ग़ालिब की रचनाएँ

अज़ मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना

अज़ मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना
तूती को शश जिहत से मुक़ाबिल है आइना

अपना अहवाल-ए-दिल-ए-ज़ार कहूँ

ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार [1]होता
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता

अफ़सोस कि दनदां का किया रिज़क़ फ़लक ने 

अफ़सोस कि दनदां का किया रिज़क़ फ़लक ने
जिन लोगों की थी दर-ख़ुर-ए-अक़्द-ए-गुहर अंगुश्त

काफ़ी है निशानी तिरा छल्ले का न देना
ख़ाली मुझे दिखला के ब-वक़्त-ए-सफ़र अंगुश्त

लिखता हूं असद सोज़िश-ए दिल से सुख़न-ए गरम
ता रख न सके कोई मिरे हरफ़ पर अनगुशत

‘असद’ हम वो जुनूँ-जौलाँ गदा-ए-बे-सर-ओ-पा हैं 

‘असद’ हम वो जुनूँ-जौलाँ गदा-ए-बे-सर-ओ-पा हैं
कि है सर-पंजा-ए-मिज़्गान-ए-आहू पुश्त-ख़ार अपना

आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है

आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है
ताक़ते-बेदादे-इन्तज़ार नहीं है

देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदले
नश्शा बअन्दाज़-ए-ख़ुमार नहीं है

गिरिया निकाले है तेरी बज़्म से मुझ को
हाये! कि रोने पे इख़्तियार नहीं है

हम से अबस है गुमान-ए-रन्जिश-ए-ख़ातिर
ख़ाक में उश्शाक़ की ग़ुब्बार नहीं है

दिल से उठा लुत्फे-जल्वाहा-ए-म’आनी
ग़ैर-ए-गुल आईना-ए-बहार नहीं है

क़त्ल का मेरे किया है अहद तो बारे
वाये! अगर अहद उस्तवार नहीं है

तू ने क़सम मैकशी की खाई है “ग़ालिब”
तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नहीं है

आमों की तारीफ़ में 

हाँ दिल-ए-दर्दमंद ज़म-ज़मा साज़
क्यूँ न खोले दर-ए-ख़ज़िना-ए-राज़

ख़ामे का सफ़्हे पर रवाँ होना
शाख़-ए-गुल का है गुल-फ़िशाँ होना

मुझ से क्या पूछता है क्या लिखिये
नुक़्ता हाये ख़िरदफ़िशाँ लिखिये

बारे, आमों का कुछ बयाँ हो जाये
ख़ामा नख़्ले रतबफ़िशाँ हो जाये

आम का कौन मर्द-ए-मैदाँ है
समर-ओ-शाख़, गुवे-ओ-चौगाँ है

ताक के जी में क्यूँ रहे अर्माँ
आये, ये गुवे और ये मैदाँ!

आम के आगे पेश जावे ख़ाक
फोड़ता है जले फफोले ताक

न चला जब किसी तरह मक़दूर
बादा-ए-नाब बन गया अंगूर

ये भी नाचार जी का खोना है
शर्म से पानी पानी होना है

मुझसे पूछो, तुम्हें ख़बर क्या है
आम के आगे नेशकर क्या है

न गुल उस में न शाख़-ओ-बर्ग न बार
जब ख़िज़ाँ आये तब हो उस की बहार

और दौड़ाइए क़यास कहाँ
जान-ए-शीरीँ में ये मिठास कहाँ

जान में होती गर ये शीरीनी
‘कोहकन’ बावजूद-ए-ग़मगीनी

उग रहा है दर-ओ-दीवार से सबज़ा ग़ालिब

उग रहा है दर-ओ-दीवार से सबज़ा ग़ालिब
हम बयाबां में हैं और घर में बहार आई है

क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना

क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना
तअज्जुब से वह बोला यूँ भी होता है ज़माने में

दिल-ए-नाज़ुक पे उस के रहम आता है मुझे
न कर सरगर्म उस काफ़िर को उल्फ़त आज़माने में

कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं

कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं
इक तीर मेरे सीने में मारा के हाये हाये

वो सब्ज़ा ज़ार हाये मुतर्रा के है ग़ज़ब
वो नाज़नीं बुतान-ए-ख़ुदआरा के हाये हाये

सब्रआज़्मा वो उन की निगाहें के हफ़ नज़र
ताक़तरूबा वो उन का इशारा के हाये हाये

वो मेवा हाये ताज़ा-ए-शीरीं के वाह वाह
वो बादा हाये नाब-ए-गवारा के हाये हाये

कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए

कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए
यक मरतबा घबरा के कहो कोई कि वो आए

हूँ कशमकश-ए-नज़ा में हाँ जज़्ब-ए-मोहब्बत
कुछ कह न सकूँ पर वो मिरे पूछने को आए

है साइक़ा-ओ-शोला-ओ-सीमाब का आलम
आना ही समझ में मिरी आता नहीं गो आए

ज़ाहिर है कि घबरा के न भागेंगे नकीरें
हां मुंह से मगर बादा-ए-दोशीना की बो आए

जललाद से डरते हैं न वाइज़ से झगड़ते
हम समझे हुए हैं उसे जिस भेस में जो आए

हां अहल-ए-तलब कौन सुने ताना-ए-ना-याफ़त
देखा कि वह मिलता नहीं अपने ही को खो आए

अपना नहीं वह शेवह कि आराम से बैठें
उस दर पह नहीं बार तो क`बे ही को हो आए

की हम-नफ़सों ने असर-ए गिरयह में तक़रीर
अचछे रहे आप उस से मगर मुझ को डुबो आए

उस अनजुमन-ए नाज़ की कया बात है ग़ालिब
हम भी गए वां और तिरी तक़दीर को रो आए

कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइये

कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइए
बे-तकल्लुफ़ ऐ शरार-ए-जस्ता क्या हो जाइए

बैज़ा-आसा नंग-ए-बाल-ओ-पर है ये कुंज-ए-क़फ़स
अज़-सर-ए-नौ ज़िंदगी हो गर रिहा हो जाइए


