केशव. की रचनाएँ

प्रेम (सात कविताएं)

 (एक)

तुम हो
मैं हूं
प्रेम है

तुम नहीं हो
मैं भी नहीं
तो भी है प्रेम
जीवित हैं
हम
सिर्फ प्रेम में
मृत
प्रेम की स्मृति में

(दो)

प्रेम

खोजता हमें
प्रेम को
हम नहीं
फिर रहता हममें
जैसे
मछ्ली का घर
पानी
पानी रहता है
पानी
लेकिन हम
मछली
रेत पर

(तीन)

प्रेम ने दी
दस्तक
हम ही रहे
बेखबर
गुज़र गया जैसे कोई
अपना
पता बता कर

(चार)

खत लिखकर भी
रह गया
दराज में
बोलकर भी चुप
रह गया हो
जैसे कोई
आने को कह्कर भी
लौट गया हो
बीच रास्ते से
जैसे
डाल से
अलग होकर भी
हवा में
अटका रह गया हो
पत्ता कोई

(पांच्)

हादसा नहीं
खबर भी नहीं
अखबार के किसी
कोने में चस्पां
एक चुप्पी है
धीरे-धीरे
घटित होती
आत्मा के झुट्पुटे में
खोलती खुद को
तह-दर-तह
फिर छा लेती
पेड़ को जैसे

(छह)

भीड़ की
रेलमपेल में
खो गया है
आजकल
ढूंढना मुश्किल

भीड़ के छंटने तक
रह जाएगा

कितना शायद
समय की हवा में
उड़ते
एक पीले पत्ते
जितना

(सात)

ठहरे हुए जल में
एक पत्ता गिरा
डूबा
डूबता ही चला गया
जल मय होने तक

खुशी (कविता) 

माँ बाप की इच्छा थी
कि मैं
अपनी ख़ुशी से ज़्यादा
जीऊं उनकी ख़ुशी के लिये
जिनके दु:ख में
शामिल नहीं रहता
एक तिनका तक
अपने जीवन को भरूं
जहां-जहां ख़ाली रह गए थे वे
चलूं उस रास्ते पर
जिस पर चलना
उनका सपना था
वे अक्सर कहते रहे
के मैं
अपनी आवाज़ का इस्तेमाल
दूसरों को डराने के लिये नहीं
खुद को हर
भय से मुक्त करने के लिये करूं
जब भी रहने के लिये बनाऊं
घर
तो हर दीवार में
ज़रूर रखूं एक
खिड़की
पहला कौर
मुंह में डालने से पहले
स्मरण करूं जरूर
कि भूख़ होती है
कितनी आक्रामक
उनकी इच्छा थी
समयातीत
लेकिन
म्रेरे
समय का
बैकुण्ठ
कुछ और ही

नींद

ओ मितवा
जब रात उतरती है
आसमान से
नहीं उतरता कोई
तारा नींद में

रात भर
उड़ती रहती है
एक काली तितली
नींद के जंगल में
अपने लिये
किसी सुर्ख़ गुलाब की
तलाश में
ओ मितवा!
नींद के पास से
क्यों खो गया है पता
उस घर का
जिसमें खिड़्कियां थीं
रोशनदान थे
और थी शिशुवत नींद भी
अब खंडहर है
स्मृतियों का
ठहरा हुआ
समय से बाहर
पत्थर की तरह
ठंडे और सख़्त अंधेरे में

ओ मितवा!
समय के पाताल में
भोग रही है
नींद
अपने हिस्से का नर्क।

एक सूनी यात्रा (कविता) 

मैं तो सिर्फ यहां के बारे में जानता हूँ
जहाँ होता नहीं
किसी को किसी से प्यार
केवल चलते हैं पाँव
एक दीवार से दूसरी दीवार तक

मैं कहीं और की बात क्यों करूँ
यहां जो होता है भ्रम का विस्तार
वृक्श के नीचे लेटे-लेटे
फल टपकने का रहता है इंतजार
दिन गुज़र जाते हैं
अकेली चिड़िया की तरह सुरंग से

पहियों के नीचे
दब जाता है आकाश

लोग पीते रहते हैं चाय
बदलते रहते लिबास

दफ्तरनुमा घरों में
काले साँप की तरह
रेंगता रहता है अकेलापन
और धनुष की डोरी की मानिंद
खिंचे रहते हैं लोग
मैं दबे पाँव
निकल पड़ता हूँ
एक सूनी यात्रा पर
जहाँ दिन चढ़ते ही
गहराने लगता है झींगुरों का शोर
कागजों के ढेर पर बैठा
ऊँघता है देश.

फॉल

वक़्त गुज़र जाने पर अब
उम्र के खंडहरों पर बैठ
देखते हो
सुदूर टिमटिमाती हुई रोशनियों जैसा
अतीत

जलते हुए जंगल-सा वर्तमान
हर पल रहता है संग
जिस ओर भी बदलो करवट
हर द्वार के सामने फ़ूटती है
एक सूनी अकेली पगडंडी
और हर खिड़की खुलती है
गहन अंधकार में
जीने की तैयारी के लिये
यह समय
रह गया है कितना छोटा और अर्थहीन
बाकी है सिर्फ अभिनय
या फिर अकेलेपन का
स्वीकार
जिसे भी चाहो अपना लो
झूठ और सच का निर्ण
अब भी कर लो
नहीं तो सारी की सारी यात्रा
एक बिगड़े हुए ज़ख़्म -सी लगेगी
गंधाने
आँखों में सुलगते रहेंगे स्वप्न
और ज़िन्दगी के लाक्षागृह में
किसी खंडित मूर्ति-से
पड़े रह जाओगे
इतिहास होने का सुख भी
दलदल में फंसी चिड़िया को तरह
महज़ ज़िन्दा रहने के एक
व्यर्थ संघर्ष में तब्दील हो जायेगा

किससे कहोगे
ज़िन्दगी के हाथों से फिसल जाने की
कहानी
जबकि अपने ही प्रयत्न
रह जाएंगे
सिसिफस की
अंतहीन अर्थहीनता का बोध
यद्यपि ढ्अलान पर से उतरने में भी
ढूँढी जा सकती है
एक गति
एक लय

मुक्ति कहाँ है पीठ् पर लदी हुई
इस अर्थहीनता से
सिर्फ एक राह है ‘अगर है तो’
बिछी हुई सामने
और है उस पर चलते जाना
बिना उम्मीद
बिना किसी आस्था के भी

सच दोस्त
पुल पर से किसी को गिरते देख
अगर देख सके हो तुम भी
अपना गिरना
तो ज़िन्दा रहने के लिए
काफी है इतना ही आधार
मौत की प्रतीक्षा क्यों करते हो
इतनी बेसब्री से
मौत कोई अंत नहीं
किसी भी सिलसिले का

यात्रा है यह
अंतहीन रास्तों की
जो देख सके उसके लिए
गूँगे हैं सभी पल
कंकड़ों की तरह बिखरे हुए
दूर तक

अंत नहीं होता पलों का
होता है उसका
जो वर्तमान को
अपनी बेपेंदी जेबों में रखे
अतीत को
चश्मे की तरह आँखों पर चढ़ाए
भविष्य झाँकता रहता है ।

नियति

कहीं कोई अर्थ नहीं। न कहीं कोई दिशा
लौटकर सब ओर से बैठा है अपने पास
खुद से सच कहते हुए छूट जाता हूँ जहाँ
मिलते हैं सब वहीं । पहचान होती है वहीं रिश्तों की
मेरी। और वहीं होता हूँ सबका मैं

कैसा दुखद होगा ऐ नियति के लिए लड़ना
उस स्थिति में पहुँचकर अर्थ वहाँ मिलते हैं
अपने से झूठ बोलो जहाँ दुनिया को दो
एक नकाब और प्रतीक्षा करते रहो
दुनियाँ के नमक में अपने गलने की

इस जंगल के शोर में खोजते रहो कोई
सूना कोना जहाँ अपने से किया जा रहा सकता ह्ऐ
साक्षात्कार दुनिय्आ की भटकन से मिल
सकती ह्ऐ मुक्ति पर क्या है संभव उस कोने
की उपलब्धि जबकि अर्थ सारे झूठ के
किले में हों नज़रबंद और आप खड़े हों
कगार पर कभी देखें आगे कभी पीछे

जन्म लेता है भीतर के संसार सोचता
हूँ भर गया सूनपान तभी भीतर के
संसार में छिड़ जाता है शीतयुद्ध और उस
स्थिति में पहुंचकर बिना प्रयास ही सब
टूट जाता है फिर पता नहीं चलता कि
कितना छूट गया है बीनने में उन टुकड़ों को
उन्हें एक सिलसिला दे सामने रखकर देखने में

मुझे पता है वह जो छूट गया सब-कुछ
था वही जो मिला वह तो मात्र अवशेष
हैं उसके पर मैं धीरे-धीरे समझौता
कर लेता हूँ इस स्थिति से और इसी के
सब कुछ होने का भ्रम अपने भीतर बो
लेता हूँ खुद को सच प्रमाणित करने के
लिये कर लेता हूँ तैयार कई एक गवाह
अचानक भीड़ में से कोई फैंकता है
मुझपर पत्थर चौक़कर देखता हूँ खड़ा
हूँ कगार पर
तब मैं बिना सोचे भागने लगता हूँ पीछे
की ओर बेतहाशा तपती दुपहरों में
किसी छाया के टुकड़े की तलाश में
अर्थ सारे काँतों की तरह उग आते हैं मेरी
देह पर और दिशा बन जाती है हर वह
राह जिस पर मैं भागता जाता हूँ उस
स्थिति से बचने के लिए चारों ओर उग
आये भ्रम के जालों से मुक्त होने के लिए
तब लगता ज़िन्दगी दौड़ है यथार्थ से
भ्रम तक फिर भ्रम तोड़कर एक खालीपन
में आ गिरना और खोजते रहना खुद को
उस खालीपन में जो नियति है

