ख़ालिद महमूद की रचनाएँ

आँखों में धूप दिल में हरारत लहू की थी

आँखों में धूप दिल में हरारत लहू की थी
आतिश जवान था तो क़यामत लहू की थी

ज़ख़्मी हुआ बदन तो वतन याद आ गया
अपनी गिरह में एक रिवायत लहू की थी

ख़ंजर चला के मुझ पे बहुत ग़म-ज़दा हुआ
भाई के हर सुलूक में शिद्दत लहू की थी

कोह-ए-गिराँ के सामने शीशे की क्या बिसात
अहद-ए-जुनूँ में सारी शरारत लहू की थी

रूख़्सार ओ चश्म ओ लब गुल ओ सहबा शफ़क़ हिना
दुनिया-ए-रंग-ओ-बू में तिजारत लहू की थी

‘ख़ालिद’ हर एक ग़म में बराबर का शरीक था
सारे जहाँ के बीच रफ़ाकत लहू की थी

बराए तिश्ना-लब पानी नहीं है 

बराए तिश्ना-लब पानी नहीं है
समंदर का कोई सानी हैं

हमारा घर भी सहरा हो गया है
मगर ‘ग़ालिब’ सी वीरानी नहीं है

रगों में ख़ून शोख़ी कर रहा है
सितारे सी वो पेशानी नहीं है

मैं अपने घर के अंदर चैन से हूँ
किसी शय की फ़रावानी नहीं है

निज़ाम-ए-जिस्म जम्हूरी है ‘ख़ालिद’
किसी जज़्बे की सुल्तानी नहीं है

हर इक फ़ैसला उस ने बेहतर किया 

हर इक फ़ैसला उस ने बेहतर किया
मुझे आँख दी तुम को मंज़र दिया

दिल-ए-ख़ूँ-चकीदा मुनव्वर किया
तो आँखों का सहरा समंदर किया

लकीरों को रौशन सितारे दिए
सितारों को अपना मुक़द्दर किया

वहीं डूबने का यक़ीं आ गया
जहाँ उस ने हम को शनावर किया

उजाला नफ़ी है जब उस ने कहा
अँधेरे में थे हम ने बावर किया

झपटते हैं झपटने के लिए परवाज़ करते हैं

झपटते हैं झपटने के लिए परवाज़ करते हैं
कबूतर भी वही करने लगे जो बाज़ करते हैं

वही क़िस्से वही बातें के जो ग़म्माज़ करते हैं
तेरे हम-राज़ करते हैं मेरे दम-साज़ करते हैं

ब-सद हीले बहाने ज़ुल्म का दर बाज़ करते हैं
वही जाँ-बाज़ जिन पर हर घड़ी हम नाज़ करते हैं

ज़्यादा देखते हैं जब वो आँखें फेर लेते हैं
नज़र में रख रहे हों तो नज़र-अंदाज़ करते हैं

सताइश-घर के पंखों से हवा तो कम ही आती है
मगर चलते हैं जब ज़ालिम बहुत आवाज़ करते हैं

ज़माने भर को अपना राज़-दाँ करने की ठहरी है
तो बेहतर है चलो उसे शोख़ को हम-राज़ करते हैं

डराता है बहुत अंजाम-ए-नमरूदी मुझे ‘ख़ालिद’
ख़ुदा लहजे में जब बंदे सुख़न आगाज़ करते हैं

मुक़ाबला हो तो सीने पे वार करता है 

मुक़ाबला हो तो सीने पे वार करता है
वो दुश्मनी भी बड़ी पुर-वक़ार करता है

जो हो सके तो उसे मुझ से दूर ही रखिए
वो शख़्स मुझ पे बड़़ा ऐतबार करता है

नगर में उस की बहुत दुश्मनी के चर्चे हैं
मगर वो प्यार भी दिवाना-वार करता है

मैं जिस ख़याल से दामन-कशीदा रहता हूँ
वही ख़याल मेरा इंतिज़ार करता है

शिकायतें उसे जब दोस्तों से होती है
तो दोस्तों में हमें भी शुमार करता है

नहीं है अगर उन में बारिश हवा

नहीं है अगर उन में बारिश हवा
उठा बादलों की नुमाइश हवा

गहे बर्फ है गाह आतिश हवा
तुझे क्यूँ है दिल्ली से रंजिश हवा

मैं गुंजान शहरों का मारा हुआ
नवाज़िश नवाज़िश नवाज़िश हवा

तेरे साथ चलने की आदत नहीं
हमारी न कर आज़माइश हवा

शिकस्ता सफ़ीना मुसाफ़िर निढाल
तलातुम शब-ए-तार बारिश हवा

अब अश्क ओ तपिश चश्म ओ दिल में नहीं
थे यक-जा कभी आब ओ आतिश हवा

रास्ता पुर-ख़ार दिल्ली दूर है 

रास्ता पुर-ख़ार दिल्ली दूर है
सच कहा है यार दिल्ली दूर है

काम दिल्ली के सिवा होते नहीं
और ना-हंजार दिल्ली दूर है

अब किसी जा भी सुकूँ मिलता नहीं
आसमाँ कह्हार दिल्ली दूर है

फूँक देता है हर इक के कान मे
सुब्ह का अख़बार दिल्ली दूर है

कल तलक कहते हैं दिल्ली दूर थी
आज भी सरकार दिल्ली दूर है

सुब्ह गुज़री शाम होने आई मीर
तेज़ कर रफ़्तार दिल्ली दूर है

कौन दिल्ली से मसीहा लाएगा
ऐ दिल-ए-बीमारी दिल्ली दूर है

शायद के मर गया मेरे अंदर का आदमी

शायद के मर गया मेरे अंदर का आदमी
आँखें दिखा रहा है बराबर का आदमी

सूरज सितारे कोह ओ समंदर फ़लक ज़मीं
सब एक कर चुका है ये गज़ भर का आदमी

आवाज़ आई पीछे पलट कर तो देखिए
पीछे पलट के देखा तो पत्थर का आदमी

इस घर का टेलिफ़ोन अभी जाए जाएगा
साहब को ले के चल दिया दफ़्तर का आदमी

ज़र्रे से कम-बिसात पे सूरज-निगाहियाँ
‘ख़ालिद’ भी अपना है तो मुक़द्दर का आदमी

वक़्त-ए-क़याम दस्त-ए-कज़ा ने नहीं दिया

वक़्त-ए-क़याम दस्त-ए-कज़ा ने नहीं दिया
चलने लगे तो साथ हवा ने नहीं दिया

पहले ही मरहले में क़लम हो के रह गए
दस्त-ए-हुनर को हाथ दिखाने नहीं दिया

गिरना तो क्या बुरा था मगर उस को क्या कहें
जो गिर गया तो उठने उठाने नहीं दिया

अब उन की कज-रवी से शिकायत हैं हमें
हम ने ही उन को राह पे आने नहीं दिया

दो चार कारें कोठियाँ दस बीस लाख बस
इस से ज़्यादा ख़ौफ-ए-ख़ुदा ने नहीं दिया

मैं सिर्फ़ टेलिफ़ोन का एहसान-मंद हूँ
उन का पयाम बाद-ए-सबा ने नहीं दिया

उस यार-ए-शोख़-चश्म से ‘ख़ालिद’ का इर्तिबात
इक राज़ था के जिस को छुपाने नहीं दिया

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