वुसअत-ए-मशरब नियाज़-ए-कुल्फ़त-ए-वहशत असद
यक-बयाबाँ साया-ए-बाल-ए-हुमा हो जाइए

क्या तंग हम सितमज़दगां का जहान है

क्या तंग हम सितमज़दगां का जहान है
जिस में कि एक बैज़ा-ए-मोर आसमान है

है कायनात को हरकत तेरे ज़ौक़ से
परतव से आफ़ताब के ज़ररे में जान है

हालांकिह है यह सीली-ए ख़ारा से लालह रनग
ग़ाफ़िल को मेरे शीशे पह मै का गुमान है

की उस ने गरम सीनह-ए अहल-ए हवस में जा
आवे न कयूं पसनद कि ठनडा मकान है

क्या ख़ूब तुम ने ग़ैर को बोसह नहीं दिया
बस चुप रहो हमारे भी मुंह में ज़बान है

बैठा है जो कि सायह-ए दीवार-ए यार में
फ़रमां-रवा-ए किशवर-ए हिनदूसतान है

हस्ती का ए’तिबार भी ग़म ने मिटा दिया
किस से कहूं कि दाग़ जिगर का निशान है

है बारे ए’तिमाद-ए वफ़ा-दारी इस क़दर
ग़ालिब हम इस में ख़वुश हैं कि ना-मिहरबान है

ख़ुश हो ऐ बख़्त कि है आज तेरे सर सेहरा

ख़ुश हो ऐ बख़्त[1]कि है आज तेरे सर सेहरा
बाँध शहज़ादा जवाँ बख़्त के सर पर सेहरा

क्या ही इस चाँद-से मुखड़े पे भला लगता है
है तेरे हुस्ने-दिल अफ़रोज़[2] का ज़ेवर[3] सेहरा

सर पे चढ़ना तुझे फबता है पर ऐ तर्फ़े-कुलाह[4]
मुझको डर है कि न छीने तेरा लंबर[5] सेहरा

नाव भर कर ही पिरोए गए होंगे मोती
वर्ना[6] क्यों लाए हैं कश्ती में लगाकर सेहरा

सात दरिया के फ़राहम[7]किए होंगे मोती
तब बना होगा इस अंदाज़ का ग़ज़ भर सेहरा

रुख़[8] पे दूल्हा के जो गर्मी से पसीना टपका
है रगे-अब्रे-गुहरबार[9]सरासर[10] सेहरा

ये भी इक बेअदबी थी कि क़बा[11] से बढ़ जाए
रह गया आन के दामन के बराबर सेहरा

जी में इतराएँ न मोती कि हमीं हैं इक चीज़
चाहिए फूलों का भी एक मुक़र्रर[12]सेहरा

जब कि अपने में समावें न ख़ुशी के मारे
गूँथें फूलों का भला फिर कोई क्योंकर सेहरा

रुख़े-रौशन[13] की दमक गौहरे-ग़ल्ताँ[14] की चमक
क्यूँ न दिखलाए फ़रोग़े-मह-ओ-अख़्तर[15] सेहरा

तार रेशम का नहीं है ये रगे-अब्रे-बहार[16]
लाएगा ताबे-गिराँबारि-ए गौहर[17] सेहरा

हम सुख़नफ़हम[18] हैं ‘ग़ालिब’ के तरफ़दार[19] नहीं
देखें इस सेहरे से कह दे कोई बढ़कर सेहरा

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें बख़्त नाम का राजकुमार
  2. ऊपर जायें आलौकिक सौंदर्य
  3. ऊपर जायें अलंकरण
  4. ऊपर जायें टोपी का किनारा
  5. ऊपर जायें श्रेणी,क्रम
  6. ऊपर जायें अन्यथा
  7. ऊपर जायें जुटाए गए, उपलब्ध करवाए गए
  8. ऊपर जायें चेहरे
  9. ऊपर जायें मोती बरसाते बादलों की रग
  10. ऊपर जायें नि:संदेह
  11. ऊपर जायें लिबास,वस्त्र
  12. ऊपर जायें निर्धारित
  13. ऊपर जायें प्रकाशमान चेहरे
  14. ऊपर जायें लुढ़कते हुए मोती
  15. ऊपर जायें चाँद व सितारों की शोभा
  16. ऊपर जायें मोती बरसाती बहार की रग
  17. ऊपर जायें रत्नों की बहुमूल्यता
  18. ऊपर जायें काव्य-रसिक
  19. ऊपर जायें पक्षधर

गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग 

गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग
यानी बग़ैर-ए-यक-दिल-ए-बे-मुद्दआ न माँग

आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
मुझ से मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग


अय आरज़ू शहीद-ए वफ़ा ख़ूं-बहा न माँग
जुज़ बहर-ए दसत-ओ-बाज़ू-ए क़ातिल दुआ न माँग

बर-हम है बज़म-ए ग़ुनचह ब यक जुनबिश-ए नशात
काशानह बसकि तनग है ग़ाफ़िल हवा न माँग

मैं दूर गरद-ए-अरज़-ए-रुसूम-ए-नियाज़ हूँ
दुशमन समझ वले निगह-ए आशना न माँग

यक-बख़त औज नज़र-ए-सुबुक-बारी-ए असद
सर पर वबाल-ए सायह-ए बाल-ए-हुमा न माँग

गरम-ए-फ़रयाद रखा शक्ल-ए-निहाली ने मुझे

गरम-ए फ़रयाद रखा शकल-ए निहाली ने मुझे
तब अमां हिजर में दी बरद-ए लियाली ने मुझे

निसयह-ओ-नक़द-ए दो-आलम की हक़ीक़त म’लूम
ले लिया मुझ से मिरी हिममत-ए-आली ने मुझे

कसरत-आराई-ए वहदत है परसतारी-ए-वहम
कर दिया काफ़िर इन असनाम-ए ख़याली ने मुझे

हवस-ए-गुल के तसववुर में भी खटका न रहा
अजब आराम दिया बे-पर-ओ-बाली ने मुझे

ज़िंदगी में भी रहा ज़ौक़-ए-फ़ना का मारा
नशशह बख़शा ग़ज़ब उस साग़र-ए ख़ाली ने मुझे

बसकि थी फ़सल-ए ख़िज़ान-ए-चमनिसतान-ए-सुख़न
रनग-ए शुहरत न दिया ताज़ह-ख़याली ने मुझे

जलवा-ए-ख़वुर से फ़ना होती है शबनम ग़ालिब
खो दिया सतवत-ए असमा-ए-जलाली ने मुझे

घर में था क्या कि तिरा ग़म उसे ग़ारत करता 

घर में था क्या कि तिरा ग़म उसे ग़ारत करता
वो जो रखते थे हम इक हसरत-ए-तामीर सो है

चशम-ए-ख़ूबां ख़ामुशी में भी नवा-परदाज़ है 

चश्म-ए-ख़ूबाँ ख़ामुशी में भी नवा-पर्दाज़ है
सुर्मा तो कहवे कि दूद-ए-शोला-ए-आवाज़ है

पैकर-ए-उश्शाक़ साज़-ए-ताला-ए-ना-साज़ है
नाला गोया गर्दिश-ए-सैय्यारा की आवाज़ है

दसत-गाह-ए दीदह-ए ख़ूं-बार-ए मजनूं देखना
यक-बयाबां जलवह-ए गुल फ़रश-ए-पा-अंदाज़ है

चशम-ए ख़ूबां मै-फ़रोश-ए-नशशह-ज़ार-ए-नाज़ है
सुरमह गोया मौज-ए दूद-ए शु`लह-ए आवाज़ है

