाद्य मंत्री को हमेशा शूल बोते देखता हूँ भुखमरी को जन्म देते, वन-महोत्सव को मनाते देखता हूँ! लौह-नर के वृद्ध वपु से, दण्ड के दानव निकलते देखता हूँ! व्यक्ति की स्वाधीनता पर गाज गिरते देखता हूँ! देश के अभिमन्युयों को कैद होते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! मुक्त लहरों की प्रगति पर, जन-सुरक्षा के बहाने, रोक लगाते देखता हूँ! चीन की दीवार उठते देखता हूँ! क्राँतिकारी लेखनी को, जेल जाते देखता हूँ! लपलपाती आग के भी, ओंठ सिलते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! राष्ट्र-जल में कागजी, छवि-यान बहता देखता हूँ, तीर पर मल्लाह बैठे और हँसते देखता हूँ! योजनाओं के फरिश्तों को गगन से भूमि आते, और गोबर चोंथ पर सानंद बैठे, मौन-मन बंशी बजाते, गीत गाते, मृग मरीची कामिनी से प्यार करते देखता हूँ! शून्य शब्दों के हवाई फैर करते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! बूचड़ों के न्याय-घर में, लोकशाही के करोड़ों राम-सीता, मूक पशुओं की तरह बलिदान होते देखता हूँ! वीर तेलंगानवों पर मृत्यु के चाबुक चटकते देखता हूँ! क्रांति की कल्लोलिनी पर घात होते देखता हूँ! वीर माता के हृदय के शक्ति-पय को शून्य में रोते विलपते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! नामधारी त्यागियों को, मैं धुएँ के वस्त्र पहने, मृत्यु का घंटा बजाते देखता हूँ! स्वर्ण मुद्रा की चढ़ौती भेंट लेते, राजगुरुओं को, मुनाफाखोर को आशीष देते, सौ तरह के कमकरों को दुष्ट कह कर, शाप देते प्राण लेते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! कौंसिलों में कठपुतलियों को भटकते, राजनीतिक चाल चलते, रेत के कानून के रस्से बनाते देखता हूँ! वायुयानों की उड़ानों की तरह तकरीर करते, झूठ का लम्बा बड़ा इतिहास गढ़ते, गोखुरों से सिंधु भरते, देश-द्रोही रावणों को राम भजते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! नाश के वैतालिकों को संविधानी शासनालय को सभा में दंड की डौड़ी बजाते देखता हूँ! कंस की प्रतिमूर्तियों को, मुन्ड मालाएँ बनाते देखता हूँ! काल भैरव के सहोदर भाइयों को, रक्त की धारा बहाते देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! व्यास मुनि को धूप में रिक्शा चलाते, भीम, अर्जुन को गधे का बोझ ढोते देखता हूँ! सत्य के हरिचंद को अन्याय-घर में, झूठ की देते गवाही देखता हूँ! द्रोपदी को और शैव्या को, शची को, रूप की दूकान खोले, लाज को दो-दो टके में बेचते मैं देखता हूँ!!

देश की छाती दरकते देखता हूँ! मैं बहुत उत्तप्त होकर भीम के बल और अर्जुन की प्रतिज्ञा से ललक कर, क्रांतिकारी शक्ति का तूफान बन कर, शूरवीरों की शहादत का हथौड़ा हाथ लेकर, श्रृंखलाएँ तोड़ता हूँ जिन्दगी को मुक्त करता हूँ नरक से!!

(कविता संग्रह, “कहें केदार खरी खरी”” से)

मजदूर का जन्म

एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ ! हाथी सा बलवान, जहाजी हाथों वाला और हुआ ! सूरज-सा इन्सान, तरेरी आँखोंवाला और हुआ !! एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ! माता रही विचार, अँधेरा हरनेवाला और हुआ ! दादा रहे निहार, सबेरा करनेवाला और हुआ !! एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ ! जनता रही पुकार, सलामत लानेवाला और हुआ ! सुन ले री सरकार! कयामत ढानेवाला और हुआ !! एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ !

