गंगासहाय ‘प्रेमी’ की रचनाएँ

दस्ताने

टिल्लू जी के हाथ पड़ गए
मम्मी के दस्ताने,
कुछ भी नहीं समझ में आया
घंटों खींचे-ताने।
पैरों में तो तंग एकदम
हाथों में थे ढीले,
और क्या करें, इसी सोच में
पड़े बिचारे पीले!

गप्प सुनो 

हाऊ-हाऊ हप्प,
एक सुनाऊँ गप्प।
बाबा जी की दाढ़ी,
झरबेरी की झाड़ी।
उस दाढ़ी के अंदर,
घुसे बीसियों बंदर।
करते खों-खों, खों-खों।
यूँ ही बीते बरसों।

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