ख़ुमार बाराबंकवी की रचनाएँ

दुनिया के ज़ोर प्यार के दिन 

दुनिया के ज़ोर प्यार के दिन याद आ गये
दो बाज़ुओ की हार के दिन याद आ गये

गुज़रे वो जिस तरफ से बज़ाए महक उठी
सबको भरी बहार के दिन याद आ गये

ये क्या कि उनके होते हुए भी कभी-कभी
फोर्दोस-ए-इंत्ज़ार के दिन याद आ गये

वादे का उनके आज खयाल आ गया मुझे
शक और ऐतबार के दिन याद आ गये

नादा थे जब्त-ए-गम का बहुत हज़रत-ए-“खुमार”
रो-रो जिए थे जब वो याद आ गये

ये मिसरा नहीं है

ये मिसरा नहीं है वज़ीफा मेरा है
खुदा है मुहब्बत, मुहब्बत खुदा है

कहूँ किस तरह में कि वो बेवफा है
मुझे उसकी मजबूरियों का पता है

हवा को बहुत सरकशी का नशा है
मगर ये न भूले दिया भी दिया है

मैं उससे ज़िदा हूँ, वो मुझ से ज़ुदा है
मुहब्बत के मारो का बज़्ल-ए-खुदा है

नज़र में है जलते मकानो मंज़र
चमकते है जुगनू तो दिल काँपता है

उन्हे भूलना या उन्हे याद करना
वो बिछड़े है जब से यही मशगला है

गुज़रता है हर शक्स चेहरा छुपाए
कोई राह में आईना रख गया है

कहाँ तू “खुमार” और कहाँ कुफ्र-ए-तौबा
तुझे पारशाओ ने बहका दिया है

कभी शेर-ओ-नगमा बनके 

कभी शेर-ओ-नगमा बनके कभी आँसूओ में ढलके
वो मुझे मिले तो लेकिन, मिले सूरते बदलके

कि वफा की सख़्त राहे कि तुम्हारे पाव नाज़ुक
न लो इंतकाम मुझसे मेरे साथ-साथ चलके

न तो होश से ताल्लुक न जूनू से आशनाई
ये कहाँ पहुँच गये हम तेरी बज़्म से निकलके

वो हमें जिस कदर आज़मा रहे है

वो हमें जिस कदर आज़माते रहे
अपनी ही मुश्किलो को बढ़ाते रहे

थी कमाने तो हाथो में अब यार के
तीर अपनो की जानिब से आते रहे

आँखे सूखी हुई नदियाँ बन गई
और तूफ़ा बदस्तूर आते रहे

कर लिया सब ने हमसे किनारा मगर
एक नास-ए-गरीब आते जाते रहे

प्यार से उनका इंकार बरहक मगर
उनके लब किसलिए थरथराते रहे

याद करने पर भी दोस्त आए न याद
दोस्तो के करम याद आते रहे

बाद-ए-तौबा ये आलम रहा मुद्द्तो
हाथ बेजाम भी लब तक आते रहे

अल्लमा लफ़्जिशे यक तब्बसुम “खुमार”
ज़िन्दगी भर हम आँसू बहाते रहे

वो जो आए हयात याद आई

वो जो आए हयात याद आई
भूली बिसरी सी बात याद आई

कि हाल-ए-दिल उनसे कहके जब लौटे
उनसे कहने की बात याद आई

आपने दिन बना दिया था जिसे
ज़िन्दगी भर वो रात याद आई

तेरे दर से उठे ही थे कि हमें
तंगी-ए-कायनात याद आई

न हारा है इश्क और न दुनिया थकी है

न हारा है इश्क और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है

सुकू ही सुकू है खुशी ही खुशी है
तेरा गम सलामत मुझे क्या कमी है

