‘खावर’ जीलानी की रचनाएँ

अता के रोज़-ए-असर से भी टूट सकती थी

अता के रोज़-ए-असर से भी टूट सकती थी
वो शाख़ बार-ए-समर से भी टूट सकती थी

मैं दिल में सच की नुमू से था ख़ौफ़ खाया हुआ
के सीप ताब-ए-गोहर से भी टूट सकती थी

उसी पे था मेरे हर एक तीर का तकिया
कमाँ जो खेंच के डर से टूट सकती थी

पड़ी थी आह को ही ख़ुद-नुमाई की वरना
ख़ामोशी दीद-ए-तर से भी टूट सकती थी

जुड़े हुए थे बहुत वसवसे ख़्यालों से
सो नींद ख़्वाब के शर से भी टूट सकती थी

दिलों की शीशा-गरी कार-गह-ए-हस्ती में
हुनर के ज़ेर ओ ज़बर से भी टूट सकती थी

ये आब वो था की आतिश भड़क न पाने की
रिवायत एक शरर से भी टूट सकती थी

मैं एक ऐसा किनारा था जिस की क़ुर्बत को
वो लहर अपने भँवर से भी टूट सकती थी

हर एक लश्करी इतरा रहा था जिस पे वो तेग़
ख़याल-हा-ए-ज़रर से भी टूट सकती थी

ज़मीं न होती अगर इस कमाल की हामिल
क़यामत आसमाँ पर से भी टूट सकती थी

तू ख़ुश-नसीब था वरना तेरी अना की फ़सील
कमाल-ए-सर्फ़-ए-नज़र से भी टूट सकती थी

कुछ बचा ले अभी आँसू मुझे रोने वाले 

कुछ बचा ले अभी आँसू मुझे रोने वाले
सानहे और भी हैं रू-नुमा होने वाले

वक़्त के घाट उतर कर नहीं वापस लौटे
दाग़ मल्बूस मह ओ महर के धोने वाले

दाएम आबाद रहे दार-ए-फ़ना के बासी
फ़िक्र में रूह-ए-बक़ायाब सुमूने वाले

थथराती रहे अब ख़्वाह हमा-वक़्त ज़मीं
सो गए ख़ाक-ए-अबद ओढ़ के सोने वाले

जिस पे भी पाँव धरा मैं ने उसी नाव में
आए आसार नज़र ख़ुद को डुबोने वाले

अब लिए फिरता है क्या दामन सद-चाक अपना
क्या हुए अब वो तेरे सीने पिरोने वाले

जा निकलता है अचानक वहीं रास्ता मेरा
दर प-ए-पा हों जहाँ ख़ार चुभोने वाले

गर्द है हाथ में उन के मेरी किश्त-ए-ज़र-ख़ेज़
ख़ार-ओ-ख़स से जो अलावा नहीं बोने वाले

