केदारनाथ पाण्डेय की रचनाएँ

मोती बरसा जाता

रिमझिम रिमझिम गगन मगन हो मोती बरसा जाता ।
शतदल के दल दल पर ढलकर
नयन नयन के तल में पलकर
बरस- बरस कर तरसे तन को हरित भरित कर जाता ।
हिलती डुलती लचक डालियाँ
बजा रही हैं मधुर तालियाँ
बून्दों की फुलझड़ियों में वह,गीत प्रीत का गाता ।
हृदय- हृदय में तरल प्यास है
प्रिय के आगम का हुलास है
नभ का नव अनुराग राग इस भूतल तल पर आता ।
शुभ्रवला का बादल दल में
ज्यों विद्युत्‍ नभ-नव-घन-तल में
चाव भरे चातक के चित में चोट जगाये जाता ।
चहल-पहल है महल-महल में
स्वर्ग आ मिला धरती-तल में
पल-पल में तरुतृण खग-मृग का रूप बदलता जाता ।
बुझी प्यास संचित धरती की
फली आस पल-पल मरती की
सुख दुःख में हंसते रहना यह इन्दु बताता ।
नभ हो उठा निहाल सजल हो
तुहिन बिन्दुमय ज्यों शतदल हो
शीतल सुरभि समीर चूमकर सिहर- सिहर तन जाता ।
झूमी अमराई मदमाती
केकी की कल- कल ध्वनि लाती
अन्तर-तर के तार- तार कीं बादल बरस भिंगोता ।
भींगी दुनिया भींगा वन- वन
भींग उठा भौंरों का गुँजन
कुंज- कुंज में कुसुम पुंज में मधुमय स्वर बन जाता ।

मैं प्रगति का गीत गाता जा रहा हूँ

प्रति चरण पर मैं प्रगति का गीत गाता जा रहा हूँ।
जा रहा हूँ मैं अकेला
शून्य पथ वीरान सारा
विघ्न की बदली मचलकर
है छिपाती लक्ष्य तारा
दूर मंज़िल है न जाने
क्यों स्वयं मुस्का रहा हूँ॥
जलधि सा गम्भीर हूँ मैं
चेतना मेरी निराली
प्रगति का संदेशवाहक
लौट आऊँगा न खाली
कंटकों के बीच सुमनों की
मधुरिमा पा रहा हूँ
तुम करो उपहास पर
मैं तो हूँ सदा का विजेता
तुम समय की मांग पर
सत्वर-नवल संसृति प्रजेता
आज तक की निज अगति पर
मैं स्वयं शरमा रहा हूँ॥
आज सहमी सी हवाएँ
मन्द-मन्थर चल रही हैं
दिव्य जीवन की सुनहली रश्मियाँ
भी बल रही हैं
मैं युगों पर निज प्रगति का
चिह्न देता आ रहा हूँ॥
अखिल वसुधा तो बहुत
पहले बिहँसते माप छोड़ा
अभी तो कल ही बड़ा
एवरेस्ट का अभिमान तोड़ा।
रुक अभी जा लक्ष्य पर निज
अतुल बल बतला रहा हूँ॥

नारी एक कला है 

कुशल तूलिका वाले कवि की नारी एक कला है।

फूलों से भी अधिक सुकोमल
नरम अधिक नवनी से,
प्रतिपल पिछल-पिछल उठने वाली
अति इन्दु मनी से,
नवल शक्ति भरने वाली वह कभी नहीं अबला है।

तनया-प्रिया-जननि के
अवगुण्ठन में रहने वाली,
सत्यं शिवम् सुन्दरम् सी
जीवन में बहने वाली,
विरह मिलन की धूप-छाँह में पलती शकुन्तला है।

है आधार-शिला सुन्दरता की
मधु प्रकृति-परी सी,
शुभ संसृति का बीज लिये,
मनु की उस तरुण-तरी सी,
तिमिरावृत्त जीवन के श्यामल पट पर चंद्र्कला है।

करुणा की प्रतिमा वियोग की
मूर्ति-मधुर-अलबेली
निज में ही परिपूर्ण प्रेममय
जग आधार अकेली,
सारी संसृति टिकी हुई ऐसी सुन्दर अचला है

अमृत-सिन्धु ,अमृतमयी
जग की कल्याणी वाणी।
अब भी चम-चम चमक रही हैं
तेरी चरण निशानी,
तेरे ही प्रकाश से जगमग दीप जला है।

नारी एक कला है॥

रजनी बैठ बिताऊँ 

इन तारों का हार पिरोकर रजनी बैठ बिताऊँ।
जीवन की इस चपल लहर में
नवलनिशा के नील पहर में

जाग जागकर सुमन सेज पर यों मोती बगराऊँ।
छवि मतवाली रजनी सूनी
होती टीस हृदय की दूनी

अमल कमल के कलित-क्रोण में कैसे भंवर भुलाऊँ।
ललित लता के कुंज पुंज में
अलि अलिनी की मधुर गुंज में

