गिरिजाकुमार माथुर की रचनाएँ

मेरे युवा-आम में नया बौर आया है 

मेरे युवा-आम में नया बौर आया है
ख़ुशबू बहुत है क्योंकि तुमने लगाया है

आएगी फूल-हवा अलबेली मानिनी
छाएगी कसी-कसी अँबियों की चाँदनी
चमकीले, मँजे अंग चेहरा हँसता मयंक
खनकदार स्वर में तेज गमक-ताल फागुनी

मेरा जिस्म फिर से नया रूप धर आया है
ताज़गी बहुत है क्योंकि तुमने सजाया है।

अन्धी थी दुनिया या मिट्टी-भर अन्धकार
उम्र हो गई थी एक लगातार इन्तज़ार
जीना आसान हुआ तुमने जब दिया प्यार
हो गया उजेला-सा रोओं के आर-पार

एक दीप ने दूसरे को चमकाया है
रौशनी के लिए दीप तुमने जलाया है

कम न हुई, मरती रही केसर हर साँस से
हार गया वक़्त मन की सतरंगी आँच से
कामनाएँ जीतीं जरा-मरण-विनाश से
मिल गया हरेक सत्य प्यार की तलाश से

थोड़े ही में मैंने सब कुछ भर पाया है
तुम पर वसन्त क्योंकि वैसा ही छाया है

इतना मत दूर रहो गन्ध कहीं खो जाए 

इतना मत दूर रहो
गन्ध कहीं खो जाए
आने दो आँच
रोशनी न मन्द हो जाए

देखा तुमको मैंने कितने जन्मों के बाद
चम्पे की बदली सी धूप-छाँह आसपास
घूम-सी गई दुनिया यह भी न रहा याद
बह गया है वक़्त लिए मेरे सारे पलाश

ले लो ये शब्द
गीत भी कहीं न सो जाए
आने दो आँच
रोशनी न मन्द हो जाए

उत्सव से तन पर सजा ललचाती मेहराबें
खींच लीं मिठास पर क्यों शीशे की दीवारें
टकराकर डूब गईं इच्छाओं की नावें
लौट-लौट आई हैं मेरी सब झनकारें

नेह फूल नाजुक
न खिलना बन्द हो जाए
आने दो आँच
रोशनी न मन्द हो जाए.

क्या कुछ कमी थी मेरे भरपूर दान में
या कुछ तुम्हारी नज़र चूकी पहचान में
या सब कुछ लीला थी तुम्हारे अनुमान में
या मैंने भूल की तुम्हारी मुस्कान में

खोलो देह-बन्ध
मन समाधि-सिन्धु हो जाए
आने दो आँच
रोशनी न मन्द हो जाए

इतना मत दूर रहो
गन्ध कहीं खो जाए

बरसों के बाद कभी 

बरसों के बाद कभी
हम तुम यदि मिलें कहीं,
देखें कुछ परिचित से,
लेकिन पहिचानें ना।

याद भी न आये नाम,
रूप, रंग, काम, धाम,
सोचें,यह सम्भव है –
पर, मन में मानें ना।

हो न याद, एक बार
आया तूफान, ज्वार
बंद, मिटे पृष्ठों को –
पढ़ने की ठाने ना।

बातें जो साथ हुई,
बातों के साथ गयीं,
आँखें जो मिली रहीं –
उनको भी जानें ना।

छाया मत छूना 

छाया मत छूना मन
होता है दुख दूना मन

जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी
छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी;
तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी,
कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी।

भूली-सी एक छुअन
बनता हर जीवित क्षण
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन

यश है न वैभव है, मान है न सरमाया;
जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया।
प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्‍णा है,
हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्‍णा है।

जो है यथार्थ कठिन
उसका तू कर पूजन-
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन

दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं
देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं।
दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर,
क्‍या हुया जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?