एक अश्लील कविता

वे आते हैं हाँफते हुए
कछुए की चाल
लौट जाते हैं
अपनी घरू पत्नियों के पास
मेरे मकान की एकमात्र खिड़की पर::पत्थर फैंकने
मैं उन्हें कुछ नहीं कहती
मुझे पता है
लौटकर फिर वेआयेंगे मेरे पासऔर मेरे स्तनों से लटक
नाटकीय ढंग से
करेंगे अपनी पत्नियों की
बेवफाई का ज़िक्र
कितने बौने हैं वे सब
मेरे माँस मेंकुछ इंच धँस कर
उनका सब कुछ पिघल जाता है
मोम की तरहतब न होते हैं वे
न अपने
सपना होने हैं एक ऐसा
जिसका उन्हें
न शुरू मालूम होता है
न अंत

वे उस अंधेरे को
बार-बार सूँघते
टटोलते हैं
जो उन्होंने बुन रखा है:: म्रेरे गिर्द
अपनी क्रुद्ध आवाज़ों से
मुझे काँच के बुत की तरह
अपने अन्दर सजाते
तोड़ते
बनाते हैं
मैने उनसे दिया है
अपना निजत्व
अपनी सार्थकता
अपने सभी गहरे अर्थ
और व्ए मुझसे लेती हैं
कुचले हुए साँप का
अहं

आत्म प्रवंचना 

जीने की कोशिश में
आदमी कभी नहीं मरामरा है आदमी हर-रोज़
कछुए की तरह::ख़ुद से
छिपते-छिपते
या अखबारों,पोस्टरों पर
किसी टेबल न्यूज़ की भाँति
छपते-छपते
या फोन परदेते हुए अपरिचितों को अपना
परिचय
अपनी टाँगों पर चढ़कर
दिन-भर
दुमकटे कुत्ते की मानिंद भटकना
और फिर रात को
पत्नि,प्रेमिका या वेश्या की जाँघों बीच
पिस्टन-समान धँसकरआज़ादी ढूँढना
और कुछ न मिलने पर
बजाये अपने बिस्तर बदलना
क्या इस तरह बचा या आज़ाद
हुआ जा सकता है
अकेलेपन की नागफाँस से
पिछले दिन की परछाईंयों
अगले दिन की मृगतृष्णाओं से
अकेलेपन को
तितलियों के पंखों से मढ़कर
गालियाँ देकर स्त्रियों को
झाड़कर सिगरेट की तरह
अपनी परछाईं को
बचाते रहोगे कब-तक खुद को
करते रहोगे कब तक अपने आपसे
बलात्कार
और बनते रहोगे दूसरेओं के लिए
लाक्षागृह
पौंछते रहोगे समय की रेत से
पदचिन्ह

बूढ़ा होना
इतिहास है एक
जो चूसता रहता है
जोंक की भांति
धीरे-धीरे
ज़िन्दती को
फिर छिपाने के लिए अपनी नपुंसकता को
क्यों लेते हो आड़ उस विश्वास की
जो तुम्हारी परछाईं की तरह
तुम्हारे साथ कभी नहीं रहा
तुम यह क्यों नहीं जान लेते
कि आज तक तुम बिना परछाईं ही
चलते रहे होएक सुबह उठकर
तुम्हें क्यों यह लगता है कि
चली गई है अचानक वह तुम्हें छोड़कर
क्या तुम नहीं खुद चले गये थे
अपने को छोड़
इश्तहारों,अखबारों में छपने
घुमक्कड़ आइने में खुद को नंगा देख
तनिक मुस्कान खींच
एक और अँध्रेरे को सूँघने

आदमी रोज़-रोज़

वह जिस रास्ते से दफ़्तर जाता है उसी से
बाज़ार मंदिर नदी किनारे यहाँ तक कि
प्रेमिका के घर भी किये हुए को कर
नज़रअंदाज़ जो है ही नहीं उसके लिए
जूझ रहा है लगातार
यह मौत जो रोज़-रोज़ आती है कोई
चिन्ह नहीं छोड़ जाती उसकी सफेद
कमीज़ पर न उसकी आँखों की को
अंधेरी गलियों में रोशनी की कोई किरण
हासिल न होने पर कुछ गले में फँदा
डालने को खुद को देता है धमकी
पर ऐसे वक्त में सड़क पर देखी हुई
छातियों के सिवाय कुछ नहीं होता उसके
आस-पास या उसका मन होता है कि
पत्नि से अपने फटे हुए कोट का करे
ज़िक्र या एक चक्कर में देख आए
सिनेमा घरों के पोस्टर
दिन-भर वह भागती सड़कों के पीछे
भागता रहा पर सड़कें निकल गईं
उसके हाथ से और चीज़ें जिनके बारे
में उसने कितनी बार बदले फैसले
जो भी शब्द होठों पर आए उनका
खुलकर प्रयोग क्या अपनी हालत
को और भी दयनीय बनाने की कोशिश
में फँसा अंत में उधार की बीड़ी
सुलगा एक अँधेरी गली में हो
गया दाखिल उसको रोकना अब
नामुमकिन है
आप परेशान न हों
न झूठ बोले अपने लिए या उसके लिए
वह अब नहीं मिलेगा कहीं भी वह
अपने रास्ते पर चलने का हो गया हो
अभ्यस्त

कविताएँ

कविताएँ मुस्कुरा
पौंछती हैं
उदासी का निःशब्द गहन
पककर फूटे घाव-सा रिसता
अन्तरालक्षणों की बंद पलकें
खुलती हैं
ज्यों मुस्काने फूल की:अधमुँदी दुनिया में

कभी-कभी बोलती हैअजनबी स्वरों में
अँधे गायकों के साथ
कभी बतियाती हैं
अंतरंग भाषा में
रोज़मर्रा ज़िन्दगी से
अपने न चाहने वालों के सामने
फैंकती है
तुर्प चालें
और चाहने का ढोंग रचने वालों को
उखाड़ फैंकती है आमूल
गीली मिट्टी से उख़ड़े पौधे की तरह
चाहने वालों को
ले उड़ती हैं
आकाश यात्रा पर
समुद्र मंथन
के बादहलाहल तक पीने के लिए
कविताएँ
मुस्कुराती रहती हैं।
गर्भ मेंपीड़ा का अभिमाम लिये

लम्बी कैद 

सुनो
मुझे यह कौन से गुनाहों की
दी जा रही है सज़ा
झूठे गुम्बदों का रेशमी जाल
मेरे गिर्द बुनकर
मैं एक साधारण आदमी’
रोज़ कमाकर खाने वाला
क्यों पा रहा हूँ
खुद को
एक दलदल से घिरा हुआ
मैंबे कब देखा है
कल उगने वाले सूरज को
स्वप्न में
मेरी नींद तो दुकानदार
अपने वही खाते में
बन्द कर ले गया है
चल रहा है
एक काँटेदार तार का सहारा लिये
निरंतर सिकुड़ते जाते रास्ते पर
भविष्य के नाम पर मेरे हाथों में
रह गया है सिर्फ
अपने बच्चे का टूटा हुआ खिलौना
मेरे सामने ही लगाकर
मेरे घर को आग
राख और गर्म लोहा मेरे
कंधों पर ही ढोया जाता है
और मुआवज़े के काग़ज़ों पर
मेरे दस्तख़त लेकर
वहाँ
खिलौने बनाने का कारखाना
लगा दिया जाता है
‘आज की ताज़ा खबर
आज की ताज़ा ख़बर,जैसा कोई वाक्य
निकलता है
मेरी अंतड़ियाँ निचोड़ता हुआ
धीरे-धीरे
मेरी आँखों के सामने
छाने लगा अँधकार
सूरज उस वक्त
लम्बी कैद काट रहे किसी
कैदी की आँखों-साटँगा होता है
पश्चिम की खिड़की में

बहरी भीड़

आओ, आओ
मैं तुम्हारे गीत
तुम्हें सुनाता हूँ
बात तुम्हारी
तुम्हारी ही भाषा में
फुसफुसाता हूँ तुम्हारे कान में
इकट्ठे होकर मेरे गिर्द
एक बहुत बड़े काने से
सुनते हो
तालियाँ बजाकर
गिनते हो
इस तरह निकलते हो
अपने बिल से
काले झंडे लेकर
और फिर उतने ही पत्थर
गिनकर
फैंकते हो मुझपर
अपनी चूहेदानियों से
या ईश्वर के कंधों पर बैठकर

मेरे लिए यह नहीं कोई नई बात
बार-बार अपना फन उठा
खुद को डसते हो
क्योंकि तुम अपने से अलग हो
खुद को खाली हाथों से भरते हुए
मैं गुज़रता रहता हूँ
सुरंगों से
चढ़ता रहता हूँ
पहाड़
पर तुम घर की छत पर ही
चाभी भरे कछुए की तरह
चलते रहते हो
अपनी ही आवाज़ को
न पहचानते हुए

खालीपन 

हम ठूँठ-से
गड़े हैं गहरे
अपने खालीपन में
लावारिस कई आवाज़ें
घूमती हैं भीतर हमारे
और हम अपग-अलग आवाज़ों में
भौंकते हैं
अलग-अलग दिशाओं की ओर मुँह किये
इस तरह
खाली आँख, खाली हाथ
खाली आत्मा
लिए-लिए फिरते हैं हम

