घनश्याम कुमार ‘देवांश’की रचनाएँ

इन पहाड़ों पर….-1

तवांग के ख़ूबसूरत पहाड़ों से उपजते हुए…

सामने पहाड़ दिनभर
बादलों के तकिए पर
सर रखे ऊँघते हैं
और सूरज रखता है
उनके माथे पर
नरम-नरम गुलाबी होंठ
तेज़ हवाओं में बादलों के रोएँ उठते हैं
धुएँ की तरह…

फिर भी कोई बादल तो छूट ही जाता है
किसी दिन तनहा
बिजली की तार पर बैठी नंगी चिड़िया की तरह
और दिन ख़त्म होते-होते
उसके होंठ फूटते हैं
किसी भारी पत्थर की धार से टकराकर
एक ठंडे काले रक्त की धार लील लेती है सब कुछ
और चारों तरफ़ एक सन्नाटा
ख़ामोश लाल परदे की तरह छाने लगता है
जो मेरी आत्मा के घायल
छेद में एक सूए की तरह आकर रोज़ ठहर जाता है

एक जंग खाए ताले के
छेद की तरह
दरवाज़े पर मुँह बाए लटकी है मेरी आत्मा
इन ख़ूबसूरत पहाड़ों में..
लिए एक बड़ा घायल सूराख…

रोज़ खोजता हूँ इस
सूराख़ को भरने की चाभी…

इन पहाड़ों पर….-2

तवांग के ख़ूबसूरत पहाड़ों से उपजते हुए…

आगे – पीछे
ऊपर – नीचे
और तो और
बीच में भी पहाड़ ही है
जिसपर मैं इस वक़्त बैठा हुआ हूँ
सोते – जागते
बाहर – भीतर
पहाड़ ही पहाड़ नज़र आते हैं
बड़े – बड़े बीहड़ पहाड़…
पहाड़,
जिनसे मैंने ज़िन्दगी भर प्यार किया

गड्ड-मड्ड हो गई हैं
इन पहाड़ों में आकर
मेरे सुख-दुःख की परिभाषाएँ
मेरी तमाम इच्छाओं से लेकर
ज्ञान, पीड़ा, और आनंद की अनुभूतियों तक..
सब कुछ..

टटोलता हूँ आजकल
अपने भीतर के उन परिंदों को
जो दिन-रात मेरे भीतर
न जाने कहाँ-कहाँ से आकर बैठते थे
और मुझे फुसलाते थे
कि मैं आँखों पर पट्टी बाँधकर
उनके साथ एक ‘बदहवास’
उड़ान पर उड़ चलूँ…
आजकल वे परिंदे भी नहीं दीखते कहीं…

रूई के सफ़ेद तकियों के बीच रखे
इन पहाड़ों के बीच
जब कभी बैठता हूँ अकेला
और अपने भीतर झाँकता हूँ
तो मेरी नज़रें लौट नहीं पातीं…
भीतर बहती है कहीं एक आकाशगंगा
जिसके बीचों-बीच
चक्कर काटता है
एक आकर्षक ख़तरनाक ब्लैकहोल…

डरता हूँ आजकल
अपने आप से बहुत ज़्यादा..
अपने को परिभाषित करने की सनक में
कहीं उतर न जाऊँ
किसी दिन
इस ब्लैकहोल में
‘कभी न लौटने के लिए’

इन पहाड़ों पर….-3

तवांग के ख़ूबसूरत पहाड़ों से उपजते हुए…

वो आसमान जिसने
भरे हुए महानगर में दौड़ाया था मुझे
जो अपने महत्त्वाकाँक्षी दरातों से
रोज़ मेरी आत्मा में
एक खाई चीरता था
और जो जब शुरू होता था
तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता था
यहाँ आकर देखा मैंने
वह पहाड़ों के कन्धों पर एक शिशु की तरह
पैर लटकाए बैठा हुआ था
उसके पास एक तोतली भाषा तक नहीं थी
जिसमें वह मुझसे बात तक कर सकता
एक चोटी से दूसरी
और दूसरी से तीसरी चोटी के बीच
पहाड़ झाड़ रहे थे उसके लिए
अपनी झक सफ़ेद नरम गुदडियाँ…
गुदडियाँ तैर रही थीं
गुदडियाँ उड़ रही थीं
कभी सूखी
कभी पानी में भिगोई हुई-सीं..
गुदड़ियों के नीचे ऊँघतीं – कुनमुनातीं घाटियाँ
और
गुदड़ियों के ऊपर शिशु की तरह सोता आसमान…