वह चिड़िया जो

वह चिड़िया जो- चोंच मार कर दूध-भरे जुंडी के दाने रुचि से, रस से खा लेती है वह छोटी संतोषी चिड़िया नीले पंखों वाली मैं हूँ मुझे अन्‍न से बहुत प्‍यार है।

वह चिड़िया जो- कंठ खोल कर बूढ़े वन-बाबा के खातिर रस उँडेल कर गा लेती है वह छोटी मुँह बोली चिड़िया नीले पंखों वाली मैं हूँ मुझे विजन से बहुत प्‍यार है।

वह चिड़िया जो- चोंच मार कर चढ़ी नदी का दिल टटोल कर जल का मोती ले जाती है वह छोटी गरबीली चिड़िया नीले पंखों वाली मैं हूँ मुझे नदी से बहुत प्‍यार है।

मात देना नहीं जानतीं 

घर की फुटन में पड़ी औरतें ज़िन्दगी काटती हैं मर्द की मौह्ब्बत में मिला काल का काला नमक चाटती हैं

जीती ज़रूर हैं जीना नहीं जानतीं; मात खातीं- मात देना नहीं जानतीं

और का और मेरा दिन

दिन है किसी और का सोना का हिरन, मेरा है भैंस की खाल का मरा दिन। यही कहता है वृद्ध रामदहिन यही कहती है उसकी धरैतिन, जब से चल बसा उनका लाड़ला।

बसंती हवा 

हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ

वही हाँ, वही जो युगों से गगन को बिना कष्ट-श्रम के सम्हाले हुए है हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ

वही हाँ, वही जो धरा की बसंती सुसंगीत मीठा गुंजाती फिरी हूँ हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ

वही हाँ, वही जो सभी प्राणियों को पिला प्रेम-आसन जिलाए हुई हूँ हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ

कसम रूप की है, कसम प्रेम की है कसम इस हृदय की, सुनो बात मेरी– अनोखी हवा हूँ बड़ी बावली हूँ

बड़ी मस्तमौला। न हीं कुछ फिकर है, बड़ी ही निडर हूँ। जिधर चाहती हूँ, उधर घूमती हूँ, मुसाफिर अजब हूँ।

न घर-बार मेरा, न उद्देश्य मेरा, न इच्छा किसी की, न आशा किसी की, न प्रेमी न दुश्मन, जिधर चाहती हूँ उधर घूमती हूँ। हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!

जहाँ से चली मैं जहाँ को गई मैं – शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन, हरे खेत, पोखर, झुलाती चली मैं झुमाती चली मैं! हवा हूँ, हवा मै बसंती हवा हूँ।

चढ़ी पेड़ महुआ, थपाथप मचाया; गिरी धम्म से फिर, चढ़ी आम ऊपर, उसे भी झकोरा, किया कान में ‘कू’, उतरकर भगी मैं, हरे खेत पहुँची – वहाँ, गेंहुँओं में लहर खूब मारी।

पहर दो पहर क्या, अनेकों पहर तक इसी में रही मैं! खड़ी देख अलसी लिए शीश कलसी, मुझे खूब सूझी – हिलाया-झुलाया गिरी पर न कलसी! इसी हार को पा, हिलाई न सरसों, झुलाई न सरसों, मज़ा आ गया तब, न सुधबुध रही कुछ, बसंती नवेली भरे गात में थी हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!

मुझे देखते ही अरहरी लजाई, मनाया-बनाया, न मानी, न मानी; उसे भी न छोड़ा- पथिक आ रहा था, उसी पर ढकेला; हँसी ज़ोर से मैं, हँसी सब दिशाएँ, हँसे लहलहाते हरे खेत सारे, हँसी चमचमाती भरी धूप प्यारी; बसंती हवा में हँसी सृष्टि सारी! हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!