जो न मिला भूल उसे
कर तू भविष्‍य वरण,
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन

कौन थकान हरे जीवन की 

कौन थकान हरे जीवन की?
बीत गया संगीत प्यार का,
रूठ गयी कविता भी मन की ।
वंशी में अब नींद भरी है,
स्वर पर पीत सांझ उतरी है
बुझती जाती गूंज आखिरी
इस उदास बन पथ के ऊपर
पतझर की छाया गहरी है,
अब सपनों में शेष रह गई
सुधियां उस चंदन के बन की ।

रात हुई पंछी घर आए,
पथ के सारे स्वर सकुचाए,
म्लान दिया बत्ती की बेला
थके प्रवासी की आंखों में
आंसू आ आ कर कुम्हलाए,
कहीं बहुत ही दूर उनींदी
झांझ बज रही है पूजन की ।
कौन थकान हरे जीवन की?

ढाकबनी

लाल पत्थर लाल मिटृटी

लाल कंकड़ लाल बजरी

लाल फूले ढाक के वन

डाँग गाती फाग कजरी

सनसनाती साँझ सूनी

वायु का कंठला खनकता

झींगुरों की खंजड़ी पर

झाँझ-सा बीहड़ झनकता

कंटकित बेरी करौंदे

महकते हैं झाब झोरे

सुन्न हैं सागौन वन के

कान जैसे पात चौड़े

ढूह, टीेले, टोरियों पर

धूप-सूखी घास भूरी

हाड़ टूटे देह कुबड़ी

चुप पड़ी है देह बूढ़ी

ताड़, तेंदू, नीम, रेंजर

चित्र लिखी खजूर पांतें

छाँह मंदी डाल जिन पर

ऊगती हैं शुक्ल रातें

बीच सूने में

बनैले ताल का फैला अतल जल

थे कभी आए यहाँ पर

छोड़ दमयंती दुखी नल

भूख व्याकुल ताल से ले

मछलियाँ थीं जो पकाईं

शाप के कारन जली ही

वे उछल जल में समाईं

है तभी से साँवली

सुनसान जंगल की किनारी

हैं तभी से ताल की

सब मछलियाँ मनहूस काली

पूर्व से उठ चाँद आँधा

स्याह जल में चमचमाता

बनचमेली की जड़ों से

नाग कसकर लिपट जाता

कोस भर तक केवड़े का

है गसा गुंजान जंगल

उन कटीली झाड़ियों में

उलझ जाता चाँद चंचल

चाँदनी की रैन चिड़िया

गंध कलियों पर उतरती

मूँद लेती नैन गोरे

पाँख धीरे बंद करती

गंध घोड़े पर चढ़ीं

दुलकी चली आतीं हवाएँ

टाप हल्के पड़ें जल में

गोल लहरें उछल आएँ

सो रहा बन ढूह सोते

ताल सोता तीर सोते

प्रेतवाले पेड़ सोते

सात तल के नीर सोते

ऊँघती है रूँद

करवट ले रही है घास ऊँची

मौन दम साधे पड़ी है

टोरियों की रास ऊँची

साँस लेता है बियाबाँ

डोल जातीं सुन्न छाँहें

हर तरफ गुपचुप खड़ी हैं

जनपदों की आत्माएँ

ताल की है पार ऊँची

उतर गलियारा गया है

नीम, कंजी, इमलियों में

निकल बंजारा गया है

बीच पेड़ों की कटन में

हैं पड़े दो चार छप्पर

हाँडियाँ, मचिया, कठौते

लट्ठ, गूदड़, बैल, बक्खर

राख, गोबर, चरी, औंगन

लेज, रस्सी, हल, कुल्हाड़ी

सूत की मोटी फतोही

चका, हँसिया और गाड़ी

धुआँ कंडों का सुलगता

भौंकता कुत्ता शिकार

है यहाँ की जिंदगी पर

