गिरिराजशरण अग्रवाल की रचनाएँ

आकांक्षा 

मैं तुम्हारी आँखों में
झाँकूँ
और झाँकता ही रहूँ ।

मैं
तुम्हारी आँखों की गहराई
नापूँ
और नापता ही रहूँ ।

तुम्हारे आकाश को
बाँहों में अपनी
भर लूँ
और भरता ही रहूँ ।

तुम्हारे सपनों में
इंद्रधनुषी रंग घोलूँ
और घोलता ही रहूँ ।

तुम्हारी साँसों में
जीभर महकूँ
और महकता ही रहूँ।
तुम्हारे मादक स्पर्श को
प्यार से सहेज लूँ
और सहेजता ही रहूँ ।

तुम्हारे संकेतों को
अनायास समझ लूँ
और समझता ही रहूँ ।

संबंध 

संबंध
पुस्तक में लिखा
कोई एक शब्द नहीं होता,
जो लिखा जाता है
केवल पढ़ने के लिए;
और न ही चाहता है
अपनी व्याख्या
तर्कों के आधार पर।

संबंध
केवल शब्द नहीं होता
जो सहेज दिया जाता है
शब्दकोश में
उसका अर्थ
समझाने के लिए
बेजान, अनजान लोगों को ।

संबंध
ख़ातों में लिखी
कोरी औपचारिकता नहीं होता।
और न ही
बधाई-कार्डों तक सीमित
कोई दिखावा
जिसे साल में एक बार
आ जाने वाली याद,
समझ लो तुम!
संबंध
न ही रूढ़ि़ है
न ही परंपरा
प्यार के प्रदर्शन की ।

संबंध तो सचमुच
अपनत्व के गहरे सागर में
डूबे हुए क्षणों का अहसास है,
जो सारे दिखावों से दूर
ज़िंदगी के हर एक लम्हे को,
हमारे-तुम्हारे पल-पल को
आत्मसात कर लेता है
अपने अंदर ।

नहीं हो सकती
संबंधों की व्याख्या
क्योंकि ये
किताबी नहीं होते;
और न ही संबंध
सजाए जा सकते हैं कमरों में,
मोहक बधाई कार्डों की तरह;
क्योंकि ये आत्मीयता से पगे होते हैं
क्योंकि ये औपचारिक नहीं होते ।
संबंधों की डोर में बँधे आत्मीयों को,
विस्मृति का अहसास
भला कैसे हो सकता है?
क्योंकि ये ही तो बाँधते हैं हम सबको
स्नेह की अदेखी रेशम-डोरी से,
इसीलिए सच्चे संबंध
सामयिक नहीं होते
स्थाई रहकर सुख देते हैं मन को !

शायद इसीलिए
मेरा मन
घबराता है
संबंधों की व्याख्या करने से ।

राजनीति में जीते हुए 

राजनीति में
भाई-भतीजावाद का मुहावरा
अब पुराना पड़ गया है;
ऐसा लगता है कि अब
हम स्वयं राजनीति हो गए हैं
और
राजनीति केवल हमसे ही चलती है;
कहीं पर भी हमारे सिवा
किसी और की दाल नहीं गलती है ।

दिन्नू कुम्हार और मन्नू लुहार
दोनों अब समाजवादी हो गए हैं।
दिन्नू कुम्हार
अब समाजवादी घड़े बनाता है
उस पर बड़ी ही चतुराई से
मीठी-सी कथनी का
चिकनापन लगाता है;
कोई भी बात उसके घडे़ पर
अब रुकती ही नहीं है ।
मन्नू लुहार भी
अब समाजवादी फावड़े
दनादन बनाता है,
और तेज़ चोटवाले भाषणों के
हथौड़े चलाता है,
नई धारवाली
छुरियों को भी गढ़ रहा है,
नितप्रति
उसका व्यापार ख़ूब बढ़ रहा है ।

खादी भंडार
नई प्रकार की खादी से अट गए हैं;
अब मोटी खादी के
कुरते-धोतियाँ नहीं बनते
बेलबॉटम और लंबे-लंबे फैंसी कुरतों
और अपर ब्लाउज़-बुश्शर्ट का
ज़माना है ।
नए-नए कपड़े बन रहे हैं,
आधुनिक युवकों के
ढाई इंची सीने तन रहे हैं
कि उनका इंडिया
तरक़्क़ी की एक सीढ़ी
और चढ़ गया है;
यह और बात है कि
उनके कारण ही
मेरे देश के पैरों में
एक कड़ा और पड़ गया है
परतंत्रता का ।
सचमुच,
उनके लिए अर्थ ही क्या है-
स्वतंत्रता का !