कनबहरे

कोई नहीं सुनता झरी पत्तियों की झिरझिरी न पत्तियों के पिता पेड़ न पेड़ों के मूलाधार पहाड़ न आग का दौड़ता प्रकाश न समय का उड़ता शाश्वत विहंग न सिंधु का अतल जल-ज्वार सब हैं – सब एक दूसरे से अधिक कनबहरे, अपने आप में बंद, ठहरे।

वीरांगना

मैंने उसको जब-जब देखा लोहा देखा लोहे जैसा- तपते देखा- गलते देखा- ढलते देखा मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा।

नागार्जुन के बाँदा आने पर

यह बाँदा है। सूदख़ोर आढ़त वालों की इस नगरी में, जहाँ मार, काबर, कछार, मड़ुआ की फ़सलें, कृषकों के पौरुष से उपजा कन-कन सोना, लढ़ियों में लद-लद कर आ-आ कर, बीच हाट में बिक कर कोठों-गोदामों में, गहरी खोहों में खो जाता है जा-जा कर, और यहाँ पर रामपदारथ, रामनिहोरे, बेनी पंडित, बासुदेव, बल्देव, विधाता, चंदन, चतुरी और चतुर्भुज, गाँवों से आ-आ कर गहने गिरवी रखते, बढ़े ब्याज के मुँह में बर-बस बेबस घुसते, फिर भी घर का ख़र्च नहीं पूरा कर सकते, मोटा खाते, फटा पहनते, लस्टम-पस्टम जैसे-तैसे भरते-खपते, न्याय यहाँ पर अन्यायों पर विजय न पाता, सत्य सरल होकर कोरा असत्य रह जाता, न्यायालय की ड्योढ़ी पर दब कर मर जाता, यहाँ हमारे भावी राष्ट्र-विधाता, युग के बच्चे, विद्यालय में वाणी-विद्या-बुद्धि न पाते, विज्ञानी बनने से वंचित रह जाते, केवल मिट्टी में मिल जाते।

यह बाँदा है, और यहाँ पर मैं रहता हूँ, जीवन-यापन कठिनाई से ही करता हूँ, कभी काव्य की कई पंक्तियाँ, कभी आठ-दस बीस पंक्तियाँ, और कभी कविताएँ लिखकर, प्यासे मन की प्यास बुझा लेता हूँ रस से, शायद ही आता है कोई मित्र यहाँ पर, शायद ही आती हैं मेरे पास चिट्ठियाँ।

मेरे कवि-मित्रों ने मुझ पर कृपा न की है, इसीलिए रहता उदास हूँ, खोया-खोया, अपने दुख-दर्दों में डूबा, जन-साधारण की हालत से ऊबा-ऊबा, बाण-बिंधे पक्षी-सा घायल, जल से निकली हुई मीन-सा, विकल तड़पता, इसीलिए आतुर रहता हूँ, कभी-कभी तो कोई आए, छठे-छमाहे चार-पाँच दिन तो रह जाए, मेरे साथ बिताए, काव्य, कला, साहित्य-क्षेत्र की छटा दिखाए, और मुझे रस से भर जाए, मधुर बनाए, फिर जाए, जीता मुझको कर जाए।

आख़िर मैं भी तो मनुष्य हूँ, और मुझे भी कवि-मित्रों का साथ चाहिए, लालायित रहता हूँ मैं सबसे मिलने को, श्याम सलिल के श्वेत कमल-सा खिल उठने को।

सच मानो जब यहाँ निराला जी आए थे, कई साल हो गए, यहाँ कम रह पाए थे, उन्हें देख कर मुग्ध हुआ था, धन्य हुआ था, कविताओं का पाठ उन्हीं के मुख से सुनकर, गंधर्वों को भूल गया था, तानसेन को भूल गया था, सूरदास, तुलसी, कबीर को भूल गया था, ऐसी वाणी थी हिंदी के महाकृती की।

तब यह बाँदा काव्य-कला की पुरी बना था, और साल पर साल यहाँ मधुमास रहा था, बंबेश्वर के पत्थर भी बन गए हृदय थे, चूनरिया बन गई हवा थी, गौने वाली, और गगन का राजा सूरज दूल्हा बन कर, चूम रहा था प्रिय दुलहन को।

