ख़ालिद मलिक ‘साहिल’ की रचनाएँ

मेरे भी कुछ गिले थे मगर रात हो गई 

मेरे भी कुछ गिले थे मगर रात हो गई
कुछ तुम भी कि रहे थे मगर रात हो गई

दुनिया से दूर अपने बराबर खड़े रहे
ख़्वाबों में जागते थे मगर रात हो गई

आसाब सुन रहे थे थकावट की गुफ़्तुगू
उलझन थी मसअले थे मगर रात हो गई

आँखों की रौशनी में अंधेरे बिखर गए
ख़ेमे से कुछ जले थे मगर रात हो गई

ऐ दिल ऐ मेरे दिल ये सुना है कि शाम को
घर से वो चल पड़े थे मगर रात हो गई

ऐसी भी क्या वफ़ा की कहानी थी रो पड़े
कुछ सिलसिले चले थे मगर रात हो गई

कुछ ज़ीने इख़्तियार के चढ़ने लगा था मैं
कुछ वो उतर रहे थे मगर रात हो गई

दुश्मन की दोस्ती ने मसाफ़त समेट ली
क़दमों में रास्ते थे मगर रात हो गई

‘साहिल’ फ़रेब-ए-फ़िक्र है दुनिया की दास्ताँ
कुछ राज़ खुल चले थे मगर रात हो गई

 

बड़े जतन से बड़े सोच से उतारा गया

बड़े जतन से बड़े सोच से उतारा गया
मिरा सितारा सर-ए-ख़ाक भी सँवारा गया

मिरी वफ़ा ने जुनूँ का हिसाब देना था
सो आज मुझ को बयाबान से पुकारा गया

बस एक ख़ौफ़ था ज़िंदा तिरी जुदाई का
मिरा वो आख़िरी दुश्मन भी आज मारा गया

मुझे यक़ीन था इस तज-रबे से पहले भी
सुना है ग़ैर से जल्वा नहीं सहारा गया

सजा दिया है तसव्वुर ने धूप का मंज़र
अगरचे बर्फ़ की तस्वीर से गुज़ारा गया

मिला है ख़ाक से निस्बत का फिर सिला मुझ को
मिरा ही नाम है गर्दूं से जो पुकारा गया

मैं देखता रहा दुनिया को दूर से ‘साहिल’
मिरे मकान से आगे तलक किनारा गया

 

किसी भी राह पे रूकना न फ़ैसला कर के

किसी भी राह पे रूकना न फ़ैसला कर के
बिछड़ रहे हो मिरी जान हौसला कर के

मैं इंतिज़ार की हालत में रह नहीं सकता
वो इंतिहा भी करे आज इब्तिदा कर के

तिरी जुदाई का मंज़र बयाँ नहीं होगा
मैं अपना साया भी रक्खूँ अगर जुदा कर के

मुझे तो बहर-ए-बला-ख़ेज की ज़रूरत थी
सिमट गया हूँ मैं दुनिया को रास्ता कर के

किसी ख़याल का कोई वजूद हो शायद
बदल रहा हूँ मैं ख़्वाबों को तजरबा कर के

कभी न फै़सला जल्दी में कीजिए ‘साहिल’
बदल भी सकता है काफ़िर वो बद-दुआ कर के

 

मैं अपनी आँख भी ख़्वाबों से धो नहीं पाया 

मैं अपनी आँख भी ख़्वाबों से धो नहीं पाया
मैं कैसे दूँगा ज़माने को जो नहीं पाया

शब-ए-फ़िराक़ थे मौसम अजीब था दिल का
मैं अपने सामने बैठा था रो नहीं पाया

मिरी ख़ता है कि मैं ख़्वाहिशों के जंगल में
कोई सितारा कोई चाँद बो नहीं पाया

हसीन फूलों से दीवार-ओ-दर सजाए थे
बस एक बर्ग-ए-दिल आसा पिरो नहीं पाया

चमक रहे थे अंधेरे में सोच के जुगनू
मैं अपने याद के ख़ेमे में सो नहीं पाया

नहीं है हर्फ़-ए-तसल्ली मगर कहूँ ‘साहिल’
नहीं जो पाया कहीं यार तो नहीं पाया

 