या फिर काँच के बहुरंगी टुकड़ों से
बार-बार भरते हैं
खालीपन
और एक-एक टुकड़ा
आँखों पर चढ़ा
देखते हैं
चलते दृश्य
पर दृश्य पड़ा रहता है वहीं का वहीं
बँधी हुई भारी गाँठ-सा
साथ ही भीतर हमारे
कई रंग एक साथ
लगते हैं जलने-बुझने

अनुभवों की पटरी पर
लेटे हुए हम
खाली होते रहते निरंतर
हर बार आती है ट्रेन
और हमें कुचल
चली जाती है
पर भीतर सोया यात्री
जागता नहीं कभी

बहस के बीच 

जब कहने के लिए कुछ नहीं बचा
उनके पास
तो वे सूखे स्वर में एक साथ बोले
‘हम गिरा सकते हैं तुम्हें
क्योंकि तुम एक ऐसे घने वृक्ष हो
कुछ नहीं उग सकता
जिसके नीचे
सिवा सूखी घास के’
तब लगा मुझे
ये सब अब भाग रहे हैं
बौखलाये चूहों की तरह
टूटे काँच पर

बंदर,बिल्लियों के झगड़े में
भला क्या बोल सकता हूँ मैं
जबकि ये सब
उतर आये हैं
बुद्धि के बलात्कार पर
पर मेरे अंदर
एक चाकू
बहुत तेज़ी से चलने लगा
खून को चीरता हुआ
अब-जब मैने
बता दिया उन्हें
सच उनका
तो वे एक साथ सूरज को
देने लगे गालियाँ
उनका ख़्याल है
कि इस तरह मिलकर वे
छिपा सकते हैं सूरज को
हथेलियों की ओट में
मुझे फैंक सकते हैं
मुझसे अलग काटकर
अपने कुंठित
जंग लगे हथियारों से
क्योंकि वे
एक लम्बी रस्सी से
खूँटे पर बँधे हुये हैं
मेममे की तरह

अपरिहार्य 

मुझसे कहा गया है अक्सर कि ज़िन्दगी में
चलता है सब-कुछ
मैं इस चलने में साफ
साफ देख रहा हूँ अपनी संवेदना की मौत
और सारे के सारे रासतों पर उगते झाड-झंखाड़

क्यों मुझे यह सिखाया जा रहा है कि आदमी
जी सकता है अगर तो बस अपने से अलग
रहकर और अपने से जुड़ने की हर कोशिश
कदम है एक आत्महत्या की ओर

क्या अपने पर हमारी आस्था इतनी छोटी
हो गई है बार-बार हमें सुरक्षा के लिये
खंडित मूर्तियों के सामने आँखें मूँदकर कुछ
रटी-रटाई घिसी-पिटी प्रार्थनाएँ यंत्रवत
दोहरानी होती हैं और उनसे प्राप्त आस्था
को विज्ञापन की तरह माथे पर चिपकाए
गुज़रना होता है गलियों बाज़ारों में-से

मुझे भी यह आस्था सलीब की तरह बहन
करनी पड़ रही ह्ऐ क्योंकि घुमाव के सभी
अधिकार बड़े लोगों की लम्बी जेबों में
इतिहास के पृष्ठ रंगने के लिये पड़ॆ हैं

मेरे हाथों में हर-रोज़ धर दिया जाता है
एक न एक नशा नींद से जब मैं जागता
हूँ तब तक फैल चुका होता है चारों ओर
अंधकार या काले खून के अनगिनत
धब्बे रौशनियों की जगह

दफ्तर से लौटते हुए

उसे झट से अंतिम बार चूमकर
खाली कर दिया मुझे

मुझे सुनाई दे रही थी
द्वार के करीब होती
पदचाप
कोई दहलीज़ के उस पार
ठिठका
हल्के नीले पर्दे पर
एक मुट्ठी किंचित झुकी
खुली
और गहरे नीले उजास में सरकते
पीले साँप के समान
रेंगीं उंगलियाँ
मैं एक झटके से
कंधे पर कोट टाँग
पिछले दरवाज़े से
निकल आया बाहर

आसमान पहले ही की तरह
लटका था ऊबड़-खाबड़
जैसे बकरे का कटा हुआ सर
किसी आवारा औरत की तरह
गली करने लगी थी
चहलकदमी
हाथों में जामुनी रंग के फूल लिये लोग
जिनकी तंग सुरंग-सी आँखें
उलीचने को थीं तैयार
दिन भर की नसों में दौड़ती
ऊब
बाँस की झिड़कियाँ
और सावधान कोशिश से बचाया
अपना एक अंश
उनके चेहरे पर बैठा साँप
धीरे-धीरे खोल रहा था

अपनी गंजलक
आपस में टकराते हुए
पतझर की हवा में टकराते
पत्तों की मानिंद
आ-जा रहे थे
डालते हुए एक दूसरे पर
चोर दृष्टियाँ
शब्द तैर रहे थे लापरवाह
गली में फैल रहे उस
बैंगनी अंधेरे में

पहुँचना चाहते थे सभी
एक कतार में जलती-बुझती
उन खिड़कियों के अन्दर
पहुँचकर
लौटना चाहते थे फौरन
खाली चैम्बर लिये

मेरे शरीर को नहीं मिल सकता था
चारों ओर जंगल-सी फैली
उस भीड में
क्योंकि कहीं भी नहीं थे
ज़िन्दगी के चिन्ह
मैं अकेला छूट गया था जैसे
बस स्टाप पर अंतिम बस
मुझे नहीं पहुँचना था कहीं भी

खुले में आकर
भरपूर कश खींच
उगल देता हूँ घुएं का अम्बार
अचानक एक ख्याल
मेरे दिमाग में
जुगनू की तरह जलकर बुझ जाता है:
कहाँ होगा इस सिलसिरे का अन्त
जो कहीं से नहीं होता शुरू

अलगाव.

जब-से उड़ने लगा है जहाज़
उड़ गये हैं पँछी
किसी अनजानी दिशा में

जब भी होता है
इंजन का शोर
बरना पड़ा रहता ह्अइ आसमान
ठंडे इस्पात के टुकड़े-सा
और हर दृष्य
किसी दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी-सा

यूँ तो सूरज भी उगता है
पर दिन भर कुर्सी पर बैठा
करता रहता है
फाईलों पर हस्ताक्षर
और साँझ को झुर्रियों भरा
चेहरा लिये

आ बैठती ह्अइं पत्नी के माथे की सलवटों में

साँझ बहुत देर तक
किसी धुँधली इबारत-सी
खड़ी रहती है
दिन के कटघरे में
फिर ताँबे के काले पड़ गये
सिक्के जैसी
चलने से पहले ही
किसी दुकानदार के गल्ले में
गर्क हो जाती हैं

रात भी होती है
जो असल में ही सच होती है
सबके लिये
जिसमें परछाईंयाँ रात गये तक
करती रहती हैं एक-दूसरे का पीछा
जैसे भटके हुए चमग़ादड़

बदलते रहते दृष्य
चलते-रहते चित्र
आदमी पाँचवे टायर-सा
पड़ा रहता है
फिर से अपनी बारी की प्रतीक्षा में।

कोई किसी के साथ नहीं 

कोई नहीं
कोई नहीं करता इंतज़ार
सड़क चलती रहती लगातार
अपनी ही गति में गुम
मुझे नहीं जाना है कहीं

पीली धुएं पर उतरती इस शाम
एक लौंपपोस्ट के नीचे खड़ा हूँ मैं
सामने लुढ़कती जा रही हैं
रोशनियाँ
जैसे ढलान से लुढ़कते हों पत्त्थर

खिडकियों के काँच पर
इक्का दुक्का सलवटों भरी
थकी छायाएँ
लगी हैं उभरने
कितनी अकेली
कितनी दूर
कोई नहीं है किसी के साथ

शब्द लंगड़ाते हुए
आ-जा रहे हैं
रेडियो पर मुड़े-तुड़े काग़ज़-सी
बजने वाली धुनें
गिरने लगी है मेरे पास आ-आकर
व्यस्तता किसी विज्ञापन-सी
चिपकी है हर चेहरे पर

सबके हाथ हैं भरे हुए
पर आँखें सूनी सड़क-सी
अगले मोड़ पर टँगी हैं

चल रही है सड़क
अकेली
बेलौस
धड़कती है पदचापें उसके सीने में
अलग-अलग हैं सब
सबकी अपनी-अपनी धुन
कोई नहीं है किसी के साथ

और मैं खड़ा हूँ
कभी उनको
कभी आसमान को ताकता हुआ
जिसे कहीं नहीं जाना है
इन सबके साथ

मृत कमरा

कमरा सुन्न पड़ा है
रीढ-अ की हड्डी टूट गई हो जैसे
खिड़कियाँ दरवाज़े भिंचे हैं
मैगनट से जुड़े लोहे की तरह
ऊपर छत लकड़ी की है
जिस पर चिपकी है एक
अधमरी छिपकली
मुँह में छटपटाती है जिसके
एक तितली
नीचे ठंडा काले सीमेंट का फर्श है
मरे हुए गिद्ध सा
डैने फैलाए
खामोश पड़ा है
धूल सना प्यानो
दीवारें पत्थरों की
जिन पर टँगे हैं स्तब्ध
फ्रेम में जड़े चित्र
फलांगते-फलांगते फ्रेम
पथरा गई है मुस्कान
जिनके होठों पर

स्थिर हो गया है
उड़ते-उड़ते एक पक्षी
दीवारों के बीचों-बीच
मरे हुए चमगादड़ सी लटकी है
दीवारघड़ी की सूईयाँ
और प्रकाश फैलते-फैलते
सिमटकर
अपने ही अन्दर ही अन्दर
धंसा गया है कहीं
पानी की अंधेरी तहों पर जैसे
धँसता हो कोई पोत