प्रश्न 

क्या मेरा
चोटी पर चढ़ना ज़रूरी है
जबकि मेरे टाँगें ही नहीं हैं ।

किसी से उधार ली हुई
कृत्रिम टाँगों को
अथवा
झूठ की बैसाखियों को लेकर
मैं तेनसिंह बनूँ
क्या यह ज़रूरी है !

इस विश्व के
अथाह और विस्तीर्ण
सागर के किनारे
नियति द्वारा छोड़ा हुआ मैं
तैरकर पार जाने की
क्यूँ करूँ व्यर्थ चेष्टा
हाथ ही नहीं हैं जबकि मेरे ।
एक नया द्वीप कोई
खोज लाऊँ
बढ़ूँ आगे
सत्यहीन गर्व के
झंझा में बहता हुआ ।

टूटी हुई नाव का
सहारा भी मिलता नहीं
फिर भी
वास्कोडिगामा के
यश का चाहक बनूँ मैं ?
क्या यह ज़रूरी है!
मन कहता है मुझसे-
‘चरैवेति… चरैवेति.. चरैवेति’
बस, याद रख इस कर्म-मंत्र को,
तब-
अनुत्तरित नहीं रहेगा मन का
कोई भी प्रश्न ।

संसार : नियति 

मधुस्नेह हो गया स्वप्नमय
भाव हृदय के सूने घट में
हो विलीन सब
दुख के राग सुनाते गाते
पीड़ा के अभिशाप व्याल-से
काल-भाल को डसते जाते
और आह के अथाह स्रोत
इस अंतस्तल में
श्वासों के बड़वानल के मिस
दर्दीले तूफ़ान मचलते ।
समय बदलता रहा
प्रगति भी सदा रही है,
रहे बदलते मीत, बंधु
सारे प्रेमीजन
पर यह वसुधा वही रही है ।
इसमें कड़वे औ’ मीठे
सब फल उगते हैं ।
मीठा-मीठा स्वाद
सदा ही कुछ पाते हैं
कुछ को केवल
कड़वे फल ही मिल पाते हैं ।

मेरी झोली में आकाश

इतना बड़ा आकाश
मेरी झोली में आ जाए
मैंने बार-बार सोचा था
अब जब
आकाश मेरे पास आ रहा है
तो मेरी झोली
बहुत छोटी हो गई है ।

आकाश को समेटने की इच्छा
हर कोई करता है
किंतु झोली का आकार
बढ़ सके
आकाश को समा लेने को ख़ुद में
ऐसी कोशिश यहाँ
कौन करता है ?

बच्चों के बीच

कितना अच्छा लगता है
सब कुछ भूलकर
बच्चों के बीच बैठना;
उन्हें देखना जी भरके,
उनसे बातें करना
उन्हें पुचकारना
और उनकी जीत में ही
अपनी जीत मानकर
सब कुछ हार जाना ।

कितना अच्छा लगता है
बच्चों की सहज मुस्कान को
सहेजना,
उनके कोमल अंगों का
स्पर्श करना फूलों की तरह धीरे से
और फिर देर तक
उनकी आँखों में झाँकना
सचमुच, कितना अच्छा लगता है !

कितना अच्छा लगता है
बच्चों को बेबात
बड़ी-बड़ी बातें करते देखना;
या फिर बुद्धू-सा बनकर
उनकी बातों में रस लेना
उनकी ज़िद पर ख़ुशी-ख़ुशी
अपनी ज़िद छोड़ना
और उनके सपनों से
अपने सपने जोड़ना।
कितना अच्छा लगता है !