है सरीर-ए ख़ामह रेज़िशहा-ए इसतिक़बाल-ए-नाज़
नामह ख़वुद पैग़ाम को बाल-ओ-पर-ए परवाज़ है

सर-नविशत-ए इज़तिराब-अनजामी-ए उलफ़त न पूछ
नाल-ए ख़ामह ख़ार-ख़ार-ए ख़ातिर-ए आग़ाज़ है

शोख़ी-ए इज़हार ग़ैर अज़ वहशत-ए मजनूं नहीं
लैला-ए-मानी असद महमिल-निशीन-ए-राज़ है

जब तक दहान-ए-ज़ख़्म न पैदा करे कोई

जब तक दहान-ए-ज़ख़्म न पैदा करे कोई
मुश्किल कि तुझ से राह-ए-सुख़न वा करे कोई

आलम ग़ुबार-ए-वहशत-ए-मजनूँ है सर-ब-सर
कब तक ख़याल-ए-तुर्रा-ए-लैला करे कोई

अफ़सुरदगी नहीं तरब-इनशा-ए इलतिफ़ात
हां दरद बन के दिल में मगर जा करे कोई

रोने से अय नदीम मलामत न कर मुझे
आख़िर कभी तो `उक़दह-ए दिल वा करे कोई

चाक-ए-जिगर से जब रह-ए पुरसिश न वा हुई
कया फ़ाइदा कि जेब को रुसवा करे कोई

लख़त-ए जिगर से है रग-ए हर ख़ार शाख़-ए-गुल
ता चनद बाग़-बानी-ए सहरा करे कोई

ना-कामी-ए निगाह है बरक़-ए नज़ारा-सोज़
तू वह नहीं कि तुझ को तमाशा करे कोई

हर सनग-ओ-ख़िशत है सदफ़-ए गौहर-ए-शिकस्त
नुक़सां नहीं जुनूं से जो सौदा करे कोई

सर-बर हुई न व`दह-ए सबर-आज़मा से `उमर
फ़ुरसत कहां कि तेरी तमनना करे कोई

है वहशत-ए तबी`अत-ए ईजाद यास-ख़ेज़
यह दरद वह नहीं कि न पैदा करे कोई

बे-कारी-ए-जुनूं को है सर पीटने का शग़ल
जब हाथ टूट जाएं तो फिर कया करे कोई

हुसन-ए फ़ुरोग़-ए शम-ए सुख़न दूर है असद
पहले दिल-ए-गुदाख़ता पैदा करे कोई


वहशत कहां कि बे-ख़वुदी इनशा करे कोई
हसती को लफ़ज़-ए-मानी-ए-अनक़ा करे कोई

जो कुछ है महव-ए-शोख़ी-ए-अबरू-ए यार है
आंखों को रख के ताक़ पह देखा करे कोई

अरज़-ए-सिरिशक पर है फ़ज़ा-ए ज़माना तंग
सहरा कहां कि दावत-ए-दरया करे कोई

वह शोख़ अपने हुस्न पह मग़रूर है असद
दिखला के उस को आइना तोड़ा करे कोई

ज़-बस-कि मश्क़-ए-तमाशा जुनूँ-अलामत है

ज़-बस-कि मश्क़-ए-तमाशा जुनूँ-अलामत है
कुशाद-ओ-बस्त-ए-मिज़्हा सीली-ए-नदामत है

न जानूँ क्यूँकि मिटे दाग़-ए-तान-ए-बद-अहदी
तुझे कि आइना भी वार्ता-ए-मलामत है

ब-पेच-ओ-ताब-ए-हवस सिल्क-ए-आफ़ियत मत तोड़
निगाह-ए-अज्ज़ सर-ए-रिश्ता-ए-सलामत है

वफ़ा मुक़ाबिल-ओ-दावा-ए-इश्क़ बे-बुनियाद
जुनूँ-ए-साख़्ता ओ फ़स्ल-ए-गुल क़यामत है

ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद

ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद
वगरना हम तो तवक़्क़ो ज़्यादा रखते हैं

तन-ए-ब-बंद-ए-हवस दर नदादा रखते हैं
दिल-ए-ज़-कार-ए-जहाँ ऊफ़्तादा रखते हैं

तमीज़-ए-ज़िश्ती-ओ-नेकी में लाख बातें हैं
ब-अक्स-ए-आइना यक-फ़र्द-ए-सादा रखते हैं

ब-रंग-ए-साया हमें बंदगी में है तस्लीम
कि दाग़-ए-दिल ब-जाबीन-ए-कुशादा रखते हैं

ब-ज़ाहिदाँ रग-ए-गर्दन है रिश्ता-ए-ज़ुन्नार
सर-ए-ब-पा-ए-बुत-ए-ना-निहादा रखते हैं

मुआफ़-ए-बे-हूदा-गोई हैं नासेहान-ए-अज़ीज़
दिल-ए-ब-दस्त-ए-निगारे नदादा रखते हैं

ब-रंग-ए-सब्ज़ा अज़ीज़ान-ए-बद-ज़बान यक-दस्त
हज़ार तेग़-ए-ब-ज़हर-आब-दादा रखते हैं

अदब ने सौंपी हमें सुर्मा-साइ-ए-हैरत
ज़-बन-ए-बस्ता-ओ-चश्म-ए-कुशादा रखते हैं

जादा-ए-रह ख़ुर को वक़्त-ए-शाम है तार-ए-शुआ

जादा-ए-रह ख़ुर को वक़्त-ए-शाम है तार-ए-शुआ
चर्ख़ वा करता है माह-ए-नौ से आग़ोश-ए-विदा

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री ‘ग़ालिब’

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री
हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे

जुनूँ की दस्त-गीरी किस से हो गर हो न उर्यानी

जुनूँ की दस्त-गीरी किस से हो गर हो न उर्यानी
गरेबाँ-चाक का हक़ हो गया है मेरी गर्दन पर

बा-रंग-ए-कागज़-ए-आतिश-ज़दा नै-रंग-ए-बेताबी
हज़ार आईना दिल बाँधे है बाल-ए-यक-तपीदन पर

फ़लक से हम को ऐश-ए-रफ़्ता का क्या क्या तक़ाज़ा है
मता-ए-बुर्दा को समझे हुए हैं क़र्ज़ रहज़न पर

हम और वो बे-सबब रंज-आशना दुश्मन कि रखता है
शुआ-ए-मेहर से तोहमत निगह की चश्म-ए-रौज़न पर

फ़ना को सौंप गर मुश्ताक़ है अपनी हक़ीक़त का
फ़रोग़-ए-ताला-ए-ख़ाशाक है मौक़ूफ़ गुलख़न पर

असद बिस्मिल है किस अंदाज़ का क़ातिल से कहता है
कि मश्क़-ए-नाज़ कर ख़ून-ए-दो-आलम मेरी गर्दन पर

