खगेंद्र ठाकुर की रचनाएँ

वे लेखक नहीं हैं 

वे लिखते हैं
लेकिन कागज पर नहीं
वे लिखते हैं धरती पर

वे लिखते हैं
लेकिन कलम से नहीं
वे लिखते हैं
हल की नोंक से.

वे धरती पर वर्णमाला नहीं
रेखाएं बनाते हैं
दिखाते हैं वे
मिट्टी को फाड़ कर
सृजन के आदिम और अनंत स्रोत

वे तय करते हैं
समय के ध्रुवांत
समय उनको नहीं काटता
समय को काटते हैं वे इस तरह कि
पसीना पोछते-पोछते
समय कब चला गया
पता ही नहीं चलता उन्हें

वे धरती पर लिखते हैं
फाल से जीवन का अग्रलेख
वे हरियाली पैदा करते हैं
वे लाली पैदा करते हैं
वे पामाली संचित करते हैं
शब्दों के बिना
जीवन को अर्थ देते हैं
ऊर्जा देते हैं, रस देते हैं, गंध देते हैं,
रंग देते हैं, रूप देते हैं
जीवन को वे झूमना सिखाते हैं
नाचना-गाना सिखाते हैं
लेकिन वे न लेखक हैं
और न कलाकार
वे धरती पर
हल की नोंक से लिखते हैं
उन्हें यह पता भी नहीं कि
लेखकों से उनका कोई रिश्ता है क्या?
उन्हें कोई सर्जक क्षमता है क्या?

ज्योति का अक्स

झरोखे के चौकोर से लगा तुम्हारा चेहरा,
और प्रतीक्षारत सजल आँखें तुम्हारी,
इधर मेरा द्विधाग्रस्त अस्तित्व
दोनों के बीच फैलता हुआ है
भयानक, खूंखार सघन जंगल.

मैं जो पगडण्डी नाप रहा हूँ
वह जंगल से होकर गुजरती है
भरा हुआ है जो हिंस्र जंतुओं से
लेकिन कोई बात नहीं चिंता की,
मुझे मालूम है
यह पगडण्डी जंगल से बाहर गयी है
जाहिर है मैं भी जाऊंगा

कदम-कदम पार करेंगे हम जंगल,
मेरे साथ है तुम्हारी आँखों की ज्योति
और उस ज्योति का अक्स मेरी चेतना में
फिर तो कोई बात नहीं

माँ 

दुनिया का सबसे आत्मीय
और सबसे प्यारा शब्द – माँ
पहले-पहल जब होठ हिले और मिले
तब अन्तर से निकला सांस की तरह
जीवन का पहला शब्द – माँ
चेतना में घुल-मिला यह शब्द
जैसे प्राण में घुला दूध और पानी.

माँ से बढ़कर कुछ भी नहीं है सृष्टि में
माँ के बिना कुछ भी नहीं है सृष्टि में
माँ सबसे अच्छी होती है
जननी जब वह होती है
वही देती है हमें संज्ञा और क्रिया भी.

बहुत अच्छी होती है माँ
पयस्विनी जब होती है वह
अपना जीवन-रस निचोड़ कर
हमारी नसों में वह घोलती है
जब मुझसे बढ़कर नहीं होता
कुछ भी उसके लिए
मेरी तुतलाहट और मुस्कराहट पर
रहती है तत्पर वह होने को कुर्बान

मेरे मुंह में देखती है सारी दुनिया
और मेरी आँखों में सृजन का सपना
माँ होती है ममता की प्रतिमूर्ति
काम से लौटने पर मेरी आंतें टटोलती है
माँ होती है पूरे परिवार की आत्मा
पूरे आँगन की अक्षय चेतना
आंगन से खलिहान तक आँख बनी

माँ कितनी अच्छी और प्यारी माँ
कहती है – समय बहुत ख़राब हो गया
बच्चे भी जवाब देने लगे हैं
छोटे भी बड़े-बड़े शब्द बोलते हैं
कोई कहीं से आता-जाता नहीं
जोड़ने लगे हैं वे आने-जाने का खर्च
कहाँ हो सीताराम! आदमी से बड़ा
हो गया है खर्च का हिसाब!
ऐसा तो पहले नहीं होता था
इतना खराब हो गया समय कि
भगवान् भी उठते नहीं
लक्ष्मी को छोड़ कर
कहाँ गया वह समय
कैसे जिएगा आदमी!
ऐसे ही समय के फेर में पड़कर माँ
न जननी और न पयस्विनी
रह जाती है वह केवल माँ
कुछ और नहीं केवल माँ

माँ होती है जीवन की स्थिति
बेटा होता है जीवन की सम्भावना
जीने लगती है माँ स्मृतियों में
बेटा जीता है अपने सपनों में
स्मृतियाँ ले जाती हैं अतीत में
सपने देते हैं प्रेरणा भविष्य की
दिशाओं का यह फर्क मालूम नहीं होता
अतीत और अनागत में होता है टकराव
सोख लेता है जो समय की संवेदना

बुढ़ापे की लाठी होता है बेटा
बशर्ते लाठी हो माँ के हाथ में
माँ की बूढ़ी और ढीली नसें
पकड़ नहीं पातीं लाठी अपने हाथ
स्मृति और सपने चलते नहीं साथ
सोच-सोच कर माँ मूँद लेती है आँख
कांपते हुए होठों से निकलते हैं शब्द
भगवान् ने ही फेर ली जब नजर
तो समय या किसी को भी दोष दें क्यों कर?