फिर दिन बीते, मधु-घट रीते, फिर पहले-सा यह नीरस हो गया नगर था, फिर पहले-सा मैं चिंतित था, फिर मेरा मन भी कुंठित था, फिर लालायित था मिलने को कवि-मित्रों से, फिर मैं उनकी बाट जोहता रहा निरंतर, जैसे खेतिहर बाट जोहता है बादल की, जैसे भारत बाट जोहता है सूरज की, किंतु न कोई आया, आने के वादे मित्रों के टूटे, कई वर्ष फिर बीते, रंग हुए सब फीके, और न कोई रही हृदय में आशा।

तभी बंधुवर शर्मा आए, महादेव साहा भी आए, और निराला-पर्व मनाया हम लोगों ने, मुंशी जी के पुस्तक-घर में, एक बार फिर मिला सुअवसर मधु पीने का, कविता का झरना बन कर झर-झर जीने का, लगातार घंटों, पहरों तक, एक साथ साँसें लेने का, एक साथ दिल की धड़कन से ध्वनि करने का, ऐसा लगा कि जैसे हम सब, एक प्राण हैं, एक देह हैं, एक गीत हैं, एक गूँज हैं इस विराट फैली धरती के, और हमी तो वाल्मीकि हैं, कालिदास हैं, तुलसी हैं, हिंदी कविता के हरिशचंद्र हैं, और निराला हमी लोग हैं, बंधु! आज भी वह दिन मुझको नहीं भूलता, उसकी स्मृति अब भी बेले-सी महक रही है, उस दिन का आनंद आज कालिदास का छंद बना मन मोह रहा है, मुक्त मोर बन श्याम बदरिया भरे हृदय में, दुपहरिया में, शाम-सबेरे नाच रहा है, रैन-अँधेरे में चंदनियाँ बाँह पसारे, हमको, सबको भेंट रहा है।

संभवतः उस दिन मेरा नव जन्म हुआ था, संभवतः उस दिन मुझको कविता ने चूमा, संभवतः उस दिन मैंने हिमगिरि को देखा, गंगा के कूलों की मिट्टी मैंने पाई, उस मिट्टी से उगती फ़सलें मैंने पाईं, और उसी के कारण अब बाँदा में जीवित रहता हूँ, और उसी के कारण अब तक कविता की रचना करता हूँ, और तुम्हारे लिए पसारे बाँह खड़ा हूँ, आओ साथी गले लगा लूँ, तुम्हें, तुम्हारी मिथिला की प्यारी धरती को, इसमें व्यापे विद्यापति को, और वहाँ की जनवाणी के छंद चूम लूँ, और वहाँ के गढ़-पोखर का पानी छू कर नैन जुड़ा लूँ, और वहाँ के दुखमोचन, मोहन माँझी को मित्र बना लूँ, और वहाँ के हर चावल को हाथों में ले हृदय लगा लूँ, और वहाँ की आबहवा से वह सुख पा लूँ जो नृत्यों में नाचा जा कर कभी न चुकता, जो आँखों में आँजा जा कर कभी न चुकता, जो ज्वाला में डाला जा कर कभी न जलता, जो रोटी में खाया जा कर कभी न कमता, जो गोली से मारा जा कर कभी न मरता, जो दिन दूना रात चौगुना व्यापक बनता, और वहाँ नदियों में बहता, नावों को ले आगे बढ़ता, और वहाँ फूलों में खिलता, बागों को सौरभ से भरता।

अहोभाग्य है जो तुम आए मुझसे मिलने, इस बाँदा में चार रोज़ के लिए ठहरने, अहोभाग्य है मेरा, मेरे घर वालों का, जिनको तुम स्वागत से हँसते देख रहे हो। अहोभाग्य है इस जीवन के इन कूलों का, जिनको तुम अपनी कविता से सींच रहे हो। अहोभाग्य हैं हम दोनों का, जिनको आजीवन जीना है काव्य-क्षेत्र में। अहोभाग्य है हम दोनों की इन आँखों का, जिनमें अनबुझ ज्योति जगी है अपने युग की। अहोभाग्य है दो जनकवियों के हृदयों का जिनकी धड़कन गरज रही है घन-गर्जन-सी।