कितना अच्छा लगता है
संवादहीनता की स्थिति में भी
बच्चों के साथ संवाद बुनना,
और उनकी तोतली-सी ज़ुबान में
कही-अनकही बातों को बार-बार
बडे़ ध्यान से सुनना;
उनके आकाश को बरबस
अपनी भुजाओं में भरना
और उनके सागर को
नापने के प्रयास में
ख़ुद ही सागर बन जाना।
कितना अच्छा लगता है !

कितना अच्छा लगता है-
बच्चों के बीच बैठकर,
बिलकुल बच्चा बन जाना
और भूल जाना सारे दुख-दर्द
सचमुच, कितना अच्छा लगता है !

एक हो जाएँ 

आओ, हम तुम एक हो जाएँ
किसी की प्यासी ताकती
नज़रों के कुंठित तालों में
न बंद हो जाएँ ।
आओ, हम तुम एक हो जाएँ ।

उसकी कुंठाओं की चाबी
किसी अतीत खंडहर में
खो गई है
किसी वर्तमान आस्था से
उसे ढूँढ लाएँ ।
आओ, हम तुम एक हो जाएँ ।

वह अभी तक
बीते हुए कल के साथ
चिपटा हुआ है जोंक जैसा
गर्द से लबालब,
खिड़कियाँ बंद कर ली हैं उसने
हवा आकर लौट जाती है,
उसने रोशनी को झुठला दिया है
यह सोचकर
कि रोशनी ही उसे झुठला रही है ।
आओ, उसे अहसास कराएँ
आज की ताज़गी का
और कल की सीलन से उसे
बाहर लाएँ,
चलो, हम तुम एक हो जाएँ ।

ओ कठोर 

तुम मस्त हो
अपनी ही क्रियाओं में
नहीं देखते
उस काँपती हुई लौ को
जो व्याकुल है
आग के पर्वत को उठाने के लिए

सोचते हो, यह लौ
बुझने के लिए ही जली है
किंतु इसकी कोख में
आक्रोश की जो आँधी पली है
वह शांत रहने के लिए
नहीं जनमी है
तुम हमेशा से
इसका प्रकाश चूसते रहे
और अपने अँधेरे रास्तों को
भरते रहे रोशनी से

हाँ रोशनी
जब किसी मासूम के
चेहरे पर पड़ती है
तो सजा देती है उसकी
मधुर मुस्कान ।

रोशनी जब अँधेरे कोने में बैठे
छात्र की पुस्तक पर पड़ती है
तो सजा देती है
भविष्य के सपने ।

रोशनी जब
अँधेरे में भटकते
थके-हारे राही के
क़दमों में पड़ती है
तो सजा देती है
उसके पैरों में गति के घुँघरू ।

यही रोशनी जब
तुम्हारे मन के झरोखों से झाँकेगी
और अंदर तक जाएगी
तो खींच लाएगी कुरूपता
जो तुमने
अपनी मुस्कान के परदों के पीछे
छिपा रखी थी।
आओ, हम इस लौ
और इसकी रोशनी का
सही-सही प्रयोग सीखें
ताकि हम जो हैं वहीं दीखें ।

मेरे आँसू थम नहीं रहे हैं
तुम्हारी हैवानियत के
दर्पण में झाँकते हुए ।

मेरी साँसें जल रही हैं
तुम्हारी वहशी आग के शोलों को
अपने तन से छूते हुए ।

मेरे कानों में
पिघल गया है लावा-सा
तुम्हारे शब्दों के
अर्थ खोजते हुए ।

मेरे होठों पर
डरी हुई मुस्कान चिपक गई है
कनखजुरे का अहसास
पालते हुए ।
मेरी उँगलियों की पोरों पर
उभर रहा है बिच्छू घास का दंश
तुम्हारे भेजे फूल को छूते हुए ।
मेरे कंधों पर
तुम्हारी पालकी का बोझ
आज असह्य हो रहा है
विषभरी भावनाओं को ढोते हुए ।

मेरे पाँवों की गति
किन पलों में छीन ली तुमने
विश्वास को झुठलाते हुए ।

मेरा तन और चिंतन
दोनों थक गए हैं
तुम्हारे भावों की
बारूदी सुरंग में
प्रवेश करते हुए ।