अधूरापन 

बीत गया यूँ आज भी
पर देखा न कहीं अंत

उदास खिड़्कियों में
जाले में उलझी पीली तितली-सा
लटक रहा सूरज
अटकी रही हलक में
मौसम की चीख
झरते रहे दिन की खोखली
छत से समाचार
और ठोस उंगलियाँ टाईपराईटर पर
पथरीली ईमारतों के अन्दर
करती रहीं वक़्त टाईप

गुज़र गया
गुज़र गया हर कोई
अजनबी सा
दिन के तालाब में
महज़ एक कंकड़ फ़ैंक

लावारिस दिन भटका किया हर कहीं
नहीं अपनाया किसी ने उसे
चाहे थे खाली सब हाथ
देखा नहीं उसने अन्त
अंत है कहाँ
रोज़-रोज़ लौट आने वाले
इस अधूरे पन का

चक्रव्यूह

मेरे भीतर व्याप्त
जंगल का यह सन्नाटा
जड़ तो नहीं

लेकिन इसकी धड़कनों को
पकड़ने के लिये फैंका हुआ
शब्दों का जाल
हर बार खाली ही सिमट आता है

कुहरा होता जाता है घना
और डूबने के प्रति सजग रहते हुए भी
निरंतर डूबता जाता हूँ मैं

जिस दिशा में भी मुड़ते हैं पाँव
हर चीज़ मिलती है
एक दोधारी तलवार की तरह पड़ी हुई
और हर रास्ता मरीज़ की
निस्तेज आँखों की तरह
मेरे बढ़े हुए हाथ हमेशा की तरह
बर्फ़ की सिल्लियों को छूकर
लौट आते हैं

अपनी आँखों के नीचे
स्याह गढों को टटोलकर मैं
आईने को तोड़ने का
असफ़ल प्रयास करता हूँ
लेकिन इस कोशिश में
मेरे अपने ही चेहरे की रोशनी
हो जाती है

ट्कड़े-टुकड़े

इस सबके बावजूद भी मेरे भीतर
जो हो रहा है उसे पकड़ने के लिए
उतरता है फिर
उसी गूँगी दुनियाँ में
जो ला पटकती है मुझे
हर बार
एक भुरभुरी चट्टान पर

अपनी इस लड़ाई में
शरीक करना चाहा जिसे
वह शायद पहले ही से
गंवा बैठा था खुद को
उस गूँगी दुनियाँ
और उसका दिमाग
लड़खड़ा रहा था
चकाचौंध में
अनिश्चय की लीक पकड़े वह
देखता रहा
मेरे साथ अंधेरा पार करने का स्वप्न
जब तक आभास हुआ मुझे इसका
कर चुका था उसके साथ मैं
ल लौट सकने की सीमा तक
सफ़र
प्रश्नों की गीली मशाल सुलगाने
खुद को आग में झोंक देने के बाद भी
धुएँ की लकीरें ही फैली
चारों ओर

जानता हूँ
लड़ाई यह ख़त्म नहीं होती कभी
लेकिन कुछ पाने के लिए
पागलपन की हद तक जाकर भी
अधिक से अधिक
हासिल होती है
परछाईयाँ

क्या इतने भर के लिए ही
जारी रहेगी यह अंधी दौड़
और नियति के नाम पर होती रहेगी
बार बार इस चक्रव्यूह की रचना
खुद को क़त्ल कर देने के लिए
आखिरकार

लिखना

हम लिखते रहे उनके लिए
जो नहीं थे इसके लिए तैयार

भीतर की आग से
पकाया और
बाँटते रहे उनमें
जो नहीं थे भूखे
नहीं पहुँचा उन तक कोई स्वर
न शब्द
फिर भी लिखते रहे
बाँटते रहे
और धीरे-धीरे
भीतर-ही-भीतर कहीं
लौटते रहे अपनी ओर

बदलता रहा
लिखने,बाटने का यह दस्तूर
और हो गये एक दिन हम
अपने सामने खड़े
सवाल किया हमसे
हमारी आत्मा ने :
किसके लिए तुम इतनी आत्मीयता से लड़े

उत्तर हमारे होठों पर आ बैठा अचानक
जालीदार खिड़कियाँ,रोशनदान, झरोखे
जाग रहे हैं
चौकन्ने
टालते हुए अँधेरे की मौत
क्योंकि डर है
सूरज के लौटते ही
न हो जाये आईना पारदर्शी

ऊब गया हूँ 

यह सब जैसा है उसके वैसा होने से
ऊब गया हूँ मैं
उन्हीं चेहरों से मिलना रोज़
गुज़रना बाज़ार से
जहाँ से उठने वाली गंध
भर देती है मेरी आत्मा में
कोलाहल

चूहों की तरह झाँकते हुए
पीले मकानों वाली खिड़कियों से लोग
झुककर
सड़कों गलियों में से
घटनाएँ बीनते हुए
कुछ नहीं है उनके पास
शून्य में लटकी आँखों के
अतिरिक्त
जिसमें हर तस्वीर उतरती है
बिना परछाईं के

सच तो यह है कि मैं
हर रोज़
इन ठहरे हुए
प्राणहीन दृष्यों मे गुज़रने से
ऊब गया हूँ

वापसी 

नहीं जानता किसके साथ हूँ मैं किस प्रकीक्षा में
जो मेरे गीतों में भरना चाहता है धुन उनके साथ
या जो मुझे छोड़ जाता है अनिश्चय में

कहाँ पहुँच मुड़कर देखूँ पीछे किसके लिए
जो मेरे साथ चलकर छूट गया है पीछे उसके लिये
या जो बढ गया है आगे

भागना नहीं है मुझे अपने से
और उनसे भी जिन्होंने मुझे भीड़ में कभी
छू लिया अनजाने में
और जिन्होंने चलते वक़्त मुझे
हाथ हिला कर किया विदा
सबके सब मेरे भीतर है मौज़ूद

सोचता हूँ
उन्होंने जो दिया उसके साथ जब कभी लौटूँ
उनके और मेरे बीच का कोई पुल न टूटा हो
जो मेरा रह गया उनके पास
मार्ग में उसका ओई चिन्ह न छूटा हो

आत्म रूपांतर 

जब तुम उतरोगे
तलघर की सीढ़ियाँ
एक
एक कर
अंतिम सीढी पर
अचानक
खुद से मिलोगे तुम
अकेले होते हुए भी तब
सदा अपने साथ रहोगे

सब कुछ साफ-साफ दिखाई देगा तुम्हे
जैसा है वैसा ही
क्योंकि तलघर में
नहीं डूबेगा सूरज कभी

जब आओगे बाहर
तो लगेगा
बाहर का सबकुछ ताज़ा
कहीं कोई धब्बा नहीं
चिन्ह नही अतीत और भविष्य का
आईनें मे जंगली पौधों की तरह
उग आएँगे दृष्य
और तुम हर दृष्य में
होंगे मौजूद

पलायन 

मौत से डरकर
अमरता में विश्वास करते हैं
न हम प्यार करते हैं न घृणा
बस इंतज़ार करते हैं
कब होगी सुबह
और हर रोज़ की तरह
चल देंगे हम
अनिश्चयसे
अनिश्चय की ओर
आसमान की ओर हाथ उठाकर
उछाल देंगे सिक्कों-सी
कुछ प्रार्थनाएं

हम न कहते हैं
न सुनते
करते हैं बीच-बीच में
पक्षियों की बीट की तरह
अपने ऊपर से उड़ते
शब्दों का छिड़काव

हर रोज़ मरते हैं
पर एक बार मरने से डरते हैं
दर्द कोई बात तो नहीं
जिसे कह दिया जाये
रेलग़ाड़ी के डिब्बे में
फिर भी
चेहरा मदारी
लिये फिरते हथेलियों पर
जैसे कुछ भी नहीं है दुख़
बस एक घटना है
जिसे पढ़ते हैं अख़बारों
पोस्टरों में
जो कुछ भी सीखा है
मौत के ड्अर से
बीते हैं जितना भी
अमरता के भ्रम में बीते हैं

पर बाहर तो तैरते हैं हम
सूनी नाव की तरह
हाहाकार में

साथ-साथ लिये चलो

मुझे साथ-साथ लिये चलो
मैं तुम्हें आईना दूँगा
जिसमें मृत्यु को देख
तुम क्षण-क्षण में जी सकोगे
तब तुम्हें नहीं ढूँढने पड़ेंगे हल
समस्याओं में तुम
खड़े नहीं रहोगे
देखकर
जीकर
बह जाओगे
जैसे सुरंग में से गुज़रता दरिया
ज़िन्दगी के समुद्र में

मुझे साथ-साथ लिये चलो
सच,मैं तुम्हें गति दूँगा
जो ल्ए जायेगी तुम्हें
सभी पुलों के पार
आकाश ओढ़े सोई तुम्हारी
परछाईं के पास

पहचान.