शाप नल का स्याह भारी

भूख की मनहूस छाया

जब कि भोजन सामने हो

आदमी हो ठीकरे-सा

जबकि साधन सामने हो

धन वनस्पति भरे जंगल

और यह जीवन भिखरी

शाप नल का घूमता है

भोथरे हैं हल-कुल्हाड़ी

हल कि जिसकी नोक से

बेजान मिट्टी झूम उठती

सभ्यता का चाँद खिलता

जंगलों की रात मिटती

आइनों से गाँव होते

घर न रहते धूल कूड़ा

जम न जाता ज़िंदगी पर

युगों का इतिहास-घूरा

मृत्यु-सा सुनसान बनकर

जो बनैला प्रेत फिरता

खाद बन जीवन फसल की

लोक मंगल रूप धरता

रंग मिट्टी का बदलता

नीर का सब पाप धुलता

हरे होते पीत ऊसर

स्वस्थ हो जाती मनुजता

लाल पत्थर, लाल मिट्टी

लाल कंकड़, लाल बजरी

फिर खिलेंगे झाक के वन

फिर उठेगी फाग कजरी।

दो पाटों की दुनिया

दो पाटों की दुनिया
चारों तरफ शोर है,
चारों तरफ भरा-पूरा है,
चारों तरफ मुर्दनी है,
भीड और कूडा है।

हर सुविधा
एक ठप्पेदार अजनबी उगाती है,
हर व्यस्तता
और अधिक अकेला कर जाती है।

हम क्या करें-
भीड और अकेलेपन के क्रम से कैसे छूटें?

राहें सभी अंधी हैं,
ज्यादातर लोग पागल हैं,
अपने ही नशे में चूर-
वहशी हैं या गाफिल हैं,

खलानायक हीरो हैं,
विवेकशील कायर हैं,
थोडे से ईमानदार-
हम क्या करें-
अविश्वास और आश्वासन के क्रम से कैसे छूटें?

तर्क सभी अच्छे हैं,
अंत सभी निर्मम हैं,
आस्था के वसनों में,
कंकालों के अनुक्रम हैं,

प्रौढ सभी कामुक हैं,
जवान सब अराजक हैं,
बुध्दिजन अपाहिज हैं,
मुंह बाए हुए भावक हैं।

हम क्या करें-
तर्क और मूढता के क्रम से कैसे छूटें!

हर आदमी में देवता है,
और देवता बडा बोदा है,
हर आदमी में जंतु है,
जो पिशाच से न थोडा है।

हर देवतापन हमको
नपुंसक बनाता है
हर पैशाचिक पशुत्व
नए जानवर बढाता है,

हम क्या करें-
देवता और राक्षस के क्रम से कैसे छूटें?

बरसों के बाद कभी
बरसों के बाद कभी,
हम-तुम यदि मिलें कहीं,
देखें कुछ परिचित से,
लेकिन पहिचानें ना।
याद भी न आए नाम,
रूप, रंग, काम, धाम,
सोचें,
यह सम्भव है-
पर, मन में मानें ना।

हो न याद, एक बार
आया तूफान, ज्वार
बंद, मिटे पृष्ठों को-
पढने की ठानें ना।

बातें जो साथ हुईं,
बातों के साथ गईं,
आंखें जो मिली रहीं-
उनको भी जानें ना।

सार्थकता
तुमने मेरी रचना के
सिर्फ एक शब्द पर
किंचित मुसका दिया
– अर्थ बन गई भाषा
छोटी सी घटना थी
सहसा मिल जाने की
तुमने जब चलते हुए
एक गरम लाल फूल
होठों पर छोड दिया
-घटना सच हो गई

संकट की घडियों में
बढते अंधकार पर
तुमने निज पल्ला डाल
गांठ बना बांध लिया
– व्यथा अमोल हो गई
मुझसे जब मनमाना
तुमने देह रस पाकर
आंखों से बता दिया
-देह अमर हो गई