धुआँ उठने को है

खूब उगलो ताप
ढेर-ढेर फेंको आग
ओ सूरज!
जल गये आसमानी बादल,
तलैयों के प्राण गये,
धरती की कोख जली,
जल-जल कर बिदक गयी
फसलों की हरी- भरी क्यारी!
और जलें,
तुम्हें जीवन करें अर्पित सभी
पशु-पक्षी और आदमी
बराबर हैं सभी अब।
कायम करो ऐसे ही समता का राज,
अर्पित हैं सभी तुम्हारे प्रताप को,
सह नहीं पाते थे आग
ओ सूरज!
इनके पेट की आग
उग्रतर हैं तुम्हारे प्रताप से,
खूब उगलो ताप,
लाख फेंको अग्निवाण,
ये नहीं सहेंगे अब आग।
धुआँ पेट की आग का,
धुआँ जीवन के अरमानों का
उठने को है,
तुम्हारे प्राणघाती किरणों पर छाने को है।

हम काले हैं

हाँ, हम काले हैं
काला होता है जैसे कोयला
जब जलता है तो
हो जाता है बिलकुल लाल
आग की तरह
गल जाता है लोहा भी
जब उसमें पड़ जाता है।
हाँ, हम काले हैं
काला होता है जैसे कोयला
जब जलता है तो
हो जाता है बिलकुल लाल
आग की तरह
चमड़ी खींच लेता है
जब कहीं कोई भिड़ता है।
हाँ, हम काले हैं
काला होता है जैसे बादल
जब गरजता है तो
बिजली चमक उठती है
कौंध जाती है
जिससे दुनिया की नजर।
हाँ, हम काले हैं
काली होती है जैसे चट्टान
फूटती है जिसके भीतर से
निर्झर की बेचैन धारा
जिससे दुनिया की प्यास बुझती है।
हाँ, हम काले हैं
काली होती है जैसे मिट्टी
जब खुलता है उसका दिल
तो दुनिया हरी-भरी हो उठती है।
जब जलता है तो
हो जाता है बिलकुल लाल

मेरा सीना हाजिर है 

नहीं, नहीं
इसे किसी तरह नहीं समझें
मेरा विद्रोह आप
बात इतनी-सी है कि
इस पूरे शहर में कहीं भी
जहाँ मैं पैदा हुआ और पला बढ़ा
अपने पसीने के मोती से कितने कंगूर सजाये
वहाँ मेरा कोई घर नहीं है
इसीलिए सो गया हूँ मैं
सड़क पर ही
रात का समय जान कर,
मुझे क्या पता महाराज कि
निकल आएँगे आप रात में भी,
आपके रास्ते में अवरोध हो गया है,
नहीं, नहीं,
ऐसा नहीं हो सकता
चले आइये आप
कदम बढ़ाइए आगे
मेरा सीना हाजिर है
आप पाँव उस पर
रखिये और बढ़ जाइए
नहीं कोई खतरा नहीं है
मैं शांतिप्रिय नागरिक आपका मतदाता हूँ
जनतंत्र है यह
और यह जनता का सीना है
संकोच मत कीजिए
किसी से नहीं कहूँगा मैं
आप तो अपने आदमी हैं
फिर अभी तो घुप्प अँधेरा है
कोई देखेगा भी नहीं
कि आपने पाँव रखा मेरे सीने पर
लेकिन जरा जल्दी कीजिए
रात का अंतिम पहर है यह
कुछ ही देर में
माहौल बदलने वाला है
कुछ ही देर बाद
आ धमकेगा सूरज
फिर तो दुनिया देख लेगी
मेरे सीने पर आपके पैर
फिर करवट बदलूंगा
आपके गिर जाने का
खतरा पैदा हो जाएगा तब
अभी कोई बात नहीं है
चले आइये आप
मेरे सीने पर कदम रख बढ़ जाइए,
हाँ, जरा जल्दी कीजिए.