फ़ुसून-ए-यक-दिली है लज़्ज़त-ए-बेदाद दुश्मन पर
कि वजह-ए-बर्क़ ज्यूँ परवाना बाल-अफ़्शाँ है ख़िर्मन पर

तकल्लुफ़ ख़ार-ख़ार-ए-इल्तिमास-ए-बे-क़ारारी है
कि रिश्ता बाँधता है पैरहन अंगुश्त-ए-सोज़न पर

तपिश से मेरी वक़्फ़-ए-कशमकश हर तार-ए-बिस्तर है

तपिश से मेरी वक़्फ़-ए-कशमकश हर तार-ए-बिस्तर है
मिरा सर रंज-ए-बालीं है मिरा तन बार-ए-बिस्तर है

सरिश्क-ए-सर ब-सहरा दादा नूर-उल-ऐन-ए-दामन है
दिल-ए-बे-दस्त-ओ-पा उफ़्तादा बर-ख़ुरदार-ए-बिस्तर है

ख़ुशा इक़बाल-ए-रंजूरी अयादत को तुम आए हो
फ़रोग-ए-शम-ए-बालीं ताल-ए-बेदार-ए-बिस्तर है

ब-तूफ़ाँ-गाह-ए-जोश-ए-इज़्तिराब-ए-शाम-ए-तन्हाई
शुआ-ए-आफ़्ताब-ए-सुब्ह-ए-महशर तार-ए-बिस्तर है

अभी आती है बू बालिश से उस की ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं की
हमारी दीद को ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा आर-ए-बिस्तर है

कहूँ क्या दिल की क्या हालत है हिज्र-ए-यार में ग़ालिब
कि बेताबी से हर-यक तार-ए-बिस्तर ख़ार-ए-बिस्तर है

ता हम को शिकायत की भी बाक़ी न रहे जा 

ता हम को शिकायत की भी बाक़ी न रहे जा
सुन लेते हैं गो ज़िक्र हमारा नहीं करते

ग़ालिब तिरा अहवाल सुना देंगे हम उन को
वो सुन के बुला लें ये इजारा नहीं करते

तुम न आए तो क्या सहर न हुई 

तुम न आए तो क्या सहर[1] न हुई
हाँ मगर चैन से बसर[2] न हुई
मेरा नाला[3]सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई

तेरे वादे पर जिये हम 

तेरे वादे पर जिये हम, तो यह जान, झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता ।

दिल लगा कर लग गया उन को भी तनहा बैठना 

दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना
बारे अपनी बेकसी की हम ने पाई दाद याँ

हैं ज़वाल-आमादा अजज़ा आफ़रीनश के तमाम
मेहर-ए-गर्दूं है चराग़-ए-रहगुज़ार-ए-बाद याँ

देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे

देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे
कर गई वाबस्ता-ए-तन मेरी उर्यानी मुझे

बन गया तेग़-ए-निगाह-ए-यार का संग-ए-फ़साँ
मरहबा मैं क्या मुबारक है गिराँ-जानी मुझे

क्यूँ न हो बे-इल्तिफ़ाती उस की ख़ातिर जम्अ है
जानता है महव-ए-पुर्सिश-हा-ए-पिन्हानी मुझे

मेरे ग़म-ख़ाने की क़िस्मत जब रक़म होने लगी
लिख दिया मिन-जुमला-ए-असबाब-ए-वीरानी मुझे

बद-गुमाँ होता है वो काफ़िर न होता काश के
इस क़दर ज़ौक़-ए-नवा-ए-मुर्ग़-ए-बुस्तानी मुझे

वाए वाँ भी शोर-ए-महशर ने न दम लेने दिया
ले गया था गोर में ज़ौक़-ए-तन-आसानी मुझे

वादा आने का वफ़ा कीजे ये क्या अंदाज़ है
तुम ने क्यूँ सौंपी है मेरे घर की दरबानी मुझे

हाँ नशात-ए-आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी वाह वाह
फिर हुआ है ताज़ा सौदा-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे

दी मिरे भाई को हक़ ने अज़-सर-ए-नौ ज़िंदगी
मीरज़ा यूसुफ़ है ग़ालिब यूसुफ़-ए-सानी मुझे

न लेवे गर ख़स-ए-जौहर तरावत सबज़-ए-ख़त से 

न लेवे गर ख़स-ए-जौहर तरावत सब्ज़ा-ए-ख़त से
लगावे ख़ाना-ए-आईना में रू-ए-निगार आतिश

फ़रोग़-ए-हुस्न से होती है हल्ल-ए-मुश्किल-ए-आशिक़
न निकलते शम्अ के पा से निकाले गर न ख़ार आतिश

नवेदे-अम्न है बेदादे दोस्त जाँ के लिए

नवेदे-अम्न[1]है बेदादे दोस्त[2]जाँ के लिए
रही न तर्ज़े-सितम[3]कोई आसमाँ के लिए

बला से गर मिज़्गाँ-ए-यार[4]तश्ना-ए-ख़ूँ[5]है
रखूँ कुछ अपनी भी मि़ज़्गाँने-ख़ूँफ़िशाँ[6]के लिए

वो ज़िन्दा हम हैं कि हैं रूशनासे-ख़ल्क़[7]– ए -ख़िज्र[8]
न तुम कि चोर बने उम्रे-जाविदाँ[9]के लिए

रहा बला में भी मैं मुब्तिला-ए-आफ़ते-रश्क[10]
बला-ए-जाँ[11]है अदा तेरी इक जहाँ, के लिए

फ़लक न दूर रख उससे मुझे, कि मैं ही नहीं
दराज़-ए-दस्ती-ए-क़ातिल[12]के इम्तिहाँ के लिए

मिसाल यह मेरी कोशिश की है कि मुर्ग़े-असीर[13]
सरे क़फ़स[14]में फ़राहम[15]ख़स[16]आशियाँ [17]के लिए

गदा[18]समझ के वो चुप था मेरी जो शामत आए
उठा और उठ के क़दम, मैंने पासबाँ के लिए

बक़द्रे-शौक़[19]नहीं ज़र्फ़े-तंगना-ए-ग़ज़ल[20]
कुछ और चाहिए वुसअत[21]मेरे बयाँ[22]के लिए

दिया है ख़ल्क[23]को भी ता उसे नज़र न लगे
बना है ऐश तजम्मल हुसैन ख़ाँ[24]के लिए

ज़बाँ पे बारे-ख़ुदाया ये किसका नाम आया
कि मेरे नुत्क़ [25]ने बोसे मेरी ज़ुबाँ के लिए

नसीरे-दौलत-ओ-दीं[26]और मुईने-मिल्लत-ओ-मुल्क़[27]
बना है चर्ख़े-बरीं[28]जिसके आस्ताँ[29]के लिए