अ-नया वर्ष
इसके पहले कि हम एक कविता तो दूर
एक अच्छा खत ही लिख पाते

इसके पहले कि हम किसी शाम
बिना साथ ही उदास हुए हंस पाते

इसके पहले कि हम एक दिन
सिर्फ एक ही दिन
पूरे दिन की तरह बिता पाते

इसके पहले कि हम किसी व्यक्ति
या घटना या स्थान या स्थिति से
बिना ऊबे हुए
अपरिचित की तरह मिले पाते

इसके पहले कि
सुख के और संकट के क्षणों को
हम अलग-अलग करके
समझ पाते

इसके पहले
इसके पहले
एक और अर्थहीन बरसा गीत गया।

आज हैं केसर रंग रंगे वन

आज हैं केसर रंग रंगे वन
रंजित शाम भी फागुन की खिली खिली पीली कली-सी
केसर के वसनों में छिपा तन
सोने की छाँह-सा
बोलती आँखों में
पहले वसन्त के फूल का रंग है।
गोरे कपोलों पे हौले से आ जाती
पहले ही पहले के
रंगीन चुंबन की सी ललाई।
आज हैं केसर रंग रंगे
गृह द्वार नगर वन
जिनके विभिन्न रंगों में है रंग गई
पूनो की चंदन चाँदनी।

जीवन में फिर लौटी मिठास है
गीत की आख़िरी मीठी लकीर-सी
प्यार भी डूबेगा गोरी-सी बाहों में
ओठों में आँखों में
फूलों में डूबे ज्यों
फूल की रेशमी रेशमी छाँहें।
आज हैं केसर रंग रंगे वन।

चूड़ी का टुकड़ा

आज अचानक सूनी-सी संध्या में
जब मैं यों ही मैले कपड़े देख रहा था
किसी काम में जी बहलाने
एक सिल्क के कुर्ते की सिलवट में लिपटा
गिरा रेशमी चूड़ी का छोटा-सा टुकड़ा
उन गोरी कलाइयों में जो तुम पहने थीं
रंग भरी उस मिलन रात में।

मैं वैसा का वैसा ही रह गया सोचता
पिछली बातें
दूज कोर से उस टुकड़े पर
तिरने लगीं तुम्हारी सब तस्वीरें
सेज सुनहली
कसे हुए बन्धन में चूड़ी का झर जाना।
निकल गईं सपने जैसी वे रातें
याद दिलाने रहा सुहाग भरा यह टुकड़ा।

पन्द्रह अगस्त 


आज जीत की रात
पहरुए! सावधान रहना
खुले देश के द्वार
अचल दीपक समान रहना


प्रथम चरण है नए स्वर्ग का
है मंज़िल का छोर
इस जनमंथन से उठ आई
पहली रत्न-हिलोर
अभी शेष है पूरी होना
जीवन-मुक्ता-डोर
क्योंकि नहीं मिट पाई दुख की
विगत साँवली कोर
ले युग की पतवार
बने अम्बुधि समान रहना।


विषम शृंखलाएँ टूटी हैं
खुली समस्त दिशाएँ
आज प्रभंजन बनकर चलतीं
युग-बंदिनी हवाएँ
प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गईं
यह सिमटी सीमाएँ
आज पुराने सिंहासन की
टूट रही प्रतिमाएँ
उठता है तूफ़ान, इन्दु! तुम
दीप्तिमान रहना।


ऊँची हुई मशाल हमारी
आगे कठिन डगर है
शत्रु हट गया, लेकिन उसकी
छायाओं का डर है
शोषण से है मृत समाज
कमज़ोर हमारा घर है
किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी
यह विश्वास अमर है
जन-गंगा में ज्वार,
लहर तुम प्रवहमान रहना
पहरुए! सावधान रहना।

भीगा दिन 

भीगा दिन
पश्चिमी तटों में उतर चुका है,
बादल-ढकी रात आती है
धूल-भरी दीपक की लौ पर
मंद पग धर।