ओ कठोर,
इस ठौर मत आना
क्योंकि तेरी गंध
मेरे नथुनों से छीन लेगी
जीवनी आक्सीजन
जो आग तूने
मेरी हथेलियों पर बोई है
जलाकर रख देगी
मेरी आस्था के वचन ।

स्वार्थ का सुख और है, सेवा का सागर और है

स्वार्थ का सुख और है, सेवा का सागर और है
आदमी के नाम का इक क़र्ज़ हम पर और है

अपने आँगन में दिया रखने से पहले ध्यान दो
बीच की दीवार के उस पार इक घर और है

कटने ही वाला है पर्वत राह का, थककर न बैठ
एक पत्थर और है, बस एक पत्थर और है

हौसले के साथ जीवन जी, मगर दोहरा न जी
घर के अंदर और है तू, घर के बाहर और है

कोई भी सागर हो, है तैराक की बाहों से कम
क्या हुआ गर रास्ते में इक समंदर और है

इसे रोशनी दे, उसे रोशनी दे 

इसे रोशनी दे, उसे रोशनी दे
सभी को उजालों-भरी ज़िंदगी दे

सिसकते हुए होंठ पथरा गए हैं
इन्हें कहकहे दे, इन्हें रागिनी दे

नहीं जिनमें साहस उन्हें यात्रा में
न किश्ती सँभाले, न रस्ता नदी दे

मेरे रहते प्यासा न रह जाए कोई
मुझे दिल दिया है तो दरियादिली दे

मुझे मेरे मालिक! नहीं चाहिए कुछ
ज़मीं को मुहब्बत-भरा आदमी दे

धूप बनकर फैल जाओ, चाँदनी बनकर जियो 

धूप बनकर फैल जाओ, चाँदनी बनकर जियो
घुप अँधेरा छा न जाए, रोशनी बनकर जियो

फूल बन-बन कर बिखरती है, तपन देती नहीं
आग बनकर ख़ाक जीना, फुलझड़ी बनकर जियो

आज तक जीते रहे हो, अपनी-अपनी ज़िंदगी
दोस्तो! इक-दूसरे की ज़िंदगी बनकर जियो

ओस की बूँदों में ढलकर तुम अगर बिखरे तो क्या
दूर तक बहती हुई शीतल नदी बनकर जियो

आदमी के रूप में पैदा हुए तो क्या हुआ ?
बात तो तब है कि सचमुच आदमी बनकर जियो

रोशनी बनकर पिघलता है उजाले के लिए

रोशनी बनकर पिघलता है उजाले के लिए
शम्अ जल जाती है घर को जगमगाने के लिए

हमने अपनों के लिए भी मूँद रक्खा है मकाँ
पेड़ की बाहें खुली हैं हर परिंदे के लिए

प्रेम हो, अपनत्व हो, सहयोग हो, सेवा भी हो
सिर्फ़ पैसा ही नहीं, हर बार जीने के लिए

जितने भी काँटे हैं पग-पग में वे चुनते जाइए
रास्ते को साफ़ रखना आने वाले के लिए

एक दिन जाना ही है, जाने से पहले दोस्तो
यादगारें छोड़ते जाओ, ज़माने के लिए

रोकेंगे हादिसे मगर चलना न छोड़ना 

रोकेंगे हादिसे मगर चलना न छोड़ना
हाथों से तुम उम्मीद का रिश्ता न छोड़ना

झेली बहुत है अब के बरस जेठ की तपन
बादल, किसी के खेत को प्यासा न छोड़ना

ले जाएगी उड़ा के हवा धुंध का पहाड़
शिकवे भी हों तो मिलना-मिलाना न छोड़ना

तुम फूल हो, सुगंध उड़ाते रहो यूँ ही
औरों की तरह अपना रवैया न छोड़ना

तुम ही नहीं हो, राह में कुछ दूसरे भी हैं
आगे बढ़ो तो दीप जलाना न छोड़ना

पिघलकर पर्वतों सा हमने ढल जाना नहीं सीखा 

पिघलकर पर्वतों से हमने ढल जाना नहीं सीखा
न सीखा बर्फ़ बनकर हमने गल जाना, नहीं सीखा