अहोभाग्य है कठिनाई में पड़े हुए प्रत्येक व्यक्ति का, जिनका साहस-शौर्य न घटता। अहोभाग्य है स्वयं उगे इन सब पेड़ों का, जिनके द्रुम-दल झरते फिर-फिर नए निकलते। अहोभाग्य है हर छोटी चंचल चिड़िया का, जिनका नीड़ बिगड़ते-बनते देर न लगती। अहोभाग्य है बंबेश्वर की चौड़ी-चकली चट्टानों का, जिनको तुमने प्यार किया है, सहलाया है। अहोभाग्य है केन नदी के इस पानी का, जिसकी धारा बनी तुम्हारे स्वर की धारा। अहोभाग्य है बाँदा की इस कठिन भूमि का, जिसको तुमने चरण छुला कर जिला दिया है।

आज नदी बिलकुल उदास थी

आज नदी बिलकुल उदास थी। सोई थी अपने पानी में, उसके दर्पण पर- बादल का वस्त्र पडा था। मैंने उसको नहीं जगाया, दबे पांव घर वापस आया।

ओस की बूंद कहती है 

ओस-बूंद कहती है; लिख दूं नव-गुलाब पर मन की बात। कवि कहता है : मैं भी लिख दूं प्रिय शब्दों में मन की बात॥ ओस-बूंद लिख सकी नहीं कुछ नव-गुलाब हो गया मलीन। पर कवि ने लिख दिया ओस से नव-गुलाब पर काव्य नवीन॥

हम और सड़कें

सूर्यास्त मे समा गयीं सूर्योदय की सड़कें, जिन पर चलें हम तमाम दिन सिर और सीना ताने, महाकाश को भी वशवर्ती बनाने, भूमि का दायित्व उत्क्रांति से निभाने, और हम अब रात मे समा गये, स्वप्न की देख-रेख में सुबह की खोयी सड़कों का जी-जान से पता लगाने

मैना 

गुम्बज के ऊपर बैठी है, कौंसिल घर की मैना । सुंदर सुख की मधुर धूप है, सेंक रही है डैना ।।

तापस वेश नहीं है उसका, वह है अब महारानी । त्याग-तपस्या का फल पाकर, जी में बहुत अघानी ।।

कहता है केदार सुनो जी ! मैना है निर्द्वंद्व । सत्य-अहिंसा आदर्शों के, गाती है प्रिय छंद ।।

कंकरीला मैदान

कंकरीला मैदान ज्ञान की तरह जठर-जड़ लम्बा चौड़ा गत वैभव की विकल याद में- बडी दूर तक चला गया है गुमसुम खोया। जहाँ-तहाँ कुछ कुछ दूरी पर, उसके उँपर, पतले से पतले डंठल के नाजुक बिरवे थर-थर हिलते हुए हवा में खड़े हुए बेहद पीड़ित। हर बिरवे पर मुँदरी जैसा एक फूल है अनुपम, मनोहर, हर एसी मनहर मुंदरी को मीनों नें चंचल आँखों से नीले सागर के रेशम के रश्मि तार से, –हर पत्ती पर बड़े चाव से–बड़ी जतन से– अपने अपने प्रेमीजन को देने के खातिर काढ़ा था सदियों पहले। किंतु नहीं वे प्रेमी आये और मछलियाँ सूख गयी हैं–कंकड़ हैं अब। आह! जहाँ मीनों का घर था वहाँ बड़ा मैदान हो गया॥

लंदन में बिक आया नेता 

लंदन में बिक आया नेता, हाथ कटा कर आया । एटली-बेविन-अंग्रेज़ों में, खोया और बिलाया ।।

भारत-माँ का पूत-सिपाही, पर घर में भरमाया । अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद का, उसने डिनर उड़ाया ।।

अर्थनीति में राजनीति में, गहरा गोता खाया । जनवादी भारत का उसने, सब-कुछ वहाँ गवायाँ ।|

गोटवव

पुकार

ऐ इन्सानों! आँधी के झूले पर झूलो आग बबूला बन कर फूलो कुरबानी करने को झूमो लाल सवेरे का मूँह चूमो ऐ इन्सानों ओस न चाटो अपने हाथों पर्वत काटो पथ की नदियाँ खींच निकालो जीवन पीकर प्यास बुझालो रोटी तुमको राम न देगा वेद तुम्हारा काम न देगा जो रोटी का युद्ध करेगा वह रोटी को आप वरेगा!

पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा

इसी जन्म में, इस जीवन में, हमको तुमको मान मिलेगा। गीतों की खेती करने को, पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा।

क्लेश जहाँ है, फूल खिलेगा, हमको तुमको ज्ञान मिलेगा। फूलों की खेती करने को, पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा।

दीप बुझे हैं जिन आँखों के, उन आँखों को ज्ञान मिलेगा। विद्या की खेती करने को, पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा।

मैं कहता हूँ, फिर कहता हूँ, हमको तुमको प्राण मिलेगा। मोरों-सा नर्तन करने को, पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा।

एक खिले फूल से 

एक खिले फूल से झाड़ी के एक खिले फूल ने नीली पंखुरियों के एक खिले फूल ने आज मुझे काट लिया ओठ से, और मैं अचेत रहा धूप में

लिपट गयी जो धूल 

लिपट गयी जो धूल पांव से

वह गोरी है इसी गांव की

जिसे उठाया नहीं किसी ने

इस कुठांव से।

ऐसे जैसे किरण

ओस के मोती छू ले

तुम मुझको

चुंबन से छू लो

मैं रसमय हो जाऊँ!

तुम भी कुछ हो

तुम भी कुछ हो लेकिन जो हो, वह कलियों में रूप-गन्ध की लगी गांठ है जिसे उजाला धीरे धीरे खोल रहा है। यह जो नग दिये के नीचे चुप बैठा है, इसने मुझको काट लिया है, इस काटे का मंत्र तुम्हारे चुंबन में है, तुम चुंबन से मुझे जिला दो।

वह पठार जो जड़ बीहड़ था

कटते-कटते ध्वस्त हो गया, धूल हो गया, सिंचते-सिंचते, दूब हो गया, और दूब पर वन के मन के- रंग -रूप के, फूल खिल उठे, वन फूलों से गंध-गंध संसार हो गया।

समुद्र वह है

समुद्र वह है

जिसका धैर्य छूट गया है

दिककाल में रहे-रहे !

समुद्र वह है

जिसका मौन टूट गया है,

चोट पर चोट सहे-सहे !

प्रक्रति चित्र

जिसने सोने को खोदा, लोहा मोड़ा है जो रवि के रथ का घोड़ा है वह जन मारे नहीं मरेगा

मार्क्सवाद की रोशनी

 दोषी हाथ हाथ जो चट्टान को तोडे़ नहीं वह टूट जाये,

लोहे को मोड़े नहीं सौ तार को जोड़े नहीं वह टूट जाये।

पूंजीवादी व्यवस्था

हे मेरी तुम डंकमार संसार न बदला प्राणहीन पतझार न बदला बदला शासन, देश न बदला राजतंत्र का भेष न बदला, भाव बोध उन्मेष न बदला, हाड़-तोड़ भू भार न बदला कैसे जियें? यही है मसला नाचे कोैन बजाये तबला?

राजनीति

राजनीति नंगी औरत है कई साल से जो यूरुप में आलिंगन के अंधे भूखे कई शक्तिशाली गुंडों को देश-देश के जो स्वामी हैं जो महान सेनाएँ रखते जो अजेय अपने को कहते ऐसा पागल लड़वाती है आबादी में बम गिरते हैं; दल की दल निर्दोषी जनता गिनती में लाखों मरती है; नष्ट सभ्यता हो जाती है- कभी किसी के, कभी किसी के, गले झूलकर मुसकाती है। हार-जीत के इस किलोल से संधि नहीं होने देती है॥

रचनाकाल: ०७-०२-१९४६

घोड़े का दाना 

सेठ करोड़ीमल के घोड़े का नौकर है भूरा आरख।– बचई उसका जानी दुश्मन!