गीली राहें धीरे-धीरे सूनी होतीं
जिन पर बोझल पहियों के लंबे निशान है
माथे पर की सोच-भरी रेखाओं जैसे।

पानी-रँगी दिवालों पर
सूने राही की छाया पड़ती
पैरों के धीमे स्वर मर जाते हैं
अनजानी उदास दूरी में।

सील-भरी फुहार-डूबी चलती पुरवाई
बिछुड़न की रातों को ठंडी-ठंडी करती
खोये-खोये लुटे हुए खाली कमरे में
गूँज रहीं पिछले रंगीन मिलन की यादें
नींद-भरे आलिंगन में चूड़ी की खिसलन
मीठे अधरों की वे धीमी-धीमी बातें।

ओले-सी ठंडी बरसात अकेली जाती
दूर-दूर तक
भीगी रात घनी होती हैं
पथ की म्लान लालटेनों पर
पानी की बूँदें
लंबी लकीर बन चू चलती हैं
जिन के बोझल उजियाले के आस-पास
सिमट-सिमट कर
सूनापन है गहरा पड़ता,

-दूर देश का आँसू-धुला उदास वह मुखड़ा-
याद-भरा मन खो जाता है
चलने की दूरी तक आती हुई
थकी आहट में मिल कर।

नया बनने का दर्द 

पुराना मकान
फिर पुराना ही होता है
-उखड़ा हो पलस्तर
खार लगी चनखारियाँ
टूटी महरावें
घुन लगे दरवाजे
सील भरे फर्श,
झरोखे, अलमारियाँ

-कितनी ही मरम्मत करो
चेपे लगाओ
रंग-रोगन करवाओ
चमक नहीं आती है
रूप न सँवरता है
नींव वही रहती है
कुछ भी न बदलता है

-लेकिन जब आएँ
नई दुनिया की चुनौतियाँ
नई चीजों की आँधियाँ
घर हो-
या व्यवस्था हो
नक्शा यदि बदला नहीं
नया कुछ हुआ नहीं
बखिए उधेड़ता
वक्त तेजी से आता है
जो कुछ है सड़ा-गला
सब कुछ ढह जाता है

-यों तो पुराना कभी व्यर्थ नहीं होता है
वह एक रंगीन डोर है
रोम रोम बँधी जिससे
एक-एक पीढ़ियाँ
माटी से बनी देह
रंग, रूप, बीज-कोष
अपनी पहचान-गन्ध
संस्कार सीढ़ियाँ!

जो कुछ पुराना है मोहक तो लगता है
टूटने का दर्द मगर सहना ही पड़ता है
बहुत कुछ टूटता है
तब नया बनता है

ख़ुशबू बहुत है 

मेरे युवा-आम में नया बौर आया है
ख़ुशबू बहुत है क्‍योंकि तुमने लगाया है

आएगी फूल-हवा अलबेली मानिनी
छाएगी कसी-कसी अँबियों की चाँदनी
चमकीले, मँजे अंग
चेहरा हँसता मयंक
खनकदार स्‍वर में तेज गमक-ताल फागुनी

मेरा जिस्‍म फिर से नया रूप धर आया है
ताज़गी बहुत है क्‍योंकि तुमने सजाया है

अन्‍धी थी दुनिया या मिट्टी-भर अन्‍धकार
उम्र हो गई थी एक लगातार इन्‍तज़ार
जीना आसान हुआ तुमने जब दिया प्‍यार
हो गया उजेला-सा रोओं के आर-पार

एक दीप ने दूसरे को चमकाया है
रौशनी के लिए दीप तुमने जलाया है

कम न हुई, मरती रही केसर हर साँस से
हार गया वक़्त मन की सतरंगी आँच से
कामनाएँ जीतीं जरा-मरण-विनाश से
मिल गया हरेक सत्‍य प्‍यार की तलाश से

