‘गुलनार’ आफ़रीन की रचनाएँ

आँख में अश्क लिए ख़ाक लिए दामन में 

आँख में अश्क लिए ख़ाक लिए दामन में
एक दीवाना नज़र आता है कब से बन में

मेरे घर के भी दर ओ बाम कभी जागेंगे
धूप निकलेगी कभी तो मेरे भी आँगन में

कहिए आईना-ए-सद-फ़स्ल-ए-बहाराँ तुझ को
कितने फूलों की महक है तेरे पैराहन में

शब-ए-तारीक मेरा रास्ता क्या रोकेगी
मेरे आँचल में सितारे हैं सहर दामन में

किन शहीदों के लहू के ये फ़रोज़ाँ हैं चराग़
रौशनी सी जो है ज़िंदाँ के हर इक रोज़न में

अहद-ए-रफ़्ता की तमन्ना की फ़ुसूँ ज़िंदाँ है
दिल-ए-ना-काम अभी तक मेरी हर धड़कन में

हमें मंज़ूर नहीं अगली रवायात-ए-जुनूँ
आ-ख़िरद हो गई ‘गुलनार’ दीवान-पन में

 

आँसू भी वही कर्ब के साए भी वही हैं 

आँसू भी वही कर्ब के साए भी वही हैं
हम गर्दिश-ए-दौराँ के सताए भी वही हैं

क्या बात है क्यूँ शहर में अब जी नहीं लगता
हालांकि यहाँ अपने पराए भी वही हैं

औराक़-ए-दिल-ओ-जाँ पे जिन्हें तुम ने लिखा है
नग़मात-ए-आलम हम ने सुनाए भी वही है

ऐ जोश-ए-जुनूँ दर्द का आलम भी वही है
ऐ वहशत-ए-जाँ दर्द के साए भी वही हैं

देखा है जिन्हें आह-ब-लब चाक-गिरेबाँ
हर दाग़-ए-आलम दिल में छुपाए भी वही हैं

सौ रंग बिखेरेंगे मोहब्बत के शगूफ़े
‘गुलनार’ चमन में हमंे लाए भी वही हैं

 

दिल ने इक आह भरी आँख में आँसू आए

दिल ने इक आह भरी आँख में आँसू आए
याद ग़म के हमें कुछ और भी पहलू आए

ज़ुल्मत-ए-शब में है रू-पोश निशान-ए-मंज़िल
अब मुझे राह दिखाने कोई जुगनू आए

दिल का ही ज़ख़्म तेरी याद का इक फूल बने
मेरे पैहरान-ए-जाँ से तेरी ख़ुश-बू आए

तिश्ना-कामों की कहीं प्यास बुझा करती है
दश्त को छोड़ के अब कौन लब-ए-जू आए

एक परछाईं तसव्वुर की मेरे साथ रहे
मैं तुझे भूलूँ मगर याद मुझे तू आए

मैं यही आस लिए ग़म की कड़ी धूप में हूँ
दिल के सहरा में तेरे प्यार का आहू आए

दिल परेशान है ‘गुलनार’ तो माहौल उदास
अब जरूरत है कोई मुतरिब-ए-ख़ुश-ख़ू आए

 

हमारा नाम पुकारे हमारे घर आए 

हमारा नाम पुकारे हमारे घर आए
ये दिल तलाश में जिस की है वो नज़र आए

न जाने शहर-ए-निगाराँ पे क्या गुज़रती है
फ़जा-ए-दश्त-आलम कोई तो ख़बर आए

निशान भूल गई हूँ मैं राह-ए-मंज़िल का
ख़ुदा करे के मुझे याद-ए-रह-गुज़र आए

मैं आँधियों में भी फूलों के रंज पढ़ लूँगी
तेरे बदन की महक लौट कर अगर आए

ग़ुबार ग़म का दयार-ए-वफ़ा में उड़ता है
मगर ये अश्क बहुत काम चश्म-ए-तर आए

सफ़र का रंज हसीं क़ुर्बतों का हामिल हो
बहार बन के कोई अब तो हम-सफ़र आए

नई सहर का मैं ‘गुलनार’ इस्तिआरा हूँ
फ़जा-ए-तीरा-शबी ख़त्म हो सहर आए

 

न पूछ ऐ मेरे ग़म-ख़्वार क्या तमन्ना थी

न पूछ ऐ मेरे ग़म-ख़्वार क्या तमन्ना थी
दिल-ए-हज़ीं में भी आबाद एक दुनिया थी

हर इक नज़र थी हमारे ही चाक-दामाँ पर
हर एक साअत-ए-ग़म जैसे इक तमाशा थी

हमें भी अब दर ओ दीवार घर के याद आए
जो घर में थे तो हमें आरज़ू-ए-सहरा थी

कोई बचाता हमें फिर भी डूब ही जाते
हमारे वास्ते ज़ंजीर मौज-ए-दरिया थी

बग़ैर सम्त के चलना भी काम आ ही गया
फ़सील-ए-शहर के बाहर भी एक दुनिया थी

तिलिस्म-ए-होश-रूबा थे वो मंज़र-ए-हस्ती
फ़जा-ए-दीदा-ओ-दिल जैसे ख़्वाब आसा थी

कोई रफ़ीक़-ए-सफ़र था न राह-बर केाई
जुनूँ की राह में ‘गुलनार’ जादा-पैमा थी

 