ज़माना अह्द[30]में उसके है मह्वे आराइश[31]
बनेंगे और सितारे अब आसमाँ के लिए

वरक़[32]तमाम हुआ और मदह[33]बाक़ी है
सफ़ीना[34]चाहिए इस बह्रे- बेक़राँ[35]के लिए

अदा-ए-ख़ास[36]से ‘ग़ालिब’ हुआ है नुक़्ता-सरा[37]
सला-ए-आम[38]है याराने-नुक़्ता-दाँ[39]के लिए

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें शान्ति का सुसमाचार
  2. ऊपर जायें मित्र का अत्याचार
  3. ऊपर जायें कष्ट देने का ढंग
  4. ऊपर जायें प्रेमिका की पलकें
  5. ऊपर जायें रक्त-पिपासु
  6. ऊपर जायें रक्तरंजित पलकें
  7. ऊपर जायें संसार से परिचित
  8. ऊपर जायें एक अवतार
  9. ऊपर जायें शाश्वत जीवन
  10. ऊपर जायें ईर्ष्या की मुसीबत में गिरफ़्तार
  11. ऊपर जायें प्राणों का संकट
  12. ऊपर जायें क़ातिल के अत्याचार
  13. ऊपर जायें बन्दी पक्षी
  14. ऊपर जायें पिंजरा
  15. ऊपर जायें उपलब्ध
  16. ऊपर जायें घास
  17. ऊपर जायें आशियाना
  18. ऊपर जायें भिखारी
  19. ऊपर जायें रुचिकर
  20. ऊपर जायें ग़ज़ल के सीमित मैदान में काव्य-साहस
  21. ऊपर जायें विस्तार
  22. ऊपर जायें अभिव्यक्ति
  23. ऊपर जायें दुनिया
  24. ऊपर जायें एक व्यक्ति विशेष का नाम
  25. ऊपर जायें शब्द
  26. ऊपर जायें धर्म और राज्य के सहायक
  27. ऊपर जायें देश एवं जाति के सहायक
  28. ऊपर जायें आकाश
  29. ऊपर जायें दहलीज़
  30. ऊपर जायें अधीनस्थ
  31. ऊपर जायें शृंगाररत
  32. ऊपर जायें पृष्ठ
  33. ऊपर जायें प्रशंसा,दाद
  34. ऊपर जायें नौका
  35. ऊपर जायें परेशान समुंदर
  36. ऊपर जायें विशेष-रूप
  37. ऊपर जायें काव्य(बारीक़ और ख़ूबसूरत बात)कहने वाला
  38. ऊपर जायें सार्वजनिक निमंत्रण
  39. ऊपर जायें गुण-ग्राही मित्रों

नश्शा-हा शादाब-ए-रंग ओ साज़-हा मस्त-ए-तरब 

नश्शा-हा शादाब-ए-रंग ओ साज़-हा मस्त-ए-तरब
शीशा-ए-मय सर्व-ए-सब्ज़-ए-जू-ए-बार-ए-नग़्मा है

हम-नशीं मत कह कि बरहम कर न बज़्म-ए-ऐश-ए-दोस्त
वाँ तो मेरे नाले को भी ए’तिबार-ए-नग़्मा है

नुक्‌तह-चीं है ग़म-ए दिल उस को सुनाए न बने/

 नुक्‌तह-चीं है ग़म-ए दिल उस को सुनाए न बने
क्‌या बने बात जहां बात बनाए न बने

मैं बुलाता तो हूं उस को मगर अय जज़्‌बह-ए दिल
उस पह बन जाए कुछ ऐसी कि बिन आए न बने

खेल सम्‌झा है कहीं छोड़ न दे भूल न जाए
काश यूं भी हो कि बिन मेरे सताए न बने

ग़ैर फिर्‌ता है लिये यूं तिरे ख़त को कि अगर
कोई पूछे कि यह क्‌या है तो छुपाए न बने

इस नज़ाकत का बुरा हो वह भले हैं तो क्‌या
हाथ आवें तो उंहें हाथ लगाए न बने

कह सके कौन कि यह जल्‌वह-गरी किस की है
पर्‌दह छोड़ा है वह उस ने कि उठाए न बने

मौत की राह न देखूं कि बिन आए न रहे
तुम को चाहूं कि न आओ तो बुलाए न बने

बोझ वह सर से गिरा है कि उठाए न उठे
काम वह आन पड़ा है कि बनाए न बने

`इश्‌क़ पर ज़ोर नहीं है यह वह आतिश ग़ालिब
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

पीनस में गुज़रते हैं जो कूचे से वह मेरे 

पीनस में गुज़रते हैं जो कूचे से वह मेरे
कंधा भी कहारों को बदलने नहीं देते

फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर 

फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर
है दाग़-ए-इश्क़ ज़ीनत-ए-जेब-ए-कफ़न हुनूज़

है नाज़-ए-मुफ़्लिसाँ ज़र-ए-अज़-दस्त-रफ़्ता पर
हूँ गुल-फ़रोश-ए-शोख़ी-ए-दाग़-ए-कोहन हुनूज़

मै-ख़ाना-ए-जिगर में यहाँ ख़ाक भी नहीं
ख़म्याज़ा खींचे है बुत-ए-बे-दाद-फ़न हुनूज़

जूँ जादा सर-ब-कू-ए-तमन्ना-ए-बे-दिली
ज़ंजीर-ए-पा है रिश्ता-ए-हुब्बुल-वतन हुनूज़

फिर हुआ वक़्त कि हो बाल कुशा मौजे-शराब 

फिर हुआ वक़्त कि हो बालकुशा[1]मौजे-शराब[2]
दे बते मय[3]को दिल-ओ-दस्ते शना[4] मौजे-शराब

पूछ मत वजहे-सियहमस्ती[5]-ए-अरबाबे-चमन[6]
साया-ए-ताक[7] में होती है हवा मौजे-शराब

है ये बरसात वो मौसम कि अजब क्या है अगर
मौजे-हस्ती[8] को करे फ़ैज़े-हवा[9] मौजे शराब

जिस क़दर रूहे-नबाती[10] है जिगर तश्ना-ए-नाज़[11]
दे है तस्कीं[12]ब-दमे- आबे-बक़ा [13] मौजे-शराब

बस कि दौड़े है रगे-ताक[14] में ख़ूँ हो-हो कर
शहपरे-रंग [15] से है बालकुशा[16] मौजे-शराब

मौज-ए-गुल[17] से चराग़ाँ[18] है गुज़रगाहे ख़याल[19]
है तसव्वुर[20] में जिबस[21] जल्वानुमा मौजे-शराब

नश्शे के पर्दे में है मह्वे[22] तमाशा -ए-दिमाग़
बस कि रखती है सरे- नश-ओ-नुमा[23] मौजे शराब