थोड़े ही में मैंने सब कुछ भर पाया है
तुम पर वसन्‍त क्‍योंकि वैसा ही छाया है

अनकही बात 

बोलते में
मुस्‍कराहट की कनी
रह गई गड़ कर
नहीं निकली अनी

खेल से
पल्‍ला जो उँगली पर कसा
मन लिपट कर रह गया
छूटा वहीं

बहुत पूछा
पर नहीं उत्‍तर मिला
हैं लजीले मौन
बातें अनगिनी

अर्थ हैं जितने
न उतने शब्‍द हैं
बहुत मीठी है
कहानी अनसुनी

ठीक कर लो
अलग माथे पर पड़ी
ठीक से
आती नहीं है चाँदनी

याद यह दिन रहे
चाहें दूर से
दूर ही से सही
आए रोशनी

चाँदनी की रात है

चाँदनी की रात है तो क्‍या करूँ
ज़िन्‍दगी में चाँदनी कैसे भरूँ

दूर है छिटकी छबीली चाँदनी
बहुत पहली देह-पीली चाँदनी
चौक थे पूरे छुई के : चाँदनी
दीप ये ठण्‍डे रुई के : चाँदनी
पड़ रही आँगन तिरछी चाँदनी
गन्‍ध चौके भरे मैले वसन
गृहिणी चाँदनी

याद यह मीठी कहाँ कैसे धरूँ
असलियत में चाँदनी कैसे भरूँ

फूल चम्‍पे का खिला है चाँद में
दीप ऐपन का जला है चाँद में
चाँद लालिम उग कर उजला हुआ
कामिनी उबटन लगा आई नहा
राह किसकी देखती यह चाँदनी
दूर देश पिया, अकेली चाँदनी

चाँदनी की रात है तो क्‍या करूँ
आसुँओं में चाँदनी कैसे भरूँ

शहर, कस्‍बे, गाँव, ठिठकी चाँदनी
एक जैसी पर न छिटकी चाँदनी
कागजों में बन्‍द भटकी चाँदनी
राह चलते कहाँ अटकी चाँदनी
हविस, हिंसा, होड़ है उन्‍मादिनी
शहर में दिखती नहीं है चाँदनी

चाँदनी की रात है तो क्‍या करूँ
कुटिलता में चाँदनी कैसे भरूँ

गाँव की है रात चटकी चाँदनी
है थकन की नींद मीठी चाँदनी
दूध का झरता बुरादा : चाँदनी
खोपरे की मिगी कच्‍ची चाँदनी

उतर आई रात दूर विहान है
वक्त का ठहराव है सुनसान है

चाँदनी है फसल
ठंडे बाजरे की ज्‍वार की
गोल नन्‍हे चाँद से दाने
उजरिया मटीले घर-द्वार की
एक मुट्ठी चाँदनी भी रह न पाई
जब्र लूटे धूजते संसार की
दबे नंगे पाँव लुक-छिप भागती है
धूल की धौरी नदी गलियार की
चुक गई सारी उमर की चाँदनी

बाल सन से ऊजरे ज्‍यों चाँदनी
कौड़ियों-सी बिछी उजली चाँदनी
कौड़ियों के मोल बिकती चाँदनी
और भी लगती सुहानी चाँदनी
धान, चावल, चून होती चाँदनी

चाँदनी की रात है तो क्‍या करूँ
पंजरों में चाँदनी कैसे भरूँ

गाँव का बूढ़ा कहे सुन चाँदनी
रात काली हो कि होवे चाँदनी
गाँव पर अब भी अँधेरा पाख है
साठ बरसों में न बदली चाँदनी
फिर मिलेगी कब दही-सी चाँदनी
दूध, नैनू, घी, मही-सी चाँदनी

चाँदनी की रात है तो क्‍या करूँ
डण्‍ठलों में चाँदनी कैसे भरूँ

पन्‍द्रह अगस्‍त

आज जीत की रात
पहरुए सावधान रहना !
खुले देश के द्वार
अचल दीपक समान रहना !

