ख़ालिद कर्रार की रचनाएँ

बात ये है के कोई बात पुरानी भी नहीं 

बात ये है के कोई बात पुरानी भी नहीं
और इस ख़ाक में अब कोई निशानी भी नहीं

ये तो ज़ाहिर में तमव्वुज था बला का लेकिन
या बदन मेरा जहाँ कोई रवानी भी नहीं

या तो इक मौज-ए-बला-ख़ेज है मेरी ख़ातिर
या के मश्कीज़ा-ए-जाँ में कहीं पानी भी नहीं

बात ये है के सभी भाई मेरे दुश्मन हैं
मसअला ये है के मैं युसुफ-ए-सानी भी नहीं

सच तो ये है के मेरे पास ही दिरहम कम हैं
वरना इस शहर में इस दर्जा गिरानी भी नहीं

सारे किरदार है अंगुश्त-ब-दंदाँ मुझ में
अब तो कहने को मेरे पास कहानी भी नहीं

एक बे-नाम-ओ-नसब सच मेरा इज़हार हुआ
वरना अल्फाज़ में वो सैल-ए-मआनी भी नहीं

बला की प्यास भी हद्द-ए-नज़र में पानी था

बला की प्यास भी हद्द-ए-नज़र में पानी था
के आज ख़्वाम में सहरा था घर में पानी था

फिर इस बे बाद मेरी रात बे-मिसाल हुई
उधर वो शोला-बदन था इधर मैं पानी था

न जाने ख़ाक के मिज़गाँ पे आबशर था क्या
मेरा कुसूर था मेरे शरर में पानी था

तमाम उम्र ये उक़दा न वा हुआ मुझ पर
के हाथ में था या चश्म-ए-ख़िजर में पानी था

अजीब दश्त-ए-तमन्ना से था गुज़र ‘ख़ालिद’
बदन में रेग-ए-रवाँ थी सफर में पानी था

धुआँ शोरिश रवानी बे-यक़ीनी 

धुआँ शोरिश रवानी बे-यक़ीनी
हवा रफ़्तार पानी बे-यक़ीनी

ख़ला इंसान वहशत ख़ाक हिजरत
मकाँ रस्ते निशानी बे-यक़ीनी

अज़ल बाबील रावी ख़ून आदम
अब क़ाबील सानी बे-यक़ीनी

अज़ल ख़ाली ख़ला अंजाम आख़िर
अबद आबाद फ़ानी बे-यक़ीनी

बदन आगोश रस्ता काम गंदुम
दवा बच्चे जवानी बे-यक़ीनी

फ़ज़ा रौशन अँधेरा जश्न गलियाँ
ख़ुशी मातम कहानी बे-यक़ीनी

मसाजिद शंख माबद बुत कलीसे
यक़ीं सर भीड़ पानी बे-यक़ीनी

है मोल-भाव में बाज़ार मे है साथ मेरे

है मोल-भाव में बाज़ार मे है साथ मेरे
वो एक कार-ए-फ़ना-ज़ार में है साथ मेरे

सलीब-ए-जाँ से विसाल आसमाँ के साहिल तक
हर एक लज़्ज़त-आज़ार में है साथ मेरे

कभी तो हीरो बनाता है और कभी जोकर
हर एक रंग के किरदार में है साथ मेरे

यही बहुत है मेरे जिस्म ओ जाँ का हिस्सा है
कहीं तो मौज-ए-ख़ूँ-बार में साथ मेरे

अजब गुमान है जैसे के सरफ़राज हूँ मैं
अजीब फ़ित्ना-ए-दस्तार में है साथ मेरे

कभी मुझे भी ज़रा मोजज़ा-नुमा करता
जो अपनी ज़ात के असरार में हैं साथ मेरे