वो राही, तुम ही सोचो किस तरह पहुँचेगा मंज़िल पर
वो जिसने ठोकरें खाकर सँभल जाना नहीं सीखा

हमें आता नहीं है मोम के आकार का बनना
ज़रा-सी आँच में हमने पिघल जाना नहीं सीखा

बदलते हैं, मगर यह देखकर कितना बदलना है
हवाओं की तरह हमने बदल जाना नहीं सीखा

सफ़र में हर क़दम हम काफ़ि़ले के साथ हैं, हमने
सभी को छोड़कर आगे निकल जाना नहीं सीखा

कालिख जो कोई मन की हटाने का नहीं है

कालिख जो कोई मन की हटाने का नहीं है
कुछ फ़ायदा बाहर के उजाले का नहीं है

गर डोर यह टूटी तो बिखर जाएँगे मोती
मनकों का तुम्हें ध्यान है, धागे का नहीं है

करनी हैं बहुत होश की बातें अभी तुमसे
यह वक़्त अभी पी के बहकने का नहीं है

दिल हारने वालों को ही दरकार है काँधा
वैसे तो कोई अर्थ सहारे का नहीं है

मैं दीप इरादों के जलाता हूँ लहू से
अब मन में मेरे ख़ौफ़ अँधेरे का नहीं है

मन कभी घर में रहा, घर से कभी बाहर रहा 

मन कभी घर में रहा, घर से कभी बाहर रहा
पर तुम्हारी फूल-जैसी ख़ुशबुओं से तर रहा

बर्फ़ की पौशाक उजली है, मगर पर्वत से पूछ
बर्फ़ जब पिघली तो क्या बाक़ी रहा? पत्थर रहा

तेरे आँचल में सही, मेरी हथेली में सही
आँधियाँ आती रहीं, लेकिन दिया जलकर रहा

सिर्फ़ शब्दों का दिलासा माँगने वाले थे लोग
सोचिए तो क़र्ज़ किस-किस शख़्स का हम पर रहा

हौसला मरता नहीं है संकटों के दरमियाँ
हर तरफ़ काँटे थे लेकिन फूल तो खिलकर रहा

कल का युग हो जाइए, अगली सदी हो जाइए

कल का युग हो जाइए, अगली सदी हो जाइए
बात यह सबसे बड़ी है, आदमी हो जाइए

आपको जीवन में क्या होना है यह मत सोचिए
दुख में डूबे आदमी की ज़िंदगी हो जाइए

हो सके तो रास्ते की इस अँधेरी रात में
रोशनी को ढूँढि़ए मत, रोशनी हो जाइए

रेत के तूफ़ाँ उठाती आ रही हैं आंधियाँ
हर मरुस्थल के लिए बहती नदी हो जाइए

जागते लम्हों में कीजे ज़िंदगी का सामना
नींद में मासूम बच्चे की हँसी हो जाइए

चाहतें, प्यार, सदाचार न जाने देना 

चाहतें, प्यार, सदाचार न जाने देना
मन से अपने ये सरोकार न जाने देना

स्वार्थ ही स्वार्थ हैं दुनिया में यह माना लेकिन
दिल से तुम अपने मगर प्यार न जाने देना

इक भँवर है कि उठा आता है किश्ती की तरफ़
तुम मगर हाथ से पतवार न जाने देना

तुमको मालूम है आशा पे टिका है जीवन
अपने जीवन का यह आधार न जाने देना

एक इक पल है यहाँ क़ीमती, समझो इसको
एक भी पल कभी बेकार न जाने देना

जहाँ तक बन पड़े अपनों की अनदेखी नहीं करना 

जहाँ तक बन पड़े अपनों की अनदेखी नहीं करना
लहू पानी से गाढ़ा है, इसे पानी नहीं करना

शिकायत वे ही करते हैं कि जो कमज़ोर होते हैं
जहाँ तक हो सके तुमसे, यह कमज़ोरी नहीं करना