पीर भरे अपने अन्तर को कैसे हँस बहलाऊँ।
जीवन नौका तिरती जाती
उसपर बदली घिरती जाती

फूल फलों से कुन्तल दल को कैसे आज सजाऊँ।
सिहर समीर धीर सा आता
अलक-अलक करके सहलाता

रोते युग बीते सुहास कैसे अपने में पाऊँ।
कहते लोग योग वह तेरा
वैसे जैसे रैन बसेरा

जीवन पल में काट चलूँ यदि तुझे पास में पाऊँ।
तुम चन्दा मैं चपल चकोरी
तुम नटनागर मैं ब्रज छोरी

अपने मन मधुवन में कैसे वंशी-धुन सुन पाऊँ।
सूख रही फूलों की माला
होते तुम होता उजियाला

तिमिर भरे जीवन वन में कैसे प्रकाश बिखराऊँ।
जैसे हो वैसे तुम आओ
जीवन उपवन को हुलसाओ

तुमको अपने में औ अपने में तुमको मैं पाऊँ
इन तारों का हार पिरोकर रजनी बैठ बिताऊँ।

चली निराली चाँदनी

तारों के संग रास रचाती चली निराली चाँदनी॥
वन वन के तरु-तृण से हिलमिल
कोमल कलियों के संग खिल-खिल

जीवन वन में मोद लुटाती सिहर-सिहर कर चाँदनी॥
हँस-हँस उठती नभ में लाली
पात-पात में बजती ताली

नयन-नयन की अतुल प्यास को चली बुझाती चाँदनी॥
धूम मची है वंशी वट पै
उलझे नयन लली की लट पै

अन्तर के तारों को छूकर चली बजाती चाँदनी॥
शरमाई लतिका अब डोली
अलसाई निज घूंघट खोली

मानवती का मान मिटाकर चली सजाती चाँदनी॥
छवि का सघन-वितान तना है
नवल आज अपना सपना है

झूम-झूम मदमाती सी चली नवेली चाँदनी॥
गन्ध अन्ध आकुल तन मन में
कलित-ललित अलि के गुन्जन में

मधुर माधवी के मरन्द में रंग बिछाती चाँदनी॥
पीपल के नव हरित चपल-दल
उमग-उमग पड़ते हिल अविरल

डाल-डाल में बजी बाँसुरी चली जगाती चाँदनी॥
मिलती पादप-प्रिय से लतिका
सावन बनती प्रोषित-पतिका

रोम-रोम में प्रीतम की सुधि चली जगाती चाँदनी॥
अरी चाँदनी!चंदन ले लो
अपने चन्दा के संग खेलो

सुन यह बैन,उतर कर भूपर गले लगाती चाँदनी॥
तारों के संग रास रचाती चली निराली चाँदनी

सम्पादक की वाणी 

अँग्रेज़ी सभ्यता रीति को दूर भगाने वाली
जन-जन को झकझोर ज़ोर से रोज़ जगाने वाली

स्वयं बनी मार्जनी स्वरूपा ‘सम्पादक की वाणी’
भारत और भारती की जाग्रत वाणी कल्याणी

अपनी श्वेत प्रभा से, भाषा से, नवराष्ट्र विधात्री
सम्पादन की शुचि-रुचि से जन-जन की प्राण प्रदात्री

मनुज-मनुज को यह प्रदीप्त देवत्व प्रदान करेगी
जीवन में यज्ञीय-प्रतिष्ठा पद सम्मान वरेगी

सम्पादक की वाणी! देवि! यह अभिनन्दन है मेरा
शाक्त-शक्ति जाग्रत कर दो, तम हर दो, हँसे सवेरा

उछहल चलल कोईलिया वन में 

उछहल चलल कोईलिया वन में डाल-डाल कुहुकेला।
चलल मोजरिया बगिया हुलसल रस झर-झर बरसेला।

जागल मन में सुतल पिरितिया जिय में जोति जरेला।
पात-पात पल-पल में बउराइल जिनगी जागि हँसेला।

तब तन-मन धीरज न माने जब पछुआ लहकेला।
गाँव-गाँव में डगर-डगर में सजल रूप के मेला।

हिले-मिले के मिलल सनेसा गली गली ठहकेला।
घूँघट खुलल कलिन के भँवरन के मधु बीन बजेला।

सरसों तीसी दगमग होके चुनरी खूब रँगेला।
सिहरल अंग पपीहरा पिहिकल हिय में हूक उठेला।

हँसल गुलाब फँसल रंग में मन उमगि टीस टमकेला।
चमक दमक कुछ और हो गइल जग जगमग हुलसेला।

मंगल गीत चलल दुनियाँ में चित सबकर चहकेला।
तन मन बदलि गइल तिरिया के अंग अंग कसकेला।

अंगिया भइल सकेत तिरियवा के तब मन बहकेला।
हँसी-खुशी सब एक ओर बा एक ओर कलपेला।

ए बसन्त!हम कइसे हुलसीं भूखे जीव डहकेला।
उछहल चलल कोइलिया बन में डाल-डाल कुहुकेला।

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