वो दस्तरस में है लेकिन नज़र से ग़ाएब है
हरीफ़-ए-जाँ कोई पैकार में है साथ मेरे

मैं इक निगाह को महसूस कर रहा हूँ मुदाम
कोई तो रेग-ए-फ़ना-ज़ार में है साथ मेरे

वो सारे ख़ेमे लगाता है फिर उखाड़ता है
सराब-ए-मंज़िल-ओ-आसार में है साथ मेरे

जो छोड़ देता है दश्त-ए-ज़वाल में तनहा
वा रेल-पेल में बाज़ार में है साथ मेरे

इम्कान से बाहर अभी आसार से आगे 

इम्कान से बाहर अभी आसार से आगे
महशर है मेरे दीदा-ए-ख़ूँ-बार से आगे

इरफ़ान की हद या मेरे पैकर की शरारत
निकला मेरा साया मेरी दस्तार से आगे

इक ज़िंस-ज़दा नस्ल है तहज़ीब के पीछे
बाज़ार है इक कूचा ओ बाज़ार से आगे

सूरज है शब ओ रोज़ तआक़ुब में वगरना
है और बहुत रात के असरार से आगे

हम लोग मंज़िल के भुलावे के गिरफ़्तार
आसार से पीछे कभी आसार से आगे

किसी के ख़्वाब को एहसास से बाँधा हुआ है

किसी के ख़्वाब को एहसास से बाँधा हुआ है
बहुत पुख़्ता बहुत ही पास से बाँधा हुआ है

हमारे तख़्त को मशरूत कर रखा है उस ने
हमारे ताज को बन-बास से बाँधा हुआ है

सियाही उम्र भर मेरे तआकुब में रहेगी
के मैं ने जिस्म को क़िरतास से बाँधा हुआ है

मेरे इसबात की चाबी को अपने पास रख कर
मेरे इंकार को एहसास से बाँधा हुआ है

हमारे बाद इन आबादियों में ख़ैर कीजो
समंदर हम ने अपनी प्यास से बाँधा हुआ है

सजा रखी है उस ने अपनी ख़ातिर एक मसनद
मेरे आफ़ाक़ को अनफ़ास से बाँधा हुआ है

अजब पहरे मेरे अफ़कार पर रखे हैं ‘ख़ालिद’
अजब खटका मेरे एहसास से बाँधा हुआ है

रवाँ है मौज-ए-फ़ना जिस्म ओ जाँ उतार मुझे /

रवाँ है मौज-ए-फ़ना जिस्म ओ जाँ उतार मुझे
उतार अब के सर-ए-आसमाँ उतार मुझे

मेरा वजूद समंदर के इजि़्तराब में है
के खुल रहा है तेरा बाद-बाँ उतार मुझे

बहुत अज़ीज़ हूँ ख़ारान-ए-ताज़ा-कार को मैं
बहुत उदास है दश्त-ए-जवाँ उतार मुझे

कोई जज़ीरा जहाँ हस्त ओ बूद हो न फ़ना
वजूद हो न ज़माना वहाँ उतार मुझे

सबा की ख़ाक-नवर्दी सुबू की वीरानी

सबा की ख़ाक-नवर्दी सुबू की वीरानी
तुम्हारे बाद हुई आरज़ू की वीरानी

तेरे बग़ैर मेरे हौसले ज़वाल-पज़ीर
तेरे बग़ैर मेरी जुस्तुजू की वीरानी

शुमार-ए-उम्र-ए-गुरेज़ाँ हिसाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद
वज़ू की ख़ाना-पुरी थी लहू की वीरानी