जो आसानी से मिल जाए, वो शय क़ीमत नहीं रखती
सभी करना, मगर जीवन में आसानी नहीं करना

सभी को साथ लेना है, सभी के साथ चलना है
अकेले रास्ता चलने की नादानी नहीं करना

मुहब्बत अर्थ रखती है, अकेलापन निरर्थक है
तुम्हें जीना है तो जीवन को बेमानी नहीं करना

सागर हो कि वन हो कि नगर, सबके लिए हो

सागर हो कि वन हो कि नगर, सबके लिए हो
हो दिल में तेरे प्यार मगर, सबके लिए हो

मंज़िल पे जो पहुँचूँ तो सदा दूँ मैं सभी को
करना जो मुझे हो, वह सफ़र, सबके लिए हो

अब धूप में झुलसे न किसी शख़्स का चेहरा
साया हो सभी के लिए, घर सबके लिए हो

साबित न हो रस्ते पे किसी का भी इजारा
मंज़िल पे पहुँचने की डगर सबके लिए हो

बस अपने ही सुख-चैन की चिंता न रहे अब
हम भी हों वहीं, चैन जिधर सबके लिए हो

क़दम मिलकर उठें तो रास्ता अक्सर निकलता है 

क़दम मिलकर उठें तो रास्ता अक्सर निकलता है
करें कोशिश तो बिखरी भीड़ से लश्कर निकलता है

सभी बाधाएँ हट जाती हैं, जब साहस हो बढ़ने का
कि अंकुर तोड़कर सारे कवच बाहर निकलता है

नहीं देखें तो सागर आँख के आगे से हो ओझल
अगर देखें तो इक क़तरे से भी सागर निकलता है

वो बेगाना पड़ोसी जिसने हमसे कुछ नहीं चाहा
अगर सोचें तो उसका क़र्ज़ भी हम पर निकलता है

ज़माने-भर के सब चेहरे हमें अपने-से लगते हैं
लिखें तो लेखनी से प्रेम का अक्षर निकलता है

गर नहीं है रास्ता तो रास्ता पैदा करो 

गर नहीं है रास्ता तो रास्ता पैदा करो
ज़िंदगी में ज़िंदगी का हौसला पैदा करो

हर अँधेरे को नई इक दीपमाला भेंट दो
हर निराशा से नई संभावना पैदा करो

दे सको तो मोम को भी रूप दो फ़ौलाद का
कर सको तो पत्थरों में आईना पैदा करो

दर्ज कर दो कल के काग़ज़ पर भी अपने दस्तख़त
आज के जीवन से कल का सिलसिला पैदा करो

ले के अंबर से धरा तक जितने भी संदर्भ हैं
सब तुम्हारे हैं, सभी से वास्ता पैदा करो

फूल सपनों के खिलेंगे, कामना करते चलें

फूल सपनों के खिलेंगे, कामना करते चलें
साथ लाएँगे, बहारें, फ़ैसला करते चलें

ज़िंदगी सुलझा ही लेगी अपने हर उलझाव को
उलझनें जितनी भी हैं, दिल से जुदा करते चलें

आने वालों को न करने दें अँधेरों का सफ़र
आँधियों के दरमियाँ रोशन दिया करते चले

चाहते हों ज़िंदगी में लोग यदि अपना भला
उनसे यह कहिए कि वे सबका भला करते चलें

उठ न पाएगी कभी दीवार यह अलगाव की
हम ख़फ़ा होने से पहले ही गिला करते चलें

हँसने को बहुत है, न हँसाने को बहुत है 

हँसने को बहुत है, न हँसाने को बहुत है
अफ़साना अभी मन का सुनाने को बहुत है

सौग़ात से ख़ाली नहीं संसार का दामन
तुम खोजने लग जाओ तो पाने को बहुत है

हर राह से अपने को बचाते हुए गुज़रो
इक दाग़ भी दामन पे ज़माने को बहुत है

क्यों लोग बताएँ मेरे चेहरे पे है कालिख
इक आईना सच्चाई बताने को बहुत है

कलियों पे लरजती हुई ऐ ओस की बूँदो !
क्या ताज़ा हुआ फूल खिलाने को बहुत है ?

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