वो मौज़ूद है और उनकी कमी है
मुहब्बत भी तहाई-ए-दायमी है

खटक गुदगुदगी का मज़ा दे रही है
जिसे इश्क कहते है शायद यही है

चारागो के बदले मकान जल रहे है
नया है ज़माना नई रोशनी है

जफ़ाओ पे घुट-घुट के चुप रहने वालो
खामोशी जफ़ाओ की ताईद भी है

मेरे राह पर मुझको गुमराह कर दे
सुना है कि मंज़िल करीब आ गई है

ख़ुमार-ए-बलानौश तू और तौबा
तुझे ज़ाहिदो की नज़र लग गई है

सुना है वो हमें भुलाने लगे है 

सुना है वो हमें भुलाने लगे है
तो क्या हम उन्हे याद आने लगे है

हटाए थे जो राह से दोस्तो की
तो पत्थर मेरे घर में आने लगे है

ये कहना थ उनसे मुहब्ब्त हौ मुझको
ये कहने मे मुझको ज़माने लगे है

कयामत यकीनन करीब आ गई है
“ख़ुमार” अब तो मस्ज़िद में जाने लगे है

झुंझलाए है लजाए है 

झुंझलाए है लजाए है फिर मुस्कुराए है
इसके दिमाग से उन्हे हम याद आए है

अब जाके आह करने के आदाब आए है
दुनिया समझ रही है कि हम मुस्कुराए है

गुज़रे है मयकदे से जो तौबा के बाद हम
कुछ दूर आदतन भी कदम लड़खड़ाए है

ए जोश-ए-दुनिया देख, न करना खजी मुझे
आँखे मेरी ज़रूर है आँसू पराए है

ए मौत ए बहिश्ते सुकू आ खुशामदे
हम ज़िन्दगी में पहले-पहल मुस्कुराए है

कितनी भी मयकदे में है साकी पिला दे आज
हम तशना गाँव ज़ोद के सहरा से आए है

इंसान जीतेजी करे तौबा खताओ से
मजबूरियो ने कितने फरिश्ते बनाए है

काबे में खयरियत तो है सब हज़रत-ए-“खुमार”
ये गैर है जनाब यहाँ कैसे आए है

एक पल में एक सदी का मज़ा

एक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए
दो दिन की ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए

भूले है रफ़्ता-रफ़्ता उन्हे मुद्दतो में हम
किश्तो में ख़ुदकुशी का मज़ा हमसे पूछिए

आग़ाज़-ए-आशिकी का मज़ा आप जानिए
अंजाम-ए-आशिकी का मज़ा हमसे पूछिए

जलते दियो में जलते घरो जैसी लौ कहा
सरकार रोशनी का मज़ा हमसे पूछिए

वो जान ही गये कि हमे उनसे प्यार है
आँखो की मुखबिरी का मज़ा हमसे पूछिए

हँसने का शौक हमको भी था आपकी तरह

रुख़्सत-ए-शबाब

ऐसा नहीं कि हम से मुहब्ब्त नहीं रहीं
जस्बात में वो पहली सी शिद्दत नहीं रही

सर में वो इंतज़ार का सौदा नहीं रहा
दिल पर वो धड़कनो की हुकूमत नहीं रहीं

कमज़ोर ये निगाह ने संजीदा कर दिया
जन्मों से छेड़-छाड़ की आदत नहीं रहीं

आँखो से तुम दिखाओगी या इल्तयाश में
दामन-ए-यार से कोई इस्मत नहीं रहीं

चेहरे पर झुर्रियों ने कयामत बना दिया
आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रहीं