एक आलम[24] पे है तूफ़ानी-ए-कैफ़ीयते-फ़स्ल[25]
मौज -ए-सब्ज़ा-ए-नौख़ेज़[26] से ता मौजे-शराब

शरहे[27] -हंगामा-ए-हस्ती[28] है, ज़हे[29]मौसमे-गुल
रहबरे-क़तरा ब-दरिया[30] है ख़ुशा[31]मौजे-शराब

होश उड़ते हैं मेरे जल्वा-ए-गुल[32] देख असद
फिर हुआ वक़्त कि हो बालकुशा मौजे-शराब

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें बाल खोले
  2. ऊपर जायें मदिरा की धारा
  3. ऊपर जायें मदिरा पात्र
  4. ऊपर जायें हृदय व हाथ की शक्ति
  5. ऊपर जायें नशे में धुत्त होने का कारण
  6. ऊपर जायें माली
  7. ऊपर जायें अंगूर की बेल की छाँव
  8. ऊपर जायें जीवन धारा
  9. ऊपर जायें वायु का आनंद
  10. ऊपर जायें वनस्पति की आत्मा
  11. ऊपर जायें गर्वपूर्ण प्यास
  12. ऊपर जायें तसल्ली
  13. ऊपर जायें अमृत की बूँद की तरह
  14. ऊपर जायें अंगूर की रग
  15. ऊपर जायें रंगीन पंख
  16. ऊपर जायें बाल खोले हुए
  17. ऊपर जायें पुष्प लहर
  18. ऊपर जायें प्रदीप्त
  19. ऊपर जायें कल्पनाओं की राह
  20. ऊपर जायें कल्पना
  21. ऊपर जायें अत्याधिक
  22. ऊपर जायें छुपा हुआ
  23. ऊपर जायें विकास
  24. ऊपर जायें स्थिति
  25. ऊपर जायें वसंत के आने की उमंग
  26. ऊपर जायें नवोदित हरियाली की बहार
  27. ऊपर जायें व्याख्या
  28. ऊपर जायें जीवन की चहल-पहल
  29. ऊपर जायें धन्य
  30. ऊपर जायें बूँद को नदी तक ले जाने वाला
  31. ऊपर जायें बहुत अच्छा
  32. ऊपर जायें फूल की बहार

1.हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पर दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।

2.यही है आज़माना तो सताना किसको कहते हैं,
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तहां क्यों हो।

3.हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के खुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।

4.उनको देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक,
वो समझते हैं के बीमार का हाल अच्छा है।

5.इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे।

ब-नाला हासिल-ए-दिल-बस्तगी फ़राहम कर 

ब-नाला हासिल-ए-दिल-बस्तगी फ़राहम कर
मता-ए-ख़ाना-ए-ज़ंजीर जुज़ सदा मालूम

ब-क़द्र-ए-हौसला-ए-इश्क़ जल्वा-रेज़ी है
वगरना ख़ाना-ए-आईना की फ़ज़ा मालूम

‘असद’ फ़रेफ्ता-ए-इंतिख़ाब-ए-तर्ज़-ए-जफ़ा
वगरना दिलबरी-ए-वादा-ए-वफ़ा मालूम

बर्शकाल-ए-गिर्या-ए-आशिक़ है देखा चाहिए

बर्शकाल-ए-गिर्या-ए-आशिक़ है देखा चाहिए
खिल गई मानिंद-ए-गुल सौ जा से दीवार-ए-चमन

उल्फ़त-ए-गुल से ग़लत है दावा-ए-वारस्तगी
सर्व है बा-वस्फ़-ए-आज़ादी गिरफ़्तार-ए-चमन

बाद मरने के मेरे घर से यह सामाँ निकला

बूए-गुल, नाला-ए-दिल, दूदे चिराग़े महफ़िल
जो तेरी बज़्म से निकला सो परीशाँ निकला।

चन्द तसवीरें-बुताँ चन्द हसीनों के ख़ुतूत,
बाद मरने के मेरे घर से यह सामाँ निकला।

बीम-ए-रक़ीब से नहीं करते विदा-ए-होश

बीम-ए-रक़ीब से नहीं करते विदा-ए-होश
मजबूर याँ तलक हुए ऐ इख़्तियार हैफ़

जलता है दिल कि क्यूँ न हम इक बार जल गए
ऐ ना-तमामी-ए-नफ़स-ए-शोला-बार हैफ़

मस्ती ब-ज़ौक़-ए-ग़फ़लत-ए-साक़ी हलाक है 

मस्ती ब-ज़ौक़-ए-ग़फ़लत-ए-साक़ी हलाक है
मौज-ए-शराब यक-मिज़ा-ए-ख़्वाब-नाक है

जुज़ ज़ख्म-ए-तेग़-ए-नाज़ नहीं दिल में आरज़ू
जेब-ए-ख़याल भी तिरे हाथों से चाक है

जोश-ए-जुनूँ से कुछ नज़र आता नहीं असद
सहरा हमारी आँख में यक-मुश्त-ए-ख़ाक है

मुँद गईं खोलते ही खोलते आँखें ‘ग़ालिब’ 

मुँद गईं खोलते ही खोलते आँखें ग़ालिब
यार लाए मिरी बालीं पे उसे पर किस वक़्त

मुझ को दयार-ए-ग़ैर में मारा वतन से दूर 

मुझ को दयार-ए-ग़ैर में मारा वतन से दूर
रख ली मिरे ख़ुदा ने मिरी बेकसी की शर्म

वह हल्क़ा-हा-ए-ज़ुल्फ़ कमीं में हैं या ख़ुदा
रख लीजो मेरे दावा-ए-वारस्तगी की शर्म

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं 

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
कभी सबा को, कभी नामाबर को देखते हैं

वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!
कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं

तेरे ज़वाहिरे तर्फ़े कुल को क्या देखें
हम औजे तअले लाल-ओ-गुहर को देखते हैं
[1]

रहा गर कोई ता क़यामत सलामत 

रहा गर कोई ता क़यामत सलामत
फिर इक रोज़ मरना है हज़रत सलामत

जिगर को मिरे इश्क़-ए-खूँ-नाबा-मशरब
लिखे है ख़ुदावंद-ए-नेमत सलामत

अलर्रग़्मे दुश्मन शहीद-ए-वफ़ा हूँ
मुबारक मुबारक सलामत सलामत

नहीं गर ब-काम-ए-दिल-ए-ख़स्ता गर्दूं
तमाशा-ए-नैरंग-ए-सूरत सलामत

दो-आलम की हस्ती पे ख़त्त-ए-फ़ना खींच
दिल-ओ-दस्त-ए-अरबाब-ए-हिम्मत सलामत

नहीं गर ब-काम-ए-दिल-ए-ख़स्ता गर्दूं
जिगर-ख़ाइ-ए-जोश-ए-हसरत सलामत

न औरों की सुनता न कहता हूँ अपनी
सर-ए-ख़स्ता ओ शोर-ए-वहशत सलामत

वुफ़ूर-ए-वफ़ा है हुजूम-ए-बला है
सलामत मलामत मलामत सलामत

न फ़िक्र-ए-सलामत न बीम-ए-मलामा
ज़-ख़ुद-रफ़्तगी-हा-ए-हैरत सलामत

लब-ए-ईसा की जुम्बिश करती है गहवारा-जम्बानी 

लब-ए-ईसा की जुम्बिश करती है गहवारा-जम्बानी
क़यामत कुश्त-ए-लाल-ए-बुताँ का ख़्वाब-ए-संगीं है