इस तरह तुम कहीं नहीं पहुँचोगे
खुद से भागकर
खुद में उगना
फलना
अंश-अंश फैलकर
धूप की तरह

बहना
बहते चले जाना

जो तुम्हारा है
तुम देखोगे
बहीं तुम्हें खोकर भी
पा रहा है बार-बार
सुना रहा है
कहीं बहुत गहरी उठती हुई
लहर का संगीत

जो तुम्हारा नहीं
तुम पाओगे
समुद्र में गिरती हुई वर्षा की तरह
आत्मसात हो तुमनें
बहने लगेगा साथ-साथ
अपनी पहचान से अलग
तुम्हारा होने के लिए

तब न तुम
अंत से भागोगे न आदि से
और न पाओगे
दोनों की अलग-अलग पहचान में
गड्डमड्ड
अपनी पहचान

सृजन

कहने पर भी कहीं
कही जाती है पीड़ा
पीड़ा की भूमि पर उगाता हूँ
फूल,वृक्ष,लताएं
सींचकर संचित अनुभवों से अपने

लोग कहते हैं:
वाह क्य्आ सुन्दर है फूल
कितना सघन वृक्ष
इतनी कोमल लताएँ
और
फूल तोड़
वृक्ष तले विश्राम कर
छूकर लताएँ
चले जाते हैं ज़मीन को रौंद
जिसने दिया जन्म
सुन्दरता,सघनता,कोमलता को

मेरे पास बच जाती है फिर
भूमि

जोतता हूँ हल
खोदता और गहने
शायद पीड़ा इस बार
कुछ अधिक फल जाये

अंत में 

कभी-कभार
मिलने वाले क्षणों को
गिरवीं रखना
रोज़मर्रा की ज़रूरतों के बदले
कितना मुश्किल है
ज़िन्दगी की दोपहर में
बिना बैसाखी के चलना

सूख जाये जब धूप
चमड़े की तरह
फिर दिन दिन गिनना
वक्त के हाशिये पर
खींचकर
तमाम सफर का नक्शा
यादों की बर्फ में
गलना
बच जाती है अंत में
किसी घिसे हुए सिक्के की तरह
ज़िन्दगी
और उसे अँधेरे में चलाने की
चालाकी

वृक्ष

तुम मेरी खिड़की पर
झुके हुए
मौन भिक्षु
खड़े हो मेरे जन्म काल से
तुम्हारी टहनियाँ एक दिन
अकस्मात खिड़की फलाँग
हरी हुईं
मेरे अंदर आकर
फलते गये तुम
जड़ें होती गईं गहरी
तब मैं तुम्हें छोड़ चला गया
एक दिन
पर मेरे साथ-साथ रहे तुम

और आज एक अरसे बाद
लौटा हूँ जब
तो देखता हूँ
मेरी खिड़की झाँकती
एक अंतरंग सचरी वह डाल
काट डाली है किसी ने
और तुम आहत दृष्टि से
टोह रहे हो
कमरे का मौन
जो होता था मुखर कभी
तुम्हारे संग
जहाँ सौंपा था मुझे अपना
क्षण-क्षण में उगना तुमने

पर दरिया पर बाँध नहीं बँधता कभी
कटी हुई डाल
फिर-फिर उग आती है
अपने अंदर से ही

अभिसार के बाद

तुमने दिया दर्द उसे झेलने की शक्ति क्यों
दी इसलिये के मैं बार-बार तुम्हें अपनाऊँ
जब भी लौटूँ शिशु की तरह दुबकने के लिए
तुम्हारी गोद में जब भी तुम्हें पाया है
मैंने तो इन्हीं क्षणों में जिनमें तुम्हारा
हृदय बच्चों की तरह हो उठता है दयालु
और तुम्हारा मर्म नदी के कोमल सीत्कार
से ओतप्रोत

मेरे होंठों पर हो तुम्हारे लिए एक प्रार्थना
और आँखों में बसंत के किसी दिन का मुग्ध
आकाश ऐसा तुमने अक्सर चाहा है
यह सब तुम्हें बहुत-बहुत अच्छा लगता
है और अच्छा लगता है इस सबसे
प्यार करना धीरे-धीरे झरना सफेद
फूलों की तरह उस राह पर जिससे
होकर मैं पहुँचता हूँ तुम तक

पर तुम यह क्यों नहीं समझतीं के कोई
भी सिलसिला आखिरी नहीं होता

स्वीकार के बाद भी कुछ है जो
अस्वीकृत रह जाता है जिसके लिए
छटपटाता है हमारा ह्र्दय और हम
प्रत्येक बार करते हैं पहले की अपेक्षा
गहरा आलिंगन पर दर्द नहीं
करता स्वीकार हमें खुला छोड़ देता
है एक और मुक्त पल की प्रतीक्षा में

क्या हम अधीरता से नहीं करते उस पल की
प्रतीक्षा नहीं भर लेते फिर से खुद को उ
उड़ान के लिए पंछी जैसे हवा से भर
लेते हैं अपने पँख

टहनियों पर नन्हीं चिड़िया की तरह फुदकता
सूरज तब कूदकर अचानक हमारे बीच जगाता
हमें समर्पण से और तुम्हारी आँखों में मूँद
जाते हैं कितने ही फूल लज्जा के इस पल
में तुम्हारे लिये जीवित होता है संसार

पर दर्द क्यों रह-रह जीवित हो उठता है
हमारे बीच

शेष

जब भी तुम आती हो
द्वार पर अचानक दस्तक-सी
चली आती हो
जब जाती हो
सब कुछ समेट ले ज़ाती हो

कुछ तो होता है
प्यार के क्षणों म्रं आखिर
जो अनकहे-सा रहता है शेष
और अलग हो जाने के बाद भी
खिड़की के नीचे बढ़ते पौधे-सा
जीवित रहता है कहीं

आओ
उसकी सामर्थ्य से खुद को बड़ा करें
और छोड़ा था जहाँ से
वहीं से फिर शुरू करें

कोहरा,शहर और हम

तुम
मैं
शहर
और यह कोहरा
पद्चाप से
चौंककर
लिपटता हुआ
गिर्द
ठहरा हुआ
प्रश्नचिन्ह-सा
मेरे-तुम्हारे
बीच
अनजाने में ही
हमारे
छूते जिस्म
फैले
कोहरे के इस गहन
अम्बार में
धीरे
धीरे
एक दूसरे के निकट
निकटतम
एक दूसरे में डूबते
मैंने झुककर
चूमा तुम्हें
तो कोहरा भाग खड़ा हुआ
चिंहुककर
झाड़ियाँ फुदकते
सफ़ेद खरगोश की तरह

रह गए
एक दूसरे पर झुके
सोये हुए-से
चलते
तुम और मैं
या कोहरे में मुंदा
शहर
दूर
दूर कहीं
ऊंघता हुआ
किसी सपने में
बिना पाँव चलता
स्तब्ध
मौन
बहने लगी हो मुझमें तुम
जैसे कोहरे में सरकती पवन

अब न है कोहरा
न शहर
न मैं
न तुम
रह गए हम
केवल हम
केवल हम
न रुके हुए न बीतते हुए
न सोए न जागते

लौटकर नहीं आऊँगा

जब तुम मुझे नहीं करना चाहोगी
और प्यार
चुपचाप उठकर चली जाओगी
करीब से
मुझे लगेगा
कि तुमने अक्सर कहा है जो
प्यार के धधकते क्षणों में
वह सब था मात्र भूख
तुम्हारे अंतस में
सपने की तरह जागा हुआ
आँखा खुलते ही जो
उतर गया विस्मृति के गह्वर में

पर फिर जब सपना करवट लेगा
तुम्हारे अन्दर
और रात कस लेगी तुम्हें
अपनी अजनबी गुंजलक में
तब तुम पुकारोगी-जान,प्राण
पर तुम्हारी पुकार नहीं पहुँचेगी
मेरे कानो तक
बीत चुका होगा अवसर
मैं लौट कर नहीं आऊँगा
और तुम रात की कोख में
छटपटाती रहोगी
जन्म के लिए

आओ अतीत जियें 

आओ
बीते दिन दोहराएं
गाएँ अतीत के गीत
बर्षा-बूँदों की नन्हीं हथेलियों
की तरह नाचते हुए

डूब जाएँ फिर से
उन्हीं उन्हीं पलों में
अंतरंग सखा मान जिनमें
किया था अपनी झीलों में
आत्मसात तुम्हें
जब अक्सर हम-तुम
आसमानी बिजली की तरह
कौंध जाते थे एक दूसरे में
और बादली-आलिंगन में विभोर
छप जाते थे
अपनी पहचान के आकाश में
नक्षत्र-से

आआ
बटोर लें
अतीत के धुंधलाते आकाश से
स्मृतियों के सितारे
जिनमें से हमारे
चुम्बनों की गर्मी
पिघलती नहीं है आज तक भी
आज फिर एक बार
झाँक लें
नयन-कोर
जिनमें मोजूद है सदियों की प्यास
अनखुदे कुएँ पर बैठे
यायावर-सी
बाँट लें
एक दूसरे की सीमाओं पर ठहरे
प्रश्नचिन्ह

आओ
एक बार फिर
मधुमास के स्वागतार्थ
खोलें
दिशाओं के द्वार

एक टीस 

बरसते हुए मेह के साथ
धीरे-धीरे उतरती है
तुम्हारी अनुपस्थिति
इन क्षणों में
पोर-पोर कसती

हँसी तुम्हारी
घर के कोने-कोने में
रह-रहकर
भोर की घंटियों-सी बजती है
कि तुम कहाँ हो

कितने अंतरंग होते हैं
ये पल
जब मन तुम्हारी याद क्ए सिवा
और कहीं नहीं भटकता
छा जाता है
तमाम स्मृतियों पर
उदासी का एक हल्का-सा
बादल

क्यों बरसता मेह
छोड़ जाता है मेरे पास
बार-बार तुम्हें
ऐसे में तुम्हारे लिए
उड़ाता रहूँ अनगिनत पंछी
करता रहूँ बादलों से प्रार्थना
बरसो, और बरसो
कि तन को बाँध रहा तन

होना

यह भी कितना सुन्दर है
अकेले राह पर होना

अनगिनत मोड़ों में खुलते
आकाश ओढ़क्र सोना

एकाकी राह पर चलते
निरंतर फासला बोना

संदर्भ 

तारीखों के साथ बीत गये हैं
संदर्भ भी
संदर्भों से जुड़ी रह गई हैं
स्मृतियाँ
जो कभी-कभी पिघलने लगती हैं
मोम की तरह