हाथ जोड़कर, पाँव पकड़कर, आँखों में आँसू झलकाकर, भूख-भूख से व्याकुल होकर, बदहवास लाचार हृदय से, खाने को घोड़े का दाना आध पाव ही बचई ने भूरा से माँगा।

लेकिन उसने बेचारे भूखे बचई को, नहीं दिया घोड़े का दाना; दुष्ट उसे धक्का ही देता गया घृणा से!

तब बचई भूरा से बोला : ‘पाँच सेर में आध पाव कम हो जाने से घोड़ा नहीं मरेगा भूखा; वैसे ही टमटम खींचेगा; वैसे ही सरपट भागेगा; आध पाव की कमी न मालिक भी जानेगा; पाँच सेर में आध पाव तो यों ही भूरा! आसानी से घट जाता है; कुछ धरती पर गिर जाता है; तौल-ताल में कुछ कमता है; कुछ घोड़ा ही, खाते-खाते,- इधर उधर छिटका देता है।

आध पाव में भूरा भैया! नहीं तुम्हारा स्वर्ग हरेगा नहीं तुम्हारा धर्म मिटेगा; धर्म नहीं दाने का भूखा!- स्वर्ग नहीं दाने का भूखा!- आध पाव मेरे खाने से कोई नहीं अकाल पड़ेगा।’

पर, भूरा ने, अंगारे सी आँख निकाले, गुस्से से मूँछें फटकारे, काले नोकीले काँटों से, बेचार बचई के कोमल दिल को छलनी छलनी कर ही डाला। जहर बूँकता फिर भी बोला : ‘नौ सौ है घोड़े का दाम!- तेरा धेला नहीं छदाम। जा, चल हट मर दूर यहाँ से।’

अपमानित अवहेलित होकर, बुरी तरह से जख्मी होकर, अब गरीब बचई ने बूझा : पूँजीवादी के गुलाम भी बड़े दुष्ट हैं;- मानव को तो दाना देते नहीं एक भी, घोड़े को दाना देते हैं पूरा; मृत्यु माँगते हैं मनुष्य की, पशु को जीवित रखकर!

रचनाकाल: १२-०४-१९४६

एका का बल 

डंका बजा गाँव के भीतर, सब चमार हो गए इकट्ठा। एक उठा बोला दहाड़कर : “हम पचास हैं, मगर हाथ सौ फौलादी हैं। सौ हाथों के एका का बल बहुत बड़ा है। हम पहाड़ को भी उखाड़कर रख सकते हैं। जमींदार यह अन्यायी है। कामकाज सब करवाता है, पर पैसे देता है छै ही। वह कहता है ‘बस इतना लो’, ‘काम करो, या गाँव छोड़ दो।’ पंचो! यह बेहद बेजा है! हाथ उठायो, सब जन गरजो : गाँव छोड़कर नहीं जायँगे यहीं रहे हैं, यहीं रहेंगें, और मजूरी पूरी लेंगे, बिना मजूरी पूरी पाए हवा हाथ से नहीं झलेंगें।” हाथ उठाये, फन फैलाये, सब जन गरजे। फैले फन की फुफकारों से जमींदार की लक्ष्मी रोयी!!

रचनाकाल: १२-०४-१९४६

कारण-करण

गेहूँ में गेरुआ लगा, घोंघी ने खा लिया चना, बिल्कुल बिगड़ा, खेल बना।

अब आफत से काम पड़ा, टूटा सुख से भरा घड़ा, दिल को धक्का लगा बड़ा।

जमींदार ने कहा करो, सब लगान अब अदा करो, वरना जिंदा आज मरो।

जोखू ने घर बेंच दिया रूपया और उधार लिया खंड-खंड हो गया हिया।

विधि से देखा नहीं गया, जोखू बाजी हार गया लकवा उसको मार गया।

रचनाकाल: १०-०८-१९४६

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