ख़्वाजा मीर दर्द की रचनाएँ

तुहमतें चन्द अपने ज़िम्मे धर चले

तुहमतें चन्द अपने ज़िम्मे धर चले
किसलिए आये थे हम क्या कर चले

ज़िंदगी है या कोई तूफ़ान है
हम तो इस जीने के हाथों मर चले

क्या हमें काम इन गुलों से ऐ सबा
एक दम आए इधर, उधर चले

दोस्तो देखा तमाशा याँ का बस
तुम रहो अब हम तो अपने घर चले

आह!बस जी मत जला तब जानिये
जब कोई अफ़्सूँ तेरा उस पर चले

शमअ की मानिंद हम इस बज़्म में
चश्मे-नम आये थे, दामन तर चले

ढूँढते हैं आपसे उसको परे
शैख़ साहिब छोड़ घर बाहर चले

हम जहाँ में आये थे तन्हा वले
साथ अपने अब उसे लेकर चले

जूँ शरर ऐ हस्ती-ए-बेबूद याँ
बारे हम भी अपनी बारी भर चले

साक़िया याँ लग रहा है चल-चलाव,
जब तलक बस चल सके साग़र चले

‘दर्द’कुछ मालूम है ये लोग सब
किस तरफ से आये थे कीधर चले

कभी ख़ुश भी किया है दिल किसी रिन्दे-शराबी का

कभी ख़ुश भी किया है दिल किसी रिन्दे-शराबी का
भिड़ा दे मुँह से मुँह साक़ी हमारा और गुलाबी का

छिपे हरगिज़ न मिस्ल-ए-बू वो पर्दों में छिपाए से
मज़ा पड़ता है जिस गुल पैरहन को बे-हिजाबी का

शरर-ओ-बर्क़ की-सी भी नहीं याँ फ़ुर्सते-हस्ती
फ़लक़ ने हम को सौंपा काम जो कुछ था शताबी का

मैं अपना दर्दे-दिल चाहा कहूँ जिस पास आलम में
बयाँ करने लगा क़िस्सा वो अपनी ही ख़राबी का

ज़माने की न देखी ज़र्रा-रेज़ी ‘दर्द’ कुछ तूने
मिलाया मिस्ले-मीना ख़ाक में ख़ूँ हर शराबी का

क़त्ले-आशिक़ किसी माशूक़ से कुछ दूर न था

क़त्ले-आशिक़ किसी माशूक़ से कुछ दूर न था
पर तेरे अहद के आगे तो ये दस्तूर न था

रात मजलिस में तेरे हुस्न के शोले के हज़ूर
शम्मअ के मुँह पे जो देखा तो कहीं नूर न था

ज़िक्र मेरा ही वो करता था सरीहन लेकिन
मैं जो पहुँचा तो कहा ख़ैर ये मज़कूर न था

बावजूद-ए-के परो-बाल न थे आदम के
वहाँ पहुँचा के फ़रिश्ते का भी मक़दूर न था

मुह्त्सिब आज तो मयख़ाने में तेरे हाथों
दिल न था कोई के शीशे की तरह चूर न था

दर्द के मिलने से ऐ यार बुरा क्यों माना
उसको कुछ और सिवा दीद के मंज़ूर न था

दुनिया में कौन-कौन न यक बार हो गया

दुनिया में कौन-कौन न यक बार हो गया
पर मुँह फिर इस तरफ़ न किया उसने जो गया

फिरती है मेरी ख़ाक सबा दर-ब-दर लिए,
अय चश्म-ए-अश्कबार ये क्या तुझ को हो गया

आगाह इस जहाँ में नहीं ग़ैर बे ख़ुदाँ,
जागा वही इधर से जो मूँद आँख सो गया

तूफ़ान-ए-नौहा ने तो डुबाई ज़मीं फ़क़त,
मैं नन्ग-ए-खल्क़ सारी ख़ुदाई डुबो गया

बरहम कहीं न हो गुल-ओ-बुलबुल की आशती,
डरता हूँ आज बाग़ में वो तुन्द ख़ू गया

वाइज़ किसे डरावे है योम- उल्हिसाब से,
गिरिया मेरा तो नामा-ए-आमाल धो गया

फूलेंगे इस ज़बाँ में भी गुल्ज़ार-ए-मारफ़त,
याँ मैं ज़मीन-ए-शेर में ये तुख़्म बो गया