यहीं जाना पहली बार
आसमान होने का मतलब…
सुखों और दुखों के टुकड़े,
अधूरी-अतृप्त इच्छाएँ,
हुँकारती वासनाएँ,
दुरूह स्वप्नों के धारावाही चित्र,
जीवन और मृत्यु के गहन रहस्य
सब
मेरे शरीर से मैल की तरह झरकर
गहरी घाटियों में
विलीन हो रहे थे…

आसमान अपने गहन, अलौकिक और प्रकाशमय
अर्थ के साथ
मेरे सामने फूट रहा था निरंतर
और मैं जान रहा था आसमान…
जैसे पैदा होता शिशु…

इस तरह मैं ‘मर’ रहा था
इस तरह मैं ‘नया जन्म’ ले रहा था..
इस तरह मैं आसमान हो रहा था…

बचाया जाना चाहिए तुम्हें

जबकि पूरी दुनिया की जवान लड़कियों
की आँखों में
एक मासूम बच्चे की ह्त्या हो चुकी थी
मैंने देखा तुम्हारे मन
तुम्हारे शरीर और तुम्हारी आत्मा में
किलकारियाँ लेता एक बच्चा…
इस ग्लोबल युग की यह सबसे बड़ी परिघटना है
जगह मिलनी चाहिए इसे
गिनीज़ बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड्स
में सबसे बड़े जीवित करिश्मे की तरह
और बचाया जाना चाहिए तुम्हें
एक विरासत की तरह
कि सिर्फ़ तुम्ही हो एकमात्र उम्मीद
कलह और विनाश की तरफ़
क़दम बढ़ाती मानव सभ्यता के लिए..

खोजी जानी चाहिए
दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत पहाड़ पर
फूलों से घिरी एक महकती जगह
जहाँ उम्मीद से भरा एक बच्चा
साँस ले सके
जी सके
और खेल सके
दुनिया के सबसे पुराने और मासूम खेल…

लड़नेवाले लोग 

हर दौर में
कुछ ऐसे लोग होते रहे
जो लोगों की आँखों में
आँच फूँकने की कला में माहिर थे
ऐसे लोग
हर युग में नियंता बने
और उन लोगों के माथों पर
असंतोष की
लकीरें खींचते रहे
जिनके चेहरे पर एक चिर अभावग्रस्त उदासी थी

उन चंद लोगों ने
उन अधिकाँश लोगों की सेनाएँ बना लीं
जो अपनी आँखों में
अमन और बेहतर ज़िन्दगी के
सुलगते सवाल लिए
इधर-उधर
बेतहाशा भाग रहे थे

उन चंद लोगों ने
उन अधिकाँश लोगों को
बड़ी आसानी से यह समझा दिया था
कि हर आग लड़कर ही बुझाई जा सकती है
इसीलिए
युद्ध लड्नेवालों की कुल संख्या में से
क़रीब नब्बे फ़ीसदी लोग
बहादुर तो थे
लेकिन युद्ध-प्रेमी कतई नहीं थे
दरअसल
वे तो हमेशा
शान्ति की आकाँक्षा में मारे गए…

अप्रैल-फूल

सिर्फ़ तुम्हारी बदौलत
भर गया था अप्रैल
विराट उजाले से
हो रही थी बरसात
अप्रैल की एक ख़ूबसूरत सुबह में
चाँद के चेहरे पर नहीं थी थकावट
रातों के सिलसिले में
एक इन्द्रधनुष टँग गया था
अप्रैल की शाम में
एक सूखे दरख़्त की फुनगी में
मंदिर की घंटियाँ
गिरजे की कैंडल्स और
मस्जिद की अज़ान
घुल गई थी
अप्रैल की त्रिवेणी में…

सचमुच… सिर्फ़ तुम्हारी ही बदौलत
अचानक उग आए थे
अप्रैल में
इतने सारे फूल
पहली बार अच्छा लग रहा था
बनकर अप्रैल फूल…

तुम हो…

तुम एक सुन्दर
बियावान जंगल हो
जिसके ख़ूब भीतर
रहना चाहता हूँ मैं..
एक आदिम मनुष्य की तरह
नग्न..
भग्न..
अकेला..