प्रथम चरण है नए स्‍वर्ग का
है मंज़िल का छोर
इस जन-मन्‍थन से उठ आई
पहली रत्‍न हिलोर
अभी शेष है पूरी होना
जीवन मुक्‍ता डोर
क्‍योंकि नहीं मिट पाई दुख की
विगत साँवली कोर

ले युग की पतवार
बने अम्‍बुधि महान रहना
पहरुए, सावधान रहना !

विषम शृँखलाएँ टूटी हैं
खुली समस्‍त दिशाएँ
आज प्रभंजन बन कर चलतीं
युग बन्दिनी हवाएँ
प्रश्‍नचिह्न बन खड़ी हो गईं
यह सिमटी सीमाएँ
आज पुराने सिंहासन की
टूट रही प्रतिमाएँ

उठता है तूफ़ान इन्‍दु तुम
दीप्तिमान रहना
पहरुए, सावधान रहना !

ऊँची हुई मशाल हमारी
आगे कठिन डगर है
शत्रु हट गया, लेकिन
उसकी छायाओं का डर है
शोषण से मृत है समाज
कमज़ोर हमारा घर है
किन्‍तु आ रही नई ज़िन्‍दगी
यह विश्‍वास अमर है

जन-गंगा में ज्‍वार
लहर तुम प्रवहमान रहना
पहरुए, सावधान रहना !

कौन थकान हरे 

 कौन थकान हरे जीवन की ।
बीत गया संगीत प्‍यार का,
रूठ गई कविता भी मन की ।

वंशी में अब नींद भरी है,
स्‍वर पर पीत साँझ उतरी है
बुझती जाती गूँज आखरी —
इस उदास वन-पथ के ऊपर
पतझर की छाया गहरी है,

अब सपनों में शेष रह गईं,
सुधियाँ उस चंदन के वन की ।

रात हुई पंछी घर आए,
पथ के सारे स्‍वर सकुचाए,
म्‍लान दिया बत्‍ती की बेला —
थके प्रवासी की आँखों में
आँसू आ-आ कर कुम्‍हलाए,

कहीं बहुत ही दूर उनींदी
झाँझ बज रही है पूजन की
कौन थकान हरे जीवन की ।

विदा समय क्‍यों भरे नयन हैं

 विदा समय क्‍यों भरे नयन हैं

अब न उदास करो मुख अपना
बार-बार फिर कब है मिलना
जिस सपने को सच समझा था —
वह सब आज हो रहा सपना
याद भुलाना होंगी सारी
भूले-भटके याद न करना
चलते समय उमड़ आए इन पलकों में जलते सावन हैं।

कैसे पी कर खाली होगी
सदा भरी आँसू की प्‍याली
भरी हुई लौटी पूजा बिन
वह सूनी की सूनी थाली
इन खोई-खोई आँखों में —
जीवन ही खो गया सदा को
कैसे अलग अलग कर देंगे
मिला-मिला आँखों की लाली
छुट पाएँगे अब कैसे, जो अब तक छुट न सके बन्‍धन हैं।

जाने कितना अभी और
सपना बन जाने को है जीवन
जाने कितनी न्यौछावर को
कहना होगा अभी धूल कन
अभी और देनी हैं कितनी —
अपनी निधियाँ और किसी को
पर न कभी फिर से पाऊँगा
उनकी विदा समय की चितवन
मेरे गीत किन्हीं गालों पर रुके हुए दो आँसू कन हैं
विदा समय क्यों भरे नयन हैं