आया न ऐतदाल पर हरिगज़ मज़ाज-ए-दहर,
मैं गर्चे गर्म- ओ- सर्द-ए-ज़माना समो गया

अए ‘दर्द’ जिस की आँख खुली इस जहान में,
शबनम की तरह जान को अपनी वो रो गया|

रौँदे है नक़्शे-पा की तरह ख़ल्क़ याँ मुझे 

रौंदे है नक़्शे-पा की तरह ख़ल्क याँ मुझे
अय उम्र-रफ़्ता छोड़ गयी तू कहाँ मुझे

अय गुल तू रख़्त बाँध उठाऊँ मैं आशियाँ
गुलचीं तुझे न देख सके बाग़बाँ मुझे

रहती है कोई बिन किये मेरे तईं तमाम
जूँ शम्मअ छोड़ने की नहीं यह ज़बाँ मुझे

पत्थर तले का हाथ है गफ़लत के हाथ दिल
संगे गिराँ हुआ है यह ख़्वाबे-गिराँ मुझे

कुछ और कुंजे-ग़म के सिवा सूझता नहीं
आता है याद जब कि वो कुंजे-दिहाँ मुझे

जाता हूँ ख़ुश दिमाग़ जो सुन कर उसे कभो
बदले है वहीं नज़रें वो देखा जहाँ मुझे

जाता हूँ बस के दम-ब-दम अब ख़ाक में मिला
है ख़िज़्र-ए-राह ‘दर्द’ ये रेग़े-रवाँ मुझे

अगर यूँ ही ये दिल सताता रहेगा 

अगर यों ही ये दिल सताता रहेगा
तो इक दिन मेरा जी ही जाता रहेगा

मैं जाता हूँ दिल को तेरे पास छोड़े
मेरी याद तुझको दिलाता रहेगा

गली से तेरी दिल को ले तो चला हूँ
मैं पहुँचूँगा जब तक ये आता रहेगा

क़फ़स[1] में कोई तुम से ऐ हम-सफ़ीरों
ख़बर कल की हमको सुनाता रहेगा

ख़फ़ा हो कि ऐ “दर्द” मर तो चला तू
कहाँ तक ग़म अपना छुपाता रहेगा

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें पिंज़रा

अपने तईं तो हर घड़ी ग़म है

अपने तईं तो हर घड़ी ग़म है, अलम है, दाग़ है
याद करे हमें कभी कब ये तुझे दिमाग़ है

जी की ख़ुशी नहीं गिरो सब्ज़-ओ-गुल के हाथ कुछ
दिल हो शगुफ़्ता जिस जगह वो ही चमन है बाग़ है

किस की ये चश्म-ए-मस्त ने बज़्म को यूँ छका दिया
मस्ल-ए-हबाब सर नगुँ शरम से हर अयाग़ है

जलते ही जलते सुबह तक गुज़री उसे तमाम शब
दिल है के शोला है कोई, शमा है या चिराग़ है

पाईये किस जगह बता अये बुत-ए-बेवफ़ा तुझे
उम्र-ए-गुज़श्ता की तरह गुम ही सदा सुराग़ है

सैर-ए-बहार-ओ-बाग़ से हम को मुआफ़ कीजीये
उस के ख़याल-ए-ज़ुल्फ़ से “दर्द” किसे फ़राग़ है?