एक पैसे में..

सुबह बहुत उदास थी
और मेरे भाड़े के कमरे में
धूप के तंतु ओढ़े
दूर तक पसर आई थी
कोई किसी से कुछ नहीं कह रहा था
दरवाज़े के बाहर की चिड़िया भी
रेलिंग पर हिलती डुलती
खामोश बैठी थी
और हवा का संवादहीन शोर
एक निरर्थक सायरन की तरह
बज रहा था
जबकि मैं इस सवाल से जूझ रहा था
कि सुबह इतनी सुबह सुबह
आखिर इतनी उदास क्यों थी
कि,
सबके सब ही जैसे उदास थे,
चुप थे,जबकि
कालदरें इतनी सस्ती थीं
कि पूरे दिन और पूरी रात
सिर्फ एक पैसे में
बात की जा सकती थी…..

सवाल यह नहीं था…

सवाल प्यार करने या न करने का नहीं था दोस्त
सवाल किसी हाँ या न का भी नहीं था
सवाल तो यह था
कि उन आखों में हरियाली क्यूँ नहीं थी
और क्यूँ नहीं थी वहां
खामोश पत्थरों की जगह एक बुडावदार झील?

सवाल मिलने या न मिलने का नहीं था दोस्त
सवाल ख़ुशी और नाराजगी का भी नहीं था
सवाल तो यह था कि
एक उदास तख्ती के लिए
क्यूँ नहीं थी
दुनियाभर में कहीं कोई खड़िया मिट्टी
और क्यूँ नहीं थी एक भी दूब
इतने बड़े मैदान में?

सवाल ताल्लुकात रखने या मिटा देने
का नहीं था दोस्त
सवाल जरूरत या गैर जरूरत का भी नहीं था
सवाल तो यह था कि
इतनी बड़ी दुनिया में कोई इतना अकेला क्यूँ था
और क्यूँ नहीं था उसके पास एक भी सवाल
इतनी बड़ी दुनिया के लिए ?

स्थगित जीवन 

साँसों में चढ़ता उतरता है पल पल
महज़ एक शून्य,
कदम लड़खड़ाते घिसटते चलते हैं
बाढ़ में डूबे एक अदृश्य पथ पर,
लगता है
कि जैसे किसी असावधान पल में
आकाश का विराट अकेलापन ही पी गए,
और पता नहीं क्यों,
एक अच्छे जीवन की चाह में
इतना लम्बा स्थगित जीवन जी गए..

लडकियाँ

कुछ चीजें कभी समझ नहीं आतीं
जैसे कि
लड़कियों को सिर्फ वही लड़के
क्यों बहुत भाते हैं
जो उनसे
बहुत दूर चले जाते हैं

जैसे कि
लडकियां अकेले में ही
इतना सुरीला क्यों गातीं हैं
और क्यों नाचती हैं
भरी दुपहरियों में
बंद कमरे में जादूभरा नाच

जैसे कि
लडकियां काजल और
चश्मों के पीछे
अपनी आँखों का जादू
क्यों छिपाए फिरती हैं
और अपने मनपसंद लड़के को
न देखने की तरह ही
क्यों देखती हैं…

अबोध 

प्यार करने वाले
अबोध भेड़ शावकों की तरह होते हैं
कसाई की गोद में भी
चढ़ जाते हैं
और
आदत से मजबूर बेचारे
भेडिये की थूथन
से भी नाक सटाकर
प्यार सूंघने लगते हैं….