अल्लाह जाने मौत कहा मर गई “खुमार”
अब मुझको ज़िन्दगी की ज़रूरत नहीं रही

दिल को तस्कीन-ए-यार ले डूबी 

दिल को तस्कीन-ए-यार ले डूबी
इस चमन को बहार ले डूबी

अश्क को पी गए हम उनके हूज़ूर
आहद-ए-इख्तियार ले डूबी

इश्क के कारोबार को अक्सर
गर्मिए कारोबार ले डूबी

तेरे हर मशवरे को ए नाशे
आज फिर आज याद-ए-यार ले डूबी

हाल-ए-गम उनसे बार-बार कहा
और हँसी बार-बार ले डूबी

चार दिन का ही साथ था लेकिन
ज़िन्दगी-ए-खुमार ले डूबी

आँसूगदी से इश्क-ए-जवाँ को बचाइए

आँसूगदी से इश्क-ए-जवाँ को बचाइए
कोई जो मान जाए तो खुद रूठ जाइए

जश्न-ए-सूरूर बाए सनम पर मनाइए
ये कुसूर है तो कुसूर का ईमान लाईए

ये कौन आया है
आधी रात को मयकदे
तौबा ये जानाब-ए-शेख तशरीफ लाईए

काफी है आर्ज़-ए-गम के लिए मुज़्महिल हँसी
रो-रो के इश्क को न तमाशा बनाईए

बेमौत मार डालेंगी ये होश मन्दिया

ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गये

ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गए
आ जा कि ज़हर खाए ज़माने गुज़र गए

ओ जाने वाले! आ कि तेरे इंतज़ार में
रस्ते को घर बनाए ज़माने गुज़र गए

ग़म है न अब ख़ुशी है न उम्मीद है न यास
सब से नजात पाए ज़माने गुज़र गए

क्या लायक़-ए-सितम भी नहीं अब मैं दोस्तों
पत्थर भी घर में आए ज़माने गुज़र गए

जाने-बहार फूल नहीं आदमी हूँ मैं
आ जा कि मुस्कुराए ज़माने गुज़र गए

क्या-क्या तवक्कोअत थी आहों से ऐ ‘ख़ुमार’
यह तीर भी चलाए ज़माने गुज़र गए

तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती 

तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती
एक ख़्वाब सा देखा है ताबीर नहीं बनती

बेदर्द मुहब्बत का इतना-सा है अफ़साना
नज़रों से मिली नज़रें मैं हो गया दीवाना
अब दिल के बहलने की तदबीर नहीं बनती

दम भर के लिए मेरी दुनिया में चले आओ
तरसी हुई आँखों को फिर शक्ल दिखा जाओ
मुझसे तो मेरी बिगड़ी तक़दीर नहीं बनती

एक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए 

एक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए
दो दिन की ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए

भूले हैं रफ़्ता-रफ़्ता[1] उन्हें मुद्दतों में हम
किश्तों में ख़ुदकुशी[2] का मज़ा हमसे पूछिए

आगाज़े-आशिक़ी[3] का मज़ा आप जानिए
अंजामे-आशिक़ी[4] का मज़ा हमसे पूछिए

जलते दीयों में जलते घरों जैसी लौ कहाँ
सरकार रोशनी का मज़ा हमसे पूछिए

वो जान ही गए कि हमें उनसे प्यार है
आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हमसे पूछिए

हँसने का शौक़ हमको भी था आप की तरह
हँसिए मगर हँसी का मज़ा हमसे पूछिए

हम तौबा करके मर गए क़ब्ले-अज़ल[5] “ख़ुमार”
तौहीन-ए-मयकशी[6] का मज़ा हमसे पूछिये

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें धीरे-धीरे
  2. ऊपर जायें आत्म-हत्या
  3. ऊपर जायें प्रेम-आरम्भ
  4. ऊपर जायें प्रेम का अंत
  5. ऊपर जायें मौत से पहले
  6. ऊपर जायें शराब का निरादर

हुस्न जब मेहरबाँ हो तो क्या कीजिए

हुस्न जब मेहरबाँ हो तो क्या कीजिए
इश्क़ की मग़फ़िरत[1] की दुआ कीजिए

इस सलीक़े से उनसे गिला कीजिए
जब गिला कीजिए, हँस दिया कीजिए

दूसरों पर अगर तबसिरा[2] कीजिए
सामने आईना रख लिया कीजिए

आप सुख से हैं तर्के-तआल्लुक़[3] के बाद
इतनी जल्दी न ये फ़ैसला कीजिए

कोई धोखा न खा जाए मेरी तरह
ऐसे खुल के न सबसे मिला कीजिए

अक्ल-ओ-दिल अपनी अपनी कहें जब ‘खुमार’
अक्ल की सुनिए, दिल का कहा कीजिये

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें माफ़ी
  2. ऊपर जायें टीका-टिप्पणी
  3. ऊपर जायें संबंध-विच्छेद