मेरा जी है जब तक तेरी जुस्तजू है

मेरा जी है जब तक तेरी जुस्तजू है
ज़बाँ जब तलक है यही गुफ़्तगू है

ख़ुदा जाने क्या होगा अंजाम इसका
मै बेसब्र इतना हूँ वो तुन्द ख़ू है

तमन्ना है तेरी अगर है तमन्ना
तेरी आरज़ू है अगर आरज़ू है

किया सैर सब हमने गुलज़ार-ए-दुनिया
गुले-दोस्ती में अजब रंगो-बू है

ग़नीमत है ये दीद वा दीदे-याराँ
जहाँ मुँद गयी आँख, मैं है न तू है

नज़र मेरे दिल की पड़ी ‘दर्द’ किस पर
जिधर देखता हूँ वही रू-ब-रू है

हम तुझ से किस हवस की फ़लक जुस्तजू करें 

हम तुझ से किस हवस की फ़लक जुस्तजू करें|
दिल ही नहीं रहा है जो कुछ आरजू करें|

मिट जायें एक आन में कसरत नमयाँ,
हम आईने के सामने आ कर जो हू करें|

तार-दामनी पे शेख़ हमारी न जाई ओ,
दामन निचोड़ दें तो फ़रिश्ते वजू करें|

सर ता क़दम ज़बां है जूं शमा गो कि हम,
पर ये कहाँ मजाल जो कुछ गुफ्तगू करें|

हर चन्द आईना हूँ पर इतना न क़बूल,
मुँह फेर ले वो जिसके मुझे रू-ब-रू करें|

न गुल को है सबात न हम को ऐतबार,
किस बात पर चमन हवस-ए-रंग- ओ-बू करें|

है अपनी ये सलाह कि सब ज़ाहिदान-ए-शहर,
ऐ ‘दर्द’ आ के बेत-ए-दस्त-ए-सबू करें|

दुनिया में कौन-कौन न यक बार हो गया

दुनिया में कौन-कौन न यक बार हो गया
पर मुँह फिर इस तरफ़ न किया उसने जो गया

फिरती है मेरी ख़ाक सबा दर-ब-दर लिए,
अय चश्म-ए-अश्कबार ये क्या तुझ को हो गया

आगाह इस जहाँ में नहीं ग़ैर बे ख़ुदाँ,
जागा वही इधर से जो मूँद आँख सो गया

तूफ़ान-ए-नौहा ने तो डुबाई ज़मीं फ़क़त,
मैं नन्ग-ए-खल्क़ सारी ख़ुदाई डुबो गया

बरहम कहीं न हो गुल-ओ-बुलबुल की आशती,
डरता हूँ आज बाग़ में वो तुन्द ख़ू गया

वाइज़ किसे डरावे है योम- उल्हिसाब से,
गिरिया मेरा तो नामा-ए-आमाल धो गया

फूलेंगे इस ज़बाँ में भी गुल्ज़ार-ए-मारफ़त,
याँ मैं ज़मीन-ए-शेर में ये तुख़्म बो गया

आया न ऐतदाल पर हरिगज़ मज़ाज-ए-दहर,
मैं गर्चे गर्म- ओ- सर्द-ए-ज़माना समो गया

अए ‘दर्द’ जिस की आँख खुली इस जहान में,
शबनम की तरह जान को अपनी वो रो गया|

तुम आज हंसते हो हंस लो मुझ पर ये आज़माइश ना बार बार होगी 

तुम आज हँसते हो हंस लो मुझ पर ये आज़माइश ना बार-बार होगी
मैं जानता हूं मुझे ख़बर है कि कल फ़ज़ा ख़ुशगवार होगी|

रहे मुहब्बत में ज़िन्दगी भर रहेगी ये कशमकश बराबर,
ना तुमको क़ुरबत में जीत होगी ना मुझको फुर्कत में हार होगी|

हज़ार उल्फ़त सताए लेकिन मेरे इरादों से है ये मुमकिन,
अगर शराफ़त को तुमने छेड़ा तो ज़िन्दगी तुम पे वार होगी|