शब्द गुम हो जाते हैं तब
पीड़ा के घने जंगल में
कोई नहीं गुज़रता अपने बजाय
उधर से हो कर
सन्नाटा खोलता रहता अपनी कुंडली
लगातार
कि क्यों नहीं हो पाए हम
उन संदर्भों से अलग
स्मृतियों के इलावा जो हमें
कुछ नहीं दे पाए
जिनमें अगर है भी अब कुछ
तो बस दम तोड़ता धूप का
अंतिम टुकड़ा है
भागकर भी नहीं पकड़ सकते जिसे हम
न हो सकते हैं उसकी मुड़ानों से मुक्त
किस लिए
आखिर किस लिए
हमारे बीच वह सब बहा
जो न नदी ही बन सका
न नदी की संभावना

किस तरह फि हम अपना वर्तमान छोड़
संदर्भों को बिना सेतु के जोड़
संदर्भों को बिना सेतु के जोड़कर
करते रहें प्यार

नाव

सूरज जो कभी उगता था हमारे लिये
तोड़ देग़ा दम
हमारी आँखों में
वक्त के रेलिंग पर झुके
हम रह जाएंगे देखते
आएना चटख जायेगा

बढ़ जायेगा शोर
स्मृतियों की गुफा में
डूब जायेगी क्षनों की नब्ज़ की
धड़कन
बच जायेंगे हमारे पास
एक दूसरे के चित्र
जिन्हें एलबम में लगाकर
पहुँच जायेंगे हम फिर
शुरूआत की कग़ार पर
जहाँ कोई नहीं होगा
हमें जानने वाला
बगल में स्मृतियों का थैला दबाए
ढूँढते रहेंगे हम
कगार के नीचे बहती
नदी का किनारा
जिस पर रेत में कहीं गहरे
धँसी हमारी कश्ती
कभी नहीं मिली
बावजूद बार- बार कगार पर
पहुँचने के भी

कग़ार पर

कोने मन के
उदास लटके हैं
मकड़ी के जाले-से
ये दिन
गुज़रते नहीं
गिन
गिन

रह-रहकर उठती है टीस
यादों के कुहरे में
क्यों इतनी देर रुके
फासले न खुद से मिटे
ढल भी गई धूप
चलने के वक्त
क्यों न चले

न हुए अपने सगे
रहने को साथ रहे
खड़े उम्र की कगार पर
राह किसकी तकते रहे

इस तरह हम हरदम

अपने ही सूने में
सुलगते रहे
पल
छिन

यादें 

यादों के फूल आज फिर खिले
आखिर क्यों हम फिर उस मोड़ पर मिले

दिन कितने
तपती दुपहरों से गुज़र ढले
रेत हुईं
शामें
फिर मन की घाटी में
पगलाई रातें
भ्रम में भी हम इतना दूर चले

बत्तीसवें जन्मदिवस पर

बत्तीस बरसों का यह
लम्बा अंतराल लांघ किसी तरह
जिस ज़मीन पर खड़ा हूं
एक असह्य बोझ तले दबी लड़खड़ा रही है
खुद को संभालने की
तमाम कोशिशों के बावजूद
डूबता जा रहा हूँ
गर्व से सीना ताने बढ़ती
आज़ादी की धुआंती चिमनी में

मेरी सोच और महसूसने की तमाम
शक्तियां होती जा रही हैं कुंठित
दोगली स्थितियों से लड़ते-लड़ते

और देश का नेता
दुनिया में अपना नाम रोशन
करने के चक्कर में
चला रहा है हवा में तलवारें
मुझे सिखा रहा
कागज की नावों पर बहने का मंत्र

हर रात
नये सूरज के इंतजार में
पटरियों पर लेटता है जो हुजूम
सुबह उसे गला हुआ अंग
करार दे दिया जाता है
जब भी इस दुस्वपन को कुरेदने की खातिर
बढ़ाता हूँ नाखून
मुझे खून के धब्बे पोंछने का
रोजगार दे दिया जाता है

रेशमी ज़िल्दों में जकड़ा इतिहास
पुस्तकालयों के अंधेरे परित्यक्त कोनों में
धीरे-धीरे तोड़ रहा है दम
एक नये इतिहास के निर्माण के लिए
मेरी आँखों पर पट्टियां बाँध
पीठ पर गोला बारूद लाद
छोड़ दिया गया है मुझे
एक जंगल के बीचों-बीच

सच
ये बत्तीस बरस
मेरी चेतना को दाग रहे हैं
बत्तीस गर्म सलाखों की तरह.

नींद-नींद में ही 

पहले पहर सुला दिया
माँ ने
लोरियाँ गाकर
बिल्ली से डराकर
राम, गांधी के किस्से सुनाकर

दूसरे पहर सुला दिया
प्रेमिका ने
खिड़कियों, दरवाजों के पर्दे गिराकर
पीली पत्तियों-से होंठ छुआकर
फिल्मी डायलाग दोहराकर

तीसरे पहर सुला दिया
पत्नी ने
पहली तारीख को चेहरे की झुर्रियां छिपाकर
आपरेशन टेबल की तरह देह बिछाकर
गरीबी की सूली ढोने वाला मसीहा बनाकर

अंतिम पहर में
खुद को सुला दिया खुद ही
क्योंकि
धूप बदल चुकी थी
सूखे चमड़े में
जिजीविषा हो चुकी थी औंधा बर्तन
और कंधों पर आ बैठा था एक कौवा.

जंगल

जंगल का कहना है
वह रेगिस्तान को कंठ में रख लेगा
दलदलों को पत्तों से ढाँप लेगा
आक्सीजन का कोटा बढ़ाकर
गरीबी को समृद्ध बना देगा
और सूत्री कार्यक्रमों के तम्बुओं में
जगह-जगह महायज्ञ कराकर
भूख को मंत्रकीलित कर देगा

पर जंगल की अजगर-सी जमुहाई
खींच लेती है निरीह और निहत्थे प्राणियों को
अपने पेट में
टहनियों के झाड़ू
बुहार देते हैं पपड़ाये लहू के धब्बे
हड्डियों की कब्र को छा लेते हैं पत्ते

जंगल की भाषा
नहीं समझ पाते जीव
फिर भी चिल्लाते हुए बढ़ते हैं
रास्तों पर खो जाते हैं
कुछ दूर चलकर जंगल में

चिल्लान उनकी नियति है
रुई रखना कानों में जंगल का धर्म
जंगल अपना धर्म बखूबी निभाता है
जीवों को सहनशक्ति के टॉनिक पिलाता है

जंगल का स्वभाव है
हर कहीं उग आना
अपनी छाया में पलने वाली
ज़हरीली जड़ी-बूटियों की
पीठ थपथपाना
और राष्ट्रीय धुन पर
खड़े-खड़े सो जाना.

कत्ल का इश्तहार

मुझे और नहीं ढोना है अब
ख़ामोशी का ताबूत
जिसमें बंद हैं सच के कंकाल
और आवाजों की बुझी मशालें
मेरी पीठ पर लाद जिसे
छोड़ देते हैं मुझे वे
अनिश्चय की भुरभुरी चट्टान पर

उनके ईश्वर के
हर गर्दन नापने के लिए बढ़े हाथ
मेरे हाथों में कोई धर्मग्रन्थ थमा
उकसाते हैं मुझे
झूठ को सच और सच को झूठ की
कब्र में दफना देने के लिए
और करते हैं इन्तजार
कब मेरी आवाज में
पैदा हो दरार
और मेरे गले में फूल मालाएं पहना
जुलूस की शक्ल में मुझे घुमायें
गली-गली, बाज़ार-बाज़ार

मेरे अंदर खमीरे आटे की तरह
लगातार फूल रही है एक गाली
मेरे हाथों में है संकल्प का चाकू
जिससे काट सकता हूँ
उनकी हर साजिश को
उनका जेहन उघाड़कर
उसमें भरे मवाद को
नंगा कर सकता हूं सरेआम
न मुझे तलाश है
उनकी खोखली आवाज में किसी क्रांति की
जिसके नाम पर वे
इकट्ठा करते हैं चन्दा
आती है उनके पसीने से तब
ताजे खून की गंध

तिलचट्टों की कतार के साथ
मैं चल जरूर रहा हूँ
लेकिन अपने पैरों से

मेरी आँखों के सामने
फैला है जो धुआँ
जानता हूँ
जिन चिमनियों से होकर आ रहा है
उनके नीचे सुलग रहा है
गीली आवाजों का जंगल
इसका अर्थ समझाने के लिए वे
ले जाते हैं मुझे
गैस चेम्बरों में बार-बार
फिर भी आग के लिए मेरी तड़प देख
तिलमिलाकर बदलते हैं पैंतरा
और स्कूल के रास्ते से
कर लेते हैं मेरे बच्चे का अपहरण

फासला तय करने के लिए
पहन लूँ क्या उनकी नाप के जूते
या फिर प्रेम से निकलकर बच्चे का चित्र
लगा दूँ वहाँ
किसी के कत्ल का इश्तहार.

सपना 

इमारत की नींव खोदते हुए
वह एक सपना देखता है

उम्मीद है पैरों से चलता
बिना धूप पलता बहुरूपिये-सा
बार-बार प्रकट होता है सपना
बुझे चूल्हे के पास
जिनके लिए वह मिट्टी से
अपनी देह धोता है

रेगिस्तान में ओएसिस की तरह
सूखती घास को बसन्त बना देता है
रोज़-रोज़ पसलियों में पड़ने वाली
ठोकर की पीड़ा भुला देता है

झूठा है इमारत का मालिक
झूठी ठोकर की पीड़ा

सच्चा तो केवल सपना है
तभी तो हर फ्रेम में जड़ा
मुस्कराता दिखाई देता है

द्रौपदी के चीर की तरह
न खत्म होने दे जो इसे
उस प्रभु के हाथ खोजता है
और पता नहीं कब ईंट की जगह
जीवार में खुद को लगा देता है.