जब तुम चली जाओगी

जब तुम चली जाओगी
तुम्हारी गली में
सूरज तब भी उगेगा
यथावत,
चाँद सही समय पर
दस्तक देना नहीं भूलेगा,
फूल खिलना नहीं छोड़ देंगे,
हवाओं में ताजगी तब भी बनी रहेगी,
बच्चे तुम्हारे घर के नीचे
वैसे ही खेलते मिला करेंगे
पड़ोस के अंकल-आंटी
ठीक पहले की तरह
झगड़ते रहेंगे,
अखबार वाला बिना नागा किये
दुनिया के न रुकने कि खबरें
बालकनी में फेंकता रहेगा,
फिर भी मैं
अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी को
खुजलाता हुआ
अपने अंतर में तुम्हारे सूखते अस्तित्व को
सींचने की कोशिश में
सालों साल बराबर लगा रहूँगा…

एकाकी 

जब मैं
तुम्हारा साथ पाने के लिए
कह रहा था
कि मैं अकेला हूँ
अकेला नहीं था शायद
उस वक़्त भी,
मेरी दो बाजुओं पर
पुरवैया और पछियाव
आसमान में उड़ते
सुग्गों की तरह आकर सुस्ताते थे
सिर पर ठुड्डी
टिकाता था सूरज
और पृथ्वी चलती थी
अपनी धुरी पर फुदकती हुई
मेरे साथ,
लेकिन तुम्हारे जाते ही
भौंचक्का रह गया मैं
जब मेरी परछाईं तक
इठलाती हुई
तुम्हारे पीछे-पीछे चली गई…

इससे पहले कि

सूरज के डूबने
और उगने के बीच
मैं तैयार कर लेना चाहता हूँ
रौशनी के मुट्ठी भर बीज
जिन्हें सवेरा होते ही
दफना सकूँ मैं
धरती के सबसे उर्वर हिस्से में

गोद लेना चाहता हूँ
कविता के कुछ नए शब्द
उम्मीद और ताकत से भरे हुए
जिन्हें आने वाली पीढ़ी
की नर्म हथेली पर
छोड़ सकूँ कंचन पाँख कि तरह

रो लेना चाहता हूँ
कुछ और गर्म आंसू
इससे पहले कि
दुनिया के सारे दुःख
सारी चिंताएं
और
कविताओं के लिए
सारे विषय समाप्त हो जाएँ…

उसकी याद 

बहुत दिनों तक नहीं सुनी
आम की सबसे निचली डाली पर
पसरी कोयल की कूक
बहुत दिनों तक चलता रहा
नाक की सीध में
नहीं देखा आयें-बाएँ- दायें
नहीं देखा पलटकर किसी को
झुकाकर गर्दन नहीं देखा
जमीन पर फैले कचरे के खजाने को
और न ही सर उठाकर देखा
आसमान को उसके असीम वज़ूद के साथ

बहुत दिनों तक टहलता रहा बाजार में
और कुछ भी नहीं खरीदा
महज भरमाता रहा अपने आप को
जैसे कि मैं भी…
बहुत दिनों तक नहीं की
अपने आप से भी बात
नहीं बचाया ‘मैं’ के लिए भी जरा सा वक़्त
जबकि मेरा ‘मैं’ मुझसे मिलकर
‘उसके’ बारे में बतियाना चाहता था

लेकिन आज बड़े दिनों बाद
तडके चार बजे
दबोच लिया गया मुझे
एक भगोड़े अपराधी की तरह
जबकि मैं था निहत्था, अकेला
और गलती से जाग गया था
इतनी तड़के
इतनी तड़के कि जबकि कोई काम नहीं होता
मैं बिस्तर पर बैठा हतप्रभ सा
देख रहा था कमरे की छत को
सिनेमा के परदे की तरह
भभक रही थीं आँखें प्यास से
और मैं यादों के कुएं में
झाँक रहा था गहराई से…
‘शायद बहुत नीचे उतर गया है पानी…
आज तो सारी डोरियाँ कम पड़ रही हैं…’

आज बहुत दिनों बाद हुआ हूँ
इतना अधिक परेशान
बहुत दिनों बाद लौटा हूँ बाजार से घर
बहुत दिनों बाद कर रहा हूँ
‘मैं’ से बातचीत
बहुत दिनों बाद लगी है मर्मान्तक सी प्यास
आज बहुत दिनों बाद आई है
उसकी इतनी अधिक याद..

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