ये भी इक तुरफ़ा तमाशा है की हैं अँधियारे
रेशा-ए-शब में सितारों को पिरोने वाले

कर गए ख़ुश्क भरी झील तअस्सुफ़ के कँवल
सूख कर काँटा हुए रात भिगोने वाले

दे गया है हमें अहद-ए-मरासिम उस का
उस ख़ज़ाने को नहीं हम नहीं खोने वाले

नाफ़े है कुछ तो वो किसी फ़ैज़ान ही का है

नाफ़े है कुछ तो वो किसी फ़ैज़ान ही का है
वरना तअल्लुक़ा मेरा नुक़सान ही का है

कुल्फ़त है सब की सब ये तवक़्क़ो के नाम की
जो भी किया धरा है ये इम्कान ही का है

माल ओ मनाल दस्त गह-ए-हादसात का
रहते हैं गर ब-हाल तौ औसान ही का है

मंज़र वो है की जो कभी शशदर न कर सके
हैरत ये है की दीदा हैरान ही का है

इल्ज़ाम ख़ुद हूँ मैं यहाँ हस्ती के नाम पर
मेरा वजूद असल में बुहतान ही का है

तफ़सील में तो सिमटा हुआ ही था इंकिसार
इज्माल भी ये इज्ज़ के उनवान ही का है

आख़िर अयाँ हुआ की मरासिम की जेल में
असबाब-ए-दिल शिकस्तगी पैमान ही का है

जब तक ब-दोश रहता है हूँ गामज़न
मेरा सफ़र हक़ीक़तन सामान ही का है

उतरे वो नाव शौक़ से हो डूबना जिसे
साहिल मिजाज़-ए-बहर का तूफ़ान ही का है

आवार्गां के वास्ते किरदार दश्त का
अंजाम-ए-कार हीत-ए-ज़िंदान ही का है

जा-ए-पनाह उस की कोई दूसरी नहीं
‘ख़ावर’ कहीं का है तो बयाबान ही का है

क़दम क़दम का इलाक़ा है ना-रवा तक है 

क़दम क़दम का इलाक़ा है ना-रवा तक है
फ़ुसूँ-ए-जौर-ओ-जफ़ा पेशा जा-ब-जा तक है

गर एक बार को होता आलम ग़नीमत था
सितम तो ये है की दर-पेश बारहा तक है

दिए की लौ से नहीं वास्ता किसी का कोई
अगर किसी का कोई है तो फिर हवा तक है

अमल है ख़ुद पे अमल-दार ता-दम मौक़ूफ़
और इस का रद्द-ए-अमल अपने इल्तवा तक है

सदा-ए-शोर-ओ-शाग़ब है इधर समाअत तक
शुनीद गिर्द ओ जवानिब इधर सदा तक है

मगर ये कौन बताए सफ़र-नवर्दों को
के हद दश्त-ए-जुनूँ उन के इक्तिफ़ा तक है

ऐ बे-क़रारी दिल मुझ को ये ख़बर ही न थी
के जो क़रार की सरहद है इतक़ा तक है

ख़ुदा से बाद में रक्खे हुए है दुनिया को
वो फ़ासला जो हथेली से इक दुआ तक है

कहीं परे की है हाजत-रवाई से मेरी
मेरा सवाल ज़रूरत से माँ-वरा तक है

है तू ही आँख मेरी ऐ जमाल-ए-पेश-ए-नज़र
सो ये तमाशा मेरा इक तेरी रज़ा तक है

नहीं है कोई भी हतमी यहाँ हदें मालूम
हर एक इंतिहा इक और इंतिहा तक है

रूह के दामन से अपनी दुनिया-दारी बाँध कर 

रूह के दामन से अपनी दुनिया-दारी बाँध कर
चल रहे हैं दम-ब-दम आँखों पे पट्टी बाँध कर

ये कहानी एक ऐसे सर-फिर मौसम की है
ख़ुश्क पत्तों से जो ले आया था आँधी बाँध कर

हक़ अगर कोई नुमू का था तो वो उस ने अदा
कर दिया है बादलों से आब-यारी बाँध कर

सुब्ह होती है तो कुंज-ए-ख़ुश-गुमानी में कहीं
फ़ेंक दी जाती है शब भर की सियाही बाँध कर

ऐ मेरे दरिया अगर कोई भरोसा हो तेरा
छोड़ जाऊँ मैं तेरी लहरों से कश्ती बाँध कर

गाम उठते ही सफ़र ने पाट दी सारी ख़लीज
रह-रवी ने डाल दी इक सम्त दूरी बाँध कर

मैं सरासर एक अँदेशा हूँ नक़्स-ए-अमन का
मुझ को रखता है लिहाज़ा मेरा क़ैदी बाँध कर

इज्ज़-गोई पर पड़ाव डाल देती है मेरी
लफ़्ज़ याबी मानवियत से तितली बाँध कर

खिल रहे हैं सर-ज़मीन-ए-दिल पे जज़्बों के गुलाब
उड़ रही है आज ख़ुश्बू ख़ुद से तितली बाँध कर

जाने सीने में बिकाऊ शय या किया जिस के लिए
दौड़ती फिरती हैं साँसें रेज़-गारी बाँध कर

वा हुए होते दरीचे आज इम्कानात के
गर न रख देती हमें अपनी मसाई बाँध कर

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