आज़ादी की चुहिया 

नहीं दोस्त
इसमें कसूर उनका नहीं इतना
जितना तुम्हारे निष्कपट हृदय में
टिमटिमाते तारे का
जो हर सुबह
दुस्साहस के लिए
करता है प्रेरित तुम्हें
और रात होते ही दुबक जाता है
कांटेदार झाड़ियों में

ऐन वक्त पर
फेंकते हैं वे तुम्हारे सामने
ठंडे गोश्त-सा उम्मीद का टुकड़ा
जिसे झपटकर
बेसब्री से चबाने लगते हो तुम

उस वक्त तुम्हें याद नहीं रहते
अपनी देह पर पड़े नीले निशान
तार-तार ब्लाउज से झांकती
पत्नी की पसलियां
और बच्चे की आंखों में
डबडबाती
आइसक्रीम की लालसा
जिन पर से उनकी चमचमाती गाड़ियाँ
गुज़र जाती हैं बेधड़क
उन्हें तो हर झरोखे से
दिखाई देती है कुर्सी
वे पहनते हैं कुर्सी
ओढ़ते हैं कुर्सी
खाते हैं कुर्सी
और तुम्हें?
ऐसा क्या दिखाई देता है दोस्त!
कि तुम भूल जाते हो
अपनी पीठ पर लदे
बत्तीस क्विंटल अनगढ़े
पत्थर के बोझ की पीड़ा

भूल जाते हो
कि राशन की दुकान के सामने
लगी अंतहीन कतार में
खड़े हो आज भी
उसी नंबर पर
तहखाने में बंद
अनाज को खोखला करने के बाद
तुम्हारी देह में
कब घर बना लेता है घुन
तुम्हें पता ही नहीं चलता

और उधर
उनकी कुर्सी को
पहले से भी अधिक
आरामदेह बनाने में
जुटे रहते हैं वे तमाम बौने कारीगर
जिन्हें साल-दर-साल
बांटे जाते हैं टोकरों में भरकर
मैडल और प्रशंसापत्र
पर
करोड़ें आंखों में
कराहते भूख के सपने को
कैनवस पर उतारकर भी
खाली के खाली रहते हैं तुम्हारे हाथ
तुम्हारी जिंदगी क्या है
अँधेरे में छटपटाती एक चीख

फिर भी बाँसुरी की तलाश में
लहूलुहान हैं तुम्हारे पाँव
खाली कुएँ की जगत पर
धरे हैं तुम्हारे पपड़ाये होंठ
और तुम्हारी आत्मा को कुतर रही है
आजादी की चुहिया
तो इसमें उनका क्या दोष?

बूढ़ा साल

झुर्रियों में
काँपने लगी हैं परछाइयाँ
सूख गया है जूते का तेल
कंधों पर तंबू लिये
बैठ रहा
पलक झपकते गुज़र गयी
वक्त की रेल

किसको दी तलवार
किसको खाली म्यान
मृत्यु पर की कितनी
शोकसभायें
और जन्म पर गाये मंगलगान

काँटों-से कोलाहल में
कितना दिया
कितना लिया
अब कुछ याद नहीं

हाँ
भीड़ में खुद को
पलभर में लापता होते देखा
आवाज़ के जादूगर को भी
बिना लाठी
अंधेरे में उतरते देखा
अगारों की रोशनी में
अपने ही ज़ख्म छीलता
नारों की तलवार-सी धार पर
लेटा हुजूम
इश्तहारों में उगता सूरज
पत्थरों से भी निकलता संगीत
देखा यहाँ
भूख के तवे पर
देशप्रेम की रोटी पकते
झूठ के पार्श्व में बैठ
सच को
कंकाल में बदलते

अब तक जो लिखा है
बंधे हुए हाथों ने सुनहरी कलम से
बंद कमरों में
पथरा गया है
मेरी पुतिलयों में
बाकी इतिहास लिखेंगे
मेरे अनुगामी
क्या होगा उसमें
अभी देख रहा हूँ
भविष्य की चिता की आग
सेंक रहा हूँ

लौहमानव

मैं अब बनूँगा
लौहमानव
नकली हाथों से ही सही
बुनूँगा
वर्तमान और भविष्य के बीच के
सभी पुल
शापग्रस्त स्थितियों को
नहीं पहनाउंगा
नया लिबास

कोई भी मोड़
मुड़ने से पहले
गाड़ दूँगा अपने नाखून
अँधेरे की पुतलियों में

अँधेरा पोंछने के लिये तुमने
बाँटे शब्दों के रूमाल
गाँव-गाँव शहर-शहर
और बैसाखियाँ बाँटी
परिस्थितियों के अखाड़े में
उतरने के लिए

दरिया की लय में धुत्त
भुला दी थी नाव ने
डूबने की संभावना
कछुए की चाल
चलना
और उसकी खाल में
पलना
तार-तार होगा इन हाथों
तुम्हारा यह स्वयंसिद्ध मंत्र

तुम्हारे प्लेटफार्मों से छूटने वाली
गाड़ियों पर सवार होकर
नहीं लाँघूँगा
तुम्हारे हाथों निर्मित पुल
वक्त से पहले गजों जिंदगी को
नहीं लगने दूंगा
इस चालाकी का घुन

सचमुच
मैं बनूंगा अब
लौहमानव
मेरी धमनियों में खून की जगह
बहेंगी आसमानी बिजलियाँ

मेरे हाथों टूटेंगे
सभी आईने
पिलाते रहे जो मुझे
मात्र प्रतिबिंबों का ज़हर
जिन्होंने दिखाया नहीं मुझे
चेहरों के भीतर
काली फसलों का उगना
मकड़ियों का रेंगना
और नाखूनों का बढ़ना.

भविष्य के नाम पर (कविता)

सुनो
मुझे यह कौन से गुनाहों की
दी जा रही है सज़ा
झूठे आश्वासनों के छिद्रोंभरा तम्बू
मेरे सिर पर तानकर

मैं
एक मामूली आदमी
रोज़ की रोज़
कमाकर खाने वाला
क्यों पा रहा हूँ खुद को
उपदेशों की
झिलमिलाती दलदल
से घिरा

मैंने कब देख है
कल उगने वाले
सूरज को
स्वप्न में
मेरी नींद तो दुकानदार
अपने ही बहीखाते में
और नेता
अपने पेट में
बंद कर ले गया है.

चल रहा हूँ
निरंतर सिकुड़ते रास्ते पर
एक काँटेदार तार का
सहारा लिये
भविष्य के नाम पर
मेरे हाथों में
रह गया है सिर्फ
अपने बच्चे का
टूटा हुआ खिलौना
जिसकी हिफाजत के लिए भी
निहत्थे
सामना करना पड़ रहा है मुझे
अनगिनत गिद्धों का

एक झंडे को ढोते रहे
मेरे पूर्वज
एक झंडा
मैं ढो रहा हूँ
इस गुनाह को
अपने ही खून से
धो रहा हूँ

मेरे सामने ही लगाकर
मेरे घर को आग
राख और गर्म लोहा
ढोया जाता है मेरे ही कँधों पर
और मुआवज़े के कागजों पर
मेरे दस्तख़त लेकर
लगा दिया जाता है वहाँ
गोला बारूद बनाने का कारखाना

आज की ताज़ा खबर
आज की ताज़ा खबर
जैसा कोई वाक्य
झिंझोड़ता है मुझे
जैसे कुत्ता झिंझोड़ता है हड्डी को
धीरे-धीरे
मेरी आँखों के सामने
छा जाता है अँधकार
सूरज उस वक्त
लम्बी कैद काट रहे
कैदी की आँखों-सा
टँगा होता है
पश्चिम की खिड़की में.

तिथियाँ 

कौन पोंछेगा
हमारे चेहरे से लहू
पहनाकर हमें काँटों के ताज
बढ़ गये काल की पगडंडी पर
दिग्विजयी नेता
युद्धों के प्रणेता
अपने नाम कब की है उन्होंने
हमारी वसीयत

मर रही है अब भी
एक खामोश मौत

बहते-बहते अब तक हो सकीं
बुत
बन सकीं मुर्तियाँ
जिनके चेहरों पर लद गया
असंख्य हाथों का बोझ

मरने के बाद भी
ढोती रहीं पवित्रताओं के पिटारे

वक्ष में
इतिहास का खंजर गड़ा है
हथेलियों पर भविष्य
पारे-सा पड़ा है
आत्मा से अहं
फिर भी बड़ा है
कहाँ होगा
हमारे इस सफर का अंत
कब निकलेंगे छाती से
सभ्यताओं के डंक

हर डाकिये-युग के
थैले में बंद चिट्ठियाँ हैं
हम तिथियाँ हैं.

चिंगारी

इन तमाम लोगों के पास
जिनके साये में बैठकर
रोज़ी कमाने की मजबूरी से बँधा हूँ मैं
कुछ नहीं है शेष
सिवा सूखे चरागाहों की ओर
लौटने के

कोई भी लम्हा जो
इनके और मेरे बीच
हो सकता है एक पुल
एकाएक रेत हो जाता है
और एक गुफा से निकलकर
फौरन दूसरी गुफा में घुस जाने की
हल्की सी संभावना भी
उनकी साजिश से
तोड़ जाती है दम

चीज़ों के खो जाने का भय
इन्हें हर समय घेरे रहता है
और आदमी इनके सामने
पेपरवेट की तरह पड़ा रहता है

इन्हें जरूरत है
हर रोज एक हत्या
एक बलात्कार की
और गुंजाइश रहती है
एक मरी हुई बात की

अपनी जरूरत और गुंजाइश के
खड़े जल में मुझे
डुबकी लगवाने की साजिश में संलग्न हैं
उन्हें नहीं पता कि जिसे वे
मेरी मजबूरी समझते हैं
वह एक चिंगारी भी हो सकती है.