हर एक दश्त पुराना सराब-ए-जाँ की तरह
हर एक शहर नया आबरू की वीरानी

तुम्हारे साथ से मेरे सुख़न की शीरीनी
तुम्हारे बाद मेरी गुफ़्तगू की वीरानी

तमाम रात सराब-ए-सफर का धड़का था
तमाम रात थी इक हाव-हू की वीरानी

सफ़र रस्ता सऊबत ख़्वाब सहरा

सफ़र रस्ता सऊबत ख़्वाब सहरा
समंदर वाहिमा ख़ूनाब सहरा

सफ़ीने बारिशें तूफ़ान मौसम
जज़ीरे कश्तियाँ सैलाब सहरा

मुसाफ़िर रेत डंठल प्यास पानी
खजूरें बाग़ घर तालाब सहरा

कलीसा मौलवी रहिब पुजारी
कलस मीनार बुत मेहराब सहरा

मशीनें घर धुआँ गंदुम क़तारें
मुलाज़िम नींद बच्चे ख़्वाब सहरा

ज़मीं पत्थर शजर नहरें किनारे
ख़ला नक़्शें हदें गिर्दाब सहरा

सहरा सागर सब पानी

सहरा सागर सब पानी
सब्ज़ा बंजर सब पानी

अव्वल अव्वल पानी था
आख़र आख़र सब पानी

पानी पानी शहर-पनाह
मस्जिद मंदर सब पानी

कोई दिन ऐसा होगा
सहरा सागर सब पानी

मुस्तक़बिल मिट्टी का ढेर
माज़ी खंडर सब पानी

आग धमाके ख़ून धुआँ
नेज़े लश्कर सब पानी

सारी दुनिया डाँवा डोल
धरती सागर सब पानी

अंदर अंदर आग धुआँ
जिस्म के बाहर सब पानी

सारे मोवाह्हिद पानी के
फूल मुजावर सब पानी

वुरूद-ए-जिस्म था जाँ का अज़ाब होने लगा 

वुरूद-ए-जिस्म था जाँ का अज़ाब होने लगा
लहू में उतरा मगर ज़हर आब होने लगा

कोई तो आए सुनाए नवेद-ए-ताज़ा मुझे
उठो के हश्र से पहले हिसाब होने लगा

उसे शुबह है झुलस जाएगा वो साथ मेरे
मुझे ये ख़ौफ के मैं आफताब होने लगा

फिर उस के सामने चुप की कड़ी लबों पे लगी
मेरा ये मंसब-ए-हर्फ आब आब होने लगा

मैं अपने ख़ोल में ख़ुश भी था मुइमइन भी था
मैं अपनी ख़ाक से निकला ख़राब होने लगा

ज़रूर मुझ से ज़ियादा है उस में कुछ ‘ख़ालिद’
मेरा हरीफ अगर फ़तह-याब होने लगा

इस में ये दश्त था 

इस में ये दश्त था
इस दश्त में
मख़्लूक कब वारिद हुई
ख़ुदा मालूम
लेकिन
सब बड़े बूढ़े ये कहते हैं
उधर एक दश्त था
जाने क्यूँ उन को यहाँ
लम्बी क़तारों
शहर की गुंजान गलियों
दफ़्तरों
शाह-राहों
रास्तों और रेस्तोरानों
जलसे जुलूसों
रेलियों और
ऐवाना हा-ए-बाला-ओ-ज़िरीं में
ख़ुश-लिबासी के भरम में
नाचती वहशत नज़र आती नहीं

आँख वा थी 

आँख वा थी
होंट चुप थे
एक रिदा-ए-यख़ हवा ने ओढ़ ली थी
जबीं ख़ामोश
सज्दे बे-ज़बाँ थे
आगे इक काला समंदर
पीछे सुब्ह-ए-आतिशीं थी
और जब लम्हें रवाँ थे
हम कहाँ थे