पुरानी हवेली

इस हवेली से
गाँव में आदी-गुड़ बंटे
सोहर की धुन सुने
बहुत दिन हो गए

इस हवेली से
सत्यनारायण का प्रसाद बंटे
घड़ी-घंट की आवाज सुने
बहुत दिन हो गए

इस हवेली से
किसी को कन्धा लगाए
राम नाम सत है- सुने
बहुत दिन हो गए

इस हवेली की छत पर
उग आई है बड़ी-बड़ी घास
आम, पीपल आदि उग आये हैं
पीढ़ियों की स्मृति झेलती
जर्जर हवेली का सूनापन देख
ये सब एकदम छत पर चढ़ गए हैं.

इस हरियाली के बीच
गिरगिटों, तिलचिट्टों के सिवा
कोई नहीं है, कोई नहीं है।

हिन्दू हम बन जाएँगे 

सूखा पड़ गया
फसल मारी गयी
बादल निकले बेवफा
मौसम है कसूरवार.

बाढ़ आ गयी
गाँव दह गए
लहलहाती फसल बह गयी
कोई क्या कर सकता था?
नदियाँ हो गयी थीं पागल.

खाने की चीजें हो गयीं भूमिगत
महंगाई चढ़ी आसमान
लोग दौड़ते हुए परेशान
बोले देश के मंत्री प्रधान
इसके लिए है जवाबदेह आसमान

हतप्रभ है सुन कर जनता
बाग-बाग हैं अपने लोग
अटल जी हैं एकदम लाजवाब
नेता हो तो ऐसा हो
क्या कहने हैं – अजी वाह

उधर मुस्का रहा है प्याज
गदगद है जमाखोर समाज
पता नहीं कहाँ गया नमक
लापता है चेहरे की चमक
जनता करने लगी आह
अजी अटल जी वाह-वाह

कोई बात नहीं प्रधान जी
गीत भारतीय संस्कृति के गाइए
मुनाफाखोरों को कष्ट नहीं दीजिए
हम भी करते हैं प्रतिज्ञा
हिन्दू हम बन जाएँगे
प्याज नहीं खाएँगे
एकादशी हर रोज करेंगे
नमक आपसे नहीं मांगेंगे.

अटल रहे आपका व्यापार
अटल हों करें गगन-विहार
करे न कहीं कोई भी आह
अजी अटल जी वाह-वाह.

गोर्बाचोव

मेरे प्यारे गोर्बी!
तुम महान हो क्योंकि
तुम आत्महत्या कर सकते हो
मुश्किल है जीना फिर भी
दुर्लभ होते हैं वे जो
मौत को बुलावा देते हैं

तुम महान हो क्योंकि
जीवित हो तुम
आत्महत्या के बाद भी
तुम देख सकते हो,
तुम सुन सकते हो,
अनुभव कर सकते हो
सिर्फ कर नहीं सकते कुछ भी.

मेरे प्यारे गोर्बी!
महान हो तुम
तुम्हारी स्वाभाविक मुस्कान
छोड़ गयी तुम्हें या
लुटा दिया तुमने उसे
कौन लुटाता है अपनी मुस्कान
आज के जमाने में!
तुम सचमुच महान हो गोर्बी

मेरे प्यारे गोर्बी!
तुम्हें कहने लगे हैं लोग
हमारे गाँव की भाषा में
गोबर का चोथ
वे पवित्र करते हैं अपना घर
गोबर से लीप कर
लेकिन ताजा गोबर से,
तुम तो प्रतीक्षा कर सकते हो
हम भी कर सकते हैं
प्रतीक्षा में सूख जाता है गोबर
गोबर प्रतीक्षा करता नहीं रह सकता
क्या तुम्हें रह गयी है किसी की प्रतीक्षा?
प्रतीक्षा मुझे है तुम्हारी नहीं!

रक्त कमल परती पर (कविता)

यहाँ, वहाँ हर तरफ
उठे हैं अनगिनत हाथ
हर तरफ से अनगिनत कदम
चल पड़े हैं एक साथ
ये कदम चले हैं वहाँ
बीहड़ पर्वत के पार से
ये कदम चले हैं
गहरी घाटी के अंधियार से
पहाड़ों पर दौड़ कर
चढ़े हैं ये मजबूत कदम
धुएं की नदी पार कर के
बढ़े हैं ये जंगजू कदम
रोशनी के बिना
घोर जंगल है जिन्दगी जहाँ
ये कदम बना रहे हैं
किरणों के लिए द्वार वहाँ
अनगिनत हाथ
उठे हैं जंगल से ऊपर
ये हाथ उठे हैं
पूँजी के दानव से लड़ कर
ये हाथ हैं जो
कोयले की आग में तपे हैं
लोहे जैसा गल कर जो
इस्पात-से ढले हैं
इन हाथों ने
अपनी मेहनत की बूंदों से
सजाया है
पथरीले जीवन को फूलों से
हमने देखा हर हाथ
यहाँ एक सूरज है
हर कदम यहाँ
अमिट इतिहास-चरण है
इन्होंने गढ़ डाला है
एक नया सूरज धरती पर
उगाये हैं यहाँ अनगिन
रक्त कमल परती पर

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