भूले हुओं का गीत 

बरसों के बाद कभी
हम तुम यदि मिलें कहीं
देखें कुछ परिचित से
लेकिन पहिचानें ना

याद भी न आए नाम
रूप रंग, काम, धाम
सोचें
यह संभव है
पर, मन में मानें ना

हो न याद, एक बार
आया तूफ़ान, ज्‍वार
बन्‍द मिटे पृष्‍ठों को
पढ़ने की ठानें ना

बातें जो साथ हुईं
बातों के साथ गईं
आँखें जो मिली रहीं
उनको भी जानें ना ।

इतिहास की कालहीन कसौटी

बन्‍द अगर होगा मन
आग बन जाएगा
रोका हुआ हर शब्‍द
चिराग बन जाएगा ।

सत्‍ता के मन में जब-जब पाप भर जाएगा
झूठ और सच का सब अन्‍तर मिट जाएगा
न्‍याय असहाय, ज़ोर-जब्र खिलखिलाएगा
जब प्रचार ही लोक-मंगल कहलाएगा

तब हर अपमान
क्रान्ति-राग बन जाएगा
बन्‍द अगर होगा मन
आग बन जाएगा

घर की ही दीवार जब जलाने लगे घर-द्वार
रोशनी पलट जाए बन जाए अन्‍धकार
पर्दे में भरोसे के जब पलने लगे अनाचार
व्‍यक्ति मान बैठे जब अपने को अवतार

फिर होगा मन्थन
सिन्‍धु झाग बन जाएगा
बन्‍द अगर होगा मन
आग बन जाएगा

घटना हो चाहे नई बात यह पुरानी है
भय पर उठाया भवन रेत की कहानी है
सहमति नहीं है मौन, विरोध की निशानी है
सन्‍नाटा बहुत बड़े अंधड़ की वाणी है
टूटा विश्‍वास अगर
गाज बन जाएगा
बन्‍द अगर होगा मन
आग बन जाएगा ।

मेरे सपने बहुत नहीं हैं 

मेरे सपने बहुत नहीं हैं —
छोटी-सी अपनी दुनिया हो,
दो उजले-उजले से कमरे
जगने को-सोने को,
मोती-सी हों चुनी किताबें
शीतल जल से भरे सुनहले प्‍यालों जैसी
ठण्‍डी खिड़की से बाहर धीरे हँसती हो
तितली-सी रंगीन बगीची;
छोटा लॉन स्‍वीट-पी जैसा,
मौलसिरी की बिखरी छितरी छाँहों डूबा —
हम हों, वे हों
काव्‍य और संगीत-सिन्‍धु में डूबे-डूबे
प्‍यार भरे पंछी से बैठे
नयनों से रस-नयन मिलाए,
हिल-मिलकर करते हों
मीठी-मीठी बातें
उनकी लटें हमारे कन्‍धों पर मुख पर
उड़-उड़ जाती हों,
सुशर्म बोझ से दबे हुए झोंकों से हिल कर
अब न बहुत हैं सपने मेरे
मैं इस मंज़िल पर आ कर
सब कुछ जीवन में भर पाया ।

आदमी की अनुपात 

दो व्‍यक्ति कमरे में
कमरे से छोटे —

कमरा है घर में
घर है मुहल्‍ले में
मुहल्‍ला नगर में
नगर है प्रदेश में
प्रदेश कई देश में
देश कई पृथ्‍वी पर
अनगिन नक्षत्रों में
पृथ्‍वी एक छोटी
करोड़ों में एक ही
सबको समेटे हैं
परिधि नभ गंगा की
लाखों ब्रह्मांडों में
अपना एक ब्रह्मांड
हर ब्रह्मांड में
कितनी ही पृथ्वियाँ
कितनी ही भूमियाँ
कितनी ही सृष्टियाँ
यह है अनुपात
आदमी का विराट से
इस पर भी आदमी
ईर्ष्‍या, अहं, स्‍वार्थ, घृणा, अविश्‍वास लीन
संख्‍यातीत शंख-सी दीवारें उठाता है
अपने को दूजे का स्‍वामी बताता है
देशों की कौन कहे
एक कमरे में
दो दुनिया रचाता है ।

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