गो हमें मालूम था 

गो हमें मालूम था
के अब वो सिलसिला बाक़ी नहीं है
गो हमें मालूम था के
नूह आने के नहीं अब
हाँ मगर जब शहर में पानी दर आया
हम ने कफछ मौहूम उम्मीदों को पाला
और इक बड़े पिंडाल पे यकजा हुए हम
और ब-यक आवाज़ हम ने नूह को फिर से पुकारा
गो हमें मालूम था के
नूह आने के नहीं अब
गो हमें एहसास ये भी था के हम ने
ख़ुद ही वो सारा समंदर काट कर
उस का रूख़ मोड़ा था अपने शहर की जानिक
मगर हम मुतमइन थे
मौहूम उम्मीदों को आए दिन जवाँ करते हुए हम सब
के फिर से नूह आएँगे
बुलाएँगे
जिलो में अपने ताज़ा कश्तियाँ
मख़्लूक-ए-ख़ुदा के ताज़ा जोड़े लाएँगे
और हम फिर से
नूह की कश्ती में पानी से निकल जाएँगे इक दिन
के अब पानी फ़सीलें तोड़ कर
शहर को दरिया बनाने पे तुला है
अब नहीं मालूक के हम किस जगह हैं कौन हैं हम
हम अभी तक मुंतज़िर हैं
अब हमें कामिल यक़ीं हैं
इब्न-ए-मरयम लौट आएँगे
हमें ज़िंदा उठाएँगे

मुझे बता कर 

मुझे बता कर
के मेरी सम्त-ए-सफ़र कहाँ है
कई ख़ज़ानों के
बे-निशान नक़्शे
मुझे थमा कर
कहा था उस ने के सातवें दर से और आगे
तुम्हारी ख़ातिर
मेरा वो बाब-ए-बक़ा खुला है
मगर
वहाँ पर तमाम दर वा थे मेरी ख़ातिर
वो सातवाँ दर खुला नहीं था
मगर वहाँ पर
कोई भी राज़-ए-बक़ा नहीं था
तमाम अज्साम थे सलामत
कोई भी ज़िंदा बचा नहीं था
कोई भी मेरे सिवा नहीं था
वहाँ भी कोई ख़ुदा नहीं था

जला रहा हूँ 

जला रहा हूँ
कई यूगों से
मैं उस को ख़ुद ही जला रहा हूँ
जला रहा हूँ कि उसे के जलमे में
जीत मेरी है मात उस की
जला रहा हूँ बड़े पिण्डाल में सजा कर
जला रहा हूँ
मिटा रहा हूँ
मगर वो
मेरी ही मन की अँधेर नगरी में जी रहा हूँ
वो मेरी लंका में अपने पाँव पसारे बैठा
कई युगों से
मुझै मुसलमल चिड़ा रहा है

व्यवस्था भी बहुत ज़्यादा नहीं है

व्यवस्था भी बहुत ज़्यादा नहीं है
जतन जोखम बहुत हैं
आगे जो जंगल है वो
उस से भी ज़्यादा गुंजलक है
तपस्या के ठिकाने
ज्ञान के मंतर
ध्यान की हर एक सीढ़ी पर
वही मूरख
अजब सा जाल ताने बैठा है युगों से
न जाने क्यूँ
मेरे रावण से उस को
पराजय का ख़तरा है
तो यूँ करता हूँ
अब के ख़ुद को ख़ुद से त्याग देता हूँ

ज़वाँ रातों में काला दश्त 

ज़वाँ रातों में काला दश्त
क़ालब में उतरता है
के मेरे जिस्म ओ जाँ के मर्ग़-ज़ारों की महक
हवा के दोश पर रक़्स करती है
प्यासी रेत सहराओं की धँसती है
रग ओ पय में
उधड़ते हैं मसामों से
लहू-ज़ारों के चश्मे
बर्फ़ कोहसार के सारे परिंदे
गीत गाते हैं
हुबाब उठता है
गहरे नील-गूँ-ज़िंदा समंदर का
हमाला साँस में ढल कर
ग्लेशियर सा पिघलता है
जवाँ रातें
रेग-ज़ारों की प्यासी रेत
समंदर का हुबाब
बर्फ़ कोह-सार के सारे परिंदे
हमाला और गलेश्यिर
जवाँ रातों में
मेरी काएनातों में
नए सय्यारे और ताज़ा जहाँ दरयाफ़्त करते हैं
के मुझ पर लफ़्ज बारिश से उतरते हैं

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