बयाबान-ए-फ़ना है बाद-ए-सहरा-ए-तलब ग़ालिब
पसीना-तौसन-ए-हिम्मत तो सैल-ए-ख़ाना-ए-जीं है

लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले

लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले
ग़ालिब ये ख़ौफ़ है कि कहाँ से अदा करूँ

ख़ुश वहशते कि अर्ज़-ए-जुनून-ए-फ़ना करूँ
जूँ गर्द-ए-राह जामा-ए-हस्ती क़बा करूँ

आ ऐ बहार-ए-नाज़ कि तेरे ख़िराम से
दस्तार गिर्द-ए-शाख़-ए-गुल-ए-नक़्श-ए-पा करूँ

ख़ुश उफ़्तादगी कि ब-सहरा-ए-इन्तिज़ार
जूँ जादा गर्द-ए-रह से निगह सुर्मा-सा करूँ

सब्र और ये अदा कि दिल आवे असीर-ए-चाक
दर्द और ये कमीं कि रह-ए-नाला वा करूँ

वह बे-दिमाग़-ए-मिन्नत-ए-इक़बाल हूँ कि मैं
वहशत ब-दाग़-ए-साया-ए-बाल-ए-हुमा करूँ

वह इल्तिमास-ए-लज्ज़त-ए-बे-दाद हूँ कि मैं
तेग़-ए-सितम को पुश्त-ए-ख़म-ए-इल्तिजा करूँ

वह राज़-ए-नाला हूँ कि ब-शरह-ए-निगाह-ए-अज्ज़
अफ़्शाँ ग़ुबार-ए-सुर्मा से फ़र्द-ए-सदा करूँ

लो हम मरीज़-ए-इश्क़ के बीमार-दार हैं

लो हम मरीज़-ए-इश्क़ के बीमार-दार हैं
अच्छा अगर न हो तो मसीहा का क्या इलाज

वह शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहां

 वह फ़िराक़ और वह विसाल कहां
वह शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहां

फ़ुर्‌सत-ए कारोबार-ए शौक़ किसे
ज़ौक़-ए नज़्‌ज़ारह-ए जमाल कहां

दिल तो दिल वह दिमाग़ भी न रहा
शोर-ए सौदा-ए ख़त्‌त-ओ-ख़ाल कहां

थी वह इक शख़्‌स के तसव्‌वुर से
अब वह र`नाई-ए ख़याल कहां

ऐसा आसां नहीं लहू रोना
दिल में ताक़त जिगर में हाल कहां

हम से छूटा क़िमार-ख़ानह-ए `इश्‌क़
वां जो जावें गिरिह में माल कहां

फ़िक्‌र-ए दुन्‌या में सर खपाता हूं
मैं कहां और यह वबाल कहां

मुज़्‌महिल हो गए क़ुवा ग़ालिब
वह `अनासिर में इ`तिदाल कहां

वां उस को हौल-ए-दिल है तो यां मैं हूं शरम-सार

वाँ उस को हौल-ए-दिल है तो याँ मैं हूँ शर्म-सार
यानी ये मेरी आह की तासीर से न हो

अपने को देखता नहीं ज़ौक़-ए-सितम को देख
आईना ता-कि दीदा-ए-नख़चीरर से न हो

वुसअत-स-ईए-करम देख कि सर-ता-सर-ए-ख़ाक

वुसअत-ए-सई-ए-करम देख कि सर-ता-सर-ए-ख़ाक
गुज़रे है आबला-पा अब्र-ए-गुहर-बार हुनूज़

यक-क़लम काग़ज़-ए-आतिश-ज़दा है सफ़्हा-ए-दश्त
नक़्श-ए-पा में है तब-ए-गर्मी-ए-रफ़्तार हुनूज़

शुमार-ए सुबह मरग़ूब-ए बुत-ए-मुश्किल पसंद आया

शुमार-ए सुबह मरग़ूब-ए बुत-ए-मुश्किल पसंद आया
तमाशा-ए बयक-कफ़ बुरदन-ए सद दिल पसंद आया

ब फ़ैज़-ए बे-दिली नौमीदी-ए जावेद आसां है
कुशायिश को हमारा `उक़द-ए मुश्किल पसंद आया

हवा-ए सैर-ए गुल आईना-ए बे-मिहरी-ए क़ातिल
कि अंदाज़-ए ब ख़ूं-ग़लतीदन-ए बिस्मिल पसंद आया

रवानियाँ -ए मौज-ए ख़ून-ए बिस्मिल से टपकता है
कि लुतफ़-ए बे-तहाशा-रफ़तन-ए क़ातिल पसंद आया

असद हर जा सुख़न ने तरह-ए बाग़-ए-तज़ डाली है
मुझे रंग-ए बहार-ईजादी-ए बेदिल पसंद आया

सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर

सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर
तग़य्युर आब-ए-बर-जा-मांदा का पाता है रंग आख़िर

न की सामान-ए-ऐश-ओ-जाह ने तदबीर वहशत की
हुआ जाम-ए-ज़मुर्रद भी मुझे दाग़-ए-पलंग आख़िर

सितम-कश मस्लहत से हूँ कि ख़ूबाँ तुझ पे आशिक़ हैं

सितम-कश मस्लहत से हूँ कि ख़ूबाँ तुझ पे आशिक़ हैं
तकल्लुफ़ बरतरफ़ मिल जाएगा तुझ सा रक़ीब आख़िर

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंदख़ू क्या है

ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसे
वरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो चार
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है

बना है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में “ग़ालिब” की आबरू क्या है

हर क़दम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायाँ मुझसे

हर क़दम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायाँ[1]मुझसे
मेरी रफ़्तार से भागे है बयाबाँ मुझसे

दर्से-उन्वाने-तमाशा[2]बा-तग़ाफ़ुल[3]ख़ुशतर[4]
है निगहे- रिश्ता-ए-शीराज़ा-ए-मिज़गाँ[5]

वहशते-आतिशे-दिल[6]से शबे-तन्हाई[7]में
सूरते-दूद [8]रहा साया गुरेज़ाँ [9]मुझसे

ग़मे-उश्शाक़[10]न हो सादगी आमोज़े-बुताँ[11]
किस क़दर ख़ाना-ए- आईना[12]है वीराँ मुझसे