मैं भी हुज़ूर-ए-यार बहुत देर तक रहा

मैं भी हुज़ूर-ए-यार बहुत देर तक रहा
आँखों में फिर ख़ुमार बहुत देर तक रहा

कल शाम मेरे क़त्ल की तारीख़ थी मगर
दुश्मन का इंतिज़ार बहुत देर तक रहा

अब ले चला है दश्त में मेरा जुनूँ मुझे
इस जिन पे इख़्तियार बहुत देर तक रहा

वो इंकिशाफ़-ए-ज़ात का लम्हा था खुल गया
शायद दरून-ए-ग़ार बहुत देर तक रहा

अब देखते हो कोई सहारा मिल तुम्हें
मैं भी तो अश्क-बर बहुत देर तक रहा

तुम मस्लहत कहो या मुनाफ़िक़ कहो मुझे
दिल में मगर ग़ुबार बहुत देर तक रहा

मैं ख़ाक आसमाँ की बुलंदी को देखता
अपनों पे ए‘तिबार बहुत देर तक रहा

इल्ज़ाम-ए-ख़ुद-सरी भी तो साबित किया गया
मैं जब कि ख़ाकसार बहुत देर तक रहा

‘साहिल’ मिरी बला से मिरा हश्र होगा क्या
दुनिया में बा-वक़ार बहुत देर तक रहा

 

तक़दीर के दरबार में अलक़ाब पड़े थे 

तक़दीर के दरबार में अलक़ाब पड़े थे
हम लोग मगर ख़्वाब में बे-ख़्वाब पड़े थे

यख़-बस्ता हवाओं में थी ख़ामोश हक़ीक़त
हम सोच की दहलीज़ पे बेताब पड़े थे

तस्वीर थी एहसास की तहरीर हवा की
सहरा में तिरे अक्स के गिर्दाब पड़े थे

कल रात में जिस राह से घर लौट के आया
उस राह में बिखरे हुए कुछ ख़्वाब पड़े थे

वो फूल जिन्हें आप ने देखा था अदा से
उजड़े हुए मौसम में भी शादाब पड़े थे

पच्चीस बरस बाद उसे देख के सोचा
इक क़तरा-ए-कम-ज़ात में ग़र्क़ाक पड़े थे

हम लोग तो अख़्लाक़ भी रख आए हैं ‘साहिल’
रद्दी के इसी ढेर में आदाब पड़े थे

 

तू तिश्नगी की अज़िय्यत कभी फ़ुरात से पूछ

तू तिश्नगी की अज़िय्यत कभी फ़ुरात से पूछ
अँधेरी रात की हसरत अँधेरी रात से पूछ

गुज़र रही है जो दिल पर वही हक़ीक़त है
ग़म-ए-जहाँ का फ़साना ग़म-ए-हयात से पूछ

मैं अपने आप में बैठा हूँ बे-ख़बर तो नहीं
नहीं है कोई तअल्लुक़ तो अपनी ज़ात से पूछ

दुखी है शहर के लोगों से बद-मिज़ाज बहुत
जो पूछना है मोहब्बत से एहतियात से पूछ

तू अपनी ज़ात के अंदर भी झाँक ले ‘साहिल’
ज़मीं को भेद किसी रोज़ काएनात से पूछ

 

कुछ दिल का तअल्लुक़ तो निभाओ कि चला मैं 

कुछ दिल का तअल्लुक़ तो निभाओ कि चला मैं
या टूट के आवाज़ लगाओ कि चला मैं

दरपेश मसाफ़त है किसी ख़्वाब-नगर की
इक दीप मिरे पास जलाओ कि चला मैं

इस शहर के लोगों पे भरोसा नहीं करना
ज़ंजीर कोई दर पे लगाओ कि चला मैं

ता-दिल में तुम्हारे भी न एहसास-ए-वफ़ा हो
जी भर के मुझे आज सताओ कि चला मैं

मुश्ताक़ निगाहों से ये सेहर टूट रहा है
चेहरे पे कोई रंग सजाओ कि चला मैं

इस शहर-ए-मरासिम में तो संगसार हुआ हूँ
पत्थर ही सर-ए-राह सजाओ कि चला मैं

इस तिश्ना-लबी पर मुझे एज़ाज़ तो बख़्शो
ऐ बादा-कशो जाम उठाओ कि चला मैं

इस दर्जा तग़ाफ़ुल की नहीं ताब जिगर को
तुम और बहाने न बनाओ कि चला मैं

इक ख़्वाब है वो ख़्वाब तो पूरा करो ‘साहिल’
इक शेर मिरा मुझ को सुनाओ कि चला मैं

 

 

 

 

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