जग में आकर इधर उधर देखा

जग में आकर इधर उधर देखा|
तू ही आया नज़र जिधर देखा|

जान से हो गए बदन ख़ाली,
जिस तरफ़ तूने आँख भर देखा|

नाला, फ़रियाद, आह और ज़ारी,
आप से हो सका सो कर देखा|

उन लबों ने की न मसीहाई,
हम ने सौ-सौ तरह से मर देखा|

ज़ोर आशिक़ मिज़ाज है कोई,
‘दर्द’ को क़िस्स:-ए- मुख्तसर देखा|

अर्ज़ ओ समाँ कहाँ तेरी वुसअत को पा सके

अर्ज़ ओ समाँ कहाँ तेरी वुसअत को पा सके
मेरा ही दिल है वो कि जहाँ तू समाँ सके

वेहदत में तेरी हर्फ़ दुई का न आ सके
आईना क्या मजाल तिझे मुंह दिखा सके

मैं वो फ़तादा हूँ कि बग़ैर अज़ फ़ना मुझे
नक़्श ए क़दम की तरहा न कोई उठा सके

क़ासिद नहीं ये काम तेरा अपनी राह ले
उस का प्याम दिल के सिवा कौन ला सके

ग़ाफ़िल खुदा की याद पे मत भूल ज़ीन्हार
अपने तईं भुला से अगर तू भुला सके

यारब ये क्या तिलिस्म है इद्राक ओ फ़ेहम याँ
दौड़े हज़ार,आप से बाहर न जा सके

गो बहस करके बात बिठाई प क्या हुसूल
दिल सा उठा ग़िलाफ़ अगर तू उठा सके

इतफ़ा-ए-नार-ए-इश्क़ न हो आब-ए-अश्क से
ये आग वो नहीं जिसे पानी बुझा सके

मस्त-ए-शराब-ए-इश्क़ वो बेखुद है जिसको हश्र
ऐ दर्द चाहे लाये बखुद पर न ला सके

है ग़लत गर गुमान में कुछ है

है ग़लत गर गुमान में कुछ है
तुझ सिवा भी जहान में कुछ है

दिल भी तेरे ही ढंग सीखा है
आन में कुछ है, आन में कुछ है

बे-ख़बर तेग-ऐ-यार कहती है
बाकी इस नीम-जान में कुछ है

इन दिनों कुछ अजब है मेरा हाल
देखता कुछ हूँ, ध्यान में कुछ है

दर्द तो जो करे हैं जी का ज़ियाँ
फाएदा इस जियान में कुछ है

तुझी को जो यां जल्वा फ़र्मा न देखा 

तुझी को जो यां जल्वा फ़र्मा न देखा|
बराबर है दुनिया को देखा न देखा|

मेरा ग़ुन्चा-ए-दिल वोह दिल-गिरिफ़ता,
कि जिस को कसो ने कभी वा न देखा|

अजिअत, मुसीबत, मलामत, बलाएं,
तेरे इश्क़ में हम ने क्या क्या न देखा|

किया मुझ को दाग़ों सर्व-ए-चिराग़ां,
कभो तू ने आकर तमाशा न देखा|

तग़ाफ़ुल ने तेरे ये कुछ दिन दिखाए,
इधर तूने लेकिन न देखा, न देखा|

हिजाब-ए-रुख़-ए-यार थे आप ही हम,
खुली आँख जब, कोई परदा न देखा|

शब-ओ-रोज़ ए ‘दर्द’ दरपाई हूँ उस के,
कसो ने जिसे यां समझा न देखा|

चमन में सुबह ये कहती थी

चमन में सुबह ये कहती थी हो कर चश्म-ए-तर शबनम
बहार-ए-बाग़ तो यूँ ही रही लेकिन किधर शबनम

अर्क़ की बूंद उस की ज़ुल्फ़ से रुख़सार पर टपकी
ताज्जुब की है जागे ये पड़ी ख़ुर्शीद पर शबनम

हमें तो बाग़ तुझ बिन ख़ाना-ए-मातम नज़र अया
इधर गुल फारते थे जेब, रोती थी उधर शबनम

करे है कुछ न कुछ तासीर सोहबत साफ़ ताबों की
हुई आतिश से गुल के बैठते रश्क़-ए-शरर शबनम

भला तुक सुबह होने दो इसे भी देख लेवेंगे
किसी आशिक़ के रोने से नहीं रखती ख़बर शबनम

नहीं अस्बाब कुछ लाज़िम सुबक सारों के उठने को
गई उड़ देखते अपने बग़ैर अज़ बाल-ओ-पर शबनम

न पाया जो गया इस बाग़ से हर्गिज़ सुराग़ उसका
न पलटी फिर सबा इधर, न फिर आई नज़र शबनम

न समझा “दर्द” हमने भेद याँ की शादी-ओ-ग़म का
सहर खन्दान है क्यों रोती है किस को याक कर शबनम

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