असरे-आब्ला[13]से है जादा-ए-सहरा-ए-जुनूँ[14]
सूरते-रिश्ता-ए-गोहर[15]है चराग़ाँ मुझसे

बेख़ुदी बिस्तरे-तम्हीदे-फ़राग़त[16]हो जो
पुर है साये की तरह मेरा शस्बिस्ताँ[17]मुझसे

शौक़े-दीदार में गर तू मुझे गर्दन मारे
हो निगह मिस्ले-गुले-शम्मअ परीशाँ मुझसे

बेकसी हाए शबे-हिज्र की वहशत है ये
साया ख़ुरशीदे-क़यामत [18] में‍ है पिन्हाँ मुझसे

गर्दिशे-साग़रे-सद जल्वा-ए-रंगीं तुझसे
आईना दारी-ए-यक दीद-ए-हैराँ [19]मुझसे

निगह-ए-गर्म से इक आग टपकती है ‘असद’
है चराग़ाँ ख़स-ओ-ख़ाशाके-गुलिस्ताँ[20] मुझसे

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें परिचित
  2. ऊपर जायें खेल-शीर्षक की शिक्षा
  3. ऊपर जायें उपेक्षित
  4. ऊपर जायें हर्षित
  5. ऊपर जायें बिखरी पलकों को सी देने वाला धागा मुझसे
  6. ऊपर जायें हृदय की तपिश के डर से
  7. ऊपर जायें अकेलेपन की रात
  8. ऊपर जायें धुएँ की तरह
  9. ऊपर जायें बचता
  10. ऊपर जायें प्रियवर का दु:ख
  11. ऊपर जायें प्रिय प्रशिक्षक
  12. ऊपर जायें दर्पण गृह
  13. ऊपर जायें छालों के प्रभाव से
  14. ऊपर जायें जंगल के रास्तों का उन्माद
  15. ऊपर जायें मोतियों जैसा
  16. ऊपर जायें अवकाश का उपक्रम
  17. ऊपर जायें रात्रि-गृह
  18. ऊपर जायें प्रलय के समय का सूर्य
  19. ऊपर जायें चकित
  20. ऊपर जायें उद्यान का कूड़ा-कचरा जलना

हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुशकिल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़

हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़
दुआ क़ुबूल हो या रब कि उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़

न हो ब-हर्ज़ा बयाबाँ-नवर्द-ए-वहम-ए-वुजूद
हुनूज़ तेरे तसव्वुर में है नशेब-ओ-फ़राज़

विसाल जल्वा तमाशा है पर दिमाग़ कहाँ
कि दीजे आइना-ए-इन्तिज़ार को पर्दाज़

हर एक ज़र्रा-ए-आशिक़ है आफ़ताब-परस्त
गई न ख़ाक हुए पर हवा-ए-जल्वा-ए-नाज़

न पूछ वुसअत-ए-मै-ख़ाना-ए-जुनूँ ग़ालिब
जहाँ ये कासा-ए-गर्दूं है एक ख़ाक-अंदाज़

फ़रेब-ए-सनअत-ए-ईजाद का तमाशा देख
निगाह अक्स-फ़रोश-ओ-ख़याल-ए-आइना-साज़

ज़-बस-कि जल्वा-ए-सय्याद हैरत-आरा है
उड़ी है सफ़्हा-ए-ख़ातिर से सूरत-ए-परवाज़

हुजूम-ए-फ़िक्र से दिल मिस्ल-ए-मौज लर्ज़ां है
कि शीशा नाज़ुक ओ सहबा है आब-गीन-गुदा

असद से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ वो मअनी है
कि खींचिए पर-ए-ताइर से सूरत-ए-परवाज़

हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी 

हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी
दिल जोश-ए-गिर्या में है डूबी हुई असामी

उस शम्अ की तरह से जिस को कोई बुझा दे
मैं भी जले-हुओं में हूँ दाग़-ए-ना-तमामी

हुजूम-ए-नाला हैरत आजिज़-ए-अर्ज़-ए-यक-अफ़्ग़ँ है

हुजूम-ए-नाला हैरत आजिज़-ए-अर्ज़-ए-यक-अफ़्ग़ँ है
ख़मोशी रेशा-ए-सद-नीस्ताँ से ख़स-ब-दंदाँ है

तकल्लुफ़-बर-तरफ़ है जाँ-सिताँ-तर लुत्फ़-ए-बद-ख़ूयाँ
निगाह-ए-बे-हिजाब-ए-नाज़ तेग़-ए-तेज़-ए-उर्यां है

हुई यह कसरत-ए ग़म से तलफ़ कैफ़िययत-ए शादी
कि सुबह-ए-ईद मुझ को बद-तर अज़ चाक-ए गरेबां है

दिल ओ दीं नक़्द ला साक़ी से गर सौदा किया चाहे
कि उस बाज़ार में साग़र माता-ए-दस्त-गर्दां है

ग़म आग़ोश-ए-बला में परवरिश देता है आशिक़ को
चराग़-ए-रौशन अपना क़ुल्ज़ुम-ए-सरसर का मर्जां है

तकल्लुफ़ साज़-ए-रुस्वाई है ग़ाफ़िल शर्म-ए-रानाई
दिल-ए-ख़ूँ-गश्ता दर दस्त-ए-हिना-आलूदा उर्यां है

असद जमइयत-ए-दिल दर-किनार-ए-बे-ख़ुदी ख़ुश-तर
दो-आलम आगही सामान-ए-यक-ख़्वाब-ए-परेशाँ है

हुश्न-ए-बेपरवा ख़रीदार-ए-मता-ए-जलवा है 

हुस्न-ए-बे-परवा ख़रीदार-ए-माता-ए-जल्वा है
आइना ज़ानू-ए-फ़िक्र-ए-इख़्तिरा-ए-जल्वा है

ता-कुजा ऐ आगही रंग-ए-तमाशा बाख़्तन
चश्म-ए-वा-गर्दीदा आग़ोश-ए-विदा-ए-जल्वा है

है बज़्म-ए-बुतां में सुख़न आज़ुर्दा लबों से 

है बज़्म-ए-बुताँ में सुख़न आज़ुर्दा-लबों से
तंग आए हैं हम ऐसे ख़ुशामद-तलबों से

है दौर-ए-क़दह वजह-ए-परेशानी-ए-सहबा
यक-बार लगा दो ख़ुम-ए-मय मेरे लबों से

रिंदाना-ए-दर-ए-मई-कदा गुस्ताख़ हैं ज़ाहिद
ज़िन्हार न होना तरफ़ उन बे-अदबों से

बेदाद-ए-वफ़ा देख कि जाती रही आख़िर
हर-चंद मिरी जान को था रब्त लबों से

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