हिज्र की शब है और उजाला है

हिज्र[1] की शब[2] है और उजाला है
क्या तसव्वुर[3] भी लुटने वाला है

ग़म तो है ऐन ज़िन्दगी लेकिन
ग़मगुसारों ने मार डाला है

इश्क़ मज़बूर-ओ-नामुराद सही
फिर भी ज़ालिम का बोल-बाला है

देख कर बर्क़[4] की परेशानी
आशियाँ[5] ख़ुद ही फूँक डाला है

कितने अश्कों को कितनी आहों को
इक तबस्सुम[6] में उसने ढाला है

तेरी बातों को मैंने ऐ वाइज़[7]
एहतरामन हँसी में टाला है

मौत आए तो दिन फिरें शायद
ज़िन्दगी ने तो मार डाला है

शेर नज़्में शगुफ़्तगी मस्ती
ग़म का जो रूप है निराला है

लग़्ज़िशें[8] मुस्कुराई हैं क्या-क्या
होश ने जब मुझे सँभाला है

दम अँधेरे में घुट रहा है “ख़ुमार”
और चारों तरफ उजाला है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें जुदाई
  2. ऊपर जायें रात
  3. ऊपर जायें कल्पना
  4. ऊपर जायें बिजली
  5. ऊपर जायें घर , आशियाना
  6. ऊपर जायें मुस्कुराहट
  7. ऊपर जायें उपदेशक
  8. ऊपर जायें लड़खड़ाहटें

ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं रही 

ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं रही
जज़्बात में वो पहले-सी शिद्दत नहीं रही

सर में वो इंतज़ार का सौदा नहीं रहा
दिल पर वो धड़कनों की हुक़ूमत नहीं रही

पैहम तवाफ़े-कूचा-ए-जानाँ के दिन गए
पैरों में चलने-फिरने की ताक़त नहीं रही

चेहरे की झुर्रियों ने भयानक बना दिया
आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रही

कमज़ोरी-ए-निगाह ने संजीदा कर दिया
जलवों से छेड़-छाड़ की आदत नहीं रही

अल्लाह जाने मौत कहाँ मर गई ‘ख़ुमार’
अब मुझको ज़िन्दगी की ज़रूरत नहीं रही

क्या हुआ हुस्न है हमसफ़र या नहीं 

क्या हुआ हुस्न है हमसफ़र या नहीं
इश्क़ मंज़िल ही मंज़िल है रस्ता नहीं

ग़म छुपाने से छुप जाए ऐसा नहीं
बेख़बर तूने आईना देखा नहीं

दो परिंदे उड़े आँख नम हो गई
आज समझा के मैं तुझको भूला नहीं

अहले-मंज़िल अभी से न मुझ पर हँसो
पाँव टूटे हैं दिल मेरा टूटा नहीं

तर्के-मय को अभी दिन ही कितने हुए
और कुछ कहा मय को ज़ाहिद तो अच्छा नहीं

छोड़ भी दे अब मेरा साथ ऐ ज़िन्दगी
है नदामत मुझे तुझसे शिकवा नहीं

तूने तौबा तो कर ली मगर ऐ ‘ख़ुमार’
तुझको रहमत पर शायद भरोसा नहीं

मुझ को शिकस्ते दिल का मज़ा याद आ गया

मुझ को शिकस्त-ए-दिल का मज़ा याद आ गया
तुम क्यों उदास हो गए क्या याद आ गया

कहने को ज़िन्दगी थी बहुत मुख़्तसर मगर
कुछ यूँ बसर हुई कि ख़ुदा याद आ गया

वाइज़ सलाम ले कि चला मैकदे को मैं
फिरदौस-ए-गुमशुदा का पता याद आ गया

बरसे बगैर ही जो घटा घिर के खुल गई
एक बेवफ़ा का अहद-ए-वफ़ा याद आ गया

मांगेंगे अब दुआ के उसे भूल जाएँ हम
लेकिन जो वो बवक़्त-ऐ-दुआ याद आ गया

हैरत है तुम को देख के मस्जिद में ऐ ‘ख़ुमार’
क्या बात हो गई जो ख़ुदा याद आ गया

अकेले हैं वो और झुंझला रहे हैं 

अकेले हैं वो और झुंझला रहे हैं
मेरी याद से जंग फ़रमा रहे हैं

इलाही मेरे दोस्त हों ख़ैरियत से
ये क्यूँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं

बहुत ख़ुश हैं गुस्ताख़ियों पर हमारी
बज़ाहिर जो बरहम नज़र आ रहे हैं

ये कैसी हवा-ए-तरक्की चली है
दीये तो दीये दिल बुझे जा रहे हैं

बहिश्ते-तसव्वुर के जलवे हैं मैं हूँ
जुदाई सलामत मज़े आ रहे हैं

बहारों में भी मय से परहेज़ तौबा
‘ख़ुमार’ आप काफ़िर हुए जा रहे हैं

बुझ गया दिल हयात बाकी है

बुझ गया दिल हयात बाक़ी है
छुप गया चाँद रात बाक़ी है

हाले-दिल उन से कह चुके सौ बार
अब भी कहने की बात बाक़ी है

रात बाक़ी थी जब वो बिछड़े थे
कट गई उम्र रात बाक़ी है

इश्क़ में हम निभा चुके सबसे ‘ख़ुमार’
बस एक ज़ालिम हयात बाक़ी है

वो सवा याद आये भुलाने के बाद 

वो सवा याद आये भुलाने के बाद
जिंदगी बढ़ गई ज़हर खाने के बाद

दिल सुलगता रहा आशियाने के बाद
आग ठंडी हुई इक ज़माने के बाद

रौशनी के लिए घर जलाना पडा
कैसी ज़ुल्मत बढ़ी तेरे जाने के बाद

जब न कुछ बन पड़ा अर्जे-ग़म का जबाब
वो खफ़ा हो गए मुस्कुराने के बाद

दुश्मनों से पशेमान होना पड़ा है
दोस्तों का खुलूस आज़माने के बाद

बख़्श दे या रब अहले-हवस को बहिश्त
मुझ को क्या चाहिए तुम को पाने के बाद

कैसे-कैसे गिले याद आए “खुमार”
उन के आने से क़ब्ल उन के जाने के बाद

हम उन्हें वो हमें भुला बैठे

हम उन्हें वो हमें भुला बैठे
दो गुनहगार ज़हर खा बैठे

हाल-ऐ-ग़म कह-कह के ग़म बढ़ा बैठे
तीर मारे थे तीर खा बैठे

आंधियो जाओ अब आराम करो
हम ख़ुद अपना दिया बुझा बैठे

जी तो हल्का हुआ मगर यारो
रो के हम लुत्फ़-ऐ-गम बढ़ा बैठे

बेसहारों का हौसला ही क्या
घर में घबराए दर पे आ बैठे

जब से बिछड़े वो मुस्कुराए न हम
सब ने छेड़ा तो लब हिला बैठे

हम रहे मुब्तला-ऐ-दैर-ओ-हरम
वो दबे पाँव दिल में आ बैठे

उठ के इक बेवफ़ा ने दे दी जान
रह गए सारे बावफ़ा बैठे

हश्र का दिन है अभी दूर ‘ख़ुमार’
आप क्यों जाहिदों में जा बैठे

ग़मे-दुनिया बहुत इज़ारशाँ है 

ग़मे-दुनिया बहुत ईज़ारशाँ है
कहाँ है ऐ ग़मे-जानाँ! कहाँ है

इक आँसू कह गया सब हाल दिल का
मैं समझा था ये ज़ालिम बेज़बाँ है

ख़ुदा महफ़ूज़ रखे आफ़तों से
कई दिन से तबीयत शादुमाँ है

वो काँटा है जो चुभ कर टूट जाए
मोहब्बत की बस इतनी दासताँ है

ये माना ज़िन्दगी फ़ानी है लेकिन
अगर आ जाए जीना, जाविदाँ है

सलामे-आख़िर अहले-अंजुमन को
‘ख़ुमार’ अब ख़त्म अपनी दास्ताँ है

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