न साथ देगा कोई राह आश्ना मेरा

न साथ देगा कोई राह आश्ना मेरा
जुदा है सारे ज़माने से रास्ता मेरा

गुज़र के आई हूँ मैं ग़म के रेग-ज़ारों से
नज़र उदास है दिल है दुखा हुआ मेरा

न जाने किस लिए क़ातिल के अश्क भर आए
फ़राज-ए-दार पे जब सामना हुआ मेरा

दयार-ए-जाँ में फ़रोज़ँा रहेगी शम्मा-ए-हयात
समझ लिया तेरी आँखों ने मुद्दआ मेरा

किया है पेश तुझे आँसुओं का नज़राना
हुजूम-ए-शाम-ए-अलम और दिल जला मेरा

वो सानेहा मेरे दिल पर गुज़र गया ‘गुलनार’
हर एक हर्फ़-ए-दुआ बे-सदा हुआ मेरा

 

शायद अभी कमी सी मसीहाइयों में है 

शायद अभी कमी सी मसीहाइयों में है
जो दर्द है वो रूह की गहराइयों में है

जिस को कभी ख़याल का पैकर ने मिल सका
वो अक्स मेरे ज़ेहन की रानाईयों में है

कल तक तो ज़िंदगी थी तमाशा बनी हुई
और आज ज़िंदगी भी तमाशाइयों में है

है किस लिए ये वुसअत-ए-दामान-ए-इल्तिफ़ात
दिल का सुकून तो इन्हीं तनहाइयों में है

ये दश्त-ए-आरज़ू है यहाँ एक एक दिल
तुझ को ख़बर भी है मेरे सौदाइयों में है

तन्हा नहीं है ये शब-ए-गिर्यां दिए की लौ
यादों की एक शाम भी परछाइयों में है

‘गुलनार’ मसलहत की ज़बाँ में न बात कर
वो ज़हर पी के देख जो सच्चाइयों में है

 

शजर-ए-उम्मीद भी जल गया वो वफ़ा की शाख़ भी जल गई 

शजर-ए-उम्मीद भी जल गया वो वफ़ा की शाख़ भी जल गई
मेरे दिल का नक़्शा बदल गया मेरी सुब्ह रात में ढल गई

वही ज़िंदगी जो बहार नफ़स जो बहर क़दम मेरे साथ थी
कभी मेरा साथ भी छोड़ कर मेरी मंज़िले भी बदल गई

न वो आरज़ू है न जुस्तुजू न कोई तस्व्वुर-ए-रंग-ओ-बू
लिए दिल में दाग़-ए-ग़म-ए-ख़िज़ाँ मैं चमन से दूर निकल गई

तेरी चाल पूरी न हो सकी तेरा वार ख़ाली चला गया
ज़रा देख गर्दिश-ए-आसमाँ के मैं गिरते गिरते सँभल गई

तेरी चाहतों से सँवर गए ये मेरे जमाल के आईने
मैं गुलाब बन के महक उठी मैं शफ़क़ के रंग में ढल गई

ये तिलिस्म-ए-मौसम-ए-गुल नहीं के ये मोजज़ा है बहार का
वो कली जो शाख़ से गिर गई वो सबा की गोद में पल गई

वही साअत-ए-ग़म-ए-आरज़ू जो हमेशा दिल में बसी रही
है ख़ुदा का शुक्र के ‘आफ़रीं’ वो हमारे सर से तो टल गई

 

वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा 

वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा
हाथ में वो हाथ ले कर उम्र भर चलता रहा

एक आँसू याद का टपका तो दरिया बन गया
ज़िंदगीं भर मुझ में एक तूफ़ान सा पलता रहा

जानती हूँ अब उसे मैं पा नहीं सकती मगर
हर जगर साए की सूरत साथ क्यूँ चलता रहा

जो मेरी नज़रों से ओझल हो चुका मुद्दत हुई
वो ख़यालों में बसा और शेर में ढलता रहा

रंज था ‘गुलनार’ मुझ को उस को भी अफ़सोस था
देर तक रोता रहा और हाथ भी मलता रहा

 

याद करने का तुम्हें कोई इरादा भी न था 

याद करने का तुम्हें कोई इरादा भी न था
और तुम्हें दिल से भुला दें ये गवारा भी न था

हर तरफ़ तपती हुई धूप थी ऐ उम्र-ए-रवाँ
दूर तक दश्त-ए-अलम में कोई साया भी न था

मशअल-ए-जाँ भी जलाई न गई थी हम से
और पलकांे पे शब-ए-ग़म कोई तारा भी न था

हम सर-ए-राह-ए-वफ़ा उस को सदा क्या देते
जाने वाले ने पलट कर हमें देखा भी न था

हो गई ख़त्म सराबों में भटकती हुई ज़ीस्त
दिल में हसरत ही रही दश्त में दरिया भी न था

किस ख़मोशी से जला दामन-ए-दिल ऐ ‘गुलनार’
कोई शोला भी न था कोई शरारा भी न था

 

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