पीढ़ियोँ के बीच

सब चिल्लाये एक साथ
वक्त गुज़र रहा है
अपनी जेबों में सपने भर लो

पहले तो मुझे आयी हँसी
फिर मेरी आँखें
उन बूढ़े चेहरों में ढूँढने लगीं
पहियों के निशान
मेरे होंठों पर आ बैठा
भटके हुए यात्रियों का
अंतिम गीत
और चेहरों की ठंडी आग से
तपने लगे प्राण

तब मैंने कहा
वक्त ठहरा हुआ था
रंगमंच के दृश्य से
जब गुज़र रहे थे आप

उन्होंने सुना
और सुनते ही लौट गये
अपने काँचघरों में
जहाँ दिन-रात
बजती रहती हैं जंगली धुनें
नीं में की जाती हैं
कबूतरों की हत्याएँ
जागते हुए
बंद रहता है मुट्ठियों में
एक मरा हुआ देवता
और वे
काँचघरों से नहीं निकलते
क्योंकि बाहर जलता है
अकेला सूरज
भीतर अँधेरा है
पत्थर की तरह ठंडा और सख्त
पर पहचाने जाने के भय से
करता है मुक्त.

चेहरा

मेरे भीतर मौजूद है
एक और चेहरा
जिसे पहचानने की कोशिश में
झरते जा रहे हैं रंग
एक-एक कर

कहाँ से उठ रही है
अहं के जलने की गंध
सोचते-सोचते
झुकने लगे हैं कँधे

मैं समझता रहा दुख को
औरों के घर का
सनसनीखेज़ समाचार
पर अब उसका खुला जबड़ा
मुझे अपनी खिड़की के काँच से
दिखाई देता है

सामने है आईना
पर चेहरा नदारद
शायद कहीं
परहेज की दीवार पर बैठा हूँ

कैसा हूँ
कि कहीं होने से पहले ही
अपना चेहरा गँवा बैठा हूँ.

विडंबना

मुझे झिंझोड़ा
अनगिनत प्रश्नों ने
पर उन्हें लिये साथ
गुज़रता रहा तमाम-तमाम
पतझर के पीले पत्तों से
ढके रास्तों पर

नहीं देखा मुझे किसी ने अविश्वास से
दौड़ता रहा मन एक साथ
रेगिस्तान और हरे जंगलों के विस्तार पर

मैं खुश हूँ
कि तमाम प्रश्नों के बावजूद
अँधे कुओं में झाँकते हुए
डर नहीं लगा मुझे
खिड़की से कूदते सूरज ने
मुझे आवाज़ नहीं दी
न भागती सड़क ने रुककर
कोशिश की मुझे देखने की
लेकिन घर में घुसते ही
किसी गुस्सैल नर्स की तरह
पूछता है कमरा
कौन हो तुम?
और अँधकार लड़खड़ाकर
मेरी बाँह थाम लेता है.

काला सूरज

मुझे नहीं चाहिए
शब्द
एहसास के वृक्ष को
नंगा कर जो
पतझर के पत्तों की तरह
कुचले जाते हैं पाँवों तले
और शून्य ताकता वृक्ष
फिर से भरने की प्रतीक्षा में

नँगा होने और भरने के बीच
इस अंतराल को
जोड़ूँ व्यक्तित्व के किस रेशे से
जबकि
सारी की सारी प्रक्रिया
रबड़ के टुकड़े की मानिंद
हो जाती है पूर्ववत

इन चमकते हुए
पत्थरों की
ठोस और ठंडी चमक से
कब तक
रह सकता हूँ चौंधियाया

सरपट दौड़ती जिंदगी के साथ
भाग रहा हूँ
हाथों में
महज़ एक पोस्टर थामे
अंकित है जिस पर
लुढ़कता काला सूरज
इर्द-गिर्द जुड़ी एक भीड़
देख रही तमाशा

इन सब पर
लिखता हूँ कविताएँ
मनचाहा प्रयोग करता हूँ
शब्दों का
पर सूरज रंग बदलने की बजाय
हो जाता है और भी स्याह
चुक जाते हैं शब्द
रह जाता हूँ मैं
केवल मैं
पत्रहीन तरु-सा
लटका शून्य में
भरकर भी
न भरने वाले
इस सूनेपन के हाथों में
महज एक यन्त्र सा.

एक और दिन

सन्नाटे के तीखे नाखून
गड़ जाते हैं
रोशनी की आँखों में

एक हलकी कराह के साथ
बंद हो जाती हैं
संभावनाओं की खिड़कियाँ

आस्था की टिमटिमाती लौ
दब जाती है रोजमर्रा की
जरूरतों के मलबे तले

एक तँग सुरँग में
किसी ताजे कटे अँग की तरह
छटपटाता है मौसम

वक्त के रेलिंग से कूदकर
आत्महत्या कर लेता है
एक और दिन.

दीवारों के बीच 

ज़िंन्दगी और मौत के बीच
लुढ़कते ये पल
कभी अँधकार में लिपटे
कभी धुआँते
किस ओर
आखिर किस ओर लिये जा रहे हैं
अपने पीछे धुएँ की लकीर छोड़
सिर्फ मुस्करा भर देने से
होता नहीं दूर
भीतर भरा धुआँ और अँधकार

नियति मानकर दुख को
डूबे रहना आकंठ प्रार्थनाओं में
नहीं ले जाता धुँध के पार

लौटकर आओ किसी भी यात्रा से
घर की दीवारें लगती हैं
पहले से कहीं अधिक
सूनी और निष्प्राण
घर के लोग एक थकान में डूबे हुए
इस सबके वैसा होने से ऊबे हुए

कहाँ हैं
कहाँ हैं वे अर्थ
हर यात्रा से लौटते हुए जिनसे
भर लाया था अपनी जेबें
जिनसे लिखना चाहता था
घर की दीवारों पर एक गीत
हवा में घोलना चाहता था एक गँध
और साँसों में एक लय.

कर्फ्यू 

संगीनों की नोक पर टँगे
वातावरण के कँठ में
हड्डी की तरह फँसकर रह गयी है चीख

घोड़े की टापों के नीचे
छलनी-छलनी प्रजातंत्र
बदहवास पीट रहा है
एक झोंपड़े का द्वार

पर खामोशी की दरार में
दुबका पड़ा है हर कोई
पता नहीं किस वक्त
हवा कर ले
कौन-सा रुख अख्तियार

जिद्दी सूरज फिर भी
खोज रहा है
जिन्दगी का कोई बचा-खुचा निशान

इश्तहारों और अखबारों में
जुड़े हैं नमस्कार की मुद्रा में
जो हाथ
गर्दनों की ले रहे नाप
जानते सभी हैं
मानने को नहीं कोई तैयार
उधर भाग रहा
भोला राम
अपनी ही परछाईं से भयभीत
नहीं पता बेचारे को
आगे है कुआँ
तो पीछे खाई

जेबों में दियासलाइयाँ रखे
घरों के आस-पास
घूम रहे आदमखोर
किसी खिड़की में डूबेगा आज सूरज
लोग सहमे-सहमे ताक रहे
आसमान की ओर

सन्नाटे की दीवार पर
जब भी कहीं पड़ती है चोट
चौंककर
नाखूनों से
ज़मीन खोदने लगते हैं लोग.

शेष 

कुछ शेष हो
तो संभव हो रहना
मृत्यु के इस अविजित प्रदेश में

ज़िन्दगी एक संभावना का नाम है

मैं दौड़ रहा हूँ
प्यार और घ़णा करते हुए
आदमी के शहर और जंगल में
युद्धरत हूँ
इस संभावना के ज़हर को
नया नाम देने के लिये

बाहर और भीतर के सभी घने
चाकू जैसे मौसमों से
बहते हैं मेरे तरल स्वर
बर्फ़ काटती सर्द हवाओं की तरह
उस फ़ासले के बीच
जिसे ज़िन्दगी मौत तक
सोचता हूँ मैं

तीर की मानिंद
ठोस अन्धेरे में बढ़ता हूँ
अपने हथियारों के साथ
तो लगता है अभी कुछ है शेष
जिसमें मृत्यु का चेहरा पढ़ा जा सकता है
भाषाओं के ज्ञान के बिना भी
और संभावना की कोठरी में भी
रहा जा सकता है उस शेष के साथ।

कुछ शेष हो
तो संभव हो रहना
मृत्यु के इस अविजित प्रदेश में

ज़िन्दगी एक संभावना का नाम है

मैं दौड़ रहा हूँ
प्यार और घ़णा करते हुए
आदमी के शहर और जंगल
युद्धरत हूँ
इस संभावना के ज़हर को
नया नाम देने के लिए

बाहर और भीतर के सभी घने
चाकू जैसे मौसमों से
बहते हैं मेरे तरल स्वर
बर्फ़ काटती सर्द हवाओं की तरह
उस फ़ासले के बीच
जिसे ज़िन्दगी मौत तक
सोचता हूं मैं

तीर की मानिंद
ठोस अन्धेरे में बढ़ता हूँ
अपने हथियारों के साथ
तो लगता है अभी कुछ है शेष
जिसमें मृत्यु का चेहरा पढ़ा जा सकता है
भाषाओं के ज्ञान के बिना भी
और संभावना की कोठरी में भी
रहा जा सकता